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तुर्की में जगह बचाने के लिए लंबाई में बन रहे कब्रगाह, शव लेटने की बजाय खड़े रहेंगे!

प्रवीण झा-

मेरिकन प्रीमेवल सीरीज के दाह-संस्कार वाले दृश्य पर बात होती है। उसमें एक अमरीकी आदिवासी (रेड इंडियन) को लकड़ियों पर लिटा कर अग्नि देते हैं। एक ने कहा कि यह सेकंडों में धू-धू करने लगा और धुआँ भी नहीं है, जबकि उस जमाने में प्रोपेन गैस तो था नहीं।

मैंने कहा कि निर्देशक कहाँ पूरी प्रक्रिया दिखा पाएँगे। पूरा शवदाह देखने में दो-तीन घंटे लग जाएँगे। मैंने चार-पाँच बारी इस प्रक्रिया में भाग लिया होगा, जिसमें कुछ लोग इसमें बड़े ही दक्ष होते हैं। किस तरह चिता पर लकड़ियों को सजाना है, हवा के रुख को पहचानते हुए आग देनी है, कब तक शरीर पूरी तरह जल जाएगा, सब जानकारी रखते हैं। महिलाओं और मोटे पुरुषों की चर्बी दाह में अधिक सहायक होती।

कुछ शरीर कहीं अधिक समय लेते हैं। ऊपर से बारिश आ गयी, तो अलग ही मुश्किल। फिर भी विद्युत-दाह से अधिक सामाजिक माहौल लकड़ियों वाले दहन में लगता है।

हालाँकि अब यूरोपीय ईसाई भी विद्युत दाह ही करा रहे हैं, क्योंकि क़ब्र के लिए जगह और तमाम ताम-झाम होते हैं। एक मित्र कह रहे थे कि तुर्की में तो जगह बचाने के लिए लंबाई में कब्रगाह बन रहे हैं, जिसमें शव लेटने के बजाय खड़े रहते हैं। मानव इतिहास में इस तरह खड़े होकर रखने का आइडिया पहले क्यों नहीं आया?

पोस्ट पर आए कुछ कमेंट भी नीचे पढ़ें..


नरपतसिंह उदावत-

मेरे यहां (पाली राजस्थान)गांव में हिंदुओ की 42जातियों के लोग रहते हैं। उनमें से चार जाति में शवों को गाड़ने का रिवाज है। एक जाति वाले शव को सीधा बिठाकर गाड़ते है,उसे वे समाधि देना कहते हैं। उस स्थान पर चबूतरा भी बना देते हैं। एक जाति वालो के पास शमशान में जगह कम है,वे वहां किसी मुर्दे को गाड़ने के लिए खुदाई करते हैं तो वहां से बीस तीस साल पहले गाड़े मुर्दे की हड्डियां निकल आती हैं, मतलब गड़े मुर्दे उखाड़े जाते हैं, और नए मुर्दे गाड़े जाते हैं।

राधारमन उपाध्याय-

हमारे गांव में नाथ समाज के लोग शव समाधिस्थ अवस्था में/बैठाकर ही दफनाते है जो नाथ समाज की परम्परा मानी जाती है। साथ ही हम सहित सभी समाज दूधमुंहे बच्चों को भी दफनाते ही है।

यहां राज्य में विश्नोई समाज शव को दफनाता ही जिसे स्थानीय भाषा में माटी लगाई/मिट्टी लगाना बोला जाता है।

मोहम्मद आशिफ हाशमी-

उत्तर भारत मे मिडिल क्लास विद्युत शव दाह से कतराते है, एक स्टेट्स जैसी भ्रांति है की इतने गए गुजरे नही है की लकड़ी का इंतजाम न कर सके, वहीं दूसरे तरफ उच्च वर्ग समय की कमी का ध्यान रखते हुए विद्युत को प्रार्थमिकता देता है।

शिवम शुक्ला-

कोई पाकिस्तानी पॉडकास्ट सुन रहा था, उसमें उन्होंने बताया कि पाकिस्तान में अब दो-तीन मंज़िला कब्रें बन रही हैं। पत्नी पहले मर गईं उनको दफ़ना दिया, फिर पति निपट लिए तो उनको पत्नी के ऊपर दूसरी मंज़िल बनाकर लिटा दिया। अब सवाल है कि उनके बच्चे गए तो उनको कहां रखेंगे! समस्या कठिन है।

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