सुप्रिया श्रीनेत-
अगर आपके अपने घर में एक बेटी हो तो क्या आप किसी और की बेटी पर भद्दी टिप्पणी करके सस्ती तालियाँ बटोरेंगे?
ऐसा करने पर आप किस हद तक गिरे हुए हैं, इसका तो अंदाज़ा लग ही गया है
कुमार विश्वास जी आपने सोनाक्षी सिन्हा के अंतरधार्मिक विवाह पर तो घटिया तंज किया ही पर आपने अपने अंदर महिलाओं के लिए जो असल सोच है उसे भी उजागर कर दिया
आपके शब्द ‘वरना आपके घर की श्रीलक्ष्मी को कोई और उठा कर ले जायेगा’. क्या लड़की कोई समान है जिसको कोई कहीं उठा कर ले जाएगा? कब तक आपके जैसे लोग एक औरत को पहले पिता और फिर पति की संपत्ति समझते रहेंगे?
विवाह और दाम्पत्य की नींव बराबरी, आपसी विश्वास और आपसी प्रेम है. कोई किसी को कहीं उठा कर नहीं ले जाता
और 2024 के भारत में आप अपनी मर्जी से शादी करने पर परवरिश पर सवाल उठा रहे हैं!?? क्या एक लड़की को यह हक नहीं कि जिससे उसकी मर्जी हो उससे वह विवाह करे? या कौन क्या खायेगा, क्या पहनेगा, किससे प्यार करेगा, कैसे विवाह करेगा इसका निर्णय भी धर्म के स्वयंभू ठेकेदार करेंगे?
वैसे परवरिश पर तो सवाल तब भी नहीं होना चाहिए जब आपके साथ वाले बाउंसर एक संभ्रांत डॉक्टर को पीट डालें – यह तो आपकी कमी है जो आपका स्टाफ आपके रहते हुए ऐसा करे
आपके सर्टिफिकेट की ना तो शत्रुघ्न सिन्हा जी को ज़रूरत है ना उनकी कामयाब बेटी सोनाक्षी को, लेकिन अपने से 17 साल उम्र में छोटी लड़की पर आपकी टिप्पणी आपकी छोटी सोच को बेनक़ाब ज़रूर कर देती है
ना श्रीराम किसी की बपौती हैं, ना रामायण, ना उससे जुड़ा कोई नाम
दूसरों के बच्चों को रामायण और गीता पढ़ने की सीख देने वाले कवि महोदय, सोनाक्षी के पति के धर्म से नफ़रत करने में आप रामायण में परस्पर प्रेम पर कितना मधुर अंकित है वो भूल गए?
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीती।।
आपने रामायण का अध्ययन वाक़ई में किया होता तो प्रेम ज़रूर समझते. आपके अंदर राम कथा वाचक बनने की लालसा तो बहुत है लेकिन प्रभु राम की शालीनता और मर्यादा का रत्ती भर गुण नहीं
दो मिनट की सस्ती तालियाँ तो आपको ज़रूर मिलीं लेकिन आपका कद जमीन में और धंस गया. आपको गलती का एहसास करके एक पिता और उनकी बेटी दोनों से माफ़ी माँगनी चाहिए.
विनीत कुमार-
कुमार विश्वास हो चाहे ऐसे कई और दूसरे लोग..जो शब्दों के बूते, अपने लिखे-पढ़े के नाम पर पैसे कमा लेते हैं तो उसके भीतर समझदारी नहीं, पैसे और रुतबे की भाषा पनपने लग जाती है. दुनिया की नज़र मे तब वो भले ही कवि, लेखक, पत्रकार, न्यूज एंकर हो..भीतर एक ऐसा अहंकारी पनप चुका होता है जिसे इस बात की ख़ुशफ़हमी होती है कि वो जो बोलेगा, दुनिया उसे हाथों हाथ ले लेगी. लेकिन
ऐसे लोग ये नहीं सोचते कि एक बार एक संवेदनशील इंसान की भाषा मर गयी तो बाक़ी चीज़ें मरते देर नहीं लगती. भारत एक बहुत बड़ा देश है. इस बड़े देश के लोगों का दिल जितना बड़ा है, नज़र से उतार देने का माद्दा भी उतना ही बड़ा है. पता भी नहीं चलता और देखते-देखते लोग ऐसे नज़र से गिरा देते हैं कि उसका बाक़ी जीवन मौत से भी बदतर हो जाता है. कुमार विश्वास से पहले जीते जी ऐसे लोगों की लंबी कतार है.
इस देश के सभी लोग हमारी-आपकी तरह भले ही सार्वजनिक तौर पर लिखते-बोलते नहीं हो लेकिन महसूस तो करते ही है..और ग़र एक बार महसूस कर लिया, समझ गए कि ये शख़्स हमारे सम्मान दिए जाने का अपमान कर रहा है तो सारा सम्मान, नाम, शोहरत वापस छीन लेने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगाते. यह देश भाषा और बोली से चलता है. जो इनका सम्मान नहीं करते, देश उनका सम्मान नहीं करता.

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jagdish prasad gupta
December 23, 2024 at 6:27 am
Bajaroo ,and undegnified .