मार्स के इस मौसम में ‘द मार्शियन’ देखी जानी चाहिए

सुशोभित-

द मार्शियन…

चूँकि इन दिनों मार्स के चर्चे हैं और इसी फ़रवरी में वहाँ पर तीन स्पेस-मिशन भेजे जा चुके हैं, लिहाजा यह वाजिब ही है कि ऐसे में हमें मार्स पर बनाई गई सबसे अच्छी साइंस फ़िक्शन फ़िल्म ‘द मार्शियन’ की याद आए। इसमें मैट डैमन ने केंद्रीय भूमिका निभाई थी। यह एक रेस्क्यू फ़िल्म है, लेकिन दूसरी रेस्क्यू फ़िल्मों के उलट, जिनमें मनुष्यों को बाढ़, आगज़नी, भूकम्प, युद्ध, भूस्खलन से रेस्क्यू कराया जाता है (ज़ाहिर है, ये तमाम हादसे भयानक होने के बावजूद पृथ्वी पर ही घटित होते हैं), इस फ़िल्म में एक एस्ट्रोनॉट (मार्क वैटने) को मार्स से रेस्क्यू कराया जाता है। पृथ्वी पर किसी को रेस्क्यू कराने और मार्स से किसी को रेस्क्यू कराने में आकाश-पाताल का भेद है और इसे सम्भव कर दिखाने के लिए साइंस फ़िक्शन को बहुत पेचीदा लेकिन दिलचस्प इक्वेशंस सोचना होती हैं। यही तो फ़िल्म-दर्शकों के लिए सुख है। रिडले स्कॉट द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म दर्शकों को इस तरह का बहुत रोमांच प्रदान करती है।

लेकिन मैं फ़िल्म के शीर्षक को अपने ज़ेहन से नहीं निकाल पाता- ‘द मार्शियन’। यानी वह जिसकी उत्पत्ति मंगल ग्रह पर हुई हो या वह जो मंगल ग्रह का निवासी हो। पृथ्वी से गया जो मनुष्य इस फ़िल्म में मार्स पर छूट जाता है, वह तो- पारिभाषिक रूप से- मार्शियन नहीं हो सकता, वह तो सेपियंस है- पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली एक जाति। वह वहाँ पर एक टोही की तरह गया था, कुछ खोज-ख़बर लेने, मौक़ा-मुआयना करने, और अलबत्ता उसको वहाँ जितना समय बिताना था (इस समय के माप की इकाई सोल्स है- एक सोल यानी एक मार्स-डे), उससे कहीं ज़्यादा समय वह वहाँ पर रह आता है, लेकिन क्या इतने भर से वह मार्शियन बन सकता है? फ़िल्म में केंद्रीय भूमिका निभाने वाला मैट डैमन एक दृश्य में व्यंग्योक्ति से कहता है, “जब हम किसी जगह पर फ़सलें उगाने लगते हैं, तो हम अधिकृत रूप से उसे कलोनाइज़ कर लेते हैं। इस तरह से मैंने मार्स को कलोनाइज़ कर लिया है!” हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहे गए इस कथन में बड़े गहरे ऐतिहासिक और साभ्यतिक संकेत निहित हैं। क्योंकि मनुष्य का इतिहास पलायन और उपनिवेशीकरण का ही इतिहास है।

दो लाख साल पहले सेपियंस ने पूर्वी अफ्रीका से पलायन आरम्भ किया था! 45 हज़ार साल पहले वो ऑस्ट्रेलिया पहुँचे, वहाँ के मेगाफ़ॉना (विशालकाय स्थानीय मैमल्स) का सफ़ाया किया और उस लैंडस्केप को कलोनाइज़ किया! 16 हज़ार साल पहले वो अमरीका पहुँचे, और वहाँ भी ऐन यही कारनामा दोहराया। इसके हज़ारों साल बाद फिर एक्स्प्लोरेशंस के युग में यूरोपियन ऑस्ट्रेलिया और अमरीका पहुँचे और वहाँ बस चुके इन्हीं सेपियंस का सफ़ाया करके उन्हें कलोनाइज़ कर लिया। इन सबने वहाँ पर अपने तम्बू गाड़े, आग जलाई और फ़सलें उगाईं। कलोनाइज़ेशन की यही रीति है। एक जाति दूसरी जगह पर जाती है और वहाँ पर बसेरा बनाती है, एक समय के बाद अपनी जातिगत पहचान को उस जगह से जोड़ देती है। जैसे ऑस्ट्रेलिया और अमरीका पर धावा बोलने वाले सेपियंस कालान्तर में ऑस्ट्रेलियाई और अमरीकी कहलाए, वैसे ही मार्क वैटने को मार्शियन कहकर पुकारा गया।

सवाल यह है कि मार्क वैटने मार्शियन बनने से पहले क्या था? अमेरिकी या पृथ्वीवासी (अर्थ-ड्वेलर)? बड़े आश्चर्य की बात है कि स्पेस में जाने के बाद एस्ट्रॉनॉट्स पृथ्वी के लिए वैसी कोमल भावनाएँ विकसित कर लेते हैं, जो यहाँ पृथ्वी पर रहने वालों में कभी नहीं पनपने पातीं। वो अंतरिक्ष के पर्सपेक्टिव से इस नीली गेंद को देखते हैं और उसे अपना घर कहकर पुकारते हैं। वो इस बात को महसूस करते हैं कि इतने विराट ब्रह्मांड में पृथ्वी की हस्ती कितनी नामालूम है, वो कितनी निष्कवच है, और उसके सिवा हमारा कोई और घर नहीं। नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने मून पर अमेरिकी झण्डा गाड़ा था, क्योंकि नासा एक फ़ेडरल-फ़ंडेंड संस्था है, साइंस को पोलिटिक्स फ़ंड करती है और पोलिटिक्स के लिए नेशनलिज़्म ज़रूरी है। लेकिन अगर आप नील की स्पीचेस सुनें, या स्पेस में जा चुके किसी भी व्यक्ति की बातें सुनें तो आप महसूस करेंगे कि वो पृथ्वी से ही अपनी पहचान को जोड़ते हैं, क्योंकि सच में ही, पृथ्वी ही मनुष्यों की मातृभूमि है। अपोलो-11 के ‘पोयट-लॉरियट’ कहलाने वाले माइकल कोलिन्स (क्योंकि वो जितने अच्छे एस्ट्रोनॉट हैं, उतने ही अच्छे लेखक भी हैं) ने कहा था कि जब नील और बज़ चंद्रमा पर थे और मैं कमैंड मोड्यूल में मून को ओर्बिट कर रहा था, तो मैंने पाया कि मून का समूचा सरफ़ेस मेरी आँखों के सामने बिछा हुआ था, लेकिन मेरी नज़रें प्लेनैट-अर्थ से नहीं हट पा रही थीं। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से पृथ्वी का चक्कर काटने वाले साइंटिस्ट्स अकसर अपनी खिड़की (क्यूपोला) में जा बैठते हैं और हमारे इस ब्लू प्लैनेट को निहारते रहते हैं। कार्ल सैगन ने इसी पृथ्वी को ‘पेल ब्लू डॉट’ कहा था और एक कॉस्मोपोलिटन भावातिरेक के साथ उसे याद किया था।

मैट डैमन ने इससे पहले ‘इंटरस्टेलर’ में एक ऐसे एस्ट्रॉनॉट (डॉ. मैन) की भूमिका निभाई थी, जो एक आइसी प्लैनेट पर अकेले फंस गए हैं। उस फ़िल्म में उनकी छोटी-सी भूमिका थी, ‘द मार्शियन’ में वो उस वस्तुस्थिति को पूरी फ़िल्म की अवधि तक खींच ले गए हैं और इस बार उनकी भूमिका सकारात्मक है। साइंस फ़िक्शन का एक अर्थ यह भी होता है साइंस में जो सम्भावनाएं निहित हैं- जो कि पूर्णतया कैलकुलेशंस और इक्वेशंस को लेकर हमारी कल्पनाशीलता पर आधारित हैं- उनसे दर्शकों को अवगत कराएँ। यह एक बहुत बड़ी समस्या है कि मार्स पर छूट गए किसी एस्ट्रोनॉट को कैसे रेस्क्यू कराएँ, जिसके पास सीमित संसाधन हैं और जो धरती से 209.38 मिलियन किलोमीटर (12.42 लाइट-मिनिट्स) की दूरी पर है, वहाँ तक किसी मिशन को यात्रा करने में आठ महीने लगते हैं और उस मिशन की तैयारी अनेक वर्षों तक चलती है।

फ़िल्म के अंत में हम देखते हैं कि मार्क वैटने को सफलतापूर्वक रेस्क्यू करा लिया गया है। कैसे? ‘द मार्शियन’ हमें बतलाती है कि एस्ट्रोडायनेमिक्स और एस्ट्रोबायोलॉजी क्या चमत्कार कर सकती है। मार्स से पृथ्वी की तरफ़ आ रहे हर्मीस यान को पृथ्वी के ‘ग्रैविटी-असिस्ट’ (वही ‘इंटरस्टेलर’ वाला ‘स्लिन्गशॉट मनुवर’, वहाँ पर गार्जेन्तुआ ब्लैकहोल के ग्रैविटी असिस्ट का इस्तेमाल किया गया था। बाय द वे, जुपिटर के ग्रैविटी-असिस्ट ने ही हमारे वोयजर स्पेसशिप्स को सोलर सिस्टम से बाहर जाने में मदद की है) का इस्तेमाल करके फिर से मार्स के कोर्स पर लॉन्च किया जाता है। यह क्लासिक एस्ट्रोडायनेमिक्स है। और क्लासिक एस्ट्रोबोटनी है, मैट डैमन के द्वारा मार्स पर आलुओं की खेती करना। क्योंकि जीवित रहने के लिए बुनियादी ज़रूरत है- फ़ूड।

जाने कितनी ही सर्वाइवल-फ़िल्मो में भूख को एक केंद्रीय मोटिफ़ की तरह दर्शाया गया है (याद कीजिए ‘द पियानिस्ट’ में व्लादिष्लाव ष्पीलमान की अहर्निश क्षुधा)। कितने आश्चर्य की बात है कि मनुष्य को अपनी बुनियादी ज़रूरतों की ‘डिफ़ॉल्ट-सेटिंग्स’ पर स्विच होने में एक पल भी नहीं लगता। मार्स पर भेजे गए अत्याधुनिक मिशन का एक एस्ट्रोनॉट अपनी समस्त मेधा का इस्तेमाल आलुओं की खेती करने में लगाता है। मनुष्य के भीतर का हंटर-गैदरर जागने में कभी देरी नहीं करता। गए साल तालाबंदी के दिनों में हमने भी तो अपने भीतर के कैव-ड्वेलर को अनुभव किया था। मार्स पर आलुओं की खेती ‘द मार्शियन’ का सबसे ख़ूबसूरत, सबसे मार्मिक दृश्यबंध है। क्या आपको पता है, यूनिवर्स में आलू तमाम हीरे-जवाहरात से ज़्यादा क़ीमती वस्तु है? नेपच्यून पर तो डायमंड्स की बरखा होती है, लेकिन मजाल है जो सोलर सिस्टम में आपको कहीं भूल से एक आलू दिखलाई दे जाए। कार्ब्स की यह गठरी हमारी पृथ्वी की एक नायाब सौग़ात है। मैटर को एनर्जी और एनर्जी को लिविंग ऑर्गेनिज़्म में तब्दील कर देने वाली एक चमत्कारिक वस्तु। साइंस-फ़िक्शन फ़िल्में हमें साधारण के प्रति इसी तरह के विस्मय, आश्चर्य और विनय से भरती हैं।

मार्स के इस मौसम में ‘द मार्शियन’ देखी जानी चाहिए। फ़िल्म फ़्यूचरिस्टिक है और वर्ष 2035 के एक मैन्ड मार्स-मिशन को प्रदर्शित करती है। यह वर्ष 2021 है। यक़ीन मानिये, यह निरी कल्पना नहीं। वर्ष 2035 में हम (यानी सेपियंस, इस प्लैनेट-अर्थ का कंस्ट्रक्ट) सच में ही मार्स पर होंगे। यों भी 1972 के बाद से ही मनुष्य ने किसी एक्स्ट्राटेरेस्ट्रायल ऑब्जेक्ट पर क़दम नहीं रखा है। तब हम आख़िरी बार मून पर गए थे। बहुत लम्बा अरसा हो गया। मनुष्यता का इतिहास एक्स्प्लोरेशन का इतिहास है और स्पेस को एक्सप्लोर करने का यही सही समय है!

तो, आने वाले किसी समय में, “सी यू ऑन मार्स”- उस सेपियंस की तरह, जो अब एक ‘मार्शियन’ है!

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