संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में 220 यात्रियों के साथ श्रीनगर जा रहे इंडिगो के क्षतिग्रस्त विमान के साथ जो हुआ उसकी खबर मेरे आठों अखबारों में अलग है। पहले पन्ने से गायब,सिंगल कॉलम की और लीड। द टेलीग्राफ में यह नक्शे-फोटो के साथ लीड है और एक शब्द का शीर्षक है जो अंग्रेजी के फ्लाइट और राइट को मिलाकर बनाया गया है इसमें एल ठिकाने पर नहीं है। मिलकर बना शब्द उड़ान के दौरान हो सकने वाले डर (फ्राइट) के लिये बनाया गया है।
अखबार ने बताया है कि 36 हजार फीट की उंचाई पर एक विमान सेवा कंपनी की भिड़ंत एक डरावने तूफान जैसे खतरे और एक प्रतिकूल दुश्मन से हुई। मौजूदा परिस्थिति में जब सरकार और खासकर प्रधानमंत्री यह बताने और प्रचारित करने में लगे हुए हैं कि ऑपरेशन सिन्दूर ने पाकिस्तान को परास्त कर दिया है तो यह जानना जरूरी है कि उसकी कीमत क्या चुकानी पड़ रही है और कौन चुका रहा है। पड़ोसी देश से संबंध और आम नागरिकों के जीवन को खतरे में डालने की उसकी जुर्रत देशवासियों को मालूम होनी चाहिये पर तब प्रधानमंत्री के यह कहने का क्या मतलब रह जायेगा कि उनकी रगों में खून नहीं सिन्दूर बह रहा है। ठीक है कि ऐसी खबरें अखबारों की अपनी प्राथमिकता और स्थान के अनुसार छपती हैं लेकिन सरकार का प्रचार करने वाले अखबारों में नहीं हो और उन्हीं में विस्तार से जो जो कभी-कभी या अक्सर सरकार के खिलाफ खबरें छापते हैं तो मीडिया का बंटवारा भी साफ है और बांटो व राज करो का असर संपादकों में भी हुआ है। आइये पहले जान लें कि खबर क्या है।
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली से श्रीनगर के लिए उड़ान भरने वाले इंडिगो के विमान ने बुधवार को ओलावृष्टि और तेज झटके झेले जिससे कॉकपिट में कई चेतावनियाँ ट्रिगर हुईं, विमान क्षतिग्रस्त हो गया और खतरनाक तरीके से नीचे गिरा फिर भी पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र के उपयोग की इजाजत नहीं मिली। सब झेलकर भी उड़ान 6ई 2142 अंततः श्रीनगर में सुरक्षित रूप से उतारा गया, क्योंकि पायलटों ने मैन्युअल उड़ान कौशल पर भरोसा किया। किसी के घायल होने की सूचना नहीं है, लेकिन विमान के “नोज़ रेडम” के क्षतिग्रस्त होने की खबर आ जानते हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि पूरा मामला क्या था और आपको क्या बताया गया। दिक्कत इतनी ही नहीं है। जो पहले दिन नहीं बताया गया या नहीं छपा वह अगले दिन भी ज्यादातर अखाबरों में यह बताने के लिए नहीं छपा है कि पाकिस्तान ने 220 से ज्यादा यात्रियों की सुरक्षा के लिए अपने वायुक्षेत्र के उपयोग की इजाजत नहीं दी। कुछ अखबारों की खबर है कि भारतीय वायु सेना ने भी इससे मना किया पर टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है कि पाकिस्तान की झाड़ के बाद भारतीय वायु सेना ने विमान को सुरक्षित लैंड करने में मदद की। कहने की जरूरत नहीं है कि 220 से ज्यादा यात्रियों की जान मुश्किल में थी तो हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की इजाजात न देना और झाड़ पिलाना खबर है। विमान को सुरक्षित उतरने में वायु सेना ही मदद कर सकती है वरना नौसेना और घुड़सवार सनिक क्या काम आते?
भारतीय वायु सेना ने अगर कुछ किया तो अपना काम किया और इसका श्रेय अगर किसी को दिया जाना है तो प्रधानमंत्री को दिया जाये। मुझे नहीं लगता कि वायुसेना में कोई इस स्थिति से खुश होगा या ऐसा कर पाने का मौका पाकर खुश होगा। जो भी हो, अगर यह खबर है तो इससे पहले की खबर होगी, पाकिस्तान ने वायु क्षेत्र का उपयोग नहीं करने दिया।
द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार विमान में तृणमूल के पांच सासंद थे। इनमें से एक, सागारिका घोष के हवाले से एनडीटीवी ने कहा, “यह मौत के करीब का एक अनुभव था, लोग चिल्ला रहे थे, प्रार्थना कर रहे थे, घबरा रहे थे। हमें बचाने वाले पायलट को सलाम। अक्सर विमान यात्रा करने वाले शेख समीउल्लाह ने कहा कि वह और अन्य यात्री चिल्ला रहे थे और यहां तक कि फ्लाइट अटेंडेंट भी रो रहे थे, द न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट की है। 33 वर्षीय समीउल्लाह ने यात्रियों द्वारा हिंदी और अरबी में प्रार्थना करने के बारे में कहा, “वे अपने भगवान को पुकार रहे थे, हम अपने भगवान को पुकार रहे थे।” “हमें लगा कि यह हमारी आखिरी उड़ान है; हमें लगा कि हम मरने जा रहे हैं।” कहने की जरूरत नहीं है कि विमान में जब तृणमूल के पांच सासंद थे तो मामला खुलना ही था और इसे छिपाने की कोशिश नहीं की जाती तो अच्छा होता। पर आगे की सोचने का जमाना नहीं है और खबर तो आज भी जो छपी है, आपने देखी ही होगी। विवरण से लगता है कि विमान ऐसे ऊपर-नीचे हो रहा था और हिल रहा था जैसे अनियंत्रित हो गया हो। इससे बचने के लिए विमान को रास्ता बदलना था पर वह नहीं बदल सकता था क्योंकि वह रास्ता पाकिस्तान में था और पाकिस्तान से हम युद्ध लड़ रहे थे। मोटे तौर पर ऑपरेशन सिन्दूर में जिन नागरिकों की जान गई उनके अलावा इनकी भी जोखिम में थी। यह सब तब जब पहलगाम करने वाले को पकड़ा नहीं गया है। पुलवामा वाले को हम भूल चके हैं और बहुत पहले एक हमारे कब्जे में था तो उसे कंधार छोड़कर आना पड़ा उसने जो कांड किये वो हैं ही। फिर भी कश्मीर में शांति स्थापित करने का भरोसा ऐसा था जैसे 370 खत्म करते आतंकवाद खत्म हो जाना था। और मुंबई हमले के दौरान जिसे पकड़ा गया था उसे कानून के मुताबिक सजा देने की कार्रवाई चल रही थी तो सरकारी वकील ने बिरयानी खिलाने की खबर फैलाई बदले में विधानसभा टिकट पाया। कुल मिलाकर आतंकी पकड़ा जाये तो बुलडोजर न्याय होना चाहिये या पकड़ा ही नहीं जायेगा। यह खबर इस राजनीति को सूट नहीं करती इसलिए हेडलाइन मैनेजमेंट का शिकार हो गई।
टाइम्स ऑफ इंडिया की कहानी इस विमान के यात्रियों या पाकिस्तान के इनकार की नहीं, भारतीय वायु सेना की वीरता की है। इसके साथ एक खबर फ्लियू मैनुअली, पेज 16 भी है। मैं अंदर देखने की सोच ही रहा था कि मेरी नजर द डेली गार्जियन पर पड़ी। इसमें लीड का उपशीर्षक है, विमान को ऑटो पायलट की नाकामी का सामने करना पड़ा। मेरी दिलचस्पी विमान की खराबी, वायुसेना की वीरता के मुकाबले पाकिस्तान के इनकार पर ज्यादा है और अगर कोई हादसा हो जाता तो पाकिस्तान की खबर कौन लेता या कोई नहीं लेता। टाइम्स ऑफ इंडिया में सेना की तारीफ वाली खबर के साथ में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का यह दावा भी कि पाकिस्तान आतंक के प्रायोजक के रूप में पहचान लिया गया है। मुझे लगता है कि यह बहुत पुरानी बात है और यह जरूर संभव है कि किसी ने नया जाना हो। गृहमंत्री ने कहा तो खबर भी है लेकिन आज जो खबर है वह पहले पन्ने से तो पूरी तरह गोल है। हालांकि, टाइम्स ऑफ इंडिया में कर्नाटक की एक खबर है जिसके अनुसार सामूहिक बलात्कार के सात आरोपियों का जमानत मिलने पर ऐसा स्वागत किया गया कि चार को फिर से जेल भेज दिया गया है। स्वागत के वीडियो सामने आने के बाद एसपी ने कहा कि सात में से चार को फिर से जेल भेज दिया गया है। जाहिर है पुलिस प्रमुख काम करें या उन्हें करने दिया जाये तो बहुत कम मामले मंत्रियों तक पहुचते हैं। इंडिगो की कहानी हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम में है। इंडिगो की मुश्किल वाली उड़ान के बाद पायलट को बैठा दिया गया है। पहले पन्ने पर बहुत संक्षिप्त जानकारी है। जो है उसके अनुसार पायलट की लाहौर और श्रीनगर के ट्रांफिक कंट्रोलर से बातचीत के संबंध में नई जानकारी है।
द हिन्दू की चार कॉलम की खबर का शीर्षक है, आंधी-तूफान पीड़ित इंडिगो की उड़ान को पाकिस्तानी वायु क्षेत्र के उपयोग की इजाजत नहीं मिली। डीजीसीए ने शुक्रवार को कहा कि भारतीय सेना ने भी विमान को अंतरराष्ट्रीय सीमा की ओर ले जाने की इजाजत मांगने वाले आग्रह को स्वीकार नहीं किया। खबर के अनुसार इससे संबंधित पाकिस्तान के नोटिस 23 मई की आधी रात तक प्रभावी हैं। इंडियन एक्सप्रेस की खबर डीजीसीए की सूचनाओं पर आधारित है। इसके अनुसार वह जांच कर रहा है कि पायलट ने मार्ग बदलकर पाकिस्तान की तरफ जाने को क्यों कहा और लाहौर एयर ट्राफिक कंट्रोल से बात की थी। डीजीसीए को पता है कि दोनों ही आग्रहों को नकार दिया गया था लेकिन जांच तो जांच है। मेरे जैसे पाठक के लिये यह तय करना मुश्किल है कि अनुमति मांगना अपराध है या नहीं देना और नहीं देना अपराध है तो पायलट की क्या गलती है और इसमें जांच क्या होना है। अगर तकनीकी मामला है विद्वानों को ही समझ में आना है तो उडड़न की पत्रिका में छपती, सामान्य अखबार में क्यों छपी या छपवाई गई है? फिर भी जो है सो है।
दि एशियन एज में इंडिगो के विमान से संबंधित कोई खबर नहीं है लेकिन सांसदों की टीम टोक्यो, मास्को पहुंची, विश्व नेताओं से मिलेगी – सिंगल कॉलम की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम खबर के अनुसार, रूस पहुंचने वाले भारतीय सांसदों की टीम को रूस के वायु क्षेत्र में डर का सामना करना पड़ा। खबर के अनुसार यूक्रेन के ड्रोन हमले के कारण हवाई अड्डे पर विमानों का परिचालन निलंबित कर दिया गया। कहना सही नहीं होगा कि युद्ध रुकवाने वाले पॉपॉ अपने सांसदों के लिए ड्रोन हमले करा रहे हैं या कम से कम रुकवा नहीं पा रहे हैं। जो भी हो, इस मामले में नवोदय टाइम्स की रिपोर्टिंग निष्पक्ष है। दो कॉलम की खबर का मुख्य शीर्षक है, रूस पहुंचा भारतीय दल यूक्रेन के ड्रोन हमले में फंसा। उपशीर्षक है, 45 मिनट तक मास्को के आकाश में चक्कर कटता रहा विमान। हिन्दी अखबारों में हवाई यात्रा की खबरें नहीं छापना समझ में आता है लेकिन यहां मामला कुछ और है। फिर भी नवोदय टाइम्स में मास्को में ड्रोन हमले की खबर है और अंग्रेजी के अखबार में नहीं है। दिलचस्प यह है कि नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार भारत और पाकिस्तान ने अपने हवाई क्षेत्रों में एक दूसर के लिए प्रतिबंध की मियाद एक महीने बढ़ाई। आप जानते हैं कि इससे विमानों को घूम कर जाना पड़ता है और इसमें खर्चा ज्यादा होता है, समय भी ज्यादा लगता है। व्यावसायिक कंपनी तो ऐसा नुकसान उठाने से रही वह यात्रियों से ही वसूलेगी। पर आपात स्थिति में वायु क्षेत्र का भी उपयोग नहीं करने दिया तो इंडिगो जैसे हादसे होते रह सकते हैं। हालांकि हादसे की खबर तो छपती ही है लेकिन हादसे से पहले की खबर नहीं छापना अघोषित सेंसर है। बाकी डीजीसीए की कार्रवाई के बाद समझ में आयेगा।
आतंकवाद पर भारत की कार्रवाई और उसके असर के बीच आज जब संबंधित खबर गायब है या ढंग से नहीं छपी है तब अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, आतंकवाद पर पाकिस्तान को फिर निगरानी सूची में डालने के लिए पुख्ता सबूत देगा भारत। नवोदय टाइम्स ने राहुल गांधी का सवाल, पाकिस्तान पर भरोसा क्यों किया छापा है। बेशक यह अमर उजाला के शीर्षक के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण और गंभीर मुद्दा है। इसके अलावा राहुल गांधी का आरोप है कि भारत की विदेश नीति ध्वस्त है। इसमें एक सवाल है, पाकिस्तान की निन्दा करने में एक भी देश ने हमारा समर्थन क्यों नहीं किया। अमर उजाला में एक खबर है, आतंकवाद पर रूस भी हमारे साथ। यह भारतीय सांसदों के मास्को पहुंचने की खबर ही है। मैं अपने इस कॉलम के जरिये यह बताना चाहता था कि अखबार में काम करने वाले ज्यादातर लोग भाजपा समर्थक या उसी विचार धारा के हैं तबके लोग अब जो कर रहे हैं उससे भी यह स्पष्ट है और तब भी लगता था कि एक खास विचारधारा के लोगों को अखबारों में भरा गया है। नेताओं के बच्चे, बेटियां और दामाद भी अखबारों में थे। अब नौकरी अच्छी नहीं है पर अब अखबार में जरूरत भी नहीं है। ये बर्बाद किये जा चुके हैं। जो नहीं हुए हैं उन्हें विपक्षी विरोधी, कांग्रेसी कहा ही जाता है। जरूरत हुई तो छापे-वापे से ठीक कर दिये जायेंगे।
नवोदय टाइम्स की लीड है, पाक के वित्तीय पोषण पर दोतरफा प्रहार की तैयारी। साफ है आतंकवाद खत्म करने या पाकिस्तान को ठीक करने का मामला अभी चल ही रहा है। क्या सरकार सारे काम छोड़कर एक ही काम करती रहेगी। यह किसी तरह से उचित हो सकता है। क्या पूरी सरकार का इस एक काम में लगी रहना ठीक है। पर हेडलाइन मैनेजमेंट ऐसा ही है और यह बिहार व बंगाल के चुनावों के लिए है। एशियन एज में एक अलग लीड है, मोदी ने उत्तर पूर्व को भारत का नया विकास इंजन बताया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने कहा है कि यह बांग्लादेश के मोहम्द युनूस ने जो कहा था उसका जवाब है। द हिन्दू ने इसे और कायदे से पेश किया है, उत्तर पूर्व दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार का गेटवे होगा। यानी जनहित और देश के मुद्दों से अलग सिर्फ प्रचार ली खबरें। सजाकर।


