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उत्तराखंड

उत्तराखंड के कई पत्रकार करोड़पति जबकि कई पत्रकार भूख से जूझ रहे; संपत्ति खुलासे और जांच की मांग

गुणानंद जखमोला-

यह कैसी पत्रकारिता? ये कैसे पत्रकार?

  • माल बटोरो और फिर अपने को विक्टिम घोषित कर दो
  • पत्रकारों की संपत्ति की भी हो जांच, कैसे बने धनवान?

उत्तराखंड में पत्रकारिता दम तोड़ रही है। ईमानदार पत्रकार भुखमरी के शिकार हैं और कुछ पत्रकार देखते ही देखते करोड़पति बन गये। उनके देहरादून में शानदार घर हैं, एसयूवी कारें हैं और ब्रांडेड कपड़े हैं। जबकि उनका संस्थान उन्हें कितना वेतन देता है, यदि पता किया जाए तो मुश्किल से दर्जन भर पत्रकार होंगे जो लाख रुपये तक सेलरी पाते हैं।

कई संस्थान तो दो से तीन महीने में एक बार सेलरी दे रहे हैं। इसके बावजूद उन पत्रकारों की मौज है। टेंशन ही नहीं है कि घर-बार कैसे चलेगा? बच्चों की फीस कहां से देंगे?

दरअसल, कुछ पत्रकारों के लिए उत्तराखंड हैवन है। वो यहां के नेताओं और नौकरशाहों की कमजोर नस को जानते हैं। पहले उनसे संबंध बनाते हैं, फिर उन संबंधों को कैश कराते हैं। इसके बावजूद यदि उनकी मनमर्जी नहीं हुई तो कमजोर नस को जोर से दबा देते हैं। यदि कोई लीगल नोटिस या एफआईआर हो गयी तो ऐसे साबित करते हैं कि दुनिया के सबसे ईमानदार पत्रकार हैं और सिस्टम से पीड़ित हैं।

वहीं, दूसरी ओर बड़ी संख्या में ऐसे पत्रकार हैं जो ईमानदार हैं और वेतन न मिलने पर उनका तनाव दोगुना हो जाता है कि घर कैसे चलेगा? बच्चों की फीस कहां से देंगे? हाल में कुछ ऐसे पत्रकारों को भी जाना तो बेहद दुखी हो गया कि उनके इलाज के लिए भी घर में पैसे नहीं थे। कई पत्रकार असमय ही काल के ग्रास बन गये तो उनके बैंक एकाउंट में 1000 रुपये भी नहीं थे।

मैं कई पत्रकारों को देखता हूं कि उनके आलीशान घर और शाही ठाट-बाट तो सोच में पड़ जाता हूं कि यह दौलत कहां से आई? कोई तो ऐसा पैमाना हो कि पत्रकारों को भी लोक सेवा नियमावली के तर्ज पर हर साल अपनी संपत्ति घोषित करनी पड़े। यह भी होना चाहिए कि पत्रकारों की संपत्ति की जांच हो कि आखिर उनके ये शाही ठाट-बाट कहां से आए? लाइजिनिंग से या ब्लैकमेलिंग से। ऐसे पत्रकार चिन्हित होने चाहिए।

प्रदेश में पत्रकार और मीडिया संस्थानों की जो लूट-खसोट है वह रुकनी चाहिए।

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