सुभाष सिंह सुमन-
ट्रंप ने टैरिफ की तारीख भी बता दी. भारत का नाम लेकर बोले 2 अप्रैल से लगेगा. ग्लोबल मार्केट हिला हुआ ही है. रात में वॉल स्ट्रीट पर सारे इंडेक्स बढ़िया गिरे. एफपीआई बेच ही रहे हैं ताबड़तोड़. फिर सेंसेक्स 800-1000 अंक कैसे चढ़ा?
इसका जवाब बड़ा आसान भी है और बड़ा जटिल भी. बाजार चढ़ा, क्योंकि कोई तो खरीदने लगा शेयर. साफ-सीधी बात है. किसी एक के अकेले की क्षमता नहीं है बाजार 1% उठा दे. मतलब कई लोग खरीद रहे हैं. उसमें बड़े-छोटे सब शामिल हैं. क्यों खरीद रहे हैं, क्योंकि उनको सौदा सही लग रहा है. और एक कारण ये भी है कि बाजार वाले लोग सबसे बड़े कुमार टाइप के अचानक पैदा हुए शेयर मार्केट एक्सपर्ट्स का छटांक भर का लोड नहीं लेते. आप भी मत लिया करिए. सेहत सही रहेगी. लोड लेंगे तो बीपी-शुगर की दिक्कत बढ़ती जाएगी.
बाजार अभी 5 महीने से गिर रहा है. यह उतना ही सामान्य है, जितना रोज सुबह और शाम होना. 5 साल लगातार चढ़ने वाला बाजार अगर लगातार 5-7 महीने गिर ही जाता है, तो इसमें असामान्य क्या है? 5 साल की रैली में सेंसेक्स 180 पर्सेंट चढ़ गया और अभी 5 महीने गिरने पर 15 पर्सेंट नीचे आया है. इतने में कोई कंगाल या दिवालिया तो कतई नहीं हो सकता, बशर्ते वह मूर्ख या मौसमी न हो.
इसको एक बड़े आसान गणित से समझ सकते हैं. आपके पास 2020 में 1 लाख रुपये थे. 2024 में बढ़कर 10 लाख रुपये हो गए. फिर जनवरी-फरवरी में 1 लाख रुपये उसमें कम हो गये. मार्च में आपके पास होली खोलने के लिए 9 लाख रुपये बचे हुए हैं. इसे गणित की भाषा में 8 लाख रुपये का गेन कहेंगे, न कि 1 लाख रुपये का लॉस.
अभी रोने वाली भीड़ में मुख्य रूप से दो प्रकार के लोग हैं. एक तो वे हैं जो बाजार में तो हैं, लेकिन बेसब्र हैं. रात में सोते हैं और सुबह एलन मस्क के पापा बनकर उठना चाहते हैं. नींद खुलती है और खुद को यथास्थिति में पाते हैं तो पूरे ब्रह्मांड को ही कोसने लग जाते हैं.
बाजार बेसब्रों के लिए नहीं है. खाली बाजार छोड़िए, बेसब्रों के लिए तो यह दुनिया ही नहीं है. बाजार से सबसे बड़े आदमी बने हैं वारेन बफे. सैकड़ों किताबें मिलेंगी बफे की सक्सेस स्टोरी पर. खुद उनकी जुबानी भी बातें मिल जाएंगी. सब जगह एक बात कॉमन मिलेगी कि सब्र का फल मीठा होता है. बफे की दौलत 2000 में 28 अरब डॉलर थी. 2008 में 62 अरब डॉलर हो गई. फिर 2009 में कम होकर 37 अरब डॉलर रह गई. पिछले साल 133 अरब डॉलर तक गई. अभी 155 अरब डॉलर है. यह सक्सेस स्टोरी केस स्टडी है.
2000 के बाद 8 साल में डबल से ज्यादा हो गई, फिर एक साल में लगभग आधी हो गई. भाई को उस समय रो-रोकर प्रशांत महासागर भर देना चाहिए था. लेकिन रुदाली आई नहीं और उसके बाद 15 साल में 5 गुना बढ़ गई दौलत. अब कुछ मानिए या नहीं, लेकिन यह एक बात तो मानेंगे कि बफे सबसे बड़े कुमार टाइप रुदालियों से बहुत ज्यादा बुद्धिमान हैं?
अब किस्सा-कहानी छोड़िए. अभी की बात करते हैं. बाजार जब भी कई साल की रैली लगाता है तो उसमें अनाप-शनाप शेयर चढ़ते हैं. दो कौड़ी के शेयर हीरा बन जाते हैं और अच्छे शेयर भी फालतू चढ़ जाते हैं. इसे बोलते हैं झाग बनना. जैसे बाढ़ का पानी आता है तो बहुत झाग लाता है. झाग के चलते पानी के स्तर का सही अंदाजा नहीं लग पाता है. इसके लिए झाग का साफ होना जरूरी है.
ये जो 5 महीने से बाजार गिरा है, यह बाढ़ के साथ आए झाग की ही सफाई है. एक इन्वेस्टर (ये प्रजाति हमेशा लॉन्ग टर्म का सोचती और करती है) इससे खुश होता है. झाग हटेगा. सही स्तर का पता चलेगा. नाव उतारने में आसानी होगी. रोने वाली भीड़ की दूसरी प्रजाति किनारे पर बैठकर तमाशा देख रही होती है. उसके लिए बाढ़ का पानी आना भी प्रलय है और झाग साफ होना भी सृष्टि का अंत. बाजार जब चढ़ेगा, वे कुंठा में मरेंगे अपना बीपी-शुगर बढ़ाकर. बाजार जब गिरेगा तो सैडिस्टिक प्लेजर लेंगे, इधर-उधर से सतही चीजें जमा कर सैडिस्टिक विश्लेषण करेंगे.
तय करना आपके हाथों में है कि आप किस तरफ रहना चाहते हैं. दोनों विकल्प हमेशा खुले रहते हैं. बाजार के साथ चलेंगे तो तेज धार की थपेड़ तो लगेगी. निश्चित है. लेकिन यह भी उतना ही निश्चित है कि सब्र के साथ चलेंगे तो हाथों के साथ जेबें भी भरेंगी. इसके लिए कोई समय सही या गलत नहीं है. पांच साल, 10 साल, 15-20 साल के लिए चल रहे हैं तो जब पैसे हों, तब लगाइए. सब समय सही है.
अभी झाग कुछ साफ हुआ है तो समय कुछ ज्यादा सही हो गया है. दूसरा विकल्प आसान है. कुछ नहीं करना है. सिर्फ रोना है. रोने के साथ मोदी को गरियाने का तड़का लगाकर बीच-बीच में एडवेंचर भी कर सकते हैं. जैसे बेचारे पांच साल रोए,अभी पांच महीने से मोदी को गरियाकर एडवेंचरस हो रहे हैं.
अंतिम में सबसे जरूरी बात, जो लगातार पूछा जाता है कि बाजार कहां तक गिरेगा और कबसे सुधरना शुरू होगा? तो इसका जवाब कम से कम मेरे पास नहीं है. मुझे लगता है कि इसका सटीक जवाब किसी के पास नहीं है. बाजार को न तो टाइम किया जा सकता है, न टेम किया जा सकता है. मोटा-मोटी अंदाजा जरूर लगा सकते हैं. इसे मैंने दो-चार दिन पहले भी लिखा ही. तीसरी तिमाही में जीडीपी सुधरने लग गई. कर्ज सस्ता होने लगा है. इससे उपभोग सुधरेगा. ग्रामीण उपभोग पहले से ठीक है.
उपभोग सही होगा तो कंपनियों के तिमाही परिणाम सुधरने लगेंगे. मार्च तिमाही में ये भी होने लगेगा. हर साइकिल में होता है ऐसा. जीडीपी ग्रोथ रेट सुधरना शुरू होती है. पीछे-पीछे कंपनियों के परिणाम सुधरने लगते हैं.
पैटर्न इसी तरह का रहता आया है. इसके बाद घरेलू मोर्चे पर कोई दिक्कत नहीं बचती. ग्लोबल लेवल पर दिक्कतें हैं. ट्रेड-टैरिफ वॉर है. लेकिन अब इसका असर बाजार लगभग पचा चुका है. वर्ल्ड वॉर होता दिख नहीं रहा है. देर-सवेर यूक्रेन की तरफ भी गाजा की तरह युद्ध विराम आने वाला है. मतलब ग्लोबल साइड से भी खास दिक्कतें बची नहीं हैं. और जब न घर में दिक्कत रहेगी और न बाहर से दिक्कत होगी, तब बाजार क्या करेगा, इसका उत्तर आप खुद भी जानते हैं.
(डिस्क्लेमर: ये न पूछें कि किन शेयरों में पैसा लगाएं. इसके लिए सेबी ने पेशेवरों की व्यवस्था की है.)



Usman
March 7, 2025 at 7:02 am
Maza aa gya apka article read krne me bahut aacha lekha apne i think mood fun me tha apka jo itne fun k sath lekha