
श्वेता सिंह-
“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।” किसी ने सच ही कहा है अगर हौंसले बुलंद हों तो सीमित संसाधनों में भी कोई बहुत कुछ कर जाता है। वहीं कई बार सारे सुख सुविधाओं के बाद भी कोई तकलीफें ही गिनाता रह जाता है।
जी हां, हरिद्वार के एक स्कूल में कुछ ऐसा ही देखने को मिला। सुबह आठ बजे दस डिग्री में भी समय पर स्कूल पहुंचे बच्चे गायत्री मंत्र और प्रार्थना से अपने दिन की शुरुआत करते हैं।
नजर नहीं आता तो क्या हुआ, कोई नेत्रहीन बच्चा हारमोनियम तो कोई तबला बजाने में निपुण दिखा। सारे बच्चे एक साथ जब गायत्री मंत्र गाते हैं तब रोएं खड़े हो जाते हैं। गजब का माहौल होता है।



हरिद्वार के श्री स्वामी अजरानंद अंध विद्यालय में सामान्य बच्चों के साथ ही नेत्रहीन बच्चों को शिक्षा दी जा रही है। आमतौर पर विशिष्ट बच्चों के लिए अलग स्कूल होता है।
कड़कड़ाते ठंड में स्कूल परिसर के आंगन में बच्चे जमीन पर बैठ कर इम्तहान देते दिखे और कुछ कक्षाओं में बच्चे दरी पर बैठे पढ़ाई करते नजर आए।
थोड़ी देर के लिए भी अंधेरा हो जाने पर हम सभी परेशान हो जाते हैं। लेकिन इन बच्चों को देख कर कौन कहेगा कि इनकी दुनिया में अंधेरा है।
सामान्य बच्चों से किसी तरह कम नहीं ये नेत्रहीन बच्चे। आत्मविश्वास और हौंसले से भरे बच्चे हंसते खेलते अपनी जिंदगी जी रहे। निराशा की कोई किरण नहीं इनके चेहरे पर।
बाहरी दुनिया के उजाले से अनजान होने पर भी यह बच्चे पढ़ लिख कर कुछ बनने का सपना देख रहे। कोई बड़ा अफसर बनना चाहता है और कोई गायक बनकर मशहूर होना चाहता है।
हरिद्वार के इस अंध विद्यालय के छात्र सिर्फ किताबी ज्ञान ही हासिल नहीं कर रहे हैं। स्कूल प्रबंधन द्वारा दो म्यूजिक टीचर भी नियुक्त किए गए हैं जो इन बच्चों को संगीत की शिक्षा देते हैं। वर्तमान में इस स्कूल में 57 दृष्टिहीन बच्चे हैं और 450 सामान्य बच्चे जो निःशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
स्कूल के प्रिंसिपल पवन कुमार शर्मा ने बताया कि लोग अपने बच्चों का दाखिला इस स्कूल में कराने में तत्पर रहते हैं क्योंकि यहां सामान्य बच्चों को निशुल्क पढ़ाया जाता है। इसके साथ ही दृष्टिहीन बच्चों के आवास, भोजन और शिक्षा बिल्कुल निशुल्क है। इन सभी खर्चों का वहन अजरानंद महिला ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। स्वामी अजरानंद अंध विद्यालय के संचालक महंत स्वामी स्वयंमानंद की देखरेख में स्कूल का संचालन किया जा रहा है।
ब्लाइंड बच्चों को पढ़ाने वाले कुछ शिक्षक खुद भी नेत्रहीन हैं। अनगिनत परेशानियों के बाद शिक्षा अर्जित कर चुके ये शिक्षक बड़े गर्व के साथ कभी उजाला न देख पाए बच्चों को ब्रेल के माध्यम से पढ़ना सिखाकर उनकी जिंदगी में उजाला भर रहे हैं।
इस अंध विद्यालय की स्थापना 1968 में हुई थी। उस वक्त सिर्फ आठवीं तक कक्षाएं चलती थीं। ठीक दस साल बाद 1978 में दसवीं तक कक्षाएं शुरू हो गईं।
अधिकतर दृष्टिहीन बच्चों का दाखिला उनके मां बाप देर से कराते हैं। ऐसे में इन बच्चों को छह महीने ब्रेल के कोड सिखाए जाते हैं। इसके बाद उन बच्चों की कक्षा का निर्णय लिया जाता है। अंध विद्यालय के नेत्रहीन बच्चों को पहले ब्रेल सिखाई जाती है। फिर सामान्य बच्चों के साथ ही पढ़ाया जाता है।
इस अंध विद्यालय की खास बात यह है कि यहां सामान्य और इन विशेष बच्चों को एक साथ पढ़ाया जाता है। कुछ विषयों की पढ़ाई अलग होती है। हिंदी, संस्कृत और एसएसटी की पढ़ाई बच्चे एक साथ करते हैं वहीं गणित और अंग्रेजी की शिक्षा ब्रेल कोड की मदद से दी जाती है।
यह बच्चे हाइ स्कूल की परीक्षा भी आम बच्चों की ही तरह फर्स्ट डिवीजन में पास करते हैं। किसी भी तरीके से पीछे नहीं है। इन बच्चों में जिंदगी में आगे बढ़ने की चाह देखने लायक है।
दृष्टिहीन बच्चों के लिए स्कूल में सात शिक्षक हैं जिनमें दो म्यूजिक टीचर हैं। यह बच्चे संगीत और वादन की शिक्षा देते हैं। सामान्य बच्चों के लिए 18 टीचर हैं जिनमें से अधिकतर महिला शिक्षक हैं।
एक तरफ जहां स्कूलों में सभी अत्याधुनिक इंतजाम के बाद भी सामान्य बच्चे पढ़ाई से भागते हैं। वहीं सीमित संसाधनों में भी हरिद्वार के इस स्कूल में ब्रेल सीखकर दुनिया को पहचानने की कोशिश कर रहे बच्चों में एक अलग ही आत्मविश्वास दिखाई दिया।
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