अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

जज लोया के दोस्त इसे सुनियोजित हत्या मान रहे हैं। अनुज लोया ने जब 2015 में जांच की मांग की थी और जान को ख़तरा बताया था तब गोदी मीडिया के एंकर सवाल पूछना या चीखना चिल्लाना भूल गए। वो जानते थे कि उस स्टोरी को हाथ लगाते तो हुज़ूर थाली से रोटी हटा लेते। आप एक दर्शक और पाठक के रूप में मीडिया के डर और दुस्साहस को ठीक से समझिए। यह एक दिन आपके जीवन को प्रभावित करने वाला है। साहस तो है ही नहीं इस मीडिया में। कैरवान पर सारी रिपोर्ट हिन्दी में है। 27 दिसंबर की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

29 नवंबर 2017 को टाइम्स आफ इंडिया में ख़बर छपती है कि अनुज लोया ने बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर बताया था कि उसे अब किसी पर शक नहीं है। तब उसी दिन इन एंकरों को चीखना चिल्लाना चाहिए था मगर सब चुप रहे। क्योंकि चीखते चिल्लाते तब सवालों की बातें ताज़ा थीं। लोग उनके सवालों को पत्रिका के सवालों से मिलाने लगते। अब जब रिपोर्ट पुरानी हो चुकी है, अनुज लोया के बयान को लेकर चैनल हमलावार हो गए हैं। क्योंकि अब आपको याद नहीं है कि क्या क्या सवाल उठे थे।

मीडिया की यही रणनीति है। जब भी हुज़ूर को तक़लीफ़ वाली रिपोर्ट छपती है वह उस वक्त चुप हो जाता है। भूल जाता है। जैसे ही कोई ऐसी बात आती है जिससे रिपोर्ट कमज़ोर लगती है, लौट कर हमलावार हो जाता है। इस प्रक्रिया में आम आदमी कमजोर हो रहा है। गोदी मीडिया गुंडा मीडिया होता जा रहा है।

14 जनवरी को बयान जारी कर चले जाने के बाद गोदी मीडिया को हिम्मत आ गई है। वो अब उन सौ पचास लोगों को रगेद रहा है जो इस सवाल को उठा रहे थे जैसे वही सौ लोग इस देश का जनमत तय करते हों। इस प्रक्रिया में भी आप देखेंगे या पढ़ेंगे तो मीडिया यह नहीं बताएगा कि कैरवान ने अपनी दस रिपोर्ट के दौरान क्या सवाल उठाए। कम से कम गोदी मीडिया फिर से जज लोया की बहन का ही बयान चला देता ताकि पता तो चलता कि बुआ क्या कह रही थीं और भतीजा क्या कह रहा है।

क्यों किसी को जांच से डर लगता है? इसमें किसी एंकर की क्या दिलचस्पी हो सकती है? एक जज की मौत हुई है। सिर्फ एक पिता की नहीं। वैसे जांच का भी नतीजा आप जानते हैं इस मुल्क में क्या होता है।

अब अगर गोदी मीडिया सक्रिय हो ही गया है तो सोहराबुद्दीन मामले में आज के इंडियन एक्सप्रेस में दस नंबर पेज पर नीचे किसी कोने में ख़बर छपी है। जिस तरह लोया का मामला सुर्ख़ियों में हैं, उस हिसाब से इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिल सकती थी। सीबीआई ने सोमवार को बांबे हाईकोर्ट में कहा कि वह सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में बरी किए गए तीन आई पी एस अफसरों के ख़िलाफ़ अपील नहीं करेगी। इसे लेकर गोदी मीडिया के एंकर आक्रामक अंग्रेज़ी वाले सवालों के साथ ट्विट कर सकते थे। वंज़ारा को नोटिस नहीं पहुंच रहा है क्योंकि उनका पता नहीं चल रहा है। अदालत ने सीबीआई से कहा है कि वंज़ारा को पता लगाएं। एंकर चीख चिल्ला सकते हैं। चाहें तो।

आपको क्यों लग रहा है कि आपके के साथ ऐसा नहीं होगा? क्या आपने विवेक के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए हैं? क्या आप इसी भारत का सपना देखते हैं जिसका तिरंगा तो आसमान में लहराता दिखे मगर उसके नीचे उसका मीडिया सवालों से बेईमानी करता हुआ सर झुका ले। संस्थाएं ढहती हैं तो आम आदमी कमज़ोर होता है। आपके लिए इंसाफ़ का रास्ता लंबा हो जाता है और दरवाज़ा बंद हो जाता है।

आप सरकार को पसंद कर सकते हैं लेकिन क्या आपकी वफ़ादारी इस मीडिया से भी है, जो खड़े होकर तन कर सवाल नहीं पूछ सकता है। कम से कम तिरंगे का इतना तो मान रख लेता है कि हुज़ूर के सामने सीना ठोंक कर सलाम बज़ा देते। दुनिया देखती कि न्यूज़ एंकरों को सलामी देनी आती है। आपको पता है न कि सलाम सर झुका के भी किया जाता है और उस सलाम का क्या मतलब होता है? क्या आप भीतर से इतना खोखला भारत चाहेंगे? न्यूज़ एंकर सर झुकाकर, नज़रें चुरा कर सत्ता की सलामी बजा रहे हैं।

आईटी सेल वाले गाली देकर चले जाएंगे मगर उन्हें भी मेरी बात सोचने लायक लगेगी। मुझे पता है। जब सत्ता एक दिन उन्हें छोड़ देगी तो वो मेरी बातों को याद कर रोएंगे। लोकतंत्र तमाशा नहीं है कि रात को मजमा लगाकर फ़रमाइशी गीतों का कार्यक्रम सुन रहे हैं। भारत की शामों को इतना दाग़दार मत होने दीजिए। घर लौट कर जानने और समझने की शाम होती है न कि जयकारे की।

पत्रकारिता के सारे नियम ध्वस्त कर दिए गए हैं। जो हुज़ूर की गोद में हैं उनके लिए कोई नियम नहीं है। वे इस खंडहर में भी बादशाह की ज़िंदगी जी रहे हैं। खंडहर की दीवार पर कार से लेकर साबुन तक के विज्ञापन टंगे हैं। जीवन बीमा भी प्रायोजक है, उस मुर्दाघर का जहां पत्रकारिता की लाश रखी है।

आप इस खंडहर को सरकार समझ बैठे हैं। आपको लगता है कि हम सरकार का बचाव कर रहे हैं जबकि यह खंडहर मीडिया का है। इतना तो फ़र्क समझिए। आपकी आवाज़ न सुनाई दे इसलिए वो अपना वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।

जो इस खंडहर में कुछ कर रहे हैं, उन पर उन्हीं ध्वस्त नियमों के पत्थर उठा कर मारे जा रहे हैं। इस खंडहर में चलना मुश्किल होता जा रहा है। नियमों का इतना असंतुलन है कि आप हुज़ूर का लोटा उठाकर ही दिशा के लिए जा सकते हैं वरना उनके लठैत घेर कर मार देंगे। इस खंडहर में कब कौन सा पत्थर पांव में चुभता है, कब कौन सा पत्थर सर पर गिरता है, हिसाब करना मुश्किल हो गया है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार और एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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संपादक कुछ समझ पाता, उसके पहले ही मालिक के केबिन से बुलावा आ गया…

Abhishek Srivastava : पत्रकारिता की आधुनिक कथा। संपादक ने मीटिंग ली। सबसे कहा आइडिया दो। आजकल आइडिया पर काम होता है, घटना पर नहीं। सबने आइडिया दिया। कोई बोला, सर महंगाई… मने टमाटर ईटीसी। धत्। पागल हो? नेक्‍स्‍ट। सर, इस बार छंटनी पर कर लेते हैं। आइटी कंपनियों में भयंकर संकट है। संपादक अस मुस्‍कराया जस बुद्ध क्‍या मुस्‍कराते। बोले- बच्‍चा, पूरा करियर विशेषांक बंगलोर पर टिका है, आइटी को तो छूना भी मत। राजनीतिक संपादक अब तक चुप थे। जब सारे लौंडों ने आइडिया दे दिया तो उन्‍होंने सिर उठाया- मेरी समझ से हमें आज़ादी के सत्‍तर साल पर एक विशेषांक की तैयारी करनी चाहिए। ओके… संपादक ने कहा… आगे बढि़ए। राजनीतिक संपादक बोलते गए, ”…कि हम क्‍या थे और क्‍या हो गए… जैसा माननीय ने कहा था अभी… कि चीन याद रखे भारत 1962 वाला भारत नहीं है। तो आ‍इडिया ऑफ इंडिया… इस पर कुछ कर लेते हैं।”

इतने लंबे वाक्‍य में संपादक को केवल ‘च’ राशि सुनाई दी। उछलते हुए बोले, ”यार, ये चीन युद्ध को कितना बरस हुआ?” पचपन साल सर- एक रंगरूट उछला। अच्‍छा? पचास होता तो मज़ा आ जाता। तब तक सेना के जवान की तरह बहुजेबी जाकेट पहनने वाला ठिगना संवाददाता उछला- सर, पचास हो सकता है। 1967 में एक झड़प हुई रही सिक्किम बॉर्डर पर… उसे तान देते हैं, पचास का पचास और माहौल भी टाइट है ही! ”उम्‍मम… दैट्स वाइ आइ लव यू डूड…!” फिर संपादक ने राजनीतिक संपादक को देखा और सुझाव की मुद्रा में आदेश दिया, ”आपका आइडिया सही था मिश्राजी, बस सत्‍तर को पचास कर दो। डोकलाम में मामला मस्‍त चल रहा है। लगे हाथ एक जंग हो जाए। क्‍यों?” कमरा यस सर के समवेत् स्‍वर से गूंज उठा।

तैयारी पूरी थी जंग करवाने की तभी बिहार में तख्‍ता पलट कर सलट गया। ”आइडिया शेल्‍व्‍ड… बिहार निकलो”, संपादक का फ़रमान आया। ”लेकिन सर जंग?” संपादक ने उसे डांटा, ”जंग गई भाड़ में, पटना जाइए।” रातोरात हड़बड़-तड़बड़ में युद्ध टल गया और बिहार ने उसकी जगह ले ली। किसी तरह दो दिन बाद बिहार का मामला संभला तो संपादक ने कहा, ”इस बार चाइना ले लो।” स्‍टोरी अपडेट होने लगी। तैयारियां पूरी थीं। डोकलाम अब भी टाइट था। कोई पीछे नहीं हट रहा था। स्‍टोरी का रेलेवेंस बना हुआ था कि अचानक पाकिस्‍तान में नवाज़ की कुर्सी चली गई। ”शिट्ट यार… ये क्‍या हो रहा है। कोई नहीं… इस्‍लामाबाद से कॉलम मंगाओ… क्विक।” न्‍यूज़रूम की सारी मिसाइलों का मुंह शेंजांग से रावलपिंडी की ओर मुड़ गया। दफ्तर में डेस्‍क वाले कराची यात्रा के संस्‍मरण सुनने-सुनाने लगे। मामला बिहार से कम घरेलू नहीं था। कुछ शौकीनों ने तो झोंक में प्रेस क्‍लब में बिरयानी महोत्‍सव ही रखवा दिया। बस संपादक थोड़ा तनाव में था।

दरअसल, डोवाल साहब चाइना जा चुके थे और इधर स्‍टोरी अटकी पड़ी थी। वह किसी तरह नवाज़ की कुर्सी को ‘वन बेल्‍ट वन रोड’ प्रोजेक्‍ट से जोड़ने की जुगत भिड़ा रहा था ताकि चीन की कहानी भी इसी में अटैच हो कर निपट जाए। तभी मोबाइल घनघनाया। ”जी सर प्रणाम!” नॉर्थ ब्‍लॉक से ठाकुर सा‍ब का फोन था। ”क्‍या पंडिज्‍जी! हमारे जवान माइनस दस डिग्री में खर्च हो रहे हैं और आप दो हफ्ते से गोला दिए पड़े हैं। कब छपेगी?” संपादक घिघियाया, ”सर, वो बीच में बिहार हो गया फिर पाकिस्‍तान हो गया… कोशिश कर रहा हूं।” उधर से कड़ी आवाज़ आई, ”मैं आपकी कड़ी निंदा करता हूं। बिहार को लोग प्री-स्क्रिप्‍टेड बताके गरिया रहे हैं। पाकिस्‍तान के बहाने फिर पनामा का धुआं उठ रहा है। कुछ समझ में आता है आपको कि मैंने चीन से जंग की स्‍टोरी चलाने को क्‍यों कहा था? कल डोवाल साब लौट आएंगे और सारा खेल खत्‍म!” कह कर उन्‍होंने फोन रख दिया। संपादक कुछ समझ पाता, उसके पहले ही मालिक के केबिन से बुलावा आ गया।

इसके बाद की कहानी इतिहास है। अगले दिन पांच सौ लोगों की भीड़ प्रेस क्‍लब में संपादक के समर्थन में जुटी। अभिव्‍यक्ति की आज़ादी के नारे लगाए गए। संपादक की बरखास्‍तगी के खिलाफ़ जुलूस निकला। नया संपादक भी आ गया। अब तक किसी ने नहीं पूछा है कि आखिर संपादक ऐसा क्‍या अभिव्‍यक्‍त करना चाह रहा था कि उसे नौकरी से निकाला गया।

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जब चौंकाने लायक ख़बरें हमें चौंकाना बंद कर चुकी हों और हर ख़बर में पठनीयता के दबाव से चौंक की छौंक लगायी जा रही हो, वैसे में परसों रात से लेकर कल तक का राजनीतिक घटनाक्रम किसी भी न्‍यूज़रूम के लिए एक विशिष्‍ट स्‍थान रखता है। आम तौर से हर आलसी पत्रकार ऐसे ही कुदरती मौकों के इंतज़ार में होता है कि सेब टपके और वह उसे लपक ले। ये बात अलग है कि मौके पर कलाकारी सब नहीं दिखा पाते। आज के अख़बार देखिए। ‘दि टेलिग्राफ’ के अलावा किसी ने भी ख़बर पर मेहनत नहीं की है। ‘दि इंडियन एक्‍सप्रेस’ ने हेडिंग में ऐसी महीन बुद्धि लगाई है कि दूसरी बार में उसका व्‍यंग्‍य पकड़ में आता है। ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ बिहार को पचा गया है। न लीड है न सेकंड लीड। नीचे कहीं छोटी-सी ख़बर है और भीतर के पन्‍ने पर बाकी कवरेज।

इस सप्‍ताहांत जो पत्रिकाएं बाज़ार में आएंगी, बहुत संभव है कि उनके कवर पर बिहार हो लेकिन कंटेंट किसी के पास नहीं होगा। सब बैंकग्राउंडर के सहारे ख़बर का चुइंग गम बनाएंगी। ऐसे ही कल टीवी चैनलों का आलम अजब था। मैंने महीनों बाद पांच घंटा टीवी देखा। अव्‍वल तो दिल्‍ली से लेकर पटना तक तमाम पत्रकाराएं तीज के प्रभाव में बेमन से ख़बर कवर कर रही थीं। एक ने तो बाकायदे ऐसे हाथ नचाकर ख़बर पढ़ी कि हाथ में रचाई मेंहदी स्‍क्रीन पर छा गई। एक पत्रकार अली अनवर के पास माइक लेकर पहुंचा। पहला ही सवाल इतना क्‍लोज़ एंडेड था कि जवाब देकर दूसरे पर उन्‍होंने हाथ जोड़ लिया। माइकवीर मजबूरी में सोलो गाने लगा।

मैंने कई बार कहा है कि पुण्‍य प्रसून बाजपेयी टीवी के मिथुन चक्रवर्ती हैं। कल दिन में अगर किसी ने बीजेपी के शाहनवाज़ हुसैन से उनकी बातचीत देखी हो तो समझ में आएगा कि ऐसे मौकों पर कैसे सवाल पूछे जाने चाहिए। कल तो आलोक मेहता तक उनके सवालों पर मुंह खोलकर ठीकठाक बोल रहे थे। उनके अलावा न्‍यूज़ नेशन पर अजय कुमार का स्‍वर सधा हुआ था और उनकी बातों में ख़बर से जुड़ाव दिख रहा था। चित्रा त्रिपाठी और संगीता तिवारी ने एबीपी को टेप रिकॉर्डर बना रखा था। फील्‍ड में श्‍वेता सिंह परेशान दिख रही थीं। प्रसून की पोल्‍का डॉट वाली टाइ कल कहर ढा रही थी। मुझे आश्‍चर्य है कि अजय कुमार से अब तक किसी ने क्‍यों नहीं कहा कि पीले रंग की टाइ मत पहना करो।

मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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कुछ चैनलद्रोही बाथरूम में घण्टों से घुसे बैठे हैं ताकि कहीं कोई पैकेज न पकड़ा दे…

Arvind Mishra : नीतीश के इस्तीफे के बाद टीवी चैनलों का न्यूज़ रूम युद्ध क्षेत्र बन गया… जानिए ग्राउंड जीरो से सूरत-ए-हाल…

1- कैंटीन में भारत-चीन संबंधों पर राष्ट्र को संबोधित कर रहे मेजर जनरल (शिफ्ट इंचार्ज) फौरन असाइनमेंट रूपी बाघा बॉर्डर पर आकर तैनात हो जाते हैं।

2- सभी सिपाही (अस्सिस्टेंट प्रोड्यूसर) हवलदार (एसो प्रोड्यूसर) को शिफ्ट कंटीन्यू करने का मौखिक आदेश ब्रिगेडियर (आउटपुट हेड) की ओर से जारी हो जाता है।

3- सेना प्रमुख (चैनल हेड) चूँकि घर जा चुके थे इसलिए फोन से ही वो गोलियां दाग रहे हैं।

4- नाइट शिफ्ट में आने वाली दूसरी बटालियन कैब में रात में होने वाले युद्ध की रणनीति बना रही है।

5- मोर्चे पर तैनात पहले सिपाही (टीकर) ने सामरिक रणनीति के तहत अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया है। क्योंकि चीन की रहने वाली उसकी प्रेमिका बार बार उसे ऐसे संवेदनशील समय पर मिस कॉल कर रही है।

6- बंकर में तैनात वीडियो एडिटर अपने लिए ऐसा कोना खोज रहा है जहां आउटपुट वाले शिकारी की नज़र बिलकुल न जाए।

7- इस बीच रनडाउन और पीसीआर ने पूरे विरोधी सेना को घेर लिया है। दोनों ताबड़तोड़ फायरिंग कर रहे हैं। रनडाउन गुस्से में हैं। इस वक़्त वो ब्रिगेडियर (आउटपुट हेड) से नीचे किसी का आदेश नहीं मानेगा।

8- एंकर (मेजर) चीख रहा है। ललकार रहा है लेकिन भूख के मारे। इस गुस्से से भी कि आज फिर घर जाने में लेट होगा और मकान मालिक दरवाजा नहीं खोलेगा।

9- इस बीच ख़बर ये भी आ रही है कि युद्ध जैसे हालातों में भी कुछ चैनलद्रोही बाथरूम में घण्टों से घुसे बैठे हैं। इसलिए की कहीं कोई पैकेज न पकड़ा दे।

टीवी जर्नलिस्ट अरविंद मिश्रा की एफबी वॉल से.

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”बकवास 7×24” चैनल, चीखू ऐंकर और एक गधे का लाइव इंटरव्यू

विनय श्रीकर

देश के सबसे लोकप्रिय खबरिया चैनल ”बकवास 7×24” का चीखू ऐंकर पर्दे पर आता है और इस खास कार्यक्रम के बारे में बताता है। ऐंकर– आज हम अपने दर्शकों को दिखाने जा रहे हैं एक ऐसा लाइव इंटरव्यू, जिसको देख कर वे हमारे चैनल के बारे में बरबस कह उठेंगे कि ऐसा कार्यक्रम तैयार करने का बूता किसी और चैनल में नहीं है। स्टूडियो में गधे का प्रवेश। माइक लेकर चैनल का पत्रकार गधे से मुखातिब होता है। इंटरव्यू शुरू होता है–

पत्रकार– क्या आप विश्वास के साथ कहेंगे कि कि आप गधे ही हैं।
गधा— उतने ही विश्वास के साथ कह सकता हूं कि मैं पक्का गधा हूं, जितने विश्वास के साथ तुम अपने को टीवी पत्रकार कहते नहीं अघाते।

पत्रकार— जब आपको कोई गधा कह कर पुकारता है तो कैसा अहसास करते हैं ?
गधा— हमें इसका कोई गुरेज नहीं। तुम भी धड़ल्ले से मुझे गधा कह कर पुकारो। कतई बुरा नहीं मानेंगे, क्योंकि नाम से पुकारने की कुप्रथा इंसानों में है। दुर्भाग्य से पालतू कुत्ते भी इस कुप्रथा का शिकार हैं। हम गधों ने इस कुप्रथा से अपने को दूर रखा है। पूरी दुनिया की गधा बिरादरी में जाति, रंग, नस्ल या पंथ-धर्म जैसी वाहियात बातों के लिए भी कोई जगह नहीं है।

पत्रकार— क्या आपके मम्मी-पापा भी गधे थे ?
गधा— तो क्या तुम जैसे इंसानों के मां-बाप गधे होंगे ? क्या गधेपन का सवाल किया है यार ! किस गधे ने तुमको टीवी पत्रकार बना दिया है ?

पत्रकार— अपनी जबान पर काबू रखिये, गधा साहब ! हमारे चैनल के संपादक ने हमें रखा है। उन्हें आप गधा नहीं बोल सकते। वह अव्वल दर्जे के बुद्धिमान और विद्वान व्यक्ति हैं।
गधा— खैर चलो, तुमको मेरी खरी बात नहीं सुहाई तो अपने शब्द वापस लेता हूं। आगे जो पूछना हो पूछो।

पत्रकार— आप कहां के रहने वाले हैं और आपका पालन-पोषण कहां हुआ है ?
गधा– मेरा जन्म एवं पालन-पोषण एक भारतीय धोबी के घर में हुआ है। और, मैं भारत का एक पशु-नागरिक हूं।

पत्रकार— गधा साहब, आपका जनधन खाता किस बैंक में खोला गया है ? आपका आधार कार्ड बना है या नहीं ? अगर नहीं बना है तो क्यों नहीं ?
गधा— बरखुरदार, पक्के गंवार लगते हो। तुमको यह भी नहीं आता कि किससे क्या सवाल करना चाहिए। मेरी राय है कि तुम पत्रकारिता का पेशा छोड़ दो और चाट का ठेला लगाया करो। रहे तुम्हारे सवाल तो अव्वल ये सवाल तुमको इस देश के वजीरे-आजम से पूछने चाहिए। दूसरी बात, यदि हमारा खाता खुलेगा तो उसका नाम जनधन खाता नहीं पशुधन खाता होगा। जहां तक आधार कार्ड की बात है, तो उसके लिए दोनों हाथों की अंगुलियों के छाप की जरूरत होगी। यार, तुम तो निरे अज्ञानी लगते हो। हमारी बिरादरी का संबोधन पाने लायक भी नहीं हो।

(झुंझलाया हुआ गधा सिपों-सिपों करता इंटरव्यू बीच में छोड़ कर स्टूडियो से निकल भागता है।)

लेखक विनय श्रीकर वरिष्ठ पत्रकार हैं और ढेर सारे बड़े हिंदी अखबारों में उच्च पदों पर कार्य कर चुके हैं. उनसे संपर्क shrikar.vinay@gmail.com या 9792571313 के जरिए किया जा सकता है.

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टीवी यानि वो सर्कस जो बड़े तंबू से निकल कर आपके घर में आ गया है!

Arun Maheshwari : आज के ‘टेलिग्राफ़’ में वरिष्ठ पत्रकार सुनन्दा के दत्ता राय ने अपने लेख ‘टीवी सर्कस ही है, यह गंभीर अख़बार का विकल्प नहीं’ में ब्रिटिश अभिनेता राबर्ट मोर्ले के टीवी के बारे में इस कथन को याद किया है कि यह ‘बिग टेंट’, स्थानीय भाषा में सर्कस है। “अब सर्कस बड़े तंबू में नहीं, आपके घर में आ गया है।”

कहना न होगा टीवी न्यूज चैनल्स एंकरों और कुछ अन्य जीव-जंतुओं का खेल भर बन कर रह गये हैं, जिसमें पालतू जीव-जंतु चिंघाड़ते, नाना प्रकार की मुद्राएँ करते रहते हैं। इनमें अर्नब गोस्वामी तथा कुछ हिंदी चैनलों के एंकर सबसे अधिक वफ़ादार जान पड़ते हैं। सुनन्दा के दत्ता राय ने भी अर्नब गोस्वामी का नामोल्लेख किया है।

साहित्यकार अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से.

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पंडितों की फतवानुमा बातों पर चैनल वाले हांय हांय क्यों नहीं करते?

Mrinal Vallari : गाजियाबाद के जिस इलाके में मैं रहती हूं वहां बहुत से मंदिर हैं और बहुत से पंडी जी भी हैं। कभी-कभी इन पंडी जी की बातों को सुनने का मौका भी मिलता है। अगर लड़कियों और औरतों के बारे में इनकी बातों पर ध्यान देने लगें तब तो हो गया। जींस पहनीं मम्मियां भी मंदिर आती हैं पंडी जी की बात सुनती हैं, और जो मानना होता है उतना ही मानती हैं।

पंडी जी बता रहे होते हैं कि स्त्री का सिर ढका क्यों होना चाहिए तो पंडी जी की बेटी जींस पहन कर शॉपिंग मॉल जा रही होती है। सांस्कृतिक रूप से मंदिर जाना अलग बात है और पंडी जी की बातों पर अमल करना दूसरी बात है। अच्छा है इन पंडी जी की बातों को फतवानुमा मानने की आदत नहीं है, नहीं तो दिन भर न्यूज चैनलों वालों को हांय-हांय करने का मौका मिल जाता।

पंडितों और मौलवियों की बातों को मंदिर और मस्जिद से बाहर मत आने दीजिए। बाजार का खेल समझिए कि वो मौलवियों को क्यों बीच बहस में ला देता है। अगर वो मौलवी कहेगा कि मुसलिम इलाके में एटीएम मशीनों की इतनी कमी क्यों है, निगम प्रशासन उपेक्षित क्यों रखता है, मदर डेयरी के बूथ हमारे तरफ कम क्यों लगते हैं तो एंकर महोदय को तो ये बातें वामपंथी लगने लगेंगी। कहां, किसका और कैसे करार हो रहा है यह समझना इतना आसान नहीं है भाई। भजन गाती मीरा से लेकर गीत गाती जोहरा तक को कौन रोक सका है।

मृणाल वल्लरी प्रतिभाशाली पत्रकार हैं और जनसत्ता अखबार में कार्यरत हैं.

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सूरज ने कई न्यूज चैनलों का प्रसारण रोका (देखें वीडियो)

ऐसा साल में दो बार होता है जब सूरज महाशय कई टीवी चैनलों का प्रसारण रोक देते हैं. असल में जब सैटेलाइट और धरती पर स्थित अर्थ स्टेशन दोनों ही सूरज के एक सीध में आ जाते हैं तो सूरज के जबरदस्त विकिरण और आग के कारण प्रसारण का काम रुक जाता है. उस दौरान कई चैनल ब्लैकआउट हो जाते हैं जिसके कारण प्रसारणकर्ता डीटीएच कंपनी को एक नोटिस डिस्प्ले करना पड़ता है कि प्रसारण में व्यवधान आदरणीय सूरज जी के कारण है. देखें वीडियो, नीचे क्लिक करें…

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लगभग सारे चैनल झूठी खबर परोसते रहे, भला हो अखबारों का जिनने ये झूठ नहीं छापा

: इलेक्ट्रानिक मीडिया को शर्म क्यों नहीं आती? :  जल्द खबर देने और ब्रेकिंग न्यूज चलाने की अंधी होड मीडिया को सच से दूर कर रही है। ये बात छोटे और नये चैनलों की नहीं है। देश के प्रमुख टी.वी. चैनल भी झूठी और बेसिर-पैर की खबरें चलाने लगे हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के सच से दूर होने और झूठी खबरें प्रसारित करने का एक बड़ा प्रमाण 21 अप्रैल को मिला। उत्तराखंड हाई कोर्ट की डिवीजन बैंच के आदेश के हवाले से देश के लगभग सभी न्यूज चैनल बड़े जोर शोर के साथ झूठी खबर चलाते रहे।

इन चैनलों पर हाई कोर्ट के हवाले से 21 अप्रैल को दोपहर बाद से खबर प्रसारित होने लगी थी कि कांग्रेस के बागी विधायकों की सदस्यता खत्म कर दी गई। एक दो बार नहीं, बल्कि देर रात तक लगभग सारे चैनल इस झूठ को सच बता कर अपने दर्शकों को गुमराह करते रहे। भला हो अखबारों का… उन्होंने ये झूठ नहीं छापा।

हाई कोर्ट डिवीजन बैंच के फैसले की जानकारी देने के लिए जिन सरकारी और निजी वकीलों ने मीडिया को बाइट दी, उनमें से किसी में ऐसा उल्लेख नहीं था कि बागी विधायकों के बारे में डिवीजन बैंच ने फैसला सुना दिया है। इस अदालत में बागी विधायकों का मामला चल ही नहीं रहा था। मीडिया के धुरंधर कहे जाने वाले लोगों के ज्ञान पर आश्चर्य होता है कि जिस अदालत में बागी विधायकों का मामला नहीं चल रहा है, हाई कोर्ट की ऐसी डिवीजन बैंच के निर्णय में बागी विधायकों के बारे में आदेश देने की बात जोड़ दी गई।

दरअसल, कांग्रेस के बागी विधायकों का मामला नैनीताल हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति यू.सी. ध्यानी की अदालत में चल रहा है और मीडिया दूसरी अदालत (हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली डिवीजन बैंच) के आदेश की रिपोर्टिंग कर रहा था। जिस अदालत में किसी खास मामले पर सुनवाई ही नहीं हो रही है, वह उस मामले में कोई आदेश कैसे दे सकती है? यह सीधी सी बात इलेक्ट्रानिक मीडिया के जिम्मेदार लोगों की समझ में क्यों नहीं आई? इसका जवाब देने का साहस वे शायद ही कभी कर पाएं।

ये और ज्यादा शर्मनाक स्थिति है कि लगातार कई घंटे झूठी खबर दिखाने के बाद टी.वी. चैनलों ने अपने दर्शकों से माफी भी नहीं मांगी। इतनी बड़ी गलती के बाद माफी मांगना तो बनता ही था। कई बुलेटिनों में माफी मांगते हुए दर्शकों को सही स्थिति की जानकारी दी जाती, तो लगता कि मीडिया के तथाकथित जिम्मेदार लोगों की आंखों में शर्म हया जैसा कुछ बचा है। पता नहीं क्यों, मुझे आज भी लगता है कि ये महज एक गलती ही थी, किसी को नुकसान या किसी को फायदा पहुंचाने की बदनीयती से झूठ को सच बनाकर नहीं परोसा गया? भगवान से प्रार्थना है कि यही सच निकले।

लेखक सुभाष गुप्ता उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षक-विश्लेषक हैं. उनसे संपर्क sg2300@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

प्रो. सुभाष गुप्ता का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं….

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संघ के मुताबिक टीवी पर ब्रेन लेश डिसकसन, इसमें शामिल होते हैं अपठित पत्रकार जिन्हें भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं (देखें वीडियो)

मऊ : भारत में चाहें जो बड़ी समस्या चल रही हो, सूखा हो, महंगाई हो, भ्रष्टाचार हो लेकिन आरएसएस वालों का हमेशा एक राग बजता है. वह है राग मुसलमान. घुमा फिरा कर कोई ऐसा मुद्दा ले आते हैं जिससे मुसलमानों को चुनौती दी जा सके और पूरे भारत की बहस इसी मसले पर शिफ्ट किया जा सके. दुर्भाग्य से मीडिया का बड़ा हिस्सा भी इसी उलझावों में बह जाता है और भाजपा-संघ का भोंपू बनते हुए मूल मुद्दों से हटते हुए इन्हीं नान इशूज को इशू बना देता है. हालांकि संघ नेता फिर भी टीवी वालों को बख्शते नहीं और कहते हैं कि चैनलों पर ब्रेनलेस डिसकशन चलती है और इसमें अपठित पत्रकार भाग लेते हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं. मतलब कि अगर संघ का चले तो वो सारे चैनल बंद करा के सिर्फ एक संघ नाम से चैनल चलाएं और उसमें जो कुछ ज्ञान दिया जाएगा, उसे ही प्रसाद के रूप में पाने के लिए देश भर के दर्शक बाध्य होंगे.

नीचे चार वीडियो लिंक हैं. ये आरएसएस के पूर्वी यूपी के क्षेत्रीय संयोजक राम आशीष वर्मा से संबंधित हैं. संघ के इस बड़े नेता ने मीडिया, मुसलमान और भारत माता की जय पर क्या क्या बातें की हैं, सुनिए. ये इशारे इशारे में जो जहर हिंदू मुस्लिम दिमागों में घोल रहे हैं, उसका क्या अंजाम होगा, इन्हें भी नहीं पता. आजम खान और औवैशी इस देश की मुख्य धारा नहीं हैं. ज्यादातर मुसलमान भारत के रंग, भारत की संस्कृति, भारत के नारे में रच बस घुल चुके हैं. लेकिन क्या आप इनसे नारे लगवा कर इनकी परीक्षा लेंगे, तभी इनकी देशभक्ति प्रमाणित करेंगे? ऐसे घिनौने कृत्य से देश का नुकसान ज्यादा होगा, फायदा कम.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वी यूपी के क्षेत्रीय संयोजक राम आशीष वर्मा ने पत्रकारों से बातचीत और संघ के एक जमावड़े के संबोधन में जो कुछ कहा, उसका लब्बोलुवाब ये है-

”डा. हेडगवार ने कहा था भारत वर्ष ही हिन्दू राष्ट्र है, उस समय भी लोगों ने प्रश्न उठाये थे उसमें हर तबके के लोग थे. आज जो टीवी चैनलों पर ब्रेन लेश डिसकसन चलती है और उसमें शामिल होने वाले अपठित पत्रकार हैं. भारत माता की जय न बोलने वाले पागल हैं, उनके इलाज की जरूरत है. भारत माता की जय न बोलने वाले पागल हैं. ऐसे लोगों की हत्या नहीं, इलाज होनी चाहिए. इनके पास दिल है, लेकिन दिल की आवाज दिमाग तक नहीं पहुंची है. इसलिए इलाज जरूरी है. हम अशफाकउल्‍ला खां जैसे लोगों को आदर्श मानते हैं… अशफाकउल्ला भारत माता के लिए फांसी पर चढ़ गए.  हम उन्‍हें आदर्श मानते हैं. इन पागलों को आदर्श नहीं मानते. आवैसी और आजम के नाम पर मैं नहीं जाता हूं, ये एक विचारधारा का प्रतिनिधित्‍व करते हैं. रही बात भारत माता की जय बोलने की तो आप किसी भी भाषा में बोलिए, लेकिन भारत माता की जय बोलिए और बस दिल से बोलिए. मैं ये नहीं कहता हूं भारत माता की जय उर्दू और इंग्‍लिश में नहीं बोलनी चाहिए. आप किसी भी भाषा में बोल सकते हैं. भाषा तो हमारी देश की परंपरा है. महात्‍मा गांधी ने कहा कि था ईश्‍वर अल्‍ला तेरो नाम. भाषा का प्रश्‍न नहीं, भाव का प्रश्‍न है.  दिल से बोलना चाहिए. जो व्‍यक्‍ति भारत माता की जय न बोले उसे प्रेरित करना चाहिए, भारत माता सबकी माता हैं.”

संघ पदाधिकारी राम आशीष मऊ जनपद में आर.एस.एस. द्वारा आयोजित नववर्ष प्रतिप्रदा की पूर्व संध्या पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सोनी धापा बालिका विद्यलय के मैदान में शामिल होने आये थे. इनकी बातों को पूरा सुनने के लिए नीचे दिए गए वीडियो लिंक को एक एक कर क्लिक करते जाएं.

RSS कहिन (1) : आजम खान और ओवैशी जैसे पागलों का इलाज होना चाहिए https://www.youtube.com/watch?v=IGnRK2oJmm0

RSS कहिन (2) : पागलों का इलाज किया जाता है, उनकी हत्या नहीं की जाती https://www.youtube.com/watch?v=rsGZY4pQ8oI

RSS कहिन (3) : उर्दू में बोलिए या अंग्रेजी में, भारत माता की जय तो बोलना पड़ेगा https://www.youtube.com/watch?v=NNj8zTuH6QI

RSS कहिन (4) : टीवी पर ब्रेनलेस डिसकशन, अपठित पत्रकारों को ज्ञान नहीं https://www.youtube.com/watch?v=hu7heuyTwVI

मऊ से DEEPAK GUPTA की रिपोर्ट. संपर्क : 9452068289 या gdeepak899@gmail.com

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मोदी का जादू चुक गया, चैनल अब नहीं दिखा रहे लाइव कवरेज

मोदी के भाषण अब चुक गए हैं. उनका जादू खत्म हो चुका है. इसलिए उनकी अब टीवी चैनलों को जरूरत नहीं. एक दौर था जब मोदी के भाषण को घंटों दिखाने के कारण टीवी चैनलों की टीआरपी आसमान पर थी. तब मोदी खुद को नंबर वन होने का दावा कर रहे थे. लोकसभा चुनाव के दौरान तो प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ी थी. मोदी भी अपने अनुसार चैनलों को चुनकर उनको खूब टीआरपी दिलवा रहे थे. शायद इसी का असर रहा कि कुछ टीवी चैनलों को इसका खूब लाभ मिला. मोदी अपने भाषणों से चैनलों को टीआरपी देते चले गए और मोदी चैनलों के मुनाफे के धंधे में तब्दील हो गए.

लेकिन आज हालत ये है कि मोदी की असम रैली को किसी चैनल ने लाइव नहीं दिखाया. चैनल के भीतर के लोग बताते हैं कि मोदी अब टीआरपी नहीं दिला पा रहे. जनता उनको सुन सुन के बोर हो चुकी है. उनके जुमलों पर अब किसी को यकीन नहीं है. यही कारण है कि जब मोदी भाषण दे रहे होते हैं तो जनता चैनल बदल देती है. इस कारण चैनलों ने मोदी की रैली को लाइव दिखाना छोड़ दिया.

प्रधानमंत्री मोदी असम में होने वाले विधानसभा चुनाओं के मद्देनजर किसानों के बीच रैली कर रहे थे तो उसका प्रसारण किसी निजी चैनल ने नहीं किया. सिर्फ सरकारी चैनल दूरदर्शन ने ही इसे लाइव दिखाया. आजतक, एबीपी न्यूज़, इंडिया टुडे, टाइम्स नाउ, एनडीटीवी आदि ने मोदी के भाषण को नहीं दिखाया. रिलायंस के स्वामित्व वाले चैनल आईबीएन7 ने मोदी के भाषण का प्रसारण किया. मोदी भक्त समझे जाने वाले इंडिया टीवी और ज़ी न्यूज़ को भी अब मोदी से टीआरपी नहीं मिल रही है, यह भी साफ़ दिख रहा है.  हाल ही में टीवी रेटिंग मापने वाली संस्था TAM के आंकड़ों ने इस टीआरपी के खेल को साफ़ कर दिया. TAM ने जता दिया कि अब मोदी टीवी चैनलों की जरूरत नहीं रहे इसलिए चैनलों ने उनके लाइव भाषणों को दिखाना लगभग बंद कर दिया है.

उधर, इंटरटेनमेंट चैनलों की बात करें तो इस हफ़्ते ज़ी टीवी के ‘कुमकुम भाग्य’ ने कलर्स के सुपरहिट शो ‘नागिन’ को पहले पायदान से उतार दिया है. नंबरों की घटाजोड़ करने पर आप ‘नागिन’ को दूसरे नंबर पर पाएंगे, लेकिन अगर दर्शकों के इन धारावाहिकों पर बिताए गए समय की बात करें तो ‘नागिन’ का जादू इस हफ़्ते कुछ हल्का हुआ है. जहां पहले स्थान पर रहा ज़ी टीवी का ‘कुमकुम भाग्य’, वहीं स्टार पल्स के ‘साथिया’ ने दूसरे स्थान पर क़ब्ज़ा किया. धारावाहिकों की फ़ेहरिस्त में टॉप-3 में कुछ समय के लिए नज़र आए दो नए धारावाहिक थे- ज़ी टीवी का ‘जमाई राजा’ और ‘टश्न ए इश्का’. इन धारावाहिकों की टीआरपी पर अगर नज़र डालें, तो यह हफ़्ता ज़ी टीवी के नाम ही रहा.

सोनी और स्टार प्लस इस महीने में ‘तमन्ना’, ‘कुछ रंग प्यार के ऐसे भी’ जैसे धारावाहिकों को लेकर आ रहे हैं, जो अपनी कहानियों को लेकर चर्चा में हैं. लेकिन इन धारावाहिकों से चैनल की टीआरपी को कितना फ़ायदा होगा, यह कुछ समय बाद पता चलेगा. रिएलिटी शो के फ़ील्ड में भी ज़ी टीवी का ‘इंडियाज़ बेस्ट ड्रामेबाज़’ कलर्स के ‘खतरों के ख़िलाड़ी’ को पछाड़ रहा है. हालांकि यह अंतर बेहद कम है. 90 के दशक के कॉमिक लोटपोट के मुख्य किरदार ‘मोटू पतलू’ पर आधारित कार्टून इस हफ़्ते नंबर एक पर रहा. निकोलडियोन चैनल पर आने वाले इस धारावाहिक ने ‘निंजा हथौड़ी’ (दूसरा स्थान), ‘डोरेमॉन’ (तीसरा स्थान), ऑगी एंड दि कॉक्रोचेस (चौथा स्थान) और छोटा भीम को पीछे छोड़ दिया. अब यह तो साफ़ नहीं है कि इस धारावाहिक को बच्चे देख रहे हैं या 90 के दशक में लोटपोट के फ़ैन रहे युवा, लेकिन यह साफ़ है कि यह कार्यक्रम हिट हो रहा है.

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क्लीवेज दिखाना एंकर को पड़ा महंगा, चैनल ने किया सस्पेंड

अल्‍बीनिया में एक टीवी रिपोर्टर को न्‍यूज प्रजेंट करते समय क्‍लीवेज दिखाना और प्‍लेब्‍वॉय मैग्जीन ज्‍वाइन करना काफी महंगा पड़ गया। चैनल के नाराज अधिकारियों ने उसे तुरंत ही सस्‍पेंड कर दिया। साथ ही उसे अभी अपनी पढा़ई और जर्नलिज्‍म पर ध्‍यान देने की नसीहत दी। टीवी रिपोर्टर ने जिस समय ऐसा हाटॅ शूट दिया उस समय वह अंतरराष्‍ट्रीय खबरें पढ़ रही थी। अल्‍बीनिया में एक समाचार चैनल के लिए 21 साल की एन्‍की ब्रैकाज इंटरनेशनल लेवल की न्‍यूज पढ़ रही थीं, लेकिन अपने इस काम के दौरान उसने कुछ ऐसा कर दिया कि बाकी सभी लोग सन्न रह गए।

एन्‍की ब्रैकाज ने अपने सीनियर को इंप्रेस करने के लिए व अचानक से खुद को हाईलाइट करने के लिए अपने दोनों स्तन के काफी हिस्से उघाड़ दिए। काफी खुले हुए आउट फिट्स पहनने के कारण स्तन का अधिकांश हिस्सा दिख रहा था। वह अपने स्‍क्रीन टेस्‍ट को प्रभावशाली बनाना चा रही थी। उसका सपना था वर्ल्‍ड न्‍यूज चैनल में धमाकेदार एंट्री करने का। हुआ भी ऐसा ही। एंकर को प्‍लेब्‍वॉय फोटोशूट का ऑफर मिल गया और उन्‍होंने इसे ज्‍वाइन कर लिया। उसे और भी कई धमाकेदार ऑफर मिले।

एन्‍की ब्रैकाज इस बात से काफी खुश है कि एक स्‍क्रीन टेस्‍ट में वह क्‍लीवेज दिखाकर अचानक से पूरे अल्‍बीनिया में छा गई। सोशल साइट्स पर भी उसकी चर्चा होने लगी। मेललाइन को उसने बताया कि उसे लगता है कि टीवी की दुनिया में जर्नलिस्‍ट के लिए जॉब मिलना काफी रिस्‍की है। ऐसे में उसे अचानक से फेमस होने का यही रास्‍ता नजर आया। यह काफी असान और लोगो के बीच छाने का चांस था। हालांकि उनके इस ऑडीशन से टीवी चैनल के अधिकारी उनसे काफी नाराज हो गए। चैनल हेड ने रिपोर्टर की इस हरकत पर उसे काफी डांट लगाई। इसके बाद उसे बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। इस दौरान उन्‍होंने उसे अपनी पढाई पर ध्‍यान देने और जर्नलिज्‍म के एथिक्‍स पढने की भी सलाह दी।

चैनल हेड का कहना है कि वह अल्‍बीनिया में एक लोकल चैनल जजार चला रहे हैं। इसके लिए उन्‍होंने कुछ दिन पहले एन्‍की ब्रैकाज की कुछ पिक्‍स वगैरह देखी तो वह उन्‍हें काफी ठीक लगी। उन्‍हें कैमरे के सामने जिस फेस की जरूरत थी वह उसके हिसाब से फिट बैठ रही थी। सबसे खास बात तो यह है कि अल्‍बीनिया की राजधानी तिराना की रहने वाली एन्‍की ब्रैकाज पब्‍लिस रिलेशन की पढाई यूनिवर्सिटी से कर रही है। इस पर उन्‍होंने उसे न्‍यूज पढ़ने का आफॅर दे दिया, लेकिन उसने प्रोफेशन की सीमाएं तोड़ दी। ज्ञात हो कि अल्‍बीनिया में लगभग 60 फीसदी मुस्‍लिम कम्‍युनिटी है इसलिए यहां नंगापन को काफी बुरा माना जाता है।

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प्रबल प्रताप और संजीव पालीवाल ला रहे एक नया नेशनल न्यूज चैनल!

नोएडा के सेक्टर63 में जहां पर न्यूज एक्सप्रेस चैनल का आफिस हुआ करता था, उसके ठीक बगल वाली बिल्डिंग से एक नया चैनल अवतार लेने जा रहा है. चैनल का नाम वैसे तो फाइनली तय नहीं हुआ है लेकिन लोग कह रहे हैं कि यह ‘नेशन्स वायस’ नाम से लांच होगा. चैनल से अभी दो लोग जुड़ चुके हैं. प्रबल प्रताप सिंह और संजीव पालीवाल. प्रबल प्रताप के नेतृत्व में ही चैनल के सारे इक्विपमेंट्स, मशीनों आदि की खरीद-फरोख्त होने से लेकर इंस्टालेशन का काम चल रहा है. संजीव पालीवाल चैनल से सलाहकार की भूमिका में जुड़े हैं. भड़ास4मीडिया ने जब प्रबल से मैसेज कर इस चैनल से जुड़ने के बारे में पूछा तो उन्होंने पूरी तरह से इनकार किया. हालांकि सूत्र कहते हैं कि प्रबल प्रताप सिंह चैनल से न सिर्फ जुड़े हुए हैं बल्कि चैनल इंस्टालेशन का सारा काम उनकी अगुवाई में हो रहा है.

अब आते हैं चैनल के मालिक पर. इस चैनल के मालिक हैं विजयेंद्र सिंह. बताया जाता है कि ये मेरठ-मुजफ्फरनगर इलाके के रहने वाले हैं और एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के धंधे में हैं. इलेक्ट्रानिक सामानों के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट के बिजनेस के अलावा कई अन्य कामकाज भी इनके हैं. भड़ास4मीडिया से बातचीत में चैनल के मालिक विजयेंद्र सिंह ने चैनल लाने की तैयारियों की पुष्टि की. लोगों का कहना है कि विजयेंद्र सिंह काफी पुण्य का काम कर रहे हैं चैनल लाकर क्योंकि इससे दो तीन सौ बेरोजगार लोगों को दो – तीन साल के लिए रोजगार का जुगाड़ हो जाएगा. उसके बाद नए चैनलों का जो हश्र होता है सब जानते हैं क्योंकि मालिकों को लंबे-लंबे ख्वाब दिखाकर लाए जाने वाले चैनलों का दम दो-तीन साल बाद फूलने लगता है और फिर कर्मचारियों को अपने बकाया सेलरी के लिए आंदोलन करना पड़ता है. फिलहाल तो सभी को मिलकर नए आ रहे चैनलों का स्वागत करना चाहिए क्योंकि मीडिया क्षेत्र में कई चैनलों के बंद होने, बैठ जाने से बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार घूम रहे हैं.

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कुछ चैनलों ने इंद्राणी प्रकरण में किसी जासूसी कहानी की तरह रहस्य-रोमांच का ‘रस’ घोल दिया है

Om Thanvi : मेरी पत्नी प्रेमलताजी ने अजीब उलझन में डाल दिया है: कहती हैं समझाओ कि यह इंद्राणी मुखर्जी वाला मामला क्या है? शीना बेटी थी तो बहन क्यों बनी? विधि कौनसी बेटी है? कितने भाई-बहन थे? इंद्राणी का पहला पति कौन था? संजीव कितने नंबर का पति था, दूसरा या तीसरा? शीना का पिता कौन है? पिता की जगह वह नाना का सरनेम बोरा क्यों प्रयोग करती थी? पीटर की पहली और दूसरी बीवी कौन थी? राहुल कौनसी बीवी से है? पीटर के और कितने बच्चे हैं? पीटर की नजर में शीना साली थी तो अपने सास-ससुर या ससुराल में अन्य किसी निकट-पास के शख्स से बातचीत में यह बात पोशीदा कैसे रही, जो शीना को पीटर के सामने उसकी बेटी ही कहेंगे, साली तो नहीं?

मुझे क्या पता? हाँ, यह देखकर हैरान जरूर हूँ कि कुछ चैनलों ने इस खबर में किसी जासूसी कहानी की तरह रहस्य-रोमांच का ‘रस’ घोल दिया है। किसी सुखद आश्चर्य की तरह कल शाम बस एनडीटीवी-इंडिया पर सुशांत सिन्हा अहमदाबाद के पुलिसिया कहर और पर प्राइम टाइम में रवीश बढ़ती आबादी के पीछे अशिक्षा और गरीबी की वजहें टटोलते रहे। शीना की हत्या रिश्ते-नातों की उलझन से भरी कहानी नहीं है, दर्दनाक त्रासदी है। यकीनन वह बड़ी खबर है, मगर महज सनसनीखेज वारदात या अपराध-कथा भर नहीं है; हर शाम उसका अनवरत कवरेज सत्यकथा या मनोहर कहानियां शैली में नहीं किया जा सकता। जिम्मेदार कवरेज वह होगा जो अभागी शीना के दर्द को धुंधलाने-बिसरने न दे, यह भी याद रखे कि शीना के साथ हुए बरताव और अंततः हत्या के पीछे कथित उच्च वर्ग की पारिवारिक टूटन, आधुनिक जीवन-शैली, संवेदनहीनता, महत्त्वाकांक्षाओं, पितृ व मातृ सत्ता के अहंकार और अहम् के आपसे टकरावों आदि की क्या भूमिका है। यह काम पुलिस की खोज – हत्या क्यों और किसने की – से कहीं आगे का है, जो मीडिया कुशलता से कर सकता है – अगर चाहे।
 
Nadim S. Akhter :  पीटर मुखर्जी और इंद्राणी की स्टोरी में बड़ा रस आ रहा है चैनलों के चम्पादकों को !!! सारा जहान भूल के सिर्फ इसी स्टोरी पर पिले-पलाए बैठे हैं. आपके घर में ऐसा हो जाता तो क्या करते??!! मुंह छुपाते या फिर शर्म से आत्महत्या कर लेते??!! किसी की निजी जिंदगी के हादसे क्राइम की स्टोरी हो सकती है, पर चैनलों की टीआरपी का एजेंडा नहीं. कड़वा बोल रहा हूं पर सच्चाई यही है कि पत्रकारिता करनी नहीं आती तो इस पेशे को बदनाम मत करिए. और रिश्तों को dramatize करने का इतना ही शौक-जूनून है तो जाकर एकता कपूर से नौकरी मांगिए. उसके लिए सीरियल बनाइए-बनवाइए. शर्म नहीं आती आप लोगों को !!!

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सरकार की मर्जी पर !

यह बेहद चिंताजनक स्थिति है कि आज भारतीय मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने लिए निर्धारित मानदंडों और आचरण संहिता को भूलकर किसी न किसी राजनीतिक दल का अनुयायी या उग्र राष्ट्रवादी संगठनों की तरह व्यवहार करने लगा है। एंकर चीख चीख कर अशोभन लहजे में अपनी परम देश निष्ठा का परिचय दे रहे हैं। अपने अलावा किसी और को बोलने का मौका वे नहीं देना चाहते। खबरों का प्रसारण यहां राजनीतिक मंतव्यों के तहत हो रहा है। 

कौन सी ख़बरें किस तरह कवर करनी और दिखानी है, इसका फ़ैसला वरिष्ठ पत्रकारों पर होता है लेकिन ऐसा नहीं लगता कि वे अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं। अब ये भी एक सच है कि आजकल अधिसंख्य पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों में संपादक नहीं ही होते हैं यदि होते भी हैं तो उनकी भूमिका बेहद सीमित होती है। होना तो यह चाहिये कि टीवी चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं में ख़बरों और विचारों के प्रकाशन एवं प्रसारण से पहले उन्हें कई स्तरों पर जाँचा-परखा जाए, ताकि एक संतुलन रहे और समाज में वैमनस्य या उन्माद न फैले। 

सच्चाई यह भी है कि अनुभवहीन पत्रकारों की वजह से भी ऐसा होता है।  लेकिन उन्हें प्रशिक्षित करने और उनकी योग्यता के अनुसार काम देने की ज़िम्मेदारी भी संपादकीय नेतृत्व की ही होती है। दरअसल अधिकांश जगहों पर संपादकीय व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, सवाल उठता है कि क्यों? क्या इसके लिए मीडिया में चलने वाली होड़ ज़िम्मेदार है या फिर और भी कारण हैं? इसमें शक़ नहीं कि टीवी चैनल और पत्र-पत्रिकाएं एक दूसरे से आगे निकलने के लिए खुद को ज़्यादा बड़ा राष्ट्रभक्त दिखाने की कोशिशों में जुट जाते हैं। नतीजा यह होता है कि छोटी-छोटी चीज़ें भी उन्माद की शक्ल ले लेती हैं। जाहिर है लोकप्रियता हासिल करके उसे व्यावसायिक लाभ में तब्दील करने की ख़तरनाक़ प्रवृत्ति दिनों-दिन मज़बूत होती जा रही है लेकिन इसका संबंध सिर्फ बाज़ार से ही नहीं, राजनीति से भी है। 

मीडिया जब सत्ता के एजेंडे से जुड़ जाता है या उसमें अपना स्वार्थ देखने लगता है तो सत्ताधारियों को खुश करने के लिए तमाम तरह के हठकंडे अपनाना शुरू कर देता है। इस समय यही हो रहा है। ये जगज़ाहिर तथ्य है कि कॉरपोरेट जगत, सरकार के साथ सदैव ही कदमताल करता रहा है जो आज कुछ जियादा ही तेजी में है। इसलिए यह भी स्वाभाविक है कि उसके नियंत्रण वाला मीडिया भी सत्तापक्ष की राजनीति का समर्थन करे और वह ऐसा कर भी रहा है। इसीलिए मीडिया के कंटेंट में अब बहुसंख्यकवाद हावी हो चुका है। वह पूरी कटिबद्धता के साथ उदार या भिन्न विचारों का विरोध कर रहा है उग्रता को धड़ल्ले से मंच मुहैया करवा रहा है। सोशल मीडिया का इस तरह बेकाबू हो जाना समझ में आता है। वहाँ कोई गेटकीपर नहीं है, कोई संपादक नहीं है जो लोगों की टिप्पणियों को सावधानीपूर्वक काटे-छाँटे। 

वहाँ कोई कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र है। मगर मुख्यधारा का मीडिया क्यों अपनी ज़िम्मेदारियाँ भूलकर समाज को बेकाबू करने में जुटा हुआ है? और बिडम्बना यह कि भारत सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय उन टी वी चैनलों को नोटिस थमा रहा है जो सत्ता की प्रोपेगंडा साझेदारी से बच रहे हैं और समाचारों को कुछ संतुलन, निष्पक्षता एवं कुछ समझदारी से पेश कर रहे हैं। हाल ही में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा पहले एन डी टी वी को सरकारी सूचनाओं को सार्वजनिक करने के आरोप में फिर ए बी पी न्यूज़, एन डी टी वी 24 तथा आजतक को याकूब मेनन की फँसी के बाद उसके पक्ष में उसके वकील एवं अन्य का साक्षात्कार लेने के लिए अदालत की अवमानना का नोटिस दे दिया। क्यों सरकार टी वी चैनलों के प्रसारण का नियमन नहीं करती। 

वह अन्धविश्वास, अवैज्ञानिकता और उन्माद फैलाने वाले चैनलों पर कोई कार्यवाई करने की बजाय उन चैनलों पर शिकंजा कस रही है जो उसके साथ नहीं हैं। यह सत्ता पक्ष की असहिष्णुता का परिचायक है। वह बदले की भावना से काम कर रही है। वैसे भी अधिकांश चैनेल सत्तापक्ष के शुभचिंतकों के पास हो चुके है। क्या आज की राजनीति की यही मंतव्य प्रेरित अदृश्य रणनीति है ?

लेखक शैलेन्द्र चौहान से संपर्क : shailendrachauhan@hotmail.com

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‘समाचार प्लस’ पर डिबेट में पते की बात कम, भाषण ज्यादा करते हैं पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री

मैं किसी भी पत्रकार के बारे में लिखने से बचता हूँ लेकिन कई पत्रकारों की हरकतों की वजह से आज यह पोस्ट लिखनी पड़ रही है. वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री ‘समाचार प्लस’ पर जब डिबेट में बैठते हैं तो खुद ही बोलते रहते हैं, गेस्ट को बोलने का मौका ही नहीं देते हैं. सवाल पूछने की जगह भाषण देते हैं. 

टीवी पर कई पत्रकार/ एंकर को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह कोई संत हैं जो लोगों को आदर्श सिखाता है. यही नहीं, एंकर कभी कभी नेताओं की तरह भाषण देने लगते हैं. ऐसे ही ‘समाचार प्लस’ के एक वरिष्ठ साथी हैं अमिताभ अग्निहोत्री. वह जब डिबेट में बैठते हैं तो खुद ही बोलते रहते हैं, गेस्ट को बोलने का मौका ही नहीं देते हैं. सवाल पूछने की जगह भाषण देते हैं. डिबेट में आये पार्टियों के नेता और अन्य लोग चुपचाप उनका भाषण सुनते रहते हैं. 

मेरा ऐसा मानना है कि एंकर को डिबेट में आये गेस्ट को अधिक मौका देना चाहिये और शायद यही पत्रकारिता भी है. अगर एंकर और उनके एडिटर को खुद ही भाषण देना है तो गेस्ट को बुलाने की क्या जरुरत है? पत्रकार भाषण नहीं देता है, वह केवल रिपोर्ट करता है…..अमिताभ जी के बारे में यह सिर्फ मेरी राय नहीं है बल्कि ढेर सारे लोगों व पत्रकारों की राय कुछ ऐसे ही है. कई लोगों ने मुझसे बातचीत में कहा कि अमिताभ का भाषण बेहद उबाऊ लगता है. हो सकता है, मैं गलत हूँ लेकिन मुझे और मेरे ढेर सारे लोगों को लगता है कि अमिताभ को भाषण और प्रवचन से बचना चाहिये.

देवकी नंदन मिश्रा के एफबी वाल से

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Lok Sabha TV को किसने बना दिया ‘जोक सभा’ टीवी?

लोकसभा टीवी अब पूरी तरह से ‘जोकसभा’ टीवी का रूप ले चुका है। ये चैनल अब काम के लिए कम और विवादों के लिए ज्यादा जाना जाता है। चाहे लोकसभा टीवी के पत्रकारों का शिकायती पत्र लोकसभा के महासचिव तक पहुँचने का मामला हो, या फिर पूर्व राष्ट्रपति कलाम के असामयिक निधन पर लोकसभा टीवी के सोये रहने का मामला हो। इन दिनों सोशल मीडिया और वेब मीडिया पर आलोचकों की टीआरपी में ये चैनल नंबर वन बना हुआ है।

लोकसभा टीवी को सोशल मीडिया ने ‘जोक सभा’ टीवी का दिलचस्प नाम दिया है। लोगों की हैरानी इस बात पर है कि देश के ज्वलंत मुद्दों पर क्यों लोकसभा टीवी कभी कोई कार्यक्रम नहीं बनाता है? चैनल पर पूरे वक्त सिर्फ पैनल डिस्कशन ही चलता है। इतना पैनल डिस्कशन किसी चैनल पर नहीं देखा जाता है। सामान्य तौर पर रात 8 और 9 बजे, चैनलों पर पैनल डिस्कशन के प्रोग्राम होते हैं, लेकिन लोकसभा टीवी पर आप दिन में कभी भी इस तरह के  बेमतलब बहस के कार्यक्रम देख सकते हैं।

जबकि, गम्भीर मुद्दे जैसे किसानों की आत्महत्या,  सीमा पार से आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, ग्रामीण पिछड़ापन जैसे अनगिनत विषयों पर बिरले ही कोई स्तरीय कार्यक्रम, रिपोर्ट या डॉक्यूमेंट्री प्रसारित होती है। सवाल ये है कि क्या सिर्फ दिन भर स्टूडियो डिबेट और पैनल डिस्कशन दिखाने के लिए ही लोकसभा टीवी को लॉन्च किया गया था?

लोकसभा टीवी के टिकर पर सिर्फ एक लाईन पूरे दिन चलती है, टिकर पर संसदीय मुद्दे, संसद में क्या हुआ, देश की बड़ी ख़बरें, संसद में पेश किये जाने वाले विधेयक इत्यादि की जानकारी चलाना भी लोकसभा टीवी के पत्रकारों को गंवारा नहीं। उन्हें तो बस मेकअप करके दिन भर स्टूडियो में अपना चेहरा चमकाने में ही आनंद आता है। शायद यही कारण है कि अपना चेहरा चमकाकर यहाँ के पत्रकारों ने कईं पुरस्कार तो जीत लिए, लेकिन अपनी लॉन्चिंग के 9 साल बाद भी लोकसभा टीवी कंटेंट के मामले में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल नहीं कर पाया है। तो क्या लोकसभा टीवी पुरस्कार हासिल करने और महज़ निजी हित साधने का जरिया बन चुका है?

गौर करने वाली बात ये है कि लोकसभा टीवी कोई फ़िल्मी चैनल ना होकर एक संसदीय चैनल है, बावजूद इसके आप इसपर बॉलीवुड की कईं मसाला फिल्मों का भी आनंद ले सकते हैं। लेकिन संसदीय मुद्दों पर डॉक्यूमेंट्री और स्तरीय प्रोग्रामों का यहाँ टोटा ही रहता है।

इस संसदीय चैनल पर सरकारी ख़ज़ाने से हर महीने करोड़ों रूपये खर्च होते हैं, लेकिन उनकी सार्थकता सवालों के घेरे में है। संसदीय चैनल होने के नाते इस चैनल से देश को काफी उम्मीदें थीं। ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि ये चैनल देश की आम जनता की आवाज़ बनेगा और सरकार और जनता के बीच पुल का काम करेगा। लेकिन  ये चैनल फिलहाल तो कुछ ज्ञानी पत्रकारों के पीआर का जरिया बन गया है, जहाँ वो सांसदों और मेहमानों को बैठाकर घंटों ‘मंथन’ करते हैं। जिस तरह के कार्यक्रम इस चैनल पर प्रसारित होते हैं, उसे देखकर तो जनता की उम्मीदों और गाढ़ी कमाई पर पानी फिरता नज़र आता है।

एक टीवी पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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हर ख़बर को दूसरी ख़बर से जोड़कर बुलेटिन बनाने के आदती हैं पुण्य प्रसून बाजपेयी

टीवी चैनलों में लिंक न्‍यूज़ का प्रयोग Punya Prasun Bajpai ने किया था। उनकी आदत है कि हर ख़बर को दूसरी ख़बर के साथ जोड़कर बुलेटिन बनाते हैं ताकि एक परिप्रेक्ष्‍य निर्मित हो सके। इसीलिए आज सुबह जब वे रामेश्‍वरम और मुंबई को अलग-अलग दिखा रहे थे, तब मैंने उन्‍हें एक एसएमएस किया कि क्‍यों न दो विंडो में रामेश्‍वरम और मुंबई को एक साथ दिखाया जाए और याकूब व कलाम की मौत को लिंक कर के बात की जाए।

उनका जवाब तो नहीं आया, लेकिन ‘डेलीओ’ नाम की वेबसाइट पर नदीम असरार का एक यह बेहतरीन लेकिन छोटा सा लेख ज़रूर दिख गया, जिसमें ऐसी कुछ कोशिश है। मुझे लगता है कि आज देश में मनाई जा रही दो मौतों को एक साथ रखकर देखा जाना चाहिए। जल्‍दबाज़ी में किया गया तर्जुमा है, लेकिन मौका निकाल कर ज़रूर पढ़ें।

एक आततायी भीड़ का शोकगान (नदीम असरार) : आज भारत के सामने नैतिक रूप से दो परस्‍पर विरोधाभासी घटनाएं घट रही हैं : पहली, 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के दोषी याकूब मेनन को उसके 54वें जन्‍मदिवस पर दी गई फांसी; और दूसरी, कुछ घंटों बाद मिसाइल मैन व पीपुल्‍स प्रेसिडेंट एपीजे अब्‍दुल कलाम की राजकीय सम्‍मान के साथ अंत्‍येष्टि, जो किसी भी राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता के मामले में की गई एक दुर्लभ व अभूतपूर्व खुशामद है।  

एक ही दिन सजे मौत के ये दो रंगमंच एक ऐसे देश के लिए संभवत: बड़े सूक्ष्‍म रूपक का काम करते हैं जहां एक विशिष्‍ट ताकत के सत्‍ता में आने में के बाद उभरा एक विशिष्‍ट विमर्श अब पर्याप्‍त ज़मीन नाप चुका है। कलाम और मेमन नाम के इन दो भारतीय मुसलमानों का सफ़र और उनकी मौत एक ऐसा आईना है जिसमें हम भारतीय धर्मनिरपेक्षता की चारखानेदार चाल के कई अक्‍स एक साथ आसानी से देख सकते हैं।

हिंदुत्‍व के निर्मम और अनवरत हमले के बोध से घिरे तमाम भारतीयों को अब दोनों पर सवाल खड़ा करने से रोकना मुश्किल जान पड़ रहा है- एक, कलाम का राजकीय सम्‍मान और दूसरा, मेमन की राजकीय हत्‍या।

मिसाइल वैज्ञानिक कलाम को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने राष्‍ट्रपति पद के लिए चुना था। वे उस राष्‍ट्रवादी सत्‍ता के लिए आदर्श चुनाव थे जिसका लक्ष्‍य आक्रामक तरीके से सैन्‍य एजेंडे को हासिल करना था। चूंकि वे एक ऐसे तमिल मुसलमान थे जिनकी छवि अपनी धार्मिकता को खारिज करने से बनी थी और उस तत्‍व को प्रदर्शित करने पर टिकी थी जिसे उनके चाहने वाले दक्षिणपंथी लोग ”भारतीय” जीवनशैली करार देते हैं, लिहाजा उनको चुना जाना बीजेपी के लिए मददगार ही साबित हुआ।

कलाम को जुलाई 2002 में भारत का राष्‍ट्रपति चुना गया था। यह गुजरात के नरसंहार के महज कुछ महीने बाद की बात है। मौजूदा प्रधानमंत्री के राज में उस वक्‍त तक राज्‍य में नफ़रत की आग फैली हुई थी। अपेक्षया समृद्ध गुजरात के बीचोबीच खड़े तमाम राहत शिविर लगातार आंखों में गड़ रहे थे और नरसंहार के शिकार लोग अब भी गुजरात और बाहर की अदालतों के दरवाजे खटखटा रहे थे।

गुजरात ने वाजपेयी की छवि को भी काफी नुकसान पहुंचाया था क्‍योंकि वे तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ कोई कार्रवाई कर पाने में नाकाम रहे थे। इतना ही नहीं, नरसंहार के कुछ महीने बाद गोवा में एक कुख्‍यात भाषण में उन्‍होंने हिंसा को जायज़ तक ठहरा दिया था। उन्‍हें अपना रेचन करने की जरूरत थी। कलाम इसके काम आए। अगले दो साल तक जब तक वाजपेयी सत्‍ता में रहे, कलाम ने अपना किरदार हॉलीवुड के क्‍लासिक ”ब्‍लैक साइडकिक” की तर्ज़ पर बखूबी निभाया।

बाकी की कहानी इतिहास है। इसके बाद यह शख्‍स अपने व्‍याख्‍यानों, पुस्‍तकों और प्रेरक उद्धरणों के सहारे चौतरफा रॉकस्‍टार बन गया, जिसका निशाना खासकर युवा आबादी थी। इस प्रक्रिया में कलाम ने अधिकांश मौकों पर उन तमाम जातिगत और वर्गीय संघर्षों की ओर से अपनी आंखें मूंदे रखीं जिनका सामना इस देश के युवा कर रहे थे।

चाहे जो भी रहा हो, लेकिन रामेश्‍वरम से लेकर रायसीना तक कलाम का शानदार उभार इसके बावजूद एक समावेशी भारतीय किरदार का उदाहरण बन ही गया, जैसा कि सोशल और मुख्‍यधारा के मीडिया में उनकी मौत पर गाए जा रहे सामूहिक शोकगान से ज़ाहिर होता है।   

बिलकुल इसी बिंदु पर याकूब मेनन की विशिष्‍टता उतनी ही मर्मस्‍पर्शी बन जाती है। एक ऐसी विशिष्‍टता, जो राज्‍य को हत्‍याओं और सामूहिक हत्‍याओं में फर्क बरतने की सहूलियत देती है। एक ऐसी विशिष्‍टता, जो हमारी राष्‍ट्रीय चेतना में अपने और पराये की धारणा को स्‍थापित करती है।

आज के भारत में मौत की सज़ा का विरोध करना उदारवादियों का एक प्रोजेक्‍ट बन चुका है। (और उदारवादियों पर हमेशा ही उनके भारत-विरोधी षडयंत्रों के लिए संदेह किया जाता रहा है।)

इससे भी बुरा हालांकि यह है कि राजकीय हत्‍याएं हमेशा उन विवरणों से प्रेरित होती हैं जिनका उस मुकदमे से कोई लेना-देना नहीं होता जिसके तहत दोषी को लटकाया जाता है। प्रत्‍येक हत्‍या एक संदेश होती है, और हर मामले का विवरण इतना मामूली बना दिया जाता है कि उस पर कोई कान नहीं देता।

यही वजह है कि आततायियों की जो भीड़ नागपुर में मेमन को लटकाए जाने का इंतज़ार भी नहीं कर पा रही थी, वह उस हिंसा और नाइंसाफी को संज्ञान में लेने तक को तैयार नहीं है जिसने मेमन को पहले पहल पैदा किया। उनकी आवाज़ें इतनी दहला देने वाली हैं कि उसमें मुसलमानों (और उदारवादियों) के निहायत ज़रूरी सवाल दब गए हैं: 

”आखिर 1992-93 के मुंबई दंगों का क्‍या हुआ?”

”क्‍या श्रीकृष्‍ण आयोग की रिपोर्ट को लागू किया गया?”

”मुंबई में हुई 900 से ज्‍यादा मौतों के लिए क्‍या राज्‍य ने बाल ठाकरे और उनकी शिव सेना पर मुकदमा चलाया?”

”मुकदमा?” वे मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं, ”हमने तो पूरे राजकीय सम्‍मान के साथ ठाकरे को विदाई दी थी।”  

”अच्‍छा, क्‍या वही सलाम जो अब कलाम को मिलने वाले हैं?”

चुप…।  

अभिषेक श्रीवास्‍तव के एफबी वाल से 

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कभी रवीश कुमार मत बनना

अपने आप को नौजवानों की आंखों में चमकते देखना किसे नहीं अच्छा लगता होगा। कोई आप से मिलकर इतना हैरान हो जाए कि उसे सबकुछ सपने जैसा लगने लगे तो आप भी मान लेंगे कि मुझे भी अच्छा लगता होगा। कोई सेल्फी खींचा रहा है कोई आटोग्राफ ले रहा है। लेकिन जैसे जैसे मैं इन  हैरत भरी निगाहों की हक़ीक़त से वाक़िफ़ होता जा रहा हूं, वैसे वैसे मेरी खुशी कम होती जा रही है। मैं सून्न हो जाता हूं। चुपचाप आपके बीच खड़ा रहता हूं और दुल्हन की तरह हर निगाह से देखे जाने की बेबसी को झेलता रहता हूं। एक डर सा लगता है। चूंकि आप इसे अतिविनम्रता न समझ लें इसलिए एक मिनट के लिए मान लेता हूं कि मुझे बहुत अच्छा लगता है। मेरे लिए यह भी मानना आसान नहीं है लेकिन यह इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि आप फिर मानने लगते हैं कि हर कोई इसी दिन के लिए तो जीता है। उसका नाम हो जाए। अगर सामान्य लोग ऐसा बर्ताव करें तो मुझे ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता। मैं उनकी इनायत समझ कर स्वीकार कर लेता हूं लेकिन पत्रकारिता का कोई छात्र इस हैरत से लबालब होकर मुझस मिलने आए तो मुझे लगता है कि उनसे साफ़ साफ़ बात करनी चाहिए।

मुझे यह तो अच्छा लगता है कि पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ने वाले तेईस चौबीस साल के नौजवानों के चेहरे पर अब भी वही आदर्श और जुनून दिखता है। मुझसे मिलने वाले छात्रों में यह ललक देखकर दिल भर जाता है। सचमुच प्यार आता है। अच्छा लगता है कि तमाम निराशाओं के बाद भी आने वाले के पास उम्मीदों की कोई कमी नहीं है। उनके सवालों में यह सवाल ज़रूर होता है कि आप कितने दबाव में काम करते हैं। सवाल पूछने के लिए दबाव होता है या नहीं। रिपोर्टिंग कैसे बेहतर करें। आपका सारा शो देखते हैं। मेरे घर में सब प्राइम टाइम देखते हैं। मेरी मां तो आपकी फैन है। दीदी के ससुराल में भी सारे लोग देखते हैं। आप फिर कब रवीश की रिपोर्ट करेंगे। सर, क्या हम चुनाव की रिपोर्टिंग में आपके साथ चल सकते हैं। हमने आपकी रिपोर्ट पर प्रोजेक्ट किया है। दोस्तों, ईमानदारी से कह रहा हूं, आपकी बातें लिखते हुए आंखें भर आईं हैं। पर आपकी बातों से मुझे जो अपने बारे में पता चलता है वो बहुत कम होता है। इस कारण मैं भी आपके बारे में कम जान पाता हूं लेकिन जो पता चलता है उसके कारण लौट कर दुखी हो जाता हूं।

मुझे नहीं मालूम कि पत्रकारिता की दुकानों में क्या पढ़ाया जाता है और क्या सपने बेचे जाते हैं क्योंकि मुझे पत्रकारिता के किसी स्कूल में जाने का मन नहीं करता। जब विपरीत स्थिति आएगी तो चला जाऊंगा क्योंकि मेहनताना तो सबको चाहिए लेकिन जब तक अनुकूल परिस्थिति है मेरा जी नहीं करता कि वहां जाकर मैं खुद भी आप जैसे नौजवानों के सपनों का कारण बन जाऊं। इसलिए दोस्तों साफ साफ कहने की अनुमति दीजिए। आपमें से ज़्यादतर को पत्रकारिता की पढ़ाई के नाम पर उल्लू बनाया जा रहा है। मुझे नहीं लगता कि दस बीस शिक्षकों को छोड़कर हमारे देश में पत्रकारिता पढ़ाने वाले योग्य शिक्षक हैं। हमें समझना चाहिए कि पत्रकारिता की पढ़ाई और शाम को डेस्क पर बैठकर दस पंक्ति की ख़बर लिख देना एक नहीं है। पत्रकारिता की पढ़ाई का अस्सी फीसदी हिस्सा अकादमिक होना चाहिए। कुछ शिक्षकों ने व्यक्तिगत दिलचस्पी लेकर इस क्षेत्र में अपने आप को बेहतर ज़रूर किया है लेकिन उन तक कितने छात्रों की पहुंच हैं। इन दो चार शिक्षकों में से आधे से ज़्यादा के पास अच्छी और पक्की नौकरी नहीं हैं।

जिन लोगों को पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए नौकरी मिली है वो हमारे ही पेशे से गए हुए लोग हैं। जो नौकरी करते हुए डिग्री ले लेते हैं और नेट करने के बाद कहीं लग जाते हैं। इनमें से ज़्यादतर वे लोग होते हैं जो पेशे में ख़राब होते हैं, किसी वजह से चट कर अपने राजनीतिक और जातिगत टाइप के संपर्कों का इस्तमाल कर लेक्चरर बन जाते हैं। कुछ इस संयोग से भी बन जाते हैं कि संस्थान को कोई दूसरा नहीं मिला। कुछ उम्र के कारण पत्रकारिता में बेज़रूरी कर दिये जाते हैं तो अपनी इस डिग्री झाड़पोंछ कर क्लास में आ जाते हैं। इनमें से कुछ लगन से पढ़ाते हुए अच्छे शिक्षक भी बन जाते हैं लेकिन इस कुछ का प्रतिशत इतना कम है कि उनके आधार पर आपके भविष्य की बात नहीं की जा सकती।

मैं यह जानते हुए कि हमारे पेशे में अनेक ख़राबियां हैं, कहना चाहता हूं कि ऐसे संस्थानों और शिक्षकों से पढ़कर आप कभी पत्रकार नहीं बन सकते हैं। भारत में पत्रकारिता को ढंग से पढ़ाने और प्रशिक्षण देने के लिए  कुछ सेंटर ज़रूर विकसित हुए हैं लेकिन ज़्यादतर इसके नाम पर दुकान ही हैं। जहां किसी कैमरामैन या किसी एंकर को लेक्चर के लिए बुला लिया जाता है और वो अपना निजी अनुभव सुनाकर चला जाता है। मैं कई अच्छे शिक्षकों को जानता हूं जिनके पास नौकरी नहीं है। वे बहुत मन से पढ़ाते हैं और पढ़ाने के लिए ख़ूब पढ़ते हैं। जो शिक्षक अपने जीवन का बंदोबस्त करने के तनावों से गुज़र रहा है वो  आपके उम्मीदों को खाद पानी कैसे देगा। सोचिये उनकी ये हालत है तो आपकी क्या होगी। इसलिए बहुत सोच समझ कर पत्रकारिता पढ़ने का फैसला कीजिएगा। इंटर्नशिप के नाम पर जो गोरखधंधा चल रहा है वो आप जानते ही होंगे। मुझे ज़्यादा नहीं कहना है। सारी बग़ावत मैं ही क्यों करूं। कुछ समझौते मुझे भी करने दीजिए।

आप छात्रों से बातचीत करते हुए लगता है कि आपको भयंकर किस्म के सुनहरे सपने बेचे गए हैं। यही कि आप पत्रकार बनकर दुनिया बदल देंगे और मोटी फीस इसलिए दीजिए कि मोटे वेतन पर खूब नौकरियां छितराई हुईं हैं। नौकरियां तो हैं पर खूब नहीं हैं। वेतन भी अच्छे हैं पर कुछ लोगों के अच्छे होते हैं। आप पता करेंगे कि तमाम संस्थानों से निकले छात्रों में से बहुतों को नौकरी नहीं मिलती है। कुछ एक दो साल मुफ्त में काम करते हैं औऱ कुछ महीने के पांच दस हज़ार रुपये पर। दो चार अच्छे अखबार और चैनल अपवाद हैं। जहां अच्छी सैलरी होती हैं लेकिन वहां भी आप औसत देखेंगे तो पंद्रह बीस साल लगाकर बहुत नहीं मिलता है।  ज़्यादतर संस्थानों में पत्रकारों की तनख़्वाह धीमी गति के समाचार की तरह बढ़ती है। हो सकता है कि उनकी योग्यता या काम का भी योगदान हो लेकिन ये एक सच्चाई तो है ही। अभी देख लीजिए कुछ दिन पहले ख़बर आई थी कि सहारा में कई पत्रकारों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा है। पत्रकारों की नौकरियां चली गईं या जा रही हैं या ऐसी हालत है कि करना मुश्किल है। जो भी परिस्थिति हो लेकिन पत्रकार को कौन पूछ रहा है। उन्हें न तो नई नौकरी मिल रही है न नया रास्ता बन पा रहा है। ठीक है कि ऐसी परिस्थिति किसी भी फिल्ड में आती है लेकिन दुखद तो है ही। सहारा छोड़ दीजिए तो आप ज़िलों में तैनात पत्रकारों की सैलरी का पता कर लीजिए। पता होना चाहिए। एक स्टार एंकर की सच्चाई पत्रकारिता की सच्चाई नहीं हो सकती।

आपने उन सपनों को काफी पैसे देकर और अपनी ज़िंदगी के कीमती साल देकर ख़रीदा है। इन सपनों को बेचने के लिए हम जैसे दो चार एंकर पेश किये जाते हैं। आपकी बातचीत से यह भी लगता है कि आपको हमारे जैसे दो चार एंकरों के नाम तो मालूम हैं लेकिन अच्छी किताबों के कम। ये आपकी नहीं, आपके टीचर की ग़लती है। आपमें से ज़्यादातर साधारण या ठीकठाक परिवेश से आए हुए छात्र होते हैं इसलिए समझ सकता हूं कि पांच सौ हज़ार रुपये की किताब ख़रीद कर पढ़ना आसान नहीं है। यह भी पता चलता है कि आपके संस्थान की लाइब्रेरी अखबारों और चैनलों में काम कर रहे दो चार उत्साही लोगों की औसत किताबों से भरी पड़ी है जिनके शीर्षक निहायत ही चिरकुट टाइप के होते हैं। मसलन रिपोर्टिंग कैसे करें, एंकरिंग कैसे करें या राजनीतिक रिपोर्टिंग करते समय क्या क्या करना,मीडिया और समाज, अपराध रिपोर्टिंग के जोखिम। एक बात का ध्यान रखियेगा कि हमारे नाम का इस्तमाल कर लिखी गईं किताबों से आपको पेशे के किस्स तो मिल जायेंगे मगर ज्ञान नहीं मिलेगा। प्रैक्टिकल इतना ही महत्वपूर्ण होता तो मेडिकल के छात्रों को पहले ही दिन आपरेशन थियेटर में भेज दिया जाता। देख पूछ कर वो भी तीन महीने के बाद आपरेशन कर ही लेते।

पढ़ाई को पढ़ाई की तरह किया जाना चाहिए। हो सकता है कि अब मैं बूढ़ा होने लगा हूं इसलिए ऐसी बातें कर रहा हूं लेकिन मैं भी तो आपके ही दौर में जी रहा हूं। पढ़ाई ठीक नहीं होगी तो चांस है कि आपमें से ज़्यादर लोग अच्छे पत्रकार नहीं बन पायेंगे। हिन्दी के कई पत्रकार साहित्य को ही पढ़ाई मान लेते हैं । उन्हें यह समझना चाहिए कि साहित्य की पत्रकारिता हो सकती है मगर साहित्य पत्रकारिता नहीं है। साहित्य एक अलग साधना है। इसमें कोई प्राणायाम नहीं है कि आप इसका पैकेज बनाकर पत्रकारिता में बेचने चले आएंगे। इसलिए आप अलग से किसी एक विषय में दिलचस्पी रखें और उससे जुड़ी किताबें पढ़ें। जैसे मुझे इन दिनों चिकित्सा के क्षेत्र में काफी दिलचस्पी हो रही है। इरादा है कि दो तीन साल बाद इस क्षेत्र में रिपोर्टिंग करूंगा या लिखूंगा या कम से कम देखने समझने का नज़रिया तो बनेगा। इसके लिए मैंने मेडिकल से जुड़ी तीन चार किताबें ख़रीदी हैं और एक दो किसी ने भेज दी हैं। The Empero of All Maladies- Sidhartha Mukherjee, In and Our of theater – Dr Brijeshwar Singh, Doctored( the disillusionment of an American Physician) – Sandeep Jauhar, Being Mortal- Atul Gawande, Better Atul Gawande । मैंने यह लिस्ट आपको प्रभावित करने के लिए नहीं बताई है।

तो मैं कह ये रहा था कि पढ़ना पड़ेगा। आज भी चैनलों में कई लोग जो अपने हिसाब से अच्छा कार्यक्रम बनाते हैं( वैसे होता वो भी औसत और कई बार घटिया ही है) उनमें भी पढ़ने की आदत होती है या ये कला होती है कि कहां से क्या पढ़ लिया जाए कि कुछ बना दिया जाए। मगर कट और पेस्ट वाली से बात बनती नहीं है। ये आपको बहुत दूर लेकर नहीं जाएगा। मैं यह नहीं कह रहा कि आप पढ़ते नहीं होंगे, लेकिन यह ज़रूर कह सकता हूं कि जो आपको पढ़ाया जा रहा है उसका स्तर बहुत अच्छा नहीं है। आप इसे लेकर बेहद सतर्क रहें। अगर पढ़ाया जाता तो पत्रकारिता संस्थानों से आए छात्रों की बातचीत में किताबों या संचार की दुनिया में आ रहे बदलाव या शोध का ज़िक्र तो आता ही।

मैंने बिल्कुल भी यह नहीं कहा कि पत्रकारिता की समस्या ये है कि आने वाले छात्रों में जज़्बा नहीं है या वे पढ़े लिखे नहीं है। इस तरह के दादा टाइप उपदेश देने की आदत नहीं है। आप लोग हमारे दौर से काफी बेहतर हैं। मैं बता रहा हूं कि सिस्टम आपको ख़राब कर रहा है। वो आपके जज़्बे का सही इस्तमाल ही नहीं करना चाहता। किसी को इंतज़ार नहीं है कि कोई काबिल आ जाए और धमाल कर दे। वैसे इस लाइन में किसी को काबिल बनने में कई साल लग जाते हैं। मेरी राय में लगने चाहिए तभी आप इस यात्रा का आनंद लेना सीख सकें। कई जगहों पर जाएंगे, कई बार खराब रिपोर्ट करेंगे, उनकी आलोचनाओं से सीखेंगे। यह सब होगा तभी तो आप पांच ख़राब रिपोर्ट करेंगे तो पांच अच्छी और बहुत अच्छी रिपोर्ट भी करेंगे।

अब आता हूं आपकी आंखों में जो एंकर होते हैं उन पर। मित्रों आप खुद को धोखा दे रहे हैं। हम जैसे लोग उस मैनिक्विन की तरह है जो दुकान खुलते ही बाहर रख दिए जाते हैं । मैनिक्विन की ख़ूबसूरती पर आप फिदा होते हैं तो ये आपकी ग़लती है। पत्रकारिता में आप पत्रकार बनने आइये। किसी के जैसा बनने मत आइये। फोटो कापी चलती नहीं है। कुछ समय के बाद घिस जाती है। राहू केतु के संयोग पर यकीन रखते हैं तो मैं अपनी सारी बातें वापस लेता हूं। इस लाजिक से तो आप कुछ कीजिए भी नहीं, एक दिन क्या पता प्रधानमंत्री ही बन जाएं या फिर बीसीसीआई के चेयरमैन या क्या पता आपकी बनाई किसी कंपनी में मैं ही नौकरी के लिए खड़ा हूं। मुझे लगता है कि आप लोग ख़ुद को धोखा दे रहे हैं और आपको धोखा दिया जा रहा है। आप एक दिन आप रोयेंगे। धकिया दिये जाएंगे। इसलिए अपना फैसला कीजिए। आपका दिल टूटेगा तब आपको रवीश कुमार बनने का वो सपना बहुत सतायेगा।

मैं क्यों कह रहा हूं कि आपको रवीश कुमार नहीं बनना चाहिए। इसलिए कि आपकी आंखों में ख़ुद को देख मैं डर जाता हूं। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे आप प्रभावित हों। आप पत्रकार बनने वाले हैं, कम से कम प्रभावित होने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। यह भी ठीक नहीं होगा कि देखते ही मुझे गरिया दें लेकिन प्लीज़ ख़ुदा न कहें और मेरी तुलना किसी फिल्म स्टार से न करें। मैं ऐसा कुछ भी नहीं हूं जो आपको बनना चाहिए। हम न अपने आप में संस्थान हैं न सिस्टम। हम न बाग़ी हैं या न क्रांतिकारी। यही सीखा है कि अपना काम करते चले जाओ। अगर आप ने मुझे मंज़िल बना लिया तो निराशा होगी।

मुझे पता है कि आपसे इंटरव्यू में पूछा जाता है कि किसी अच्छे पत्रकार का नाम बताओ या किसके जैसा बनना चाहते हो। इंटरव्यू लेने वाले फिर मुझे बताते हैं कि ज़्यादातर छात्र आप ही का नाम लेते हैं। आपको क्या लगता है कि मैं खुश हो जाता हूं। सुन लेता हूं लेकिन मेरा दिल बैठ जाता है। यह सोच कर कि क्या उन्हें पता है कि रवीश कुमार होना कुछ नहीं होना होता है। किसी के जैसा बनने का यह सवाल भी गिनिज बुक के लिए रिकार्ड बनाने जैसा वाहियात है कि किसके जैसा बनना है। आपको मैं बता रहा हूं कि मैं कुछ नहीं हूं। मेरे पास न तो कोई ज़मीन है और न आसमान। आप मुझे देखते हुए किसी शक्ति की कल्पना तो बिल्कुल ही न करें। ज़रूर हम लोग व्यक्तिगत साहस और ईमानदारी के दम पर सवाल पूछते हैं लेकिन हम किसी सिस्टम या पेशे की सच्चाई नहीं हो सकते। हम अपवाद भी तो हो सकते हैं।

मोटा मोटी मैं यह कह रहा हूं कि हम लोग सामान्य लोग होते हैं। हमारे जैसे लोग चुटकी में चलता कर दिये जाते हैं और सिस्टम डस्टबिन में फेंक देता है। समाज भूल जाता है। अनेक उदाहरण हैं। कुछ उदाहरण हैं कि समाज बहुत इज्ज़त भी करता है और याद भी रखता है। प्यार भी करता है। कई लोग लस्सी और दूध लेकर आ जाते हैं। मेरे दर्शकों ने मुझे घी और गुड़ भी दिया है। कैडबरी के चाकलेट भी दिये हैं। लेकिन मैं आपके सपनों की सच्चाई नहीं हो सकता। हम सबको पेश में आने वाले उतार चढ़ावों से गुज़रना पड़ेगा। कुछ गुज़रे भी हैं और जो नहीं गुज़रे हैं वे दावे से नहीं कह सकते कि उनके साथ ऐसा नहीं होगा। इसलिए अगर आप पत्रकारिता के छात्र हैं जो दो चार एंकरों का चक्कर छोड़िये। उनके शो देखकर इस भ्रम में मत रहियेगा कि आप पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ रहे हैं। अगर भ्रम में नहीं रहते हैं तो बहुत अच्छी बात है। आप तमाम माध्यमों को देखिये, जहां हिन्दी अंग्रेजी के कई पत्रकार अच्छी और गहरी समझ से रिपोर्ट लिख रहे हैं। उनकी रिपोर्ट का विश्लेषण कीजिए। उनसे बात कीजिए कि खबर तक पहुंचने के क्या कौशल होन चाहिए। आपके टीचर ने गलत बताया है कि टीवी का पत्रकार बनना है तो चैनल देखो या रवीश कुमार को देखो। उनके कहियेगा कि खुद रवीश कुमार महीने में कुल जमा चार घंटे भी चैनल नहीं देखता है।

आप सबकी मासूमियत और ईमानदारी देखकर जी मचलता है। लगता है कि क्या किया जाए कि आपको ख़रोंच तक न लगे। जज़्बा बचा रहे। पर मैं एक व्यक्ति हूं। मैं सोच सकता हूं, लिख सकता हूं इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकता। सही बात है कि अब कुछ करना भी नहीं चाहता। शायद इसी बेचैनी के कारण यह सब लिखने की मूर्खता कर रहा हूं। आपके रवीश कुमार कुछ नहीं हैं। आप उनकी वक्ती लोकप्रियता पर मोहित मत होइये। हमने ज़रूर अपने अनुशासन से साख बनाई है और यह ज़रूरी हिस्सा है लेकिन यह भी समझिये कि मुझे बहुत अच्छे मौके मिले हैं। सबकी कहानी में दुखभरी दास्तां होती हैं। मेरी भी है लेकिन इसके बावजूद मुझे अच्छे मौके मिले हैं। पूरी प्रक्रिया को समझिये और फिर उसमें हम जैसे तथाकथित स्टार एंकरों को रखकर देखिये।

पूरी पत्रकारिता को स्टार एंकर की अवधारणा में नहीं समेटा जा सकता। एंकर हर ख़बर या हर रिपोर्टर का विकल्प नहीं हो सकता। कम से कम मैं नहीं हो सकता। लेकिन अब का दौर ऐसा ही है। आपके पास टीवी में इसका विकल्प नहीं है। कई जगहों पर प्रयास हो रहा है लेकिन जैसे ही कोई मसला आता है वे मसाला बनाने में लग जाते हैं। दर्शक भी वैसे ही हो गए हैं। किसी रिपोर्टर की स्टोरी को ध्यान से नहीं देखते। यही गिनती करते रहते हैं कि किस एंकर ने कौन सी स्टोरी पर बहस की और किस पर नहीं की ताकि वे खुद को संतुष्ट कर सकें कि ऐसा उसने किसी पार्टी के प्रति पसंद- नापसंद के आधार पर किया होगा। सारे दर्शक तो नहीं हैं लेकिन हमारे नज़दीक जो दर्शक समाज होता है वो एक खासकिस् जिस राजनीतिक तबके से सक्रिय दर्शक समाज बनता है जो हमारे नज़दीक किन्हीं कारणों से आ जाता है वो ऐसा ही माहौल रच देता है। निष्पक्ष दर्शक या जनता इन्हीं के कारण तड़पती रह जाती है और अपना क्षोभ एंकर पर निकाल कर सो जाती है। जो कि सही भी है।

इसलिए आप इन एंकरों को महाबलि न समझें कि हम देश के तमाम मुद्दों पर इंसाफ कर देगा। हर मुद्दे पर प्रतिबद्धता साबित कर देगा या सही तरीके से कार्यक्रम कर देगा। सबको सबक सीखा देगा। बैकग्राउंड में तूफान फिल्म का गाना बजेगा.. आया आया तूफान…भागा भागा शैतान। ऐसा होता नहीं है दोस्तों। आप देख ही रहे हैं कि हम एंकरों की तमाम चौकसी के बाद भी जवाब कितने रूटीन हो गए हैं। दरअसल ये जवाब बताते हैं कि तुम सिस्टम का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। ज़्यादा करोगे तो सोशल मीडिया के ज़रिये दर्शकों को बता देंगे कि हमारी पार्टी के ख़िलाफ़ हो। दर्शक भी जल्दी ही अपनी पार्टी की निष्ठा की नज़र से देखने लगेंगे और आपका साथ छोड़ देंगे। मैं रोज़ इस अकेलेपन को जीता हूं। यह भयावह है। आप व्यापम करो तो लोग कहते हैं कि यूपी मे भी तो व्यापम है। इन उदाहरणों में फंसा कर आपसे कहा जाता है कि तराजू के पलड़े पर बेंग तौल कर दिखाओ। एक बेंग इधर रखेंगे तो दूसरा उधर से कूद जाएगा।

इसलिए नौजवान दोस्तों कभी रवीश कुमार मत बनना। अपना रास्ता खुद बनाओ। मुझे जो बनना था कथित रूप से बन चुका हूं। तुम्हें दिनेश बनना होगा, असलम बनना होगा, जाटव बनना होगा, संगीता या सुनीता बनना होगा। ये तभी बनोगे जब तुम्हें कोई मौका देगा। जब तुम उस मौके के लिए अपने आप को तैयार रखोगे और अपने हिसाब से सीमाओं का विस्तार करते चलोगे। हास्टल में बैठकल मेरा फैन बनकर अपना वक्त मत बर्बाद करना। बहुत ही महत्वपूर्ण दौर है तुम्हारा। इसका सदुपयोग करो। लोकप्रियता किसी काम की नहीं होती है। कोई तुम्हें हम लोगों का नाम लेकर ठग रहा है। बचना इससे।  इसके लिए पत्रकार मत बनना। पत्रकार बनना पत्रकारिता के लिए बशर्ते कोई तुम्हारे इस जज़्बे का इंतज़ार कर रहा हो। मुझे भी बताना कौन तुम्हारा बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है।

कस्बा से साभार

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जनवरी तक एक दूसरे से अलग हो जाएंगे सीएनएन और टीवी 18 ब्राडकास्ट

मीडिया कंपनी टीवी 18 ब्राडकास्ट लि. और केबल न्यूज नेटवर्क इंक (सीएनएन) अगले साल जनवरी में अपना गठजोड़ समाप्त कर देंगे। अंग्रेजी समाचार चैनल सीएनएन आईबीएन के लिये 10 साल पुराना ब्रांड लाइसेंसिंग समझौता अगले साल जनवरी में समाप्त हो रहा है। दोनों कंपनियों ने संयुक्त बयान में कहा, ‘‘समझौता खत्म होने के बाद दोनों कंपनी दुनिया के सबसे गतिशील, जटिल और तेजी से बढ़ने वाले बाजारों में से एक बाजार में स्वतंत्र रूप से वृद्धि की रूपरेखा तैयार करेंगी.’’ बंबई शेयर बाजार को दी गई सूचना में अंग्रेजी समाचार चैनल सीएनएन-आईबीएन चलाने वाली टीवी 18 ब्रॉडकास्ट ने कहा कि सीएनएन और वह ‘‘सीएनएन ब्रांड और सीएनएन समाचार सामग्री के इस्तेमाल के लिये दस साल पुराने ब्रांड लाइसेंसिंग और समाचार सेवा व्यवस्था के समझौते को जनवरी 2016 में सफलतापूर्वक पूरा कर रहे हैं.’’

कंपनी के अनुसार, ‘‘दोनों पक्षों ने समझौते को आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय किया है.’’ टीवी 18 समूह की कंपनी ग्लोबल ब्राडकास्ट न्यूज :जीबीएन: ने भारत में अंग्रेजी न्यूज चैनल सीएनएन-आईबीएन शुरू करने के लिये वर्ष 2005 में सीएनएन टर्नर इंटरनेशनल के साथ ब्रांडिंग समझौता किया था. इसके बाद जीबीएन, आईबीएन 18ब्राडकास्ट लि. बन गयी और फिर टीवी 18 ब्राडकास्ट लि. हो गयी. इस बारे में नेटवर्क 18ग्रुप सीईओ ए पी पारिगी ने कहा, ‘‘पिछले दशक में भारतीय मीडिया में काफी तेजी आयी है और यह हमारे लिये उत्साहजनक रहा है. इस दौरान जिस तरीके से ज्यादा अपेक्षा रखने वाले दर्शकों के लिये समाचारों को परोसा जाता था, उसे नया रूप देने के लिये दो मीडिया हाउस साथ आये. सीएनएन के साथ संबंधों से टीवी 18 में हमें लाभ हुआ.’’

उन्होंने, कहा कि नेटवर्क18 के 2005 में दो चैनल थे जो बढ़कर 2015 में 17 हो गये. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि गठजोड़ समाप्त होने के बाद अंग्रेजी समाचार चैनल की ब्रांडिंग क्या होगी. सूत्रों ने कहा कि 10 साल का गठजोड़ अक्तूबर में समाप्त होगा लेकिन सह-ब्रांडिंग समझौता जनवरी 2016 तक जारी रहेगा. हालांकि, दोनों कंपनियों ने अनुबंध नवीनीकरण नहीं करने के कारणों के बारे में कुछ नहीं बताया.सीएनएन इंटरनेशनल की मुख्य परिचालन अधिकारी रानी राद ने कहा कि टीवी 18 के साथ एक दशक लंबे गठजोड़ के साथ सीएनएन आईबीएन मार्ग प्रशस्त करने वाली पहल थी.      

ऐसी अटकलें हैं कि सीएनएन अन्य भारतीय मीडिया हाउस जी समूह के साथ गठजोड़ कर सकता है. हालांकि, इस बारे में समूह से फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं मिली. पिछले साल मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज लि. ने नेटवर्क 18 मीडिया एंड इनवेस्टमेंट्स लि. में नियंत्रणकारी हिस्सेदारी ले ली. इसमें नेटवर्क 18 की अनुषंगी टीवी 18ब्राडकास्ट लि. शामिल है. कंपनी ने यह सौदा स्वतंत्र मीडिया ट्रस्ट के जरिये 4,000 करोड़ रुपये में किया. बंबई शेयर बाजार में आज के कारोबार में टीवी18 ब्राडकास्ट लिमिटेड का शेयर 3.46 प्रतिशत घटकर 36.30 रुपये पर बंद हुआ. 

टेलीविजनपोस्ट से साभार

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पीएम साहब, टी वी चैनलों पर बैठा आपका ‘चतुर गैंग’ काम न आएगा

सार्वजनिक जीवन में आप सवालों से मुँह चुराकर भाग नहीं सकते । सवाल अपने लिये माध्यम खोज लेते हैं अपने प्रियतम तक पहुँचने का , उसकी नींद चैन उड़ाने का ! फ़िलहाल हमारे प्रधानमंत्री जी यह सोच रहे हैं कि वे मीडिया की जद से बाहर रहकर इन सवालों को समय की गाद के नीचे दबाने में कामयाब हो जायेंगे जिन्होंने देश के आसमान में डेरा डाल दिया है ! ..और आप सोच रहे होंगे कि टी वी चैनलों पर बैठा आपका “चतुर गैंग” आदमी के मल से बैठक में लेप लगायेगा और परफ़्यूम छिड़क कर बदबू रोक लेगा ? पी एम साहेब ऐसा हो नहीं पाता !

केजरीवाल बहुत चतुर हैं पर ” तोमर” की डिग्री उनके माथे पर चिपक गई थी, भला हो बीजेपी कैम्प के रणनीतिकारों का कि उन्होंने तोमर पर बलपूर्वक क़ब्ज़ा लेकर (जेल भेजकर) केजरीवाल को कलंक की तासीर से काफ़ी राहत दिला दिया । गर वे बाहर रह कर मंत्री बने रहते और पुलिस धीरे धीरे एक एक पन्ना जाँच प्रेस में खोलती जाती तो दिल्ली के चारों ओर ऐसी बदबू फैलती कि आप प्रवक्ताओं का जीना दूभर हो जाता !

बात सुषमा जी द्वारा ललित कला मोदी के वीसा दिलवाने की पैरवी में निजी तौर पर शामिल रहने से शुरू हुई थी, आगे बढ़ी तो पता चला विदेश मंत्राणी के पति वक़ील भी हैं और इक बिटिया बाँसुरी बजाती है……..न न न वह भी वक़ील है बाँसुरी तो उनका नाम है । पता चला कि ललित कला मोदी कब से फ़ीस चुका रहे हैं, मध्य प्रदेश के किसान मज़दूर टैकसपेयर भी अपना अंशदान कर रहे हैं ( फ़ीस चुकाकर)!

बात और तैर गई जयपुर पहुँची । वहाँ तो सब लिखत पढ़त में निकला । लिखित सपोर्ट बनाम मारीशस के बेमानी खाते से देस के नामी खाते में सीधा ट्रांसफ़र । देसी घबराय गये । पता लगा कि उनके कोटे के पन्द्रह लाख तो पहले ही वसुंधरा जी के बिटवा के खाते में कई साल पहले एडवांस में आ गये हैं !

चतुर सुजान झक्कास जेटली साहब की बिटिया की फ़ाइल भी खुल गई । वे भी वक़ील निकलीं । वे भी फ़ीस लेंगी कि नहीं सो राष्ट्रीय हाकी उनकी दो करोड़ की फ़ीस चुका रही है , चुकायेगी , चुकाना पड़ेगा । जेटली साहब की बेटी की प्रतिष्ठा का सवाल है , हाकी डारो चूल्हे माँ !

कांग्रेसी बत्तीसी काढ़ हँसना शुरू ही किये थे कि उनके राजघराने के कुँवर की फ़ोटू आ गई ललित कला एकेडमी की फिर अपने पत्रकार कोटे के कंगरेसी भाई राजीव सुकुल के कमर का साइज़ छप गया । जवाब तो देना पड़ेगा । भागने की गैल ना है ?

तो पी एम साहेब कट मारके निकल जाने से काम नईं बनेगा । वे सब जो आपकी हिफ़ाज़त में पेमंट/बिना पेमंट फ़ेसबुक/ट्विटर/सड़क पे युद्ध छेड़े हैं उनके भी हाथ नाक कान हैं । उन्हें भी फ़रक पड़े है । हफ़्ता भर से समझ नईं पा रै कि का पोस्ट डारें ?

कोई ग़ज़ल सुन रया कोई भजन । मन नईं लग रया । मन की बात भी ख़ाली गई । अब का करैं ।

तो साहेब मैदान में आओ लोहा लो बोलो छुपो मत ! सवालों से कोई छुप नहीं पाया आजतक !

बालेंदु स्वामी के एफबी वाल से

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रिलायंस जिओ मीडिया को टीवी कंटेंट डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के लिए मिली प्रोवीजनल मंजूरी

रिलायंस इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) ने सोमवार को कहा कि उसकी सब्सिडियरी रिलायंस जिओ मीडिया को संपूर्ण भारत में डिजीटल केबल टीवी क्षेत्र में मल्‍टी सर्विस ऑपरेटर के तौर पर काम करने के लिए सरकार से प्रोवीजनल रजिस्‍ट्रेशन हासिल हो चुका है।

बीएसई को दी गई सूचना में कहा गया है कि रिलायंस इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड की सब्सिडियरी रिलायंस जिओ प्राइवेट लिमिटेड को पूरे देश में डिजीटल एड्रेसएबल सिस्‍टम (डीएएस) में मल्‍टी सर्विस ऑपरेटर (एमएसओ) के तौर पर काम करने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से प्रोवीजनल रजिस्‍ट्रेशन हासिल हो चुका है।

एमएसओ एक केबल ऑपरेटर होता है, जो एक ब्रॉडकास्‍टर से प्रोग्रामिंग सर्विसेस हासिल करता है और उसे या तो मल्‍टीपल सब्‍‍सक्राइबर या फि‍र एक या अधिक लोकल केबल ऑपरेटर के जरिये ट्रांसमिट करता है। आरआईएल अपने जिओ ब्रांड को इंटीग्रेटेड बिजनेस क्षमता के तौर पर विकसित कर रहा है,‍ जिसमें टेलीकॉम, हाई स्‍पीड डाटा, डिजीटल कॉमर्स, मीडिया और पेमेंट सर्विसेस का मिश्रण होगा।

इस मंजूरी के साथ, रिलायंस जिओ अब हेथवे, आईएमसीएल, सिटी केबल नेटवर्क और डेन नेटवर्क्‍स से प्रतिस्‍पर्द्धा कर पाएगी और यह अपने मीडिया कंटेक्‍ट को केबल टेलीविजन पर भी स्‍वयं डिस्‍ट्रीब्‍यूट कर सकेगी। कंपनी ने मीडिया हाउस नेटवर्क18 का अधिग्रहण किया है, जिसके 17 न्‍यूज चैनल और 8 भाषाओं में 14 एंटरटेनमेंट चैनल हैं। इसके अलावा इसके पास कई इंटरनेट आधरित बिजनेस भी हैं।

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सन टीवी के शेयर एक ही दिन में 30 फीसदी तक गिर गए

केंद्रीय गृह मंत्रालय से सिक्युरिटी क्लियरेंस न मिलने की खबरों के बाद सोमवार को सन टीवी नेटवर्क के शेयरों के दाम 30 फीसदी तक गिर गए। इस समूह के मालिक कलानिधि मारन हैं। शेयर गिरने के बाद कंपनी ने एक स्टेटमेंट जारी कर कहा कि उसके चैनल ऑन एयर ही हैं। दोपहर 2.45 पर सन टीवी के शेयर 277.15 रुपए से 79.20 रुपए नीचे आ गए। यह गिरावट पिछली क्लोजिंग से करीब 22.23 फीसदी कम रही। सोमवार सुबह शेयर करीब तीस फीसदी तक गिर गए थे।

कंपनी ने एक बयान में कहा, “हम यह साफ कर देना चाहते हैं कि सिक्युरिटी क्लियरेंस के मामले में हमें किसी मंत्रालय से कोई सूचना नहीं मिली है। हमारे सभी चैनल ऑन एयर हैं।” कंपनी के एक सीनियर अधिकार ने कहा कि सन टीवी ने किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया है और हम सभी टैक्स समय पर चुकाते हैं। इस अधिकारी ने कहा, “सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने होम मिनिस्ट्री से अपने प्रस्ताव पर फिर विचार करने को कहा है। हम उम्मीद करते हैं कि हमारे सारे चैनल ऑन एयर ही रहेंगे।”

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यौन हमले की पीड़ित टीवी पत्रकार को इंसाफ नहीं, आरोपी बेखौफ

मुंबई : एक चैनल में काम करने वाली पत्रकार इन दिनों खुद ही एक विचित्र परेशानी से जूझ रही है। उसने कस्तूरबा मार्ग पुलिस थाने में कुछ लोगों के खिलाफ उस पर यौन हमले की शिकायत दर्ज करवाई लेकिन एक महीना होने के बावजूद पुलिस अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। अभी तक न तो पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया है, न ही उनका पता-ठिकाना लगाने की कोई कोशिश की है।

सूत्रों के मुताबिक लीना (नाम परिवर्तित) के साथ 28 मई 2015 की शाम सात बज कर 55 मिनट पर बोरीवली की कार्टर रोड नंबर 3 पर हिमेश खिमेसरा, रितेश खिमेसरा और हिमेश खिमेसरा के बड़े भाई के खिलाफ भरे बाजार में मारपीट और यौन हमला करने के आरोप लगाए हैं। पुलिस में दर्ज एफआईआर (क्र. 174/14) के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 354, 323, 504, 506, 509 और 324 के तहत मामला दर्ज हुआ है।

लीना के पुलिस में दर्ज बयान के मुताबिक वह एक निजी न्यूज चैनल में बतौर सह संपादक काम करती है। उसने शबनम खान और विशाल दीक्षित को अनालिजा ब्यूटी पार्लर के लिए 22 लाख रुपए का निवेश किया था। ये लोग उसे दो साल से पैसे वापस नहीं दे रहे थे। एक दिन लीना ने अपने परिचित आयकर अधिकारी से इस बारे में बात की। उन्होंने कहा कि बोरीवली पूर्व में उसके दो दोस्त, अमित गुप्ता और सोनू यादव, के पास जाते हैं। उन दोनों की स्थानीय नेता नयन कदम से अच्छी दोस्ती है। वे सभी उनसे मिलेंगे और शबनम व विशाल से पैसे वापस लेने की जुगत लगाएंगे।

25 अप्रैल 2015 की सुबह 8 बजे अधिकारी और लीना एक टैक्सी में बोरीवली पूर्व में कार्टर रोड नंबर 3 पर एक डेयरी के पास रुक कर अमित गुप्ता का पता पूछने लगे। लीना ने देखा कि उसके आयकर अधिकारी मित्र से कुछ लोग झगड़ रहे हैं। वे उनसे मारपीट करने लगे। लीना को कुछ समझ नहीं आया। वह कुछ समझती, तभी वे लोग टैक्सी के पास आ पहुंचे और टैक्सी की चाबी निकाल ली। जब लीना ने उनसे पूछा कि वे कौन हैं और मारपीट क्यों कर रहे हैं, तो उनमें से एक ने लीना को भद्दी गालियां देते हुए बांह पकड़ कर टैक्सी के बाहर खींच लिया। उसके साथियों ने लीना के अश्लील हरकते करना शुरू कर दिया। लीना का आरोप है कि उनमें से एक व्यक्ति ने तो उसके गाल पर चांटा भी मारा था।

लीना के बयान के मुताबिक जब यह हंगामा चल रहा था, वहां लोगों की भीड़ लग गई थी। वे लोग उसे पास की ही एक इमारत की ओर खींच कर ले जाने की कोशिश कर रहे थे। किसी तरह लीना ने उनके चंगुल से बच कर पुलिस नियंत्रण कक्ष में 100 नंबर पर फोन किया। जब वहां पुलिस वैन आई तो उन्होंने लीना और आयकर अधिकारी को बचाया, उनके साथ मारपीट करने वालों को भी साथ में कस्तूरबा थाने ले गई। उस दिन पुलिस अधिकारियों ने लीना के बार-बार कहने पर भी शिकायत दर्ज नहीं की।

लीना के मुताबिक इस पूरे मामले की वीडियो रिकॉर्डिंग भी एक स्थानीय व्यक्ति ने मोबाईल फोन में की थी। वह वीडियो लेकर लीना ने कस्तूरबा पुलिस थाने में जाकर रपट दर्ज करवाने की कोशिश की लेकिन पुलिस अधिकारियों ने उसकी शिकायती पत्र लेकर रख लिया और एक महीने तक कुछ नहीं किया। जब लीना ने उच्चाधिकारियों से इसकी शिकायत की तब जाकर कहीं एक माह बाद लीना की एफआईआर तो दर्ज हुई लेकिन स्थानीय पुलिस अधिकारी इस मामले में कानों में तेल डाले सोए हुए हैं। अभी तक न तो इसमें कोई गिरफ्तारी हुई है, न ही कोई यह बताने के लिए तैयार है कि इसमें क्या प्रगति हुई है।

विवेक अग्रवाल के ब्लॉग से 

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पढ़ाई-लिखाई से टीवी पत्रकारों का कोई वास्ता नहीं

ना जाने क्यों टीवी एंकर्स के चेहरों पर दो किस्म के भाव रहते हैं। अव्वल तो यह मान कर टीवी एंकर्स चलते हैं, सामने वाला शख्स मूर्ख है और मैं यह भी तय करूंगा कि सामने वाले को क्या बोलना है। दूसरे, कुछेक एंकर्स ऐसी अदा से कैमरे को ताकते हुए मेहमान पर मुस्कराते हैं मानो कह रहे हों, जरा इस लल्लू को देखो तो..या फिर इस कदर आक्रामक हो उठते हैं..लगता है कि दर्शक मेहमान को नहीं, एंकर को सुनने टीवी खोल के बैठा है। 

स्मृति ईरानी के इंटरव्यू में अंजना ओम कश्यप और अशोक सिंघल ने साफ कर दिया कि अध्ययन और पढ़ाई-लिखाई से टीवी पत्रकारों का कोई वास्ता नहीं है। धन्य हो। सवाल जो पूछे जाने चाहिए थे..

1. 2011 से संसद में शिक्षा पर कोई रिपोर्ट पेश नहीं की गई है…मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में यह बिंदू कहां हैं..?

2. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शिक्षा का मुख्य बिंदू रहा है. शिक्षा का व्यावसायीकरण रोकना…वो प्रश्न कहां लुफ्त है..?

3. बतौर प्रोफेसर और बतौर मानव संसाधन मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी के होने के बाद भी मोदी ने क्यों स्मृति ईरानी को चुना..?

4. क्या कभी इस बात की तस्दीक होगी कि सरकारी इमदाद पर चलने वाली यूनिवर्सिटीज तक पहुंचने वाले छात्रों में कितने छात्र वास्तविक दलित और मुस्लिम हैं..?

5. लिंगदोह के मसले पर मोदी सरकार का क्या रुख है….?

सवाल और भी है..फिलहाल इतना ही.

सुमंत भट्टाचार्य के एफबी वाल से 

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टीवी मीडिया तो विकसित होने से पहले ही पसर गया, बस सेठजी की रखैल टाइप खबर आना रहा बाकी

व्यावहारिक पत्रकारिता में कई आयाम एक साथ काम करते हैं। उसमें संपादकीय टीम की दृष्टि, ध्येय, प्रस्तुतिकरण और प्रतिबद्धता के साथ भाषा का मुहावरा भी शामिल है। इनसे मिलकर ही एक मुकम्मल सूचना उत्पाद बनता है, जिसे आप प्रारंभिक तौर पर अखबार या मैगजीन के रूप में पहचानते हैं। हमारी पत्रकारिता की शुरुआत के समय हर अखबार और मैगजीन का कलेवर, विषयों का चयन, प्रस्तुतिकरण और भाषा का व्याकरण अलग-अलग था। यहां तक कि फॉन्ट और ले आउट भी, जैसे धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान या दिनमान और रविवार। आज भी इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू या इकोनॉमिक्स टाइम्स और बिजिनेस स्टेण्डर्ड देख कर इसे समझा जा सकता है ।

एक पत्रकार किसी भी अखबार या मैगजीन के फटे हुए कागज के टुकड़े को देखकर पहचान सकता है कि यह किस का टुकड़ा है। प्रिंट मीडिया की तरह विजुअल मीडिया का भी अलग मुहावरा होता है। आसान उदाहरण के रूप में समझें तो टीवी और सिनेमा की कैमरे की भाषा में फर्क होता है तो ऩाटक, सीरियल और सिनेमा की एक्टिंग और निर्देशन में भी। हमारी पत्रकारिता का कैरियर जब गति पकड़ रहा था, तब टी वी पर निजी न्यूज चैनलों ने दस्तक देना शुरु कर दिया था। हमें लग रहा था कि न्यूज की विजुअल भाषा को विकसित होते हुए देखेंगे। इस बार कैमरे और खबर की नई जुगलबंदी देखने को मिलेगी। हर न्यूज चैनल की अलग जुगलबंदी से विकसित होते नए व्याकरण को देखेंगे। अच्छे व्याकरण को मुख्य धारा में आते हुए और खराब व्याकरण को किनारे लगते हुए देखेंगे। 

जल्द ही हमारी इच्छाओं पर पानी फिर गया। शुरु में न्यूज चैनल थोड़ी-थोड़ी अधूरी कोशिश करते नजर तो आते थे पर वे अपनी जरूरत के रिपोर्टरों और कैमरामैनों से संपन्न नहीं थे। हो सकता है संपादकीय दृष्टि का अभाव हो या मैंनेजमेंट का दबाव, पर चैनल अपना आत्मविश्वास पैदा नहीं कर पा रहे थे। टीवी न्यूज का व्याकरण विकसित नहीं हो पा रहा था। उनपर बची खुची चोट इंडिया टीवी ने की। वह एक नया भाषाई तथा प्रबंधन व्याकरण लेकर आया कि सारे चैनलों के कथित मूल्य उसमें बह गए। अब चैनल खबर की विश्वसनीयता की जगह दर्शकों का ध्यान खींचने पर टिक गए। मदारी की चमत्कारिक भाषा, बिना कंटेंट और विजुअल के, अजब दौर शुरु हुआ।

एसपी का आजतक भी इसमें बह गया पर टीवी पत्रकारिता मर गई। साल छह महीने में चैनलों को समझ में आने लग गया कि यह रास्ता आगे कहीं नहीं जाता। फिर कॉस्ट कटिंग का मुहावरा चल निकला। फार्मूले के तौर पर पैनल डिस्कशन के कार्यक्रम शुरु किए गए क्योंकि यह न सिर्फ सस्ते पड़ते हैं बल्कि मेहनत भी कम करनी पड़ती है और तथ्य यह भी है कि देश के अधिकतर अखबार इन डिस्कशनों से प्रभावित होकर अपनी लीड तय करते हैं। यानि कि भारत में टीवी पत्रकारिता तो विकसित होने से पहले ही पसर गई। सारे न्यूज चैनलों का आदर्श बीबीसी या फॉक्स नहीं, इंडिया टीवी है। और हम इस गलतफहमी में जी रहे थे कि हम इसके विकास से कुछ सीखेंगे।

पत्रकारिता में मेरे विकास का काल और भारत में टीवी पत्रकारिता का विकास काल लगभग एक ही है पर टीवी पत्रकारिता विकसित ही नहीं हो सकी या जिसे हम विकास कहना चाहते हैं, उसकी दिशा ही मुड़ गई। वहां मौलिक मुहावरा विकसित करने के जगह नकल की भेड़चाल चल रही थी। उनका आत्मविश्वास अपनी सृजनात्मकता पर नहीं बल्कि हर हफ्ते जारी होने वाली टीआरपी पर टिका था। यह टीआरपी पर्दे के पीछे से टीवी इंडस्ट्री पर राज कर रही थी। टीवी इंडस्ट्री को सबसे ज्यादा नुकसान इसी टीआरपी ने पहुंचाया। इसके स्वतंत्र विकास की भ्रूण हत्या कर दी।

बहरहाल एसपी सिंह अपने नए मुहावरे के साथ ताजगी के झोंके की तरह आए थे। उनके आजतक ने दूरदर्शन से अपनी शुरुआत की और आजतक का बेहतरीन दौर भी वही था। इस बीच ब्रेकिंग न्यूज आ गई। फिर ब्रेकिंग के नाम पर चैनलों की खबरें इतनी नीचे गिरीं कि गड्ढे भी शरमा गए। नरक के द्वार, स्वर्ग की सीढ़ियां, शैतान का महल और दाउद की योजना टाइप कार्यक्रमों ने कम पढ़े चालू रिपोर्टरों को भी स्टार बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। बस सेठजी की रखैल टाइप खबर ही आना बाकी रह गया था। सभी न्यूज चैनल स्थितियों से समझौता कर चुके थे। सब एक जैसे बन चुके थे क्योंकि या तो प्रयोग की गुंजाइश नहीं थी या फिर अनुमति। फिर भी बीच-बीच में प्रयोग करने के प्रयास चलते रहते थे जो अंततः कुछ हफ्तों में टीआरपी रिपोर्ट के आगे घुटने टेक देते थे। 

इन सबके बीच एक अजीब प्रयोग हुआ। यह प्रयोगशाला ई-टीवी की थी। प्रयोग किया पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ने। ई-टीवी ने अपनी समाचार प्रस्तुति का कलेवर और कंटेट दोनों बदल दिए। नीचे चलने वाली पट्टियों को इसका हथियार बनाया। चैनल में कंट्रोल रूम बनाया और हर कस्बे में खबर देने के लिए इंफार्मर रखे गए। चैनल ने अपनी पहचान सबसे पहले और सबसे ज्यादा खबर देने वाले चैनल की बना ली। चैनल खबरें सुनने और देखने की जगह खबरें पढ़ने वाला चैनल बन गया। यह एक अजीब प्रयोग है पर चैनल के तौर पर सफल प्रयोग है।

इस प्रयोग की आलोचना करने वाले कम नहीं हैं पर खबरों को ताजा अपडेट के लिए वो ही इसे लगातार देखने के लिए अभिशप्त भी हैं। हर सरकारी ऑफिस में, यहां तक कि न्यूज चैनलों के ऑफिसों में भी ई-टीवी एक एडिक्शन बन गया। तेज खबरों के लिए खड़ी की गई न्यूज एजेंसियां तो दूर तक इस लड़ाई में ही नहीं हैं। अब खबरों के लिए दिनभर पढ़े जाने वाले इस चैनल के प्रयोग को सफल कैसे न कहें। ये पत्रकारिता का नहीं बल्कि टीवी प्रस्तुतीकरण का नया मुहावरा है।

लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार धीरज कुलश्रेष्ठ के एफबी वॉल से 

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‘घी न्यूज़’ पर दलाल न्यूज़ एजेंट (डीएनए ) नामक भांड टाइप कार्यक्रम

कल रात ‘घी न्यूज़’ पर दलाल न्यूज़ एजेंट (डीएनए ) नामक भांड टाइप कार्यक्रम देख रहा था… घी टीवी का नामकरण संस्कार हमारे ज्येष्ठ भ्राता श्री Sheetal P Singh जी ने किया है… कार्यक्रम का एक सूत्रीय एजेंडा था दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलना चाहिए । इसके लिए घी टीवी पर दिए जा रहे तर्क निम्नलिखित हैं ।

1- अगर दिल्ली पूर्ण राज्य बन गया तो अरविन्द केजरीवाल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के घर का पानी बिजली काट देंगे ।

2- अगर दिल्ली पूर्ण राज्य बन गयी तो अरविन्द केजरीवाल यहाँ दूसरे राज्यों से आने वाले राज्यों के मंत्रियों विधायकों को गिरफ़्तार कर लेंगे ।

3- अगर दिल्ली पूर्ण राज्य बन गयी तो अरविन्द केजरीवाल यहाँ दूसरे राष्ट्रों से आने वाले प्रतिनिधियों के विमान दिल्ली में नहीं उतरने देंगे ।

4- अगर दिल्ली पूर्ण राज्य बन गयी तो अरविन्द केजरीवाल दिल्ली स्थित तमाम विदेशी दूतावासों के अधिकारीयों और कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लेंगे ।

5- अगर दिल्ली पूर्णराज्य का दर्जा हासिल कर लेती है तो अरविन्द केजरीवाल दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लेंगे।

आप निष्पक्ष होकर बताईये क्या इनमें से एक भी तर्क ऐसा है जो दिल्ली को पूर्णराज्य का दर्जा ना देने की बात को मजबूत करता हो। दरअसल अपनी राज्यसभा की सीट पक्की करने की जुगत में लगे घी न्यूज़ के मालिक बीजेपी के घोषणा पत्र में दिल्ली की अवाम से किये गए सबसे बड़े वादे को पूरा ना करने के लिए बहाने निकाल कर ला रहे हैं… लेकिन मैं हैरान इस बात को लेकर हूँ कि क्या बीजेपी में वैचारिक शून्यता इस हद तक बढ़ गयी है कि अपने चाटुकारों की बेवकूफियां भी नज़र आनी बंद हो गयी हैं।

अरे भाई अरविन्द केजरीवाल को समझ कर क्या रखा है ? भला क्यों अरविन्द राष्ट्रपति भवन और पीएम हाउस की बिजली पानी बंद करेंगे ? क्यों अरविन्द केजरीवाल दूसरे राज्यों के विधायकों और मंत्रियों को जेल भेज देंगे । कम से कम एक तर्क तो सही दे दिया होता भाई ।

खैर जयहिंद

शगुन त्यागी के एफबी वॉल से

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‘गांव कनेक्शन’ टीवी शो और अख़बार के लिए पत्रकारों की जरूरत

देश के उभरते ग्रामीण अख़बार ‘गांव कनेक्शन’ की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। आम आदमी की आवाज उठाने और गांव की बदलती कहानियों को लोगों के सामने लाने के लिए अख़बार ने अपने ढाई वर्ष के छोटे के कार्यकाल में पत्रकारिता के सर्वोच्च पुरस्कार रामनाथ गोयनका और दो लाडली मीडिया ऑवार्ड जीते हैं। हाल ही में जर्मन मीडिया हाउस ‘डायचे विले’ ने दुनियाभर से 4800 नामांकनों में से ‘गांव कनेक्शन’ की वेबसाइट (www.gaonconnection.com) को 14 अंतराष्ट्रीय प्रविष्टियों में चुना है। यह भारत से इस कैटेगरी में एक मात्र नामांकन है।

इसके साथ ही पिछले दिनों डीडी नेशनल पर प्रसारित हुए गांव कनेक्शन के टीवी शो (हमारा गांव कनेक्शन) ने अपनी शुरुआत में ही कई फिक्शन और नॉन फिक्शन शो को लोकप्रियता के मामले में पीछे छोड़ दिया था। ‘हमारा गांव कनेक्शन’ का सीजन-2 जल्द ही शुरू होने वाला है। इसके लिए पूरे देश से पत्रकार साथियों की जरूरत है। इच्छुक साथी tv@gaonconnection.com  और 08935000290 पर संपर्क करें।

गांव कनेक्शन अख़बार का अगला पड़ाव बिहार और झारखंड हैं। फिलहाल अख़बार ने ‘बिहार कनेक्शन’ का स्पेशल पेज ग्रामीण बिहार के लिए शुरू किया है, जिसके लिए भी हमें स्थानीय स्तर पर फ्रीलांस पत्रकारों की आवश्यकता है। फ्रीलांस पत्रकारों/ लेखकों और फोटो जर्नलिस्ट को उचित भत्ता दिया जाएगा। अगर आप भी गांवों में बसने वाली 70 फीसदी आबादी के लिए कुछ लिखना चाहते हैं तो हमें मेल करें।  information@gaonconnection.com  ड्रिस्ट्रीब्यूशन से जुड़ने के लिए distribution@gaonconnection.com  या 8935000285 पर संपर्क करें।

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केक पर लिख भेजा बॉस को इस्तीफा

एक युवा पत्रकार ने अपने बॉस को त्यागपत्र देने का सबसे मीठा तरीका अपनाया. अमेरिका के एरिजोना में स्थित कोल्ड टीवी के न्यूजकास्ट डायरेक्टर मार्क हरमन ने केक पर लिखे गए अपने इस मीठे से इस्तीफे की फोटो सोशल न्यूजसाइट रेडिट पर शेयर की.

हरमन ने बताया कि केक पर अपना इस्तीफा छापने के पीछे उनका मकसद यह था कि इस खबर से उनके बॉस और सहकर्मियों को दुख न हो. हरमन ने कहा, “मैं जानता था कि मेरे जाने से सब दुखी होंगे इस लिए मैने फैसला किया कि मैं केक के जरिए अपना त्यागपत्र दूंगा…बस इसलिए नहीं की केक को देखकर कोई दुखी नहीं होगा बल्कि इसलिए भी कि मैं थोड़ा जोकर किस्म का व्यक्ति हूं. केक के जरिए इस्तीफा देने का आइडिया काफी मजाकिया है.”

हरमन ने बताया कि उनकी बॉस इस अनोखे पत्र को देखकर चौंक गई… स्ट्रॉबेरी से भरा सफेद केक. न्यूज मीटिंग में उनकी बॉस ने सबके सामने हंसते हुए उनके इस फैसले की घोषणा की. हरमन के अनुसार सब ने खुशी-खुशी उन्हें विदा किया. “केक ने इस बुरी खबर को थोड़ा सा स्वादिष्ट बना दिया.” हरमन ने कहा

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें – 

A Newscast Director Quit By Printing His Resignation Letter On A Giant Cake

Resigning from a job can be tense, so Mark Herman, who loves his newscast director gig at KOLD-TV in Tucson, Arizona, wanted to sweeten up his three weeks’ notice letter.

The cake reads:

Dear Michelle,

Please accept this cake as formal (and delicious) notice of my resignation from the position of Newscast Director at KOLD News 13. My last day of employment will be Friday, May 22.

I will miss KOLD and all the incredible people I’ve been fortunate enough to work with over the last 4 years. I cannot thank you enough for all the opportunities and experience you have given me during my time here.

I appreciate your understanding and I wish you all the very best. If there’s anything I can do to help with the transition during my last few weeks here, please don’t hesitate to ask.

Sincerely,

Mark Herman

“I know a lot of people like working with me and they’d be sad to see me go,” the self-described office jokester told BuzzFeed News. “I figured cake would soften the blow.”

The 28-year-old posted a photo of the strawberry-filled work of art to Reddit after resigning on Friday.

The rice paper letter on the cake’s whipped-cream frosting followed a more traditional email resignation.

After four and a half years at KOLD-TV, Herman took a job at an ABC affiliate in Nashville, a bigger news market. But leaving his boss and co-workers is bittersweet.

“It’s definitely hard to leave a job that I love,” Herman said. “I didn’t want [the cake] to be anything malicious like a big screw you.”

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टेलीविजन से मुक्ति का मेरा एक दशक : पत्रकार के लिए भी नियमित टीवी देखना जरूरी नहीं!

वक्त के गुजरने की गति हैरान करती है! टीवी को घर से निकाले एक दशक पूरा हो गया! लेकिन लगता है कल की ही बात है। उस वक्त मैं अमर उजाला नोएडा में था, रात की ड्यूटी करके ढाई बजे रूम पर पहुँचता और बस फिर क्या, बिना कपड़े बदले कुर्सी पर पसर जाता और पौ फटने तक न्यूज़ चैनलों को अदालत बदलता रहता। वही एक जैसी बासी ख़बरें सब चैनलों पर देखता रहता। मेरी इस आदत के चलते पढ़ना लिखना एकदम रुक ही गया था। पूरा रूटीन डिस्टर्ब रहता। सुबह छह सात बजे सोता। 11-12 बजे उठता। नींद आधी अधूरी। शरीर की लय ताल बिगड़ी रहती। फिर सोने की कोशिश। लेकिन कोई फायदा नहीं। तब तक फिर ऑफिस जाने की तैयारी। सब कुछ गड़बड़। ऑफिस के अलावा मेरा अच्छा खासा वक्त टीवी देखने में जा रहा था। मेडिटेशन सिट्टिंग्स बंद हो चुकी थी। अब टीवी ध्यान दर्शन चल रहा था। एनएसडी की विजिट्स अब कम हो गई थी। वीकेंड मूवीज और आउटिंग भी बंद क्योंकि टीवी है ना! एलजी का यह नया गोल्डन आई अब मेरी आँखों में खटकने लगा था।

अंततः इस टीवी से मुक्ति पाने की ठानी। लेकिन ये इतना आसान नहीं था। एक दिन टीवी दर्शन ऊब की चरमावस्था में पहुँचने के बाद, इस बुद्धू बक्से को इसके डब्बे में पैक कर, सहारनपुर पैरेंट्स के पते पर पार्सल कर दिया! उस दिन यह कारनामा करने के बाद मैंने एक विजेता के भाव अपने भीतर मासूस किए थे। क्योंकि टीवी एक आदत बन चुका था और किसी भी आदत को काटना और अपना नियंत्रण हासिल करना एक युद्ध जीतने से कम नहीं है! तब से आजतक फिर मैंने कभी अपने रूम में टीवी की जरुरत महसूस नहीं की। हाँ कभी गांव जाता हूं तो यदा कदा फॉक्स ट्रैवलर देख लेता हूँ। सच मानिए टीवी से मुक्ति पाकर बतौर पत्रकार मुझे नुकसान नहीं फायदा ही हुआ।

टाइम मैनेजमेंट बढ़िया हुआ। पढ़ने लिखने सोचने विचारने के लिए अब मेरे पास ज्यादा वक्त था। मजेदार ये कि टीवी पर दौड़ने वाले घटनाक्रम को भी मैंने कभी मिस नहीं किया। इसका सीधा फंडा था। अगर कोई चैनल कुछ हटकर, उल्लेखनीय दिखाता है तो उसकी स्वतः ही इतनी चर्चा हो जाती है कि उस आइटम को देखने की जरूरत ही नहीं रहती। बाकि के लिए मैं जनसत्ता के साप्ताहिक स्तम्भ ‘अजदक’ और सन्डे एक्सप्रेस का ‘टेलिस्कोप’ नियमित देखता रहा हूं। इससे आपको पता चल जाता है कि इस सप्ताह किसकी बकबक बढ़िया या घटिया रही।

आज के दौर मैं सोशल मीडिया ने तो अब आपको और भी विकल्प दे दिए है। यूट्यूब, ट्विट्टर की लाइव स्ट्रीमिंग और फेसबुक पर टीवी दर्शक लिखते ही रहते हैं कि किसने क्या दिखाया। मुझे लगता है अगर टीवी न्यूज़ ने कुछ इनोवेटिव नहीं किया तो सोशल मीडिया और मोबाइल की जुगलबंदी पारंपरिक टीवी न्यूज़ को निगल लेगी! यह सब यहां लिखने का मकसद यही बताना है कि नियमित टीवी देखना और पत्रकारिता करना दोनों का आपस में बहुत ज्यादा सम्बन्ध नहीं है। इंटरनेट ऐज में टीवी न्यूज़ एक बासी खबर है! आप अपने वक्त का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं।

लेखक मुकेश यादव स्प्रिचुवल जर्नलिस्ट हैं. कई अखबारों में काम करने के बाद अब आजाद पत्रकारिता, घुमक्कड़ी और आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्होंने उपरोक्त विश्लेषण अपने ब्लाग पर लिखा है, वहीं से साभर लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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‘जनता टीवी’ ठेके पर लिया लेकिन तय समय पर पैसा न देने के कारण हो गए आउट!

हाल ही में एनसीआर के रीजनल चैनल जनता टीवी से नई टीम की छुट्टी। 2 महीने पहले ही बिका था चैनल लेकिन चैनल के पुराने मालिक को पैसे न देने और नए खरीददारों द्वारा पुराने स्टाफ को प्रताड़ित करने के चलते दिखाया बाहर का रास्ता। आज से लगभग 7 साल पहले टोटल टीवी से गुड़गांव शहर से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले एक शख्स को अब चैनल हेड बनने का शौक चढ़ा है। इन जनाब ने टोटल टीवी की पत्रकारिता छोड़ कर गुड़गांव में खबरें अभी तक न्यूज़ चैनल में मार्किटिंग हेड बन गए। लेकिन वहाँ इन जनाब की दाल ज्यादा दिन तक नहीं गली और इनके कारनामों का मनेजमेंट को पता चल गया तो इनको चलता कर दिया गया। फिर ये p7 न्यूज़ के रीजनल चैनल पर्ल हरियाणा को इन शर्तों पर सम्भालने लगे कि प्रदेश में चुनाव है, जिसमें ये मोटी विज्ञापन राशि लायेंगे। लेकिन चुनाव के बाद यहाँ पर भी हालात ठीक नहीं रहे और p7 बंद हो गया और जनाब घर आ गए।

इसी दौरान साहब जी ने एक कांग्रेसी नेता को सपने दिखाए और 2 महीने पहले ncr का जनता tv खरीद लिया। जनाब को एक बार फिर कुर्सी हासिल हो गई। लेकिन इनकी रंग दिखाने की पुरानी आदत गई नहीं थी। अभी चैनल के मालिक को भुगतान भी नहीं हुआ था की जनाब व उनके साथ आई टीम के सदस्यों ने न केवल सभी पदों पर अपने नए लोग बिठा दिए बल्कि पुराने स्टाफ को हद से ज्यादा तंग करना शुरू कर दिया। डील के मुताबिक ये तय हुआ था कि किसी भी पुराने स्टाफ को न तो निकाला जायेगा और न ही तंग किया जायेगा। हद तो तब हो गई जब फिक्की एडिटोरिम में जनता टीवी को एक संस्था की ओर से एनसीआर के बहतरीन चैनल का अवार्ड दिया गया तो जो नई टीम कुछ दिनों पहले ही आई थी वही उस अवार्ड को लेने पहुंची और वहाँ जमकर अपनी तारीफ भी की। इसके अलावा इस नई टीम ने अपनी ही बाइट इस अवार्ड की उपलब्धि पर चलानी शुरू कर दी। इस नई टीम ने अपने निशाने का शिकार पीसीआर, mcr और रन डाउन के अलावा सभी एंकर को भी बनाया।

जो पुराने एंकर थे उनको ऑफ़ लाईन करके इस टीम ने उन अपने नए लोगो को एंकर बना दिया जिन्हें एंकरिंग ठीक से आती नहीं. इस पूरे प्रकरण से पुराना स्टाफ पूरी तरह से तंग आ चुका था और उन्होंने इन सभी बातों की शिकायत अपने पुराने बॉस गुरविंदर से की। पुराने लोगों से बात करने के लिए लगभग 10 दिन पहले गुरविंदर ऑफिस के ही नजदीक एक रेस्टोरेंट में आये थे और सभी की समस्या सुनी। इसके बाद गुरविंदर ने सभी को 22 अप्रैल तक रुकने को कहा क्योंकि तय तारीख के अनुसार कांग्रेसी नेता से डील का पैसा उन्हें मिलना था। लेकिन 22 अप्रैल की रात तक जब पैसा गुरविंदर को नहीं मिला तो उसने नई टीम से बात की तो वो पैसा देने में आनाकानी करने लगी।

गुरविंदर भी मझे खिलाड़ी बन चुके हैं। बिना पैसा हाथ आए किसी बात पर भरोसा नहीं करते। उन्हें मीडिया का धंधा ठीक से पता है। कैसे किससे कब कहां पैसा निकाल लेना है, उन्हें अच्छी तरह से आता है। पैसे न मिलने पर गुरविंदर ने 23 अप्रैल से नई टीम पर पूर्ण रूप से ऑफिस आने पर बैन लगा दिया। जब इस बात की सूचना नई टीम के सभी लोगों को लगी तो उनके तो होश उड़ गए कि ये क्या हुआ और वो फिर 23 अप्रैल को अपने मालिक और कांग्रेसी नेता से मीटिंग करने पहुंचे। लेकिन वहाँ भी उनको निराशा ही हाथ लगी क्योंकि नेता जी ने कहा अब वो कुछ नहीं कर सकते। तो फिर इस टीम के इंचार्ज ने एक और दाव खेला और कहा कि ये नहीं तो कोई और चैनल खरीद लो ताकि उनको कोई दिक्कत ना आये। इसके बाद नेता जी ने उन्हें सप्ताह भर के लिये सोचने का समय माँगा है। अब ये पूरी टीम अपने आका के साथ फिर एक बार नए शिकार की तलाश में निकली है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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