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सियासत

अमेरिका से कहीं ज़्यादा तेज गति से हमारे देश में लोकतंत्र को रौंदने वाली गाड़ी दौड़ रही है!

अतुल चौरासिया-

पूरी दुनिया में जब कम्युनिज्म की असफलता सिद्ध हो चुकी है, ले देकर दुनिया को बेहतर बनाने का एक ही वाजिब, कम बुरा विकल्प है ‘उदारवादी लोकतंत्र’. लेकिन अमेरिका में ट्रंप समर्थकों की गुंडागर्दी और हमले में जिस तरह से हमारे देश का लेफ्ट लिबरल तबका खुशी का इजहार कर रहा है वह दुखद है. याद रखिए अमेरिका में लोकतंत्र पर किसी तरह का आघात आपको, हमको, खास कर तीसरी दुनिया के देशों को उससे कहीं ज्यादा बुरी तरह से बर्बाद करेगा. अमेरिकी नेता और उसकी नीतियां संभव है कि बहुत बुरी रही हैं, उसकी निंदा करना भी जायज है, लेकिन उसकी आड़ में किसी देश के लोकतंत्र की बर्बादी की खुशी मनाना निहायत कुंठा का प्रदर्शन है. दुनिया में फेल हो चुके कम्युनिज्म की कुंठा की खुशी अमेरिका में लोकतंत्र पर हो रहे हमले में मनाने वाले सावधान रहें. अमेरिका से कहीं ज्यादा तेज गति से हमारे देश में लोकतंत्र को रौंदने वाली गाड़ी दौड़ रही है. आज अमेरिकी लोकतंत्र की असफलता, हालांकि इसे असफलता कहना भी बहुत जल्दबाजी है, पर जश्न मनाने के चक्कर में ऐसा न हो कि कल अपने यहां लोकतंत्र के बचाव के लिए मुंह ही शेष न बचे.

सौमित्र रॉय-

कल आधी रात को अमेरिकी कांग्रेस के भवन पर ट्रम्प समर्थकों का हमला एक घमंडी, तुनकमिजाज और सत्ता के मद में चूर शासक की बेहयाई है।

1814 में एक ब्रिटिश मेजर जनरल ने खुद को राष्ट्रपति निवास में आग लगा दी थी।

हाल के समय में माली, आर्मेनिया और किर्गिस्तान की संसद पर ऐसे हमले हुए हैं।

ट्रम्प ने एक दिन पहले ही ट्वीट किया था कि वे हर हाल में कुर्सी पर बने रहना चाहते हैं।

उन्होंने इसी भावना के साथ राज किया और अमेरिकी अवाम को सत्ता समर्थक उग्र भीड़ और लोकतंत्र समर्थक मज़लूम जनता के रूप में तब्दील कर दिया।

ज़रा सोचिए, क्या ये सिर्फ इत्तेफ़ाक़ है कि भारत में भी यही हो चुका है?

यह भी कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं कि पीएम नरेंद्र मोदी ट्रम्प के दोस्त हैं। मोदी समर्थकों को ट्रम्प की जीत के लिए हवन करते तो देखा ही होगा।

दुनिया भीड़ तंत्र में बदल रही है। बेलगाम भीड़। कहीं राष्ट्रवाद तो कहीं मज़हब, नस्ल और व्यक्तिवाद के नशे में झूमती, दंगे करती, विरोधियों को पटकती भीड़।

चीन ने कल कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को मुंह बंद रखने का फरमान जारी किया है।

थोड़ा बहुत लोकतंत्र इस देश में बचा है, जिसे मोदी सरकार के अफसर बहुत ज़्यादा लोकतंत्र कहते हैं।

यानी मेरा, आपका सरकार की ग़लत नीतियों के खिलाफ बोलना बहुत ज़्यादा लोकतंत्र है।

कल सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन पर केंद्र ने कहा कि बात कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि बात आगे भी नहीं बढ़ रही है।

सरकार को लगता होगा कि शायद यहां भी लकीर पार हुई है। आज 11 बजे किसानों का ट्रैक्टर मार्च है।

सरकार तो चाहेगी कि लकीर पार हो और कोर्ट को बताया जा सके कि हम तो बात कर रहे थे, लेकिन लकीर लांघी गई।

ये लकीर बनाई किसने? क्यों बनाई?

आप पाएंगे कि हर तरफ़ लकीर है। घर की चारदीवारी में, सड़क पर, मंदिर, दुकान, बाजार, स्कूल, खान-पान से लेकर पहनावे तक में लकीरें खिंची है।

इन बहुत सी लकीरों के बीच एक बड़ी लकीर सरकार खींच रही है। सहमति और असहमति के बीच। लकीर भी ऐसी, जो दीवार बन जाए।

वाशिंगटन में ट्रम्प समर्थकों ने तो दीवार भी लांघ ली। अब क्या बचा?

क्या भारत ने ऐसी कोई दीवार लांघी थी? याद कीजिये 1992 को?

हममें से कइयों ने उस वाकये को अपनी आंखों से देखा और चुपचाप मज़हब की लकीरों के बीच उसे फिट कर लिया।

भारत यकीनन विश्व गुरु है। अमेरिका बहुत पीछे है।
(तस्वीरें साभार- CNN)

हर्ष देव-

आश्चर्यजनक: अभूतपूर्व !!
ट्रम्प समर्थकों ने संसद (Capitol Hill) में धावा बोल दिया। उनमें से एक स्पीकर की कुर्सी पर जा बैठा। अंदर फ़ायरिंग भी हुई जिसमें कम से कम एक स्त्री के मरने की खबर है। दंगा निरोधी पुलिस ने घुसपैठियों को बाहर निकालकर कर्फ़्यू लगा दिया है। नेशनल गार्ड बुला लिए गए हैं।
ट्रम्प जैसा सिरफिरा ज़िद्दी ऐसा भी कर सकता है।

कैम छो ट्रम्प और हाउडी मोदी के दौरान ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ के नारों से सिरफिरे पर जीत का सुरुर इतना सिर चढ़कर नाचने लगा कि चुनाव के नतीजे देखने की भी याद नहीं रही। वो सीधे संसद पर धावा बोलने ही निकल पड़ा। दुनिया भर में थू-थू हुई, सत्ता तो हाथ आनी ही नहीं थी और बेचारे 4 लोग जान भी गँवा बैठे। और तो और, हत्थी मारनेवाले दोस्त ने भी शर्मसार होने से बचने के लिए पाला बदलने में ही भलाई समझी!

अपने नाम पर काली स्याही पुतवाने के बाद लज्जा के लिए तरसते ट्रम्प ने संसद पर धावा बोलने वालों को प्रेम भरा संदेश दिया- ‘हम तुम्हें बहुत चाहते हैं!’
आख़िरकार हत्थी मार यार ठहरा!
याद है! पत्रकार गौरी लंकेश को “रंडी” जैसे शब्दों से पुकारने वालों को भी ऐसे ही प्यार से फ़ॉलो करते हैं अपने साब!!
ट्विटर ने इस हारे हुए राष्ट्रपति के खाते पर रोक लगा दी है और उसके वीडियो भी हटा दिए हैं।
लेकिन शर्म की उम्मीद न करो। मायूस होना पड़ेगा।

सत्येंद्र पीएस-

अमेरिका के कथित लोकतंत्र का जिस तरह जुलूस निकला है, आधी दुनिया खुश तो जरूर होगी जो इनके बमों, रायफलों और लूट के कारण गृहयुद्ध झेल रहे हैं! संभव है कि यह अमेरिका के वैश्विक पतन की शुरुआत बन जाए।

मुकेश कुमार-

ये तस्वीर बता रही है कि डोनल्ड ट्रम्प ने अमेरिका को क्या बना दिया है।

लेकिन बहुत खुश न हों। भारत भी इसी दिशा में बढ़ रहा है। देखते रहिए, अगले तीन सालों में हम अमेरिका को पीछे छोड़ देंगे।

प्रकाश के रे-

पद से हटने के बाद ट्रंप के ख़िलाफ़ मुक़दमा न चलाने के बारे में लगभग आम सहमति बन गयी थी, पर आज के घटनाक्रम के बाद उनके ऊपर राष्ट्रद्रोह का मामला बन सकता है.

अमेरिका में ही नहीं दुनियाभर में लंपट धुर दक्षिणपंथ को पालने-पोसने में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही है. यह संतोषजनक है कि ट्विटर ने ट्रंप को 12 घंटे के लिए ब्लॉक किया है और फ़ेसबुक से भी कार्रवाई की माँग हो रही है, लेकिन सबसे ज़रूरी है कि धुर दक्षिणपंथ और सोशल मीडिया के गठजोड़ की ठोस परख हो. भारत के लिए तो यह मसला अमेरिका या किसी अन्य देश से अधिक गंभीर है.

जो बाइडेन, डेमोक्रेट्स और लिबरल्स को जो बात अमेरिका में इनसरेक्शन, कू और अटैक ऑन डेमोक्रेसी दिख रहा है, वह अफ़्रीका या एशिया के देशों में होता, तो यही जोकर उसे विल ऑफ़ पीपुल, पीपुल हैव स्पोकेन, डेमोक्रेटिक मूवमेंट दिखता. डबल स्टैंडर्डस ही अमेरिकी पोलिटिकल इथिक्स है.

सरफ़राज नज़ीर-

अमेरिका में व्हाइट हाउस के अंदर दंगे के हालात बन गए हैं। ट्रम्प कुर्सी छोड़ नहीं रहे और उनके समर्थकों ने अंदर फायरिंग भी कर दी है।

दुनिया में तमाम मुस्लिम ममालिक में डेमोक्रेसी लाने के नाम पर जो तांडव किया गया वो मुल्क अपनी डेमोक्रेसी नहीं बचा पाया। वक्त हर मर्ज़ का इलाज है।

अमेरिकी संसद में भीड़ के हमले पर हैरान होने की कतई ज़रूरत नहीं है, सोनिया गांधी के जन्मदिन पर बार डांसर और गांधी जयंती पर जब सावरकर ट्रेंड कर रहे हों तो समझ लीजिए यहाँ भी एक भीड़ तैयार हो रही है बस उनके प्रिय नेता के हारने की देरी है, भीड़ इस बार वाशिंग्टन डीसी की जगह दिल्ली मे हमला करेगी।

और ढोंग मुझे न पहले पसंद था न आज है। बाकी आप की मर्ज़ी.

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