श्रद्धांजलि : अरविन्द उप्रेती ने एक सीख तब दी थी और एक आज दी

Sanjaya Kumar Singh : अरविन्द उप्रेती जनसत्ता के अपने साथी थे। आज अचानक चले गए। उनकी मस्ती का जवाब नहीं। आराम से गुटखा खाते, काम करना और खाने–पीने के जुगाड़ में लगे रहना। इससे ज्यादा की उनकी चिन्ता या परेशानी कभी मालूम नहीं हुई। जनसत्ता की बुरी स्थिति में जब पेज भरने के लिए खबरों का अकाल सा होता था और खबरें बनाने वाले साथी न के बराबर होते थे तब भी उन्हें कभी परेशान नहीं देखा। आराम से आना और आराम से जाना। मन हुआ तो आए नहीं तो छुट्टी। ड्यूटी जो हो सो हो। बहुत पुरानी बात है। आरके पुरम में रहते थे और घर बदलना था। हमलोगों से कहा कि यार कल घर बदलना है। सुबह आ जाओ थोड़ी मदद करना और मटन खाया जाएगा। अगले दिन मैं साथी Sanjay Sinha के साथ पहुंच गया। उस समय की गृहस्थी में ज्यादा सामान तो नहीं था पर दो कमरे का घर था तो समान कम भी नहीं था। लेकिन अरविन्द भाई बगैर किसी तनाव के मिले। कोई पैकिंग नहीं थी कोई तैयारी नहीं।

स्व. अरविंद उप्रेती

हमलोग पहुंचे तभी सोकर उठे थे। रात की ड्यूटी की थी। हमारी चिन्ता घर बदलने के बाद मटन और फिर दफ्तर जाने की थी। पर वो निश्चिन्त थे। अकेले तो थे ही। मेटाडोर (गाड़ी) वाला आया, किसी तरह पैकिंग हुई और घर बदल गया। सामान शिफ्ट करने के दौरान अरविन्द भाई के घर में कई बंडल अखबार के ऐसे बरामद हुए जो खोले ही नहीं गए थे। उस समय हम पत्रकारों को अखबार के पैसे नहीं, अखबार ही भिजवाए जाते थे ताकि हम उन पैसों से कोई और काम नहीं करें और पढ़-लिखकर (काम करने के लिए) टाइट रहें। लेकिन अरविन्द भाई जो एडिशन बनाकर आते थे उसे खोलकर देखते भी नहीं थे। दूसरे अखबार पढ़ना और देखना तो दूर। हमलोगों ने खूब शोर मचाया लेकिन उनपर कोई असर नहीं। ना कोई शिकायत।

उस दिन घर बदलने के बाद अपने वादे के अनुकूल उन्होंने खुद मटन बनाकर खिलाया। लाजवाब। आज भी उसका स्वाद और उससे ज्यादा, बनाने में उनका लगन याद है। बैगर तैयारी के आराम से घर बदलकर, मटन खिलाकर हमलोगों को समय से ऑफिस के लिए रवाना कर दिया। इसके बाद से कितने ही घर बदले, कितने लोगों का घर बदलने में साथ दिया पर खाने के मामले में कोई ऐसा निश्चित नहीं रहा। सबने खाने की व्यवस्था की हुई थी। खुद किसी ने बनाया हो याद नहीं है। पत्नी वालों ने या किसी की पत्नी ने भी। ये कीर्तिमान अरविन्द भाई के नाम ही है।

बहुत पुरानी बात है अरविन्द भाई को पता चला कि मेरे चाचा फौज में हैं तो उन्होंने शराब का जुगाड़ करने देने का पहला और आखिरी निवेदन किया। मैंने बंदोबस्त कर दिया। चाचा से मैंने शराब ली तो मेरे सास-ससुर साथ थे और शादी के कुछ ही दिन हुए थे। पता नहीं इस बारे में उनलोगों ने क्या सोचा पर मुझे बाद में खटका हुआ और मैंने मन ही मन तय किया कि यह लेना-देना नहीं करूंगा। यह अरविन्द भाई से मुझे मिली पहली सीख थी और उनकी अपनी तरह की आखिरी सेवा। हालांकि, अरविन्द जी के पीने को लेकर मैं अक्सर उनसे कहना चाहता रहा कि संभल कर और जितना आप पीते हैं, उसके लिए जरूरी है कि नियमित जांच आदि कराते रहें। उनसे यह सब कहना उनके व्यवहार के इतना प्रतिकूल था कि मैं चाहकर और कई बार कोशिश करके भी कह नहीं पाया।

लगता था उनका जवाब पता है तो क्या कहना। आज इस तरह उनके अचानक चले जाने की खबर सुनकर दूसरी सीख मिली कि अगर किसी के बारे में ऐसा सोचा था तो कहना भी जरूर चाहिए। मुझे नहीं पता अरविन्द भाई इतनी जल्दी क्यों चले गए। पर शराब पीने वाले दूसरे करीबी जिस उम्र में गए हैं उससे तो लग रहा है कि वे समय से गए। गलती मेरी रही कि मैंने उन्हें रोकने की कोई कोशिश नहीं की। अरविन्द भाई के निधन पर अब अफसोस ही किया जा सकता है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और परिवार को यह दुख सहने की शक्ति। (फोटो Ambrish Kumar के सौजन्य से)

वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने अनुवादक संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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