महेश शर्मा-
यूपी नौ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अर्द्ध वार्षिक परीक्षा की तरह देखा जा रहा है तो वहीं यह चुनाव सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के लिए लिटमस टेस्ट है। कौन खरा उतरता है, यह शनिवार को चुनाव नतीजा बता देगा। यह चुनाव मुख्यमंत्री की राजनीति पर कमोबेश असर डाल सकते हैं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया एलायंस (सपा-कांग्रेस) की शानदार जीत का मोमेंटम क्या अखिलेश यादव बरकार रख पाए हैं?
भले ही इस चुनाव में जीत का असर सत्ता और विपक्ष पर खास नहीं पड़ने वाला दिखता है लेकिन दोनों दलों में इसकी गंभीरता कुछ संकेत करती है। यदि विपक्ष की जीत होती है तो 2027 के विधानसभा चुनाव में इसे परिवर्तन के संकेत कहा जा सकता है और भाजपा के पक्ष में रिजल्ट गया तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बहुत लोकप्रिय नेता के रूप में उभरेंगे। आदित्यनाथ ने 13 चुनावी रैलियों को संबोधित किया और दो रोड शो किए। जिसमें एक सीसामऊ क्षेत्र में किया। इतने बड़े राज्य में सिर्फ़ नौ विधानसभा सीटों के लिए योगी का यह असामान्य प्रयास कहा गया।
पिछले किसी भी उपचुनाव को लेकर इतनी बहस-मुबाहिस नहीं रही जितनी इस चुनाव की है। चूल्हा, चौपाल और चौराहा तक उपचुनाव चर्चा में रहा। ऊपर से सत्तादल की गंभीरता और उसके हावभाव कुछ ऐसा ही बयान करते हैं। इस लिहाज से उपचुनाव दोनों योगी और अखिलेश दोनों नेताओं के लिए नाक का सवाल बन गया है। लोकसभा में खराब प्रदर्शन का ठीकरा मोदी-शाह की जोड़ी पर फोड़ने की बात कही गयी।
खुद योगी ने रणनीतियों पर सवाल उठाए। शायद इसीलिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने योगी को खुलकर बल्लेबाजी करने का मौका देकर उनकी कड़ी परीक्षा ली है। वो बात दीगर की प्रत्याशी उनके पसंद के नहीं दिए गए। रिजल्ट भाजपा के पक्ष में रहा तो उनके (योगी) भविष्य की राह पुख्ता करेगा। लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा के दूसरे नंबर की पार्टी होने का दर्द भाजपा नेतृत्व को अभी भी साल रहा है।
भाजपा में गृहमंत्री अमित शाह कैंप में इस बात को लेकर हमेशा खदबदाहट हमेशा रही है कि योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक उत्तराधिकारी न बनने दिया जाए। रोड़े पर रोड़े अटकाए जाते रहे। आरएसएस की हालिया बैठक में योगी और संघ प्रमुख मोहन भागवत की लंबी बैठक में यूपी की राजनीति को लेकर चर्चा को लेकर अटकलों का बाजार गरम है। योगी को संघ का समर्थन तब खुलकर आ गया जब अधिकृत प्रेसमीट में संघ के प्रवक्ता ने बटोगे तो कटोगे के नारे पर सहमति की मुहर लगा दी। कहते हैं कि उन पर केंद्रीय नेतृत्व की लटकती तलवार से जब तब संघ ही बचाता रहा।
इसके साथ ही उपचुनाव को योगी के बंटेंगे तो कटेंगे नारे के प्रभाव की भी परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। जिन 10 सीटों उपचुनाव (मिल्कीपुर छोड़ दें तो 9 सीटें) की बात करें तो भाजपा को तीन और उसके सहयोगी दलों को दो सीटें मिली थी। सपा ने पांच जीती थी। उपचुनाव के प्रचार में योगी लगभग दो दौरे सभी सीटों पर किए।
कानपुर की सीसामऊ में वह चार बार आए। दो बार अधिसूचना से ठीक पहले। उन्होंने क्षेत्र की लालइमली मिल भी चलाने का वादा कर दिया। इसकी बंदी का निर्णय नीती आयोग ने लिया था। भाजपा के लोग ही बताते हैं कि कार्यकर्ताओं से वह यह भी कह गए थे कि जब रामपुर जीत सकते हैं तो सीसामऊ क्यों नहीं? इस दौरान वह महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव की करीब 11 सभाओं में बटोंगे तो कटोगे का नारा बुलंद कर आए।
भले ही मोदी ने बाद में एक रहेंगे नेक रहेंगे सेफ रहेंगे का नारा देकर सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ पार्टी के जाने का संकेत दिया हो। पर योगी के तरकश से तीर निकल चुका था। महाराष्ट्र और झारखंड में भी करीब एक-एक दर्जन सभाओं में हिंदुओं के ध्रुवीकरण तरफ भाजपा की राजनीति के बढ़ने का संकेत दिया।
महेश शर्मा कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं.


