
एक अप्रैल 2026 की बीबीसी की एक खबर, ‘नक्सलवाद लगभग ख़त्म‘, गृह मंत्री अमित शाह के इस दावे में कितनी सच्चाई? का शुरुआती वाक्य था, “सोमवार 30 मार्च 2026 को लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह दावा किया था, नक्सलवाद अब लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुका है… बस्तर में अब स्कूल बन रहे हैं, राशन की दुकानें खुल रही हैं।” मुझे लगता है कि आज इस खबर को दूसरे अखबारों में भी इतनी प्रमुखता तो मिलनी ही चाहिए थी। यह दिलचस्प है कि एक अप्रैल 2026 के अंक में अमर उजाला ने अमित शाह के इस बयान को प्रमुखता नहीं दी थी। दूसरे पहले पन्ने पर दो कॉलम की एक खबर का शीर्षक था, समय सीमा के अंतिम दिन 35 नक्सलियों ने हथियार डाले। इनमें 12 महिलाएं थीं। सरेंडर करने वाले सभी माओवादियों पर था 1.47 करोड़ का इनाम।
संजय कुमार सिंह
आज मेरे कई अखबारों में पश्चिम बंगाल चुनाव की मतगणना और नतीजे कल आने से संबंधित खबर है। सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश को प्रमुखता मिली है लेकिन चुनाव के दौरान युद्ध जैसा माहौल बना देने के बावजूद एक विधानसभा क्षेत्र में फिर से मतदान कराने का फैसला हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस ने इस सूचना को लीड बनाया है लेकिन संबंधित सूचना पहले पन्ने पर नहीं के बराबर है। खबर जानने के लिए अखबार के अंदर के पन्ने पर लीड का टर्न ढूंढ़ना होगा। द टेलीग्राफ में यह खबर सेकेंड लीड है और स्पष्ट शीर्षक है, फालटा में 21 मई को फिर से चुनाव होगा। जाहिर है, हिंसा रोकने और तृणमूल के ‘गुंडों’ को नियंत्रित करने के तमाम दावों और तकरीबन पहली बार बख्तरबंद घाड़ियों के साए में चुनाव कराने के बावजूद मतदान स्थगित करना बड़ा मामला है। इसे दिल्ली के अखबारो में पहले पन्ने पर प्रमुखता नहीं मिली है। पता नहीं, यह हेडलाइट मैनेजमेंट है या यूं ही खबर छूट गई, दब गई या चर्चा में नहीं है। आज की दूसरी बड़ी खबर : छत्तीसगढ़ में आईईडी विस्फोट में चार जवानों के शहीद होने की खबर है। देशबन्धु में यह खबर चार कॉलम में छपी है। अमर उजाला में भी यह चाल कॉलम का बॉटम है। शीर्षक है, कांकेर में नकसलियों की बिछाई आईईडी निष्क्रिय करत समय भीषण विसफोट… चार जवान बलिदान बलिदान। अखबार का उपशीर्षक है, नक्सलवाद मुक्त घोषित होने के बाद छत्तीसगढ़ में पहली घटना। आइए, आपको नक्सवाद मुक्त करने की कहानी बता दें। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में दावा किया था कि देश से नक्सलवाद लगभग पूरी तरह खत्म होने गया है। इससे पहले उन्होंने 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सलवाद मुक्त बनाने का लक्ष्य घोषित किया था। इसके बाद आज की खबर होनी ही नहीं चाहिए थी और हुई तो प्रमुखता से छपनी चाहिए थी। दोनों नहीं हुआ है इसलिए आपको जानना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के बस्तर, सुकमा और बूढ़ा पहाड़ जैसे प्रमुख नक्सली गढ़ों में सुरक्षाबलों की कड़ी कार्रवाई, समर्पण नीति और विकास कार्यों (सड़क, स्कूल, राशन) के चलते लाल नक्सली आतंक अब अपने आखिरी चरण में है।
अमित शाह कश्मीर में आतंकवाद खत्म करने का दावा भी कर चुके हैं। इसी तरह नक्सलवाद को भी जड़ से खत्म करने का दावा किया गया है। इसलिए, सुरक्षाबलों ने छत्तीसगढ़ और आसपास के इलाकों में आक्रामक अभियान चलाकर कवर्धा, बीजापुर और सुकमा से नक्सलियों का सफाया किया है। हाल के वर्षों में 700 से अधिक नक्सली मारे गए, 2,000 से अधिक गिरफ्तार हुए और 4,500 से ज्यादा ने आत्मसमर्पण किया। बस्तर जैसे प्रभावित क्षेत्रों में अब बंदूक की जगह विकास (सड़क, स्कूल, मोबाइल टावर) को प्राथमिकता दी जा रही है। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सरकार के दावों पर सवाल उठाते हुए इसे गुमराह करने वाला बताया है। 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को लगभग समाप्त घोषित कर दिया गया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक वैचारिक संघर्ष है जिसे पूरी तरह खत्म करने के लिए अभी भी सतर्कता की आवश्यकता है। इसके अलावा आज की खबरों में चुनाव आयोग के जरिए केंद्र सरकार की बात मान लिए जाने की भी सूचना है। उदाहरण के लिए, हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के आश्वासन के बाद टीएमसी की अपील खारिज कर दी। जाहिर है, सवाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले का नहीं, चुनाव आयोग का आश्वासन मान लेने और टीएमसी की अपील खारिज कर दिए जाने का है। दुनिया जानती है कि चुनाव आयोग केंद्र की भाजपा सरकार के निर्देश पर या उसके साथ मिलकर भाजपा सरकार के फायदे के लिए काम कर रहा है। मामला फायदे का नहीं, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और इस कारण निष्पक्ष चुनाव होता दिखने का है। लेकिन शीर्षक बता रहा है कि तृणमूल ने किसी गड़बड़ी की शिकायत की और चुनाव आयोग ने आश्वासन दिया कि ऐसा नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया। भले ही इसमें कुछ गलत नहीं हो, शिकायत का क्या हुआ या चुनाव आयोग ने ऐसा किया ही क्यों जिसकी शिकायत की गई या करनी पड़ी और अगर शिकायत की गई तो क्या सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष फैसला दिया – जैसे कई मुद्दे हैं। फैसला चाहे निष्पक्ष हो या कानूनी दृष्टि से शत प्रतिशत सही – दिखाई यह दे रहा है कि चुनाव आयोग जो करना चाहता था, उसने कर लिया। उसकी शिकायत की गई थी और सुप्रीम कोर्ट ने उसे नहीं सुना या अनसुना कर दिया या चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला दे दिया। मेरे ख्याल से शिकायत नहीं सुनना शिकायत को अनसुना करना है। भले यहां नहीं सुनने या अपील खारिज करने का फैसला संबंधित पक्ष या पक्षों को सुनकर लिया गया हो।
द हिन्दू का शीर्षक बता रहा है कि मोटे तौर पर मामला क्या था? हिन्दी में शीर्षक कुछ इस प्रकार होगा – केंद्र सरकार के कर्मचारियों द्वारा पक्षपात के तृणमूल के दावे को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया। इस खबर के साथ सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा का कहा हाईलाइट किया हुआ है। उन्होंने कहा है, यह एक और गलत धारणा है कि राज्य सरकार की सेवाओं से जुड़े लोगों की निष्ठा अलग होती है… ये तो सरकार के कर्मचारी मात्र हैं। इन्हें कुछ तो श्रेय दीजिए। उपशीर्षक है, याचिका को खारिज करते हुए (अदालत ने कहा कि) यह आनुपातिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर सवाल उठाता है। तृणमूल ने कहा था कि चुनाव आयोग मतगणना केंद्रों पर केंद्र सरकार के ज्यादा कर्मचारियों की नियुक्ति करके चुनाव मैदान को भाजपा के अनुकूल (या पक्ष वाला) बना रहा है। मुझे लगता है कि तृणमूल का आरोप किसी धारणा पर नहीं तथ्यों पर है और सुप्रीम कोर्ट की राय आदर्श स्थितियों में है। लेकिन बंगाल चुनाव के मामले में न तो स्थितियां आदर्श हैं और न ही धारणा के गलत होने का कोई आधार। उल्टे सुप्रीम कोर्ट का निर्णय उसकी अपनी धारणा के अनुकल होने की संभावना है और इसमें चुनाव आयोग को निष्पक्ष मानना शामिल है जबकि चुनाव आयोग जो कर रहा है या सुप्रीम कोर्ट ने जो करने दिया है वह भाजपा के पक्ष में होता दिख रहा है। कई कारण हैं, अभी मुद्दा वे कारण नहीं हैं बल्कि खबरों और शीर्षक से जो दिख रहा है, समझ में आ रहा है या नहीं समझ में आ रहा है या जो मामले उनुत्तरित हैं उनकी बात हो रही है। ठीक है कि केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों को अलग मानने का कोई आधार नहीं है। आदर्श स्थितियों में आम नागरिक के लिए केंद्र और राज्य सरकार को भी अलग मानने का भी कोई औचित्य नहीं है। पर केंद्र सरकार जिस ढंग से काम कर रही है, डबल इंजन सरकार बनाने की अपील कर रही है और जैसी डबल इंजन सरकारें बनी हैं तथा चुनाव आयोग जैसा व्यवहार कर रहा है उसमें यह सवाल तो है ही कि इस बार क्या बदला है कि मतगणना में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि भी लगाए जाएं उनकी संख्या ज्यादा हो आदि आदि।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर गोल मोल है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, मतदान केंद्रों पर केंद्र और राज्य सरकार – दोनों के अधिकारी रहेंगे। सुनने-पढ़ने में यह सामान्य लगता है लेकिन मुद्दा कुछ और है। तथा इसकी चर्चा ऊपर कर चुका हूं। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, चुनाव नतीजे कल, बंगाल की एक सीट पर दोबारा मतदान होगा। मतगणना में राज्य सरकार के कर्मचारियों के अलावा केंद्र सरकार के कर्मचारियों को भी लगाने के चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ तृणमूल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की खबर सिंगल कॉलम में है। बंगाल के एक विधानसभा क्षेत्र में फिर से चुनाव कराने का चुनाव आयोग का निर्णय निश्चित रूप से बड़ा और महत्वपूर्ण है। इसी दिन तृणमूल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की खबर है। इस कारण एक चुनाव क्षेत्र में फिर से मतदान कराने के चुनाव आयोग के निर्णय की खबर दब गई है। इंडियन एक्सप्रेस में भले यह सूचना लीड के शीर्षक के रूप में है लेकिन खबर का संबंधित हिस्सा टर्न में होगा। खबर यह भी है कि चुनाव आयोग ने भय मुक्त चुनाव कराने की घोणषा की थी, भाजपा ने चुनाव के बाद भय मुक्त समाज बनाने का दावा किया है लेकिन मतदान से पहले ही हिन्सा में वृद्धि होने का अनुमान है। दि एशियन एज ने यही शीर्षक बनाया है। इससे नीचे का शीर्षक है, चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में मतदान की गिनती के लिए 242 अतिरिक्त ऑब्जर्वर नियुक्त किए। खबर के अनुसार, भाजपा के आगे रहने पर दोबारा गिनती की मांग करने का संदेश ममता बनर्जी ने टीएमसी के मतगणना एजेंट को दिया है। इस खबर से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में सुरक्षा बलों की मदद से स्वतंत्र चुनाव कराने के दावे और तरह-तरह की मनमानी की बावजूद टीएमसी ने भाजपा से हार नहीं मानी है और इस लिहाज से यह भी बड़ी खबर है जो अखबारों में आम तौर पर पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स की एक खबर आम आदमी पार्टी द्वारा भाजपाई राजनीति किए जाने की है। शीर्षक है, पंजाब में एफआईआर की खबर के बाद संदीप पाठक को गिरफ्तार करने की कोशिश हुई है। उल्लेखनीय है कि राघव चड्ढा के नेतृत्व में सात सांसदों के दल बदल और भाजपा में शामिल होने के बाद पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार ने इनमें से एक, संदीप पाठक को गिरफ्तार करने की कोशिश की है। साथ ही छपी खबर का शीर्षक पाठक के हवाले से है। उन्होंने कहा है कि एफआईआर दर्ज होने की जानकारी उन्हें नहीं है। पर खास बात यही है कि भाजपा जिन नेताओं को निशाने पर लेती है उन के खिलाफ ईडी की कार्रवाई ऐसी ही होती है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


