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टीवी मीडिया तो विकसित होने से पहले ही पसर गया, बस सेठजी की रखैल टाइप खबर आना रहा बाकी

व्यावहारिक पत्रकारिता में कई आयाम एक साथ काम करते हैं। उसमें संपादकीय टीम की दृष्टि, ध्येय, प्रस्तुतिकरण और प्रतिबद्धता के साथ भाषा का मुहावरा भी शामिल है। इनसे मिलकर ही एक मुकम्मल सूचना उत्पाद बनता है, जिसे आप प्रारंभिक तौर पर अखबार या मैगजीन के रूप में पहचानते हैं। हमारी पत्रकारिता की शुरुआत के समय हर अखबार और मैगजीन का कलेवर, विषयों का चयन, प्रस्तुतिकरण और भाषा का व्याकरण अलग-अलग था। यहां तक कि फॉन्ट और ले आउट भी, जैसे धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान या दिनमान और रविवार। आज भी इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू या इकोनॉमिक्स टाइम्स और बिजिनेस स्टेण्डर्ड देख कर इसे समझा जा सकता है ।

व्यावहारिक पत्रकारिता में कई आयाम एक साथ काम करते हैं। उसमें संपादकीय टीम की दृष्टि, ध्येय, प्रस्तुतिकरण और प्रतिबद्धता के साथ भाषा का मुहावरा भी शामिल है। इनसे मिलकर ही एक मुकम्मल सूचना उत्पाद बनता है, जिसे आप प्रारंभिक तौर पर अखबार या मैगजीन के रूप में पहचानते हैं। हमारी पत्रकारिता की शुरुआत के समय हर अखबार और मैगजीन का कलेवर, विषयों का चयन, प्रस्तुतिकरण और भाषा का व्याकरण अलग-अलग था। यहां तक कि फॉन्ट और ले आउट भी, जैसे धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान या दिनमान और रविवार। आज भी इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू या इकोनॉमिक्स टाइम्स और बिजिनेस स्टेण्डर्ड देख कर इसे समझा जा सकता है ।

एक पत्रकार किसी भी अखबार या मैगजीन के फटे हुए कागज के टुकड़े को देखकर पहचान सकता है कि यह किस का टुकड़ा है। प्रिंट मीडिया की तरह विजुअल मीडिया का भी अलग मुहावरा होता है। आसान उदाहरण के रूप में समझें तो टीवी और सिनेमा की कैमरे की भाषा में फर्क होता है तो ऩाटक, सीरियल और सिनेमा की एक्टिंग और निर्देशन में भी। हमारी पत्रकारिता का कैरियर जब गति पकड़ रहा था, तब टी वी पर निजी न्यूज चैनलों ने दस्तक देना शुरु कर दिया था। हमें लग रहा था कि न्यूज की विजुअल भाषा को विकसित होते हुए देखेंगे। इस बार कैमरे और खबर की नई जुगलबंदी देखने को मिलेगी। हर न्यूज चैनल की अलग जुगलबंदी से विकसित होते नए व्याकरण को देखेंगे। अच्छे व्याकरण को मुख्य धारा में आते हुए और खराब व्याकरण को किनारे लगते हुए देखेंगे। 

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जल्द ही हमारी इच्छाओं पर पानी फिर गया। शुरु में न्यूज चैनल थोड़ी-थोड़ी अधूरी कोशिश करते नजर तो आते थे पर वे अपनी जरूरत के रिपोर्टरों और कैमरामैनों से संपन्न नहीं थे। हो सकता है संपादकीय दृष्टि का अभाव हो या मैंनेजमेंट का दबाव, पर चैनल अपना आत्मविश्वास पैदा नहीं कर पा रहे थे। टीवी न्यूज का व्याकरण विकसित नहीं हो पा रहा था। उनपर बची खुची चोट इंडिया टीवी ने की। वह एक नया भाषाई तथा प्रबंधन व्याकरण लेकर आया कि सारे चैनलों के कथित मूल्य उसमें बह गए। अब चैनल खबर की विश्वसनीयता की जगह दर्शकों का ध्यान खींचने पर टिक गए। मदारी की चमत्कारिक भाषा, बिना कंटेंट और विजुअल के, अजब दौर शुरु हुआ।

एसपी का आजतक भी इसमें बह गया पर टीवी पत्रकारिता मर गई। साल छह महीने में चैनलों को समझ में आने लग गया कि यह रास्ता आगे कहीं नहीं जाता। फिर कॉस्ट कटिंग का मुहावरा चल निकला। फार्मूले के तौर पर पैनल डिस्कशन के कार्यक्रम शुरु किए गए क्योंकि यह न सिर्फ सस्ते पड़ते हैं बल्कि मेहनत भी कम करनी पड़ती है और तथ्य यह भी है कि देश के अधिकतर अखबार इन डिस्कशनों से प्रभावित होकर अपनी लीड तय करते हैं। यानि कि भारत में टीवी पत्रकारिता तो विकसित होने से पहले ही पसर गई। सारे न्यूज चैनलों का आदर्श बीबीसी या फॉक्स नहीं, इंडिया टीवी है। और हम इस गलतफहमी में जी रहे थे कि हम इसके विकास से कुछ सीखेंगे।

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पत्रकारिता में मेरे विकास का काल और भारत में टीवी पत्रकारिता का विकास काल लगभग एक ही है पर टीवी पत्रकारिता विकसित ही नहीं हो सकी या जिसे हम विकास कहना चाहते हैं, उसकी दिशा ही मुड़ गई। वहां मौलिक मुहावरा विकसित करने के जगह नकल की भेड़चाल चल रही थी। उनका आत्मविश्वास अपनी सृजनात्मकता पर नहीं बल्कि हर हफ्ते जारी होने वाली टीआरपी पर टिका था। यह टीआरपी पर्दे के पीछे से टीवी इंडस्ट्री पर राज कर रही थी। टीवी इंडस्ट्री को सबसे ज्यादा नुकसान इसी टीआरपी ने पहुंचाया। इसके स्वतंत्र विकास की भ्रूण हत्या कर दी।

बहरहाल एसपी सिंह अपने नए मुहावरे के साथ ताजगी के झोंके की तरह आए थे। उनके आजतक ने दूरदर्शन से अपनी शुरुआत की और आजतक का बेहतरीन दौर भी वही था। इस बीच ब्रेकिंग न्यूज आ गई। फिर ब्रेकिंग के नाम पर चैनलों की खबरें इतनी नीचे गिरीं कि गड्ढे भी शरमा गए। नरक के द्वार, स्वर्ग की सीढ़ियां, शैतान का महल और दाउद की योजना टाइप कार्यक्रमों ने कम पढ़े चालू रिपोर्टरों को भी स्टार बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। बस सेठजी की रखैल टाइप खबर ही आना बाकी रह गया था। सभी न्यूज चैनल स्थितियों से समझौता कर चुके थे। सब एक जैसे बन चुके थे क्योंकि या तो प्रयोग की गुंजाइश नहीं थी या फिर अनुमति। फिर भी बीच-बीच में प्रयोग करने के प्रयास चलते रहते थे जो अंततः कुछ हफ्तों में टीआरपी रिपोर्ट के आगे घुटने टेक देते थे। 

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इन सबके बीच एक अजीब प्रयोग हुआ। यह प्रयोगशाला ई-टीवी की थी। प्रयोग किया पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ने। ई-टीवी ने अपनी समाचार प्रस्तुति का कलेवर और कंटेट दोनों बदल दिए। नीचे चलने वाली पट्टियों को इसका हथियार बनाया। चैनल में कंट्रोल रूम बनाया और हर कस्बे में खबर देने के लिए इंफार्मर रखे गए। चैनल ने अपनी पहचान सबसे पहले और सबसे ज्यादा खबर देने वाले चैनल की बना ली। चैनल खबरें सुनने और देखने की जगह खबरें पढ़ने वाला चैनल बन गया। यह एक अजीब प्रयोग है पर चैनल के तौर पर सफल प्रयोग है।

इस प्रयोग की आलोचना करने वाले कम नहीं हैं पर खबरों को ताजा अपडेट के लिए वो ही इसे लगातार देखने के लिए अभिशप्त भी हैं। हर सरकारी ऑफिस में, यहां तक कि न्यूज चैनलों के ऑफिसों में भी ई-टीवी एक एडिक्शन बन गया। तेज खबरों के लिए खड़ी की गई न्यूज एजेंसियां तो दूर तक इस लड़ाई में ही नहीं हैं। अब खबरों के लिए दिनभर पढ़े जाने वाले इस चैनल के प्रयोग को सफल कैसे न कहें। ये पत्रकारिता का नहीं बल्कि टीवी प्रस्तुतीकरण का नया मुहावरा है।

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लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार धीरज कुलश्रेष्ठ के एफबी वॉल से 

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