प्रेम में पड़ी स्त्रियां कुछ भी सह सकती हैं!

विश्व दीपक-

उनके लिए जिन्हें लगता है कि तालिबान का हृदय परिवर्तन हो चुका है. सुष्मिता बंदोपाध्याय याद है? शायद नहीं. बहुत लोग नाम भी नहीं सुने होंगे.

उसकी किताब Escape from Taliban सन 2003 के आसपास पढ़ने को मिली थी. प्रकाशक का नाम अब याद नहीं रहा पर किताब का कवर और कुछ पैराग्राफ अभी भी याद हैं. इसके कुछ साल बाद मनीषा कोइराला की इसी नाम से बनी फिल्म भी देखने को मिली. फिल्म शानदार है. मेरे नजरिए से मनीषा कोइराला की सबसे अच्छी फिल्मों में से एक है यह फिल्म. अगर आपके पास मौका हो तो इस फिल्म को ज़रूर देखिए.

तालिबान को हेडलाइन और रिर्पोट की चौहद्दी से बाहर भावनाओं के स्तर पर देख समझ पाएंगे. यह बहुत कुछ फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस जैसा होगा.

सुष्मिता कोलकाता जैसे महानगर की मध्य वर्गीय, आराम की जिंदगी छोड़कर अपने अफ़गान प्रेमी के साथ 90 के दशक में अफगानिस्तान भाग गई थी. वहां जाकर उसे पता चला कि उसका प्रेमी पहले से ही शादी शुदा है. पहली पत्नी के अलावा उसके अफ़गान प्रेमी के परिवार में करीब 70 लोग थे. जैसा कि काबिलाई संस्कृति में होता है सभी लोग साथ ही रहते थे.

कोलकाता में पढ़ी लिखी वह सुष्मिता जो शादी के मुद्दे पर अपने मां बाप के साथ एडजस्ट नहीं कर पाई थी, उसने अफगानी पति के परिवार में खुद को एडजस्ट किया जबकि दोनों के बीच बोली भाषा, धर्म, देश और समय का भयानक फर्क था.

पर प्रेम में पड़ी स्त्रियां कुछ भी सह सकती हैं.

सुष्मिता का पति जिसका नाम जांबाज़ खान था, भारत में व्यापार करता था. वो पाकिस्तान की सीमा से लगे उसके गांव में क्लिनिक चलाती थी. महिलाओं का इलाज करती थी. सुष्मिता का बाप सेना में डॉक्टर था.

सुष्मिता का क्लिनिक चलाना तालिबान को पसंद नहीं था. माना करने के बाद भी जब वो नहीं मानी तो तालिबान ने मौत का फरमान जारी कर दिया. सुष्मिता ने भागने की कोशिश की लेकिन उसके परिवार के मर्दों ने उसे तालिबान को सौंप दिया. दूसरी बार भी उसकी कोशिश असफल रही.अपने तीसरे प्रयास में (सौतन की मदद से) आखिरकार मौत को चकमा देते हुए सुष्मिता भारत पहुंचने में कामयाब हुई.

इसके दो दशक बाद 2013 में सुष्मिता एक बार फिर अफगानिस्तान जा पहुंची. उसे लगा की हालत सामान्य हो चुके हैं. शायद तालिबान भी बदल चुका होगा, उसकी सोच बदल गई होगी लेकिन सुष्मिता गलत थी.

तालिबान को उसके आने की ख़बर मिली तो रात को डोर टू डोर सर्च अभियान चलाकर सुष्मिता को खोज निकाला. फिर अफ़गान परिवार से उसे अलग किया गया. पूरे गांव के सामने तालिबान ने सुष्मिता की काफिराना और औरतों का चरित्र बिगाड़ने वाली हरकतों के लिए मौत का फरमान सुनाया. उसका शरीर गोलियों से छलनी कर दिया गया.

गार्डियन के मुताबिक तालिबान ने सुष्मिता को 15 गोलियां मारी थी. उस वक्त मैं जर्मनी में था या शायद लौट चुका था. पर सुष्मिता को फॉलो कर रहा था.

जानते हैं सुष्मिता ने बांग्ला भाषा में लिखी अपनी कहानी को नाम दिया था?

“एक काबुलीवाले की बंगाली बीवी.”



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