हर उदय प्रकाश में एक सिंह छिपा हुआ है

विवेक सत्य मित्रम-

ऐसा है मित्रों! ये आर्यावर्त है। हर ‘उदय प्रकाश’ में एक ‘सिंह’ छुपा हुआ है। इसमें इतना हायतौबा क्यों? अगर तुम्हें ‘उदय प्रकाश’ के ‘उदय प्रकाश सिंह’ होने में दिक्कत नहीं नज़र आती, खाली उनकी दान-दक्षिणा से परेशानी है तो ये भी ‘डूअल कैरेक्टर’ ही है जिस पर तुम्हें ऐतराज़ है। वरना, जितना हक़ एक मुसलमान को मस्जिद के लिए चंदा देने का है, उतना ही एक हिंदू को मंदिर के लिए देने का।

वामपंथी विचारधारा होने से किसी की धार्मिक आस्था ख़त्म हो जाती है या फ़िर वो ‘कर्मकांडी’ नहीं रहता? माफ़ करना मैनेजर पांडे इसकी संदर्भ सहित व्याख्या कर चुके हैं। मैं ना तो मंदिर, ना ही मस्जिद, दोनों के लिए ही चंदा देने में यक़ीन नहीं रखता। पर हां, मुझे ना तो मंदिर से दिक्कत है, और ना मस्जिद से।

मानो या न मानो एकतरफ़ा प्रलाप और सेलेक्टिव विरोध या समर्थन की तुम्हारी दोहरी नीतियों की वज़ह से ही आज ये देश वहां खड़ा है जिसकी कल्पना नहीं हो सकती। आस्था और विचार दो अलग बातें हैं और इसके साथ ही लोकतंत्र में ‘फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन’ भी होता है। काहे लिए एक फ़ालतू मुद्दे को तूल दे रहे हो। शनिवार है आज, जाओ शनि महाराज को एक लीटर तेल चढ़ाओ और मौज करो। घूम फिर कर तुम भी वही हो, जिसका विरोध कर रहे हो।



 

भड़ास व्हाट्सअप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए क्लिक करें- BWG-1

भड़ास का ऐसे करें भला- Donate

भड़ास वाट्सएप नंबर- 7678515849



Leave a Reply

Your email address will not be published.

*

code