आईक्यू एयर की रैंकिंग के आधार पर दिल्ली दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है पर खबर ढूंढ़ते रह जाओगे। देशबन्धु में यह खबर बॉटम है, नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम की लीड लेकिन अमर उजाला के पहले पन्ने से गायब है। टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने पर यह खबर तो नहीं है लेकिन अधपन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर बताती है, “दिल्ली ने 16 नवंबर को ‘बेहद खराब’ एक्यूआई वाले के दिन के रूप में भोगा”। इसके अलावा, देश की राजधानी के सबसे प्रदूषित शहर होने की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग से संबंधित खबर दिल्ली के मेरे नौ अखबारों में पहले पन्ने पर जो है वह इतना ही।
संजय कुमार सिंह
आज के सभी अखबारों में दुबई एयरशो के दौरान भारतीय लड़ाकू विमान तेजस के दुर्घटनाग्रस्त होने की खबर लीड या सेकेंड लीड है। मैं यह मान लेता हूं कि इस खबर को आवश्यक महत्व मिला है और ठीक ही छपा है। लेकिन आत्मनिर्भरता और स्वदेशी के प्रचार के बीच इस खबर का अपना महत्व है और इस पर सरकार का पक्ष होना चाहिए था। नहीं दिखा और यह कोई नई बात नहीं है इसलिए उसे भी रहने देता हूं। आज की बाकी बची कई खबरों में एक खबर सरकार का प्रचार करने वाली है और मैं देख रहा हूं कि इसे पूरी प्रमुखता मिली है। देशबन्धु में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। खबर की चर्चा से आप समझ जाएंगे कि यह सरकार का प्रचार ही है पहले पन्ने लायक खबर नहीं है। ऐसे में देशबन्धु की दूसरी खबरों की चर्चा की जानी चाहिए और पाठकों को पता होना चाहिए कि अखबार प्रचार वाली खबरों को महत्व देते हैं और जनहित की खबरों को छोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए देशबन्धु के पहले पन्ने का बॉटम है, दिल्ली दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर। यह अंतरराष्ट्रीय संस्था, आईक्यू एयर की रैंकिंग के आधार पर है और कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली के अखबारों के लिए आज निश्चित रूप से लीड होनी चाहिए थी। तेजस की खबर तो हादसे की खबर है और विस्तृत जानकारी जांच के बाद ही मिलेगी। सरकारी पक्ष नहीं है तो इसका बहुत महत्व भी नहीं है लेकिन दिल्ली में प्रदूषण के कारण जब हर कोई खांस रहा है और प्रदूषण की समस्या सिर्फ दिल्ली में नहीं है, आज की नहीं है तो निश्चित रूप से बड़ी खबर है। लेकिन इससे सरकार के काम और प्राथमिकताओं पर सवाल उठेंगे इसलिए इसकी उपेक्षा की गई है। हालांकि, नवोदय टाइम्स में यह तीन कॉलम की लीड है लेकिन अमर उजाला के पहले पन्ने से गायब है। टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने पर यह खबर तो नहीं है लेकिन अधपन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर बताती है, “दिल्ली ने 16 नवंबर को ‘बेहद खराब’ एक्यूआई वाले के दिन के रूप में भोगा”। इसके अलावा, देश की राजधानी के सबसे प्रदूषित शहर होने की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग से संबंधित खबर दिल्ली के मेरे नौ अखबारों में पहले पन्ने पर जो है वह इतना ही।
आइए, अब श्रम कानून में सुधार और इससे बताये जाने वाले लाभ को देखें। अमर उजाला ने इसे पांच कॉलम की लीड बनाया है। शीर्षक है, नए श्रम कानून प्रभावी, कामगारों को न्यूनतम वेतन, सुरक्षा की मिली गारंटी। मुझे नहीं लगता है कि इसमें कुछ नया है और पहले ऐसा कुछ नहीं था। आइए, खास बातों को भी देख लूं। अखबार ने इसे बड़ा नीतिगत बदलाव कहा है और बताया है – 1) हर कामगार को नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य, चालीस से अधिक आयु वाले श्रमिकों की मुफ्त स्वास्थ्य जांच। 2) ओवरटाइम पर दोगुना वेतन, रात में महिलाओं को काम करने की अनुमति, कार्यस्थलों पर भेदभाव पर लगाम और 3) एक साल की नौकरी पर ग्रेच्युटी, संविदा मजदूर पीएफ के दायरे में तथा अर्थव्यवस्था को मिलेगी रफ्तार। अव्वल तो मुझे इसमें कुछ नया या क्रांतिकारी नजर नहीं आता है और अगर अब यह नया है तो सरकार को बताना चाहिए कि वह 11 साल से क्या कर रही थी और किसका इंतजार कर रही थी। फिर भी सरकार के प्रचार में एक शीर्षक है – युवा कामगार : छुट्टी के दौरान भी मिलेगा वेतन। कहने की जरूरत नहीं है कि छुट्टियों का नियम पहले से तय था और हर नौकरी में साप्ताहिक अवकाश, राष्ट्रीय छुट्टियां, आकस्मिक अवकाश, बीमारी की छुट्टी और अर्नल्ड लीव यानी अर्जित अवकाश के तय नियम हैं। बाद के समय में महिलाओं के लिए विशेष छुट्टी (कुछ राज्यों में) और मातृत्व अवकाश आदि की भी घोषणा हो चुकी है। मतदान के दिन छुट्टी का भी नियम है ही। अब क्या युवा कामगारों को बेहिसाब छुट्टी मिलेगी या वोट देने अपने शहर जाने के लिए हफ्ते भर की छुट्टी मिलेगी?
इसी तरह, महिला : बराबरी का दर्जा…. समयबद्ध शिकायत निवारण शीर्षक से बताया गया है कि महिलाों को बराबरी का दर्जा तो दिया ही गया है, समान काम के लिए समान वेतन है और 26 सप्ताह का वेतन सहित मातृत्व लाभ है। जाहिर है यह बराबरी का मामला नहीं है और जरूरत के अनुसार सुविधा दी गई है। इसी में बताया गया है कि सहमति से और अनिवार्य सुरक्षा के साथ रात की पाली में भी काम कर सकेंगी। पहले इसपर रोक थी ही क्यों और थी तो उसे हटा दिया जाना भर पर्याप्त था अब जो किया गया है वह उनकी विशेष जरूरतों के अनुसार है फिर बराबरी की जबरदस्ती किसके लिए? कानून में हो तो हो – खबर में किसलिए?। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रेस विज्ञप्ति छाप देना खबर छापना नहीं होता है लेकिन अमृत काल में यही हो रहा है। तुर्रा यह कि प्रधानमंत्री ने कहा है, आजादी के बाद सबसे व्यापक सुधार है और इसे भी प्रचारित किया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि गिग और प्लैटफॉर्म वर्कर पहली बार परिभाषित किए गए हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह के कामगार आने के बाद इनके लिए कानून की जरूरत थी। राहुल गांधी इनसे बात करके इनका मामला पहले उजागर कर चुके हैं और आज इसे सरकार के काम या खबर के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि इन सुधारों में सुरक्षाकर्मियों की चिन्ता नजर नहीं आ रही है। समाज में सबसे ज्यादा उपेक्षित, शोषित और मजबूर वही नजर आते हैं। यह सर्वविदित तथ्य है कि ये 12 घंटे रोज, बिना साप्ताहिक अवकाश और छुट्टी के काम करते हैं। एजेंसियों के जरिए इनकी सेवा सरकार और सरकारी संस्थान भी लेते हैं और कानून ऐसा है कि इसके लिए करार सुरक्षाकर्मी मुहैया कराने वाले गार्ड से होती है। इसमें इनकी सेवा शर्तों का मतलब अक्सर नहीं होता है। कानून ऐसे हैं कि तमाम आरडब्ल्यूए दूसरे कर्मचारी तो अपनी शर्तों और जरूरत के अनुसार रखते हैं पर सुरक्षाकर्मी एजेंसियों से लेते हैं और एजेंसी वाले नौकरी देते हैं इसलिए अपनी शर्तों पर काम करवाते हैं। ऐसे मजदूरों की संख्या बहुत ज्यादा है लेकिन उनकी चिन्ता करने वाला कोई नहीं है। देश में रोजगार का जो हाल है उसमें कम पढ़े लिखे, मजबूर लोग अपना अधिकार कैसे पाएं – कोई नहीं जानता और किसी की चिन्ता नहीं है।
जहां तक कानून की बात है, मुद्दा उनके अनुपालन का है और सबको पता है कि इसके लिए अधिकारियों की मुट्ठी गर्म करनी होती है और कानून का पालन नहीं होने के कितने ही उदाहरण हैं। यही नहीं, अदालतों में चुनौती देकर रोकने-टालने का भी तरीका है। हालत यह है कि आम मजदूरों को तो छोड़िये, पत्रकारों के मामले में भी कानून और वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करवाना टेढ़ी खीर रहा है। एक सिफारिश लागू नहीं होती दूसरे का समय आ जाता है। अदालतों में मामले अपनी रफ्तार से चलते रहते हैं। और इसके ढेरों उदाहरण हैं। पहले पत्रकारों की नियुक्ति श्रम कानूनों के तहत होती थी। बाद में सब ठेके पर होने लगे और तमाम पत्रकार बिना नियुक्ति पत्र के काम करते हैं। कोई हादसा या वारदात हो जाए तो कर्मचारी ही नहीं मानने की पुरानी परंपरा है और जब पत्रकारों के साथ यह सब हो रहा है तो आम मजदूर की क्या बिसात। ऐसा नहीं है कि भाजपा की सरकार और उससे जुड़े लोगों को यह सब मालूम नहीं होगा पर प्रचारकों की सरकार ने हर क्षेत्र में जैसे काम किया है वैसे ही यहां भी कर रही है और आज इसे प्रचारित किया गया है। आज यह खबर अमर उजाला के साथ नवोदय टाइम्स, दि एशियन एज, टाइम्स ऑफ इंडिया (अधपन्ने पर लीड), इंडियन एक्सप्रेस, द हिन्दू और हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है। द टेलीग्राफ में प्रचार की ऐसी खबरें पहले पन्ने पर होती ही नहीं हैं, आज भी नहीं हैं। बाकी नवोदय टाइम्स और दि एशियन एज को छोड़कर यह खबर जहां है वहां लीड ही है।
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि नये श्रम कानूनों में क्या बदलाव हुए हैं और इनकी सीमा क्या है। खबरों के अनुसार, चार लेबर कोड लागू हुए हैं। ये बदलाव 29 पुराने श्रम-कानूनों की जगह लेते हैं। नए कोड के तहत प्रति दिन 8 से 12 घंटे तक काम की अनुमति हो सकती है। लेकिन प्रति सप्ताह कुल घंटे की सीमा है: “सप्ताह में 48 घंटे तक” के रूप में कोड में बात कही गई है। ओवरटाइम देय होगा “डबल वेतन दर” पर यदि यह सीमा से ऊपर हो। जाहिर है, ये सब अफसर तय करेंगे और मजदूर साधिकार कुछ नहीं मांग सकता है। जब सब कुछ मांग और पूर्ति से तय होता है तो इन कानूनों से क्या फर्क पड़ना है और पड़ेगा तो किसे लाभ होगा समझना मुश्किल नहीं है। फिर भी कानून कहता है, “48-घंटे सप्ताह” की सीमा कोड में स्पष्ट है, इसलिए नियोक्ता को पूरे सप्ताह में अप्रतिबंधित काम कराने का कानूनन अधिकार नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह है कि जब कर्मचारी सहमत हो, तब नियोक्ता 12-घंटे की शिफ्ट “नियमित आधार पर” लागू कर सकता है, लेकिन यह ऑटोमेटिक नहीं होगा। इसका मतलब यह हुआ कि नियोक्ता का कागजी काम बढ़ जाएगा इसलिए वह अपना कमीशन बढ़ाने को मजबूर होगा। ट्रेड यूनियनों और श्रमिकों की चिंता है कि ये बदलाव “श्रम लचीलापन” में उद्योगपतियों को बेहद शक्ति देंगे और वे श्रमिकों को ज़्यादा काम करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। खासकर “ओवरटाइम” की सीमा बढ़ाई जा रही है। मजबूरी में सहमति देने वाले कर्मचारी को लगातार अधिक समय तक काम करना पड़ेगा तो यह स्वास्थ्य और आराम के लिए समस्या हो सकती है। दूसरे शब्दों में बनी रहेगी।
सरकार के प्रचार और बचाव की खबरों में अमित शाह का यह दावा पहले पन्ने की शाश्वत खबरों में है कि वे घुसपैठियों को बाहर खदेड़ कर रहेंगे (हिन्दुस्तान टाइम्स)। एसआईआर के बावजूद बिहार में क्या हुआ उसपर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के पति परकला प्रभाकर ने चुनाव आयोग से सवाल पूछे हैं। इनमें एक सवाल यह भी है कि बिहार में चुनाव आयोग ने जितने वोट पड़े बताए उनसे ज्यादा गिने हैं और वोटों का प्रतिशत संख्या मालूम होने के बाद निकाला जाता है लेकिन चुनाव आयोग संख्या नहीं बताता है, प्रतिशत में जानकारी देता है और यह अक्सर गलत होता है पर कोई जवाब नहीं है। यह सब बिहार चुनाव नतीजों से संबंधित कई खुलासों के बाद पूछा गया है और इस सवाल का जवाब नहीं है कि बिहार में कितने घुसपैठिये मिले और नहीं मिले तो एसआईआर की क्या जरूरत। लेकिन सब चल रहा है। इसमें यह खबर कम महत्वपूर्ण है कि एसआईआर के खिलाफ याचिका पर कल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है (देशबन्धु)। यही नहीं, तमिलनाडु और गुजरात में तनाव के कारण बीएलओ के आत्महत्या करने की खबर है (टाइम्स ऑफ इंडिया)। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, 2002 के एसआईआर के बाद से बंगाल के सीमाई जिलों में मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा बढ़ी है। खबर के अनुसार, टीएमसी के अनुसार यह हिन्दू शरणार्थियों के कारण है; भाजपा इसे घुसपैठ का सबूत कहती है। जो भी हो, इसे रोकना किसे था? अगर पश्चिम बंगार सरकार को ही रोकना था तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के दावे का क्या मतलब और अब क्यों? अगर इंडियन एक्सप्रेस इसकी खबर अब दे रहा है तो दि एशियन एज की खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल के मटुआ क्षेत्र में एसआईआर विरोधी प्रदर्शन की संभावनाओं का विस्तार करेंगी ममता बनर्जी।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


