
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में शेयर बाजार में हाहाकार की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर तो नहीं ही है, बिजनेस पेज पर जरूर सात कॉलम की लीड है। लेकिन यहां खबर का शीर्षक है, ट्रम्प टैरिफ हमले से (शेयर) बाजार में मंदी की शुरुआत। इसके साथ की खबरों में एक शीर्षक है, दुनिया भर के स्टॉक प्रभावित, चीन जवाबी हमला कर सकता है। मेरे आठ अखबारों में अकेले नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड की बराबरी में सेकेंड लीड है और बाजर में हाहाकार शीर्षक के साथ बताया गया है कि सेनसेक्स 1414 अंक टूटा जबकि निफ्टी 420 अंक लुढ़का। द टेलीग्राफ ने इसके लिए अमेरिकी टैरिफ को जिम्मेदार बताया है और यह भी कहा है कि इससे पूरी दुनिया प्रभावित है लेकिन भारत में जो हुआ है वह भारत में खबर तो है ही? फिर भी यह खबर पहले पन्ने पर क्यों नहीं है, मैं नहीं जानता। मुझे इस खबर की जानकारी पहले से थी गूगल करने पर जो शीर्षक मिले उनमें कुछ इस प्रकार हैं :
– शेयर बाजार में हाहाकार! 30 साल का रिकार्ड टूटा
– सेंसेक्स – निफ्टी खुलते ही धड़ाम, निवेशकों में ना उम्मीदी
– शेयर बाजार में भारी गिरावट, निवेशकों पर आफत
– निवेशकों के नौ लाख करोड़ रुपये तक खाक
– सेंसेक्स 1000 लुढ़का, निफ्टी 22,300 के नीचे
– एक महीने में 40 लाख करोड़ स्वाहा …
ऐसे में अखबारों ने न सिर्फ इस खबर को कम महत्व दिया है बल्कि एक तथाकथित सकारात्मक या आशावादी खबर को भरपूर प्रचार दिया है, “तीसरी तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था 6.2 प्रतिशत बढ़ी”। कहने की जरूरत नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था (और व्यवस्था भी) विदेशी हमलों या ट्रम्प के टैरिफ हमले को नहीं झेल पा रही है, शेयर बाजार में हाहाकार के स्थानीय कारण भी हो सकते हैं और इन सब कारणों से यह खबर तो है ही। अगर शेयर मार्केट में हाहाकार है, उसके कारण छिपाये जायेंगे तो निवेशकों को नुकसान होने की आशंक बनी रहेगी। इसलिए, लोगों को सतर्क किया जाना चाहिये (पहले किया गया होता तो और बेहतर था)। यह सब नहीं करके इस सच को नहीं बताना या छिपाना या सब चंगा सी के मूड में रहना निवेशकों को ही नहीं खुद को भी भ्रम में रखना है। अभी तक यह माना जा रहा था कि मध्यम वर्ग को मोदी सरकार से शिकायत नहीं है क्योंकि वह शेयर बाजार के उतार चढ़ाव से कमा रहा है। अब अगर यहां भी कमाई नहीं होगी तो बेरोजगारी का असर बढ़ेगा। जो स्थितियां हैं उससे नहीं लगता है कि निवेशकों को बाजार से कुछ उम्मीद है। ऐसे में निवेशकों को वास्तविकता नहीं बताना, उल्टे जीडीपी बेहतर होने की खबर देना उन्हें भ्रम में रखना है। आज ज्यादातर अखबारों ने यही किया है।
इंडियन एक्सप्रेस ने यूरोपीय यूनियन के साथ करार की तैयारियों को लीड बनाया है और शीर्षक में ही ट्रम्प को शेयर मार्केट की हालत का जिम्मेदार ठहराया है। शेयर बाजार की खबर भी है और इसका शीर्षक लीड का उपशीर्षक है। खबर के अनुसार, सितंबर में शिखर पर होने के बाद सेनसेक्स 1.9 प्रतिशत गिरा; निफ्टी 15 प्रतिशत। शेयर मार्केट की खबर को लीड नहीं बनाने का एक कारण यह भी हो सकता है कि आम पाठक शेयर बाजार में धंधा नहीं करते हैं और जो करते हैं वो इन आम अखबारों के भरोसे नहीं रहते हैं। इसलिये यह खबर आमतौर पर मेरे अखबारों के लिए भले नहीं हो विश्वगुरू के यहां जो हो रहा है उसके नागरिकों को बताने के लिए होना ही चाहिये था और खबर पहले पन्ने पर होती तभी समझ में आता कि मामला कितना गंभीर है। जब यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है तो जीडीपी बेहतर होने की खबरों से नागरिकों को भ्रम होगा भले शेयर बाजार पर इसका असर नहीं पड़े। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर सिंगल कॉलम में है।
दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, संबंधों में मजबूती के लिए प्रधानमंत्री, ईयू प्रमुख ने बोल्ड रोडमैप तैयार किया : एफटीए (मु्क्त व्यापार करार) 2025 के अंत तक। शेयर बाजार की खबर नहीं है और यह खबर सरकार का प्रचार ही है। जीडीपी बेहतर होने की खबर इसके नीचे चार कॉलम में है और अखबार सब हरा-हरा दिखा रहे हैं। सीएजी की रिपोर्ट के हवाले से आम आदमी पार्टी की आलोचना करने वाली खबर सेकेंड लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में सरकारी प्रचार वाली दोनों खबरें तो हैं शेयर बाजार की खबर भी है। ईयू वाली खबर के साथ एक खबर यह बताती है कि सुरक्षा, रक्षा संबंधों को गति दी गई है। पहले पन्ने पर एक जैसी (आर्थिक मामलों की) चार खबरों (आधा पन्ना विज्ञापन है) की बजाय कुछ दूसरी खबर भी हो सकती थी या होनी चाहिये थी। आज एक खबर, यह भी है कि वहां की ‘सरकार’ ने मणिपुर में हथियार लौटाने के लिए समय सीमा बढ़ा दी है। इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने का एक एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड है। इसके अनुसार सेनसेक्स जब आठ महीने के निम्नतम स्तर पर है तो यह (बचे-खुचे) शेयर बेचकर छुट्टी पाने का मौका है और जो मिले उससे (या डुबोने के लिए बचा हो तो उससे) बड़ी पूंजी में बिखरे हुए निवेश करने का ‘मौका’ है। मुझे लगता है कि यह लुटे-पिटे निवेशकों को सांत्वना देने वाली प्रतिभाशाली खबर और सलाह है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में सरकारी खबरें प्रचार की तरह नहीं हैं और लीड आर्थिक खबरों से अलग, उत्तराखंड में हुए हादसे की खबर है। यह द हिन्दू और द टेलीग्राफ के साथ अमर उजाला में भी लीड है। शीर्षक है, चमोली में बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) के कैंप पर ग्लेशियर टूटा… 33 मजदूर बचाये गये, 22 अब भी फंसे। मुझे लगता है कि हिन्दुओं की रक्षा करने, मंदिर बनवाने वाली सरकार के शासन में प्राकृतिक आपदाओं की संख्या कम नहीं हुई है। सरकार ने हिन्दुओं का क्या भला किया और इस दौरान हादसों में कितने मरे (या मोक्ष मिला) का हिसाब होना चाहिये और सरकार प्रशासन के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियां नहीं गिनाती है तो हिन्दुओं को हुए नफा-नुकसान का ही हिसाब कर ले। यह अजीब स्थिति है कि दूसरी सरकारों का काम देखा जाये उनके शीश महल को मुद्दा बनाया जाये और भाजपा की सरकारें आस्था की डुबकी लगवाकर वोट लें। व्यवस्था सर्वोच्च स्तर पर झूठ बोलने की भी पुष्टि न करे और उसमें सरकार की सारी ताकत वैसे ही लगा दी जाये जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाले पैनल पर चर्चा टालने के लिये लगाई गई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने पर विज्ञापन कई अखबारों के मुकाबले कम है फिर भी यहां प्रचार तो कम है ही, खबरों की विविधता भी है। इनमें एक खबर यह भी है कि दिल्ली की एक अदालत ने पूछा है कि पीएमएलए के आरोपी को निश्चित समय तक जेल में क्यों रखा जाना चाहिये। यहां यह उल्लेखनीय है कि द वायर में प्रकाशित एक लेख में सौरव दास ने लिखा है कि आम आदमी पार्टी के नेताओं के मामले में सुनवाई में देरी करके और बिना तत्परता के कार्य करके सर्वोच्च न्यायालय ने चालाकी से यह सुनिश्चित किया कि दिल्ली की निर्वाचित सरकार के हाथ बंधे रहें। सौरव दास ने अपने इस लेख में लिखा है, दिल्ली में आम आदमी पार्टी की चुनावी हार की व्याख्या करने वाले कई विश्लेषणों में एक महत्वपूर्ण भूमिका छूट गई है – वह है सुप्रीम कोर्ट। अभी यह मुद्दा नहीं है लेकिन अखबारों में इसे भी मुद्दा होना चाहिये ।
द हिन्दू में भी ग्लेशियर फटने और उसमें लापता 22 लोगों की खबर लीड है लेकिन जीडीपी बढ़ने या बेहतर होने की खबर भी सेकेंड लीड है। सरकारी प्रचार की एक खबर यहां भी पांच कॉलम में छपी है। इस खबर के अनुसार, केंद्र, दिल्ली सरकार …, पुलिस महीने में एक बार मिलेगी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि दिल्ली शहर को आदर्श राजधानी बनाने के लिए सहयोग की जरूरत है। यहां यह दिलचस्प है कि भाजपा ने आम आदमी पार्टी की सरकार के सहयोग से दिल्ली को बेहतर बनाने के प्रयास नहीं किये। तरह-तरह से रोड़े अटकाये और डबल इंजन वाले राज्यों के लिए भी कुछ खास प्रयास नहीं किया। अभी दिल्ली पुलिस के साथ जिस पैठक की जरूरत समझी जा रही है वह पहले भी हो सकती थी और अगर डबल इंजन वाले राज्य में ही होनी है तो एनसीआर की पुलिस के साथ केंद्रीय गृहमंत्री की बैठक हो ही सकती थी। वह सब नहीं हुआ। अपराध और अव्यवस्था चलती रही और सरकार ने अब काम करना शुरू किया है। अमर उजाला की मानें तो अब बांग्लादेशी और रोहिंग्या के खिलाफ भी अभियान चलेगा। इससे पता चलता है कि भाजपा की सरकार कैसे काम करती है या उसकी प्राथमिकतायें क्या हैं।


