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हम सितारों की संतान हैं!

नवमीत नव-

आज कार्ल सेगन का जन्मदिन है। वह कहते हैं कि हमारे डीएनए की नाइट्रोजन, हमारे दाँतों का कैल्शियम, हमारे रक्त का लोहा, सब किसी फटते हुए सितारे के अवशेष से बने हुए हैं।”

तो क्या हममें भी तो वही तत्व हैं जो सितारों में हैं? “मतलब हम भी सितारों की तरह चमक सकते हैं?”

बिलकुल चमक सकते हैं। कितने ही लोग स्टार का दर्जा लिये होते हैं। कोई स्टार क्रिकेटर होता है, कोई स्टार अभिनेता तो कोई स्टार वैज्ञानिक।

लेकिन यह बात रूपक के तौर पर ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक तौर पर भी सच है।

“We are made of star stuff.” सेगन यही तो बताते हैं। जब लगभग 13.8 अरब साल पहले वह महाविस्फोट हुआ था तो उसके कुछ समय बाद सबसे हल्की गैसें, हाइड्रोजन और हीलियम, बनी थीं।

फिर समयधारा में बाकी सबकुछ यानी ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन, लोहा, सोना, यूरेनियम एंड सो ऑन, बनते चले गये।

“लेकिन कहाँ?”, मैं सोचता हूँ। उसी कॉस्मिक भट्टी में। सितारों के गर्भ में। जब कोई सितारा जन्म लेता है, तो उसके केंद्र में हाइड्रोजन के परमाणु आपस में टकराकर हीलियम बनाते हैं। इस प्रक्रिया को कहते हैं नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)।

यही प्रक्रिया सूर्य और बाकी सभी सितारों को रोज जलाती है, प्रकाश और ऊष्मा उत्पन्न करती है, और हमें प्रदान करती है जीवन ऊर्जा।

सितारे के केंद्र का गुरुत्वाकर्षण अत्यधिक होता है जो उसे अपने अंदर खींचता है, लेकिन उसके भीतर हो रहे नाभिकीय संलयन से पैदा होने वाली भीषण ऊर्जा उसे बाहर धकेलती है। इन दो विपरीत महाशक्तियों की यह एकता और उनका द्वन्द्व सितारे के अस्तित्व का कारण है। लेकिन अगर यह द्वन्द्व खत्म हो जाये तो?

तो सितारा ही खत्म हो जायेगा। जब किसी महा विशाल सितारे की हाइड्रोजन समाप्त हो जाती है, तो सितारे के भीतर ताप और दबाव में भारी बदलाव आने लगते हैं। वह अपने ही गुरुत्वाकर्षण के बोझ से सिमटने लगता है। और फिर… फिर होता है सुपरनोवा विस्फोट। और इसके साथ होती है तारे की मृत्यु। लेकिन यह मृत्यु अपने साथ अनेक तत्वों को जन्म भी देती है।

किसी बड़े सितारे की मृत्यु कोई साधारण घटना नहीं होती। यह कॉस्मॉस की सबसे महत्वपूर्ण इवेंट्स में से एक होती है।

जैसे ही किसी सितारे का ईंधन खत्म होता है, उसका खुद का गुरुत्वाकर्षण उसे भीतर की ओर खींचता है, और बाहर की परतें ज़ोरदार विस्फोट से फट पड़ती हैं। अब इसका तापमान अरबों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है।

इसके अंदर दबाव इतना प्रचंड होता है कि हीलियम, कार्बन, और ऑक्सीजन जैसे हल्के तत्व एक दूसरे से जुड़कर भारी तत्व जैसे लोहा, सोना, यूरेनियम, सिलिकॉन, कैल्शियम आदि बनाने लगते हैं।

“अरे इसे तो Nucleosynthesis कहते हैं न?”, मुझे याद आता है। बिलकुल। Nucleosynthesis यानी नए परमाणुओं का निर्माण। सुपरनोवा के बाद ये तत्व अंतरिक्ष में बिखर जाते हैं। सितारों की धूल बनकर।

इसी धूल से नए सितारे, नए ग्रह, नये सौर मंडलों का निर्माण होता है। “एक सितारे जन्म, उसकी मृत्यु और उसके बाद उसके अवशेषों से दूसरे सितारों का जन्म। सृजन-विनाश-सृजन की यह द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया सिर्फ सितारे ही नहीं बल्कि हमारे पूरे अस्तित्व का भी आधार है।”

लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले हुए एक सुपरनोवा विस्फोट हुआ था जिसके बाद हमारे सौर मंडल, सूर्य, पृथ्वी और अंततः हमारे इस प्यारे ग्रह पर जीवन का उद्भव हुआ था। “लेकिन यह बात हम इतने पक्के तौर पर कैसे कह सकते हैं?”, मैं खुद से फिर पूछता हूँ।

लोहे का एक समस्थानिक (isotope) hotaIron-60 होता है। यह सिर्फ़ सुपरनोवा विस्फोट के दौरान बनता है। लेकिन यह हमारी पृथ्वी की पपड़ी में भी पाया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि हमारी धरती में पाया जाने वाला लोहा किसी प्राचीन तारे के हृदय में पिघला था।

यही लोहा हीमोग्लोबिन बनाता है जो हमारे रक्त को लाल रंग प्रदान करता है। यही हीमोग्लोबिन जीवनदायिनी ऑक्सीजन को हमारे उत्तकों तक लेकर जाता है। और यह ऑक्सीजन भी तो अरबों साल पहले किसी तारे के गर्भ में बनी थी।

और तो और हमारे दाँतों में जो कैल्शियम है, वह भी किसी मृत सितारे की देन है।

यह बिलकुल किसी परिकथा की तरह है। एक विशाल सितारा जो अरबों वर्ष तक अपनी चमक बिखेर देने के बाद सुपरनोवा में फट गया था। उसके गर्भ से निकली धूल और राख़ फिर से एक सितारे, उसके सौर मंडल और ग्रहों को जन्म देती है। उन्हीं में से एक ग्रह पर करोड़ों वर्ष के उद्विकास के बाद एक जीव खुद से पूछता है कि, “मैं कौन हूँ?”

“वह जीव आप हैं, मैं हूँ। हम वह “स्टार स्टफ” हैं जो इस विराट ब्रह्माण्ड का उद्विकास हैं। इसका चेतन हिस्सा हैं जो खुद को समझ सकता है।” मैं खुद को बताता हूँ।

स्पेक्ट्रोस्कोपी (Spectroscopy) से हम जान सकते हैं कि सितारों में कौन कौन से तत्व हैं। वही तत्व हमें धरती पर भी मिलते हैं। “हम वही ब्रह्मांड हैं जो स्वयं को देख रहा है।” कार्ल सेगन कहते हैं।

“हम इस विराट ब्रह्माण्ड का हिस्सा हैं लेकिन इसके आगे हमारा अस्तित्व एक धूल के कण जितना भी नहीं है। साथ ही यह भी सच है कि धूल का यह कण अपने अस्तित्व को जानने समझने की कोशिश कर रहा है। यही हमारी लघुता और हमारी विशिष्टता भी है।”, मैं सोच रहा हूँ।

कितना अद्भुत है न? सुपरनोवा अवशेषों के रासायनिक विश्लेषण से हमें पता चला है कि इसमें भारी तत्वों का निर्माण होता है।

उल्कापिंड यानी मेटियोराइट्स (Meteorites) में मिले कुछ समस्थानिक ऐसे हैं जो पृथ्वी पर भी पाये जाते हैं। कुछ उल्कापिंडों में तो न्यूक्लियोटाइड जैसे जटिल कार्बनिक यौगिक भी पाये गये हैं। यह इस बात का संकेत है कि हमारा पदार्थ उन्हीं तारकीय स्रोतों से आया है।

“हम सितारों की संतान हैं।” जब हम यह कहते हैं तो इसका अर्थ होता है कि हम इस ब्रह्मांड से अलग नहीं, बल्कि उसी कॉस्मॉस का चेतन अंश हैं। हम उसी अरबों साल पुरानी प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो अभी भी चल रही है। सितारे बन रहे हैं, फट रहे हैं, नए ग्रह बन रहे हैं।

और हो सकता है कि कहीं किसी दूर दुनिया में शायद नया जीवन उभर रहा हो। शायद किसी और दुनिया में भी किन्हीं प्राणियों ने श्रम द्वारा एक अद्भुत समाज का सृजन कर लिया हो। शायद कहीं और भी कोई क्रांतिकारी सिद्धांतकार किसी क्रांति की सफलता की घोषणा कर रहा हो या फिर कोई जीनियस वैज्ञानिक सापेक्षता को परिभाषित कर रहा हो।

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