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सूरत के हजारों मजदूरों की बेरोजगारी वाशिंगटन पोस्ट में छपी, देशी मीडिया मोदीजी पर न्यौछावर है!

मनोज अभिज्ञान-

गोदी मीडिया सरकार की हर नीति को ऐतिहासिक और हर फैसले को मोदी का मास्टरस्ट्रोक बताने के होड़ में लगी है। अब जबकि अमेरिका ने भारत के हीरों और आभूषणों पर टैरिफ़ दोगुना कर दिया, तब यही मीडिया इसे भी भारत के हित में साबित करने में लगा है। चैनलों और अखबारों में समझाया जा रहा है कि यह भारत की बढ़ती ताकत का संकेत है, और इससे हमारे व्यापारियों को नया अवसर मिलेगा।

उधर वाशिंगटन पोस्ट जैसे अखबारों में पूरे पन्ने की रिपोर्ट छप रही है कि सूरत, जिसे दुनिया का डायमंड कैपिटल कहा जाता है, का हीरा उद्योग चौपट हो रहा है। लाखों मज़दूर बेरोज़गार हो गए हैं, छोटे कारोबारी दिवालिया होने की कगार पर हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है।

सूरत का हाल इस रिपोर्ट में बेहद साफ तस्वीर की तरह सामने आता है। हज़ारों कामगार, जो पीढ़ियों से हीरे काटने और पॉलिश करने के काम में लगे थे, अचानक अपनी रोज़ी-रोटी से हाथ धो बैठे हैं। उनके लिए यह सवाल नहीं कि भारत-अमेरिका संबंध कितने रणनीतिक हैं, बल्कि यह कि अगली बार घर का राशन कैसे आएगा। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर जो शुल्क लगाए हैं, उनका असर तुरंत दिखा है। ऑर्डर रुक गए हैं, कारखाने बंद हो रहे हैं और मज़दूरों को छुट्टियाँ थमा दी गई हैं। मालिक खुद कहते हैं कि अगर अमेरिकी बाज़ार बंद हो गया तो सूरत का पूरा उद्योग ध्वस्त हो सकता है।

लेकिन भारत का गोदी मीडिया इन पर चुप है। वह न तो मजदूरों की हालत दिखा रहा है, न छोटे कारोबारियों की चीख सुन रहा है। टीवी पर बहस इस बात पर हो रही है कि भारत अब सुपरपावर बनने की राह पर है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध की सबसे बड़ी मार सूरत जैसे शहरों पर पड़ रही है। जहाँ दुनिया के 90 प्रतिशत हीरे पहली बार काटे और पॉलिश किए जाते हैं, वहाँ आज मंदी का साया है। दुकानों और होटलों में ग्राहकों की भीड़ घट गई है, कामगार अपने गाँव लौटने को मजबूर हैं और मालिकों के पास उत्पादन रोकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। यहाँ का संकट सिर्फ आर्थिक नहीं है, बल्कि सामाजिक भी है। हज़ारों परिवार जिनका जीवन इस उद्योग पर टिका था, वे अचानक आर्थिक असुरक्षा और गरीबी में धकेले जा रहे हैं।

मोदी सरकार बार-बार कहती है कि वह भारत को वैश्विक व्यापार का केंद्र बनाएगी। लेकिन सवाल यह है कि जब लाखों मजदूर बेरोज़गारी और भूख से जूझ रहे हों, तब क्या ऐसी खोखली घोषणाएँ किसी काम की हैं?

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