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सुख-दुख

इस दुखी पत्रकार के मन की पीड़ा पढ़कर इनके पत्रकारीय समझ पर ही संदेह होता है!

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

Bhadas4media में एक दुखी पत्रकार के मन की पीड़ा पढ़ी। उत्तराखंड के राजपूत होने के कारण दिल्ली के मीडिया में खुद को दलित आदिवासी टाइप पाकर और इसके चलते अपने जीवन में मिली नाकामी से वह दुखी हैं। मीडिया और वह भी दिल्ली के मीडिया के बारे में उनके कहे एक भी कथन से मुझे कोई असहमति नहीं है। मैं जानता हूं कि दिल्ली के मीडिया में देशभर के छंटे हुए जातिवादी, क्षेत्रवादी और भ्रष्ट लोग ही ज्यादातर भरे हुए हैं।

उनके दुख और असफलता से भी मुझे पूरी सहानुभूति है। लेकिन अपना दुख और असफलता बताने में खुद की तुलना दलित आदिवासी से करने में वह अतिरंजित लेखन का शिकार हो गए। दलित या आदिवासी सिर्फ असफलता या नाकामी नहीं झेलते बल्कि और भी बहुत कुछ झेलते हैं, इसका अंदाजा उन्हें नहीं है। होगा भी कैसे? खुद उत्तराखंड में ब्राह्मण और राजपूत का वर्चस्व न जाने कब से ऐसा बना हुआ है कि दलित, आदिवासी आदि का तो वहां के कई मंदिरों में प्रवेश तक उन्हें बर्दाश्त नहीं है।

जाहिर है, वैसा ही वर्चस्व उन्हें दिल्ली में मौजूद अन्य राज्यों के ब्राह्मण और राजपूतों से या अन्य सवर्णों के असहयोग या साजिशों से नहीं मिला, इसलिए उन्हें यह नाकामी झेलनी पड़ी। अपनी शत प्रतिशत सफलता के लिए वह खुद को योग्य मानते हैं और इसका दावा भी उन्होंने किया है।

जबकि जहां दलित, आदिवासी, पिछड़ों आदि को मुकाबले से ही बाहर करके योग्यता योग्यता का खेल खेला जाता हो, वहां खुद को शत प्रतिशत सफलता के काबिल मानना जातिवादी अहंकार ही कहलाएगा।

दिल्ली में मैंने भी विभिन्न जातिवादी या क्षेत्रवादी गुटों से मोर्चा लिया है लेकिन खुद को कभी दलित आदिवासी टाइप पीड़ित नहीं बता पाया।

क्योंकि दलित आदिवासी होने का नतीजा दिल्ली के मीडिया में क्या होता है, यह मैंने खुद देखा है। IIMC जैसे शीर्ष मीडिया संस्थान में हमारे आधे बैचमेट्स, जो आरक्षण के चलते वहां तक आ तो गए थे लेकिन उसके बाद उन्हें मेरी तरह टाइम्स ऑफ इंडिया या हिंदुस्तान में मौके नहीं मिले। जिन्हें मिले भी, वे किस तरह हाशिए पर ढकेल दिए गए या उनका करियर किस तरह खत्म कर दिया गया, यह भी मैंने देखा है।

जबकि मीडिया में मुझे जो मौके मिले, वे ठाकुर या ब्राह्मण आदि ने दिए। जाहिर है, मेरी जाति उसमें आड़े नहीं आई। हां, वे मौके मिलने के बाद गुटबाजी के खेल में मेरी भिड़ंत जरूर कई जातिवादी या क्षेत्रीय गुटों से होती रही। लेकिन वे भी मेरी महत्वाकांक्षा के कारण होती थीं न कि जाति के कारण।

मीडिया में जातिवाद का खेल ऐसा ही है, जिसमें सामान्य वर्ग के लोग अपना वर्चस्व मिलजुल कर बनाए हुए हैं। उत्तराखंड के राजपूत दिल्ली के मीडिया में इस खेल में पिछड़ रहे हैं तो इसकी वजह उनकी जाति नहीं है बल्कि उनके गुट का वहां कमजोर होना है। उत्तराखंड के ब्राह्मण इस मामले में उनसे कई हाथ आगे हैं और दिल्ली के मीडिया में उनका वर्चस्व किसी से छिपा नहीं है।

मगर सामान्य वर्ग में आने वाले लोग इस खेल में पिछड़ कर अपनी तुलना दलित आदिवासी से करने लगें, इससे उनकी पत्रकारीय समझ पर ही संदेह होने लगता है।

दुखी पत्रकार के मन की पीड़ा संबंधी पोस्ट का लिंक नीचे है…

मीडिया में जातिवाद का शिकार बने एक पत्रकार की दास्तान, पढ़ें

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