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सुख-दुख

जिन्होंने शुरू में भारतीय टेलिविजन को आकार दिया, उन बड़े नामों से एक ने अब विदायी ले ली है!

गिरिजेश वशिष्ठ-

जाने माने पत्रकार उमेश उपाध्याय नहीं रहे. 90 के दशक से हमारा संबंध था. तब वो ज़ी के जे 27 साउथ एक्सटेंशन वाले दफ्तर में काम किया करते थे. बेहतरीन डाकूमेन्ट्री उन्होंने वहां तैयार कीं. उन दिनों ज़ी का अलग से कोई न्यूज चैनल नहीं था एक बुलेटिन बनता था. रजतशर्मा उसका काम काज देखा करते थे. सिकंदर भसीन थे. निधि कुलपति थीं. विनोद कापड़ी और सुधीर चौधरी नौजवान पत्रकारों में थे. गौरी गुप्ता, राधिका कौल बत्रा भी उस टीम का अहम हिस्सा थीं. लेकिन उमेश जी से परिचय अलग था. बाकी तो शायद भूल भी गए होंगे मुझे.

उमेश उपाध्याय को मैंने बड़े बड़े प्रोडक्शन करते भी देखा. एंकरिंग करते भी देखा और बड़ी बड़ी जिम्मेदारियां संभालते भी देखा जिनमें रिलायंस ग्रुप भी शामिल है. इस सबके बावजूद वो हमेशा सरल थे. मेरा नाम बहुत कम लोग साफ बोलते थे उनमें से उमेश जी भी थे. हमेशा साफ कहने वाले कभी मैंने उन्हें लोगों को झूठे दिलासे देते नहीं सुना. मेरी दुनिया सिमटती जा रही है. पुराने लोग कम हो रहे हैं. ग्वालियर में पुरानी इमारतें भी खत्म हो रही हैं. मेरा स्कूल मेरा कालेज सब टूट गया है.

मोहल्ले के कई लोग चले गए जो नयी पीढ़ी है वो जानती है पर परिचय नहीं है. दिल्ली में पत्रकार जमात के पुराने लोग कम हो रहे हैं. नये लोगों से सहकर्मियों के छोड़ दें तो कभी कोई जुड़ाव नहीं बन सका. ये सब जानना

उदासी भरा है. उमेश जी से एक कारण जुड़ाव का और भी था. उनके पिता और मेरे पिता का पहनावा. तिलक और डील डौल एक जैसा था.

मेरे पिता बचपन में ही चले गए थे लेकिन उनके पिता की तस्वीरें. अचकल पहनना और तिलक लगाना वैसा ही था. उमेश जी के भांजे भी मेरे साथ आजतक में काम करते थे. उनसे भी कई बार उमेश जी के पिता जी के बारे में बात हुई. मैंने अक्सर जिक्र किया कि मेरे ज्यादातर मित्र और परिचित संघ की विचारधारा के नज़दीक सोच वाले हैं. उमेश जी भी उनमें से थे. व्यक्तिगत रूप से उनका जाना मेरे लिये हानि है. जिन्होंने शुरू में भारतीय टेलिविजन को आकार दिया उन बड़े नामों से एक ने अब विदायी ले ली है. उन्होंने संपूर्ण जीवन जिया लेकिन उम्र जाने की नहीं थी. अपनी बौद्धिक क्षमताओं के ज़रिये कम से कम तीस साल और वो येगदान दे सकते थे.

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