फिर छला गया पहाड़ : असफलताओं से ध्यान हटाने को त्रिवेंद्र ने खेला गैरसैंण का कार्ड!

उमेश कुमार

गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने के दूरगामी खतरनाक परिणाम… आखिर गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने से परहेज क्यों?

पहाड़ के लोग भोले और भावुक होते हैं. पहाड़ के लोगों को अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति, अपनी बोली, अपनी खेती, अपने संगीत से बेपनाह मोहब्बत होता है. यही वजह है कि कई दफे वे छलिए नेताओं के इमोशनल ब्लैकमेल में फंस जाते हैं. उत्तराखंड में एक बार फिर से पहाड़ की भोली-भाली जनता को ठगा जा रहा है. गैरसैंण नामक इमोशनल कार्ड खेलकर सबसे असफल मुख्यमंत्री के रूप में कुख्यात त्रिवेंद्र रावत ने कुछ वक्त के लिए बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान हटा दिया है. पर सवाल है कि जिस गैरसैंण के कार्ड पर जनता लहालोट हो रही, नेता लोग वाह वाह कर रहे, उससे असल में पहाड़ के लोगों को कोई फायदा होने जा रहा या नुकसान उठाना पड़ेगा? इसकी पड़ताल कर रहे हैं चर्चित खोजी पत्रकार उमेश कुमार!

सीएम त्रिवेन्द्र ने न्यूनतम पर पहुंच चुकी अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए गैरसैंण का कार्ड खेला है जो पहाड़ की जनता पर बहुत भारी पड़ने वाला है। यह कितना भारी पड़ेगा, इसकी ठीकठीक कल्पना अभी कोई आम आदमी कर भी नहीं सकता। गैरसैंण को स्थायी राजधानी न बनाकर जनता के पैसे का बहुत भारी नुकसान सरकार करने जा रही है। हमारे उत्तराखण्ड में नेताओं को ठंड ज्यादा लगती है तो वो सर्दियों में गैरसैंण नहीं रह सकते। इसका हल सीएम त्रिवेन्द्र ने निकाला कि गर्मियों में गैरसैंण रहना और सर्दियों में देहरादून।

इस तरह यहां से वहां, यानि गैरसैंण से देहरादून और देहरादून से गैरसैंण जाने की प्रक्रिया हर साल चलती रहेगी। एक राजधानी से दूसरी राजधानी जाने का मतलब है पूरा सचिवालय, सभी सरकारी ऑफिस और निदेशालय को यहां से वहां शिफ्ट करना। एक राज्य की दो राजधानियों का उदाहरण जम्मू और श्रीनगर है। जम्मू से श्रीनगर और श्रीनगर से जम्मू शिफ्ट करने हेतु एक-एक महीने का समय लगता है सभी फाईलों को पैक करने में। फिर एक-एक महीना उन फाइलों को खोलने और सेट करने में लगता है। यह प्रक्रिया एक साल में दो बार की जाती है यानि 12० दिन मतलब 4 महीने।

इस दरम्यान राज्य के विकास से संबंधित सभी फाइलें बंद रहती हैं जिसके चलते राज्य का विकास और लोगों के सभी कार्य ठप्प हो जाते हैं। राजधानी शिफ्ट करने में लगभग 45० करोड़ का खर्च आता है। पहले से कर्ज में डूबा राज्य 45० करोड़ हर वर्ष कैसे झेलेगा। राजधानी की सभी कार्यालयों की फाइलों को पैक करने और खोलने पर लगभग 35 करोड़ का खर्चा आता है। राजधानी शिफ्ट करने के दौरान सैंकड़ो महत्वपूर्ण फाइलें गुम हो जाती हैं जिनका नुकसान आम आदमी को झेलना पड़ता है।

जम्मू और कश्मीर में आज भी लोग अपनी फाइलों के लिए भटकते मिल जाएंगे। लगभग एक लाख कर्मचारियों को एक राजधानी से दूसरे में शिफ्ट करने पर उनका टीए-डीए का बोझ अलग। अब लगभग एक लाख अधिकारियों व कर्मचारियों के कार्यालय व आवासीय क्षेत्र का इंफ्रास्ट्रकचर तैयार करने में लगभग 2० से 25 हजार करोड़ खर्चा आएगा। वहीं दोनों राजधानियों के इंफ्रास्ट्रकचर के रखरखाव का खर्चा दोगुना हो जाएगा।

दोहरा चरित्र दिखाकर कर्ज में डूबी जनता पर और कर्ज बोझ डालने का काम सरकार ने किया है। मूलभूत ढांचे के लिए पिछले 2० साल से जूझ रहा राज्य अब पुन: लगभग एक लाख कर्मचारियों के काम करने, रहने और यातायात की व्यवस्था कैसे करेगा यह बड़ा सवाल है?

आखिर यह खेल क्यों खेला सीएम त्रिवेन्द्र ने? क्या बिना सोचे समझे लिया गया निर्णय है? आखिर गैरसैंण को स्थाई राजधानी घोषित करने में क्या परेशानिया थी? इस शिफ्टिंग प्रक्रिया में अधिकारियों व कर्मचारियों के स्कूल पढऩे वाले बच्चों के सामने एक बड़ा संकट आकर खड़ा होगा क्योकि वह तो अपनी पढ़ाई छोड़कर गैरसैंण जा नहीं सकते और उनके माता पिता जब वहां जाएंगे तो बच्चे की परवरिश कौन करेगा यह भी एक बड़ा सवाल सामने आ रहा है?

मुख्य तौर पर देखा जाए जाए तो सीएम त्रिवेन्द्र का राजनीतिक लड्डू रूपी यह फैसला काफी घातक है और इसके परिणाम राज्य को डाइबिटीज़ के रूप में देखने को मिलेंगे। यह काम जो सीएम त्रिवेन्द्र कर गए है, इसका नतीजा एक भयानक समस्या के रूप में राज्य की जनता के सामने आने आने वाला है? हो सकता है कि आज लोगों को कुछ पल की खुशी और सीमए त्रिवेन्द्र को लोकप्रियता मिले लेकिन परिणाम सुखद नहीं होंगे। मेरा मत है कि गैरसैंण को स्थाई राजधानी होना चाहिए। शहीदों के सपनों और आंदोलनकारियों की भावनाओं के अनुरूप पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैंण ही होनी चाहिए क्योंकि इस राज्य का निर्माण हुआ ही इस बात को लेकर था कि जब राज्य बनेगा तो राजधानी गैरसैंण ही बनाई जाएगी। ऐसे में हम सब सवाल पूछ सकते हैं कि आखिर गैरसैंण स्थाई राजधानी बनाने से परहेज क्यों?

लेखक उमेश कुमार उत्तराखंड की राजनीति और मीडिया के चर्चित नाम हैं. इन्होंने कई मुख्यमंत्रियों के भ्रष्टाचार को बेनकाब किया. वे कई न्यूज चैनलों के संस्थापक रहे हैं. फिलहाल बांग्ला भारत नामक वेस्ट बंगाल के न्यूज चैनल के सीईओ और एडिटर इन चीफ हैं.



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