विक्रांत यादव-
विजय सिंह जूनियर नहीं रहे. आज सुबह मेदांता गुड़गांव में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया. काफी सीनियर होने के बावजूद बनारस की पत्रकारिता में विजय जूनियर के नाम से मशहूर थे.
दैनिक जागरण में हम लोग लम्बे समय तक साथ काम किये. कुछ समय पहले वो रिटायर हुए थे. और बाऊजी के सम्बोधन के साथ मुस्कुराते हुए मिलना. सभी को अपनी बातों से हँसाते रहना विजय की पहचान थी.
विजय का जाना बहुत दुःखद है. भगवान उनकी आत्मा को शांति दे.
आनंद कुमार-
वरिष्ठ पत्रकार व दैनिक जागरण के पूर्व ब्यूरो चीफ विजय सिंह जूनियर का निधन
पत्रकारिता जगत के लिए आज का दिन अत्यंत दुःखद और अपूरणीय क्षति लेकर आया है। मऊ जनपद में दैनिक जागरण के पूर्व में ब्यूरो चीफ रहे तथा जनपद चन्दौली में भी दैनिक जागरण की ज़िम्मेदारी को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाने वाले वरिष्ठ पत्रकार विजय सिंह जूनियर का इलाज के दौरान निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पत्रकारिता जगत ही नहीं, बल्कि पूरा समाज शोकाकुल है।
विजय सिंह जूनियर अपने निष्पक्ष, निर्भीक और जनहितकारी लेखन के लिए जाने जाते थे। उन्होंने हमेशा सच को सामने लाने का साहस दिखाया और समाज की आवाज़ को मजबूती से उठाया। उनका जीवन पत्रकारिता के मूल्यों, ईमानदारी और सामाजिक सरोकारों को समर्पित रहा, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
उनका जाना न केवल पत्रकारिता के लिए बल्कि समाज के लिए भी एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें एवं शोक संतप्त परिवार को इस असीम दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
विनम्र श्रद्धांजलि।
धर्मेंद्र सिंह-
हमारे प्रिय साथी पत्रकार विजय सिंह जूनियर नहीं रहे। विक्रांत जी से सूचना मिली तो स्तब्ध रह गया। मन व्यथित हो गया। ओह !!! ऐसी सूचना जो विश्वास करने वाली नहीं। पर। विधाता के विधान को कौन जानता है।
दैनिक जागरण परिवार में वर्ष 2001 का दौर। संपाकीय सहयोगी रहे। इसी संस्थान में एक विजय सिंह फोटोग्राफर थे। संभवत: आशीष बागची दादा ने टाइटल बदल दी। जूसरे विजय को जूनियर शब्द दे दिया। अपराध जगत की रिपोर्टिंग में जूनियर एक ब्रांड बन गए। खाकी वर्दी संभलकर दोस्ती रखती। लेकिन जूनियर की जादूगरी में कौन लपटा जाए, पता नहीं।
जूनियर से बहुत प्यार था। मिलना जुलना भले कम हो गया था, पर आत्मीय दूरी जरा भी कम नहीं। अलग स्टाइल का आदमी। मोटर कार का बेहद शौकीन, उतना ही कपडों का शौक।
कहीं भी दिख जाए। बस एक संबोधन। “ बाऊजी” समझ जाइए। जूनियर की आवाज है।
बेहद उत्साही व्यक्तित्व। दफ्तर में कंम्प्यूटर पर समाचार छापते, एक एक शब्दों से सबको हंसाते रहना। डाक एडिशन के लिए दो एक समाचार पाठक जी, पांडेय जी को भेज निकल जाते खाने खिलाने के जुगाड में। रात दस- ग्यारह बजे , फिर हाजिर तो भोर तक। बीच बीच में हिमांशु भैया के लिए सनीमा का जुगाड कर देना तो बाकी की पसंद का भी उतना ही ख्याल रखना।
चौबे जी ने लिखावट की गलती पकड ली तो उन्हें खुश करने को सेवादार पॉल से टोस्ट चाय का आडर फरमा देना। इतना जीवंत कि..
चड्ढा जी आ गए सूट पहनकर। जूनियर की त्वरित टिप्पणी। हॉ तो। तीन सौ में बढिया मिल गया। कोई जान नहीं पाएगा। अबे! इतना हजार खरच हुआ है। सबको बताने की जरुरत क्या। दृफ्तर ठहाके गूंज गया। आ गए सैलून से। अच्छा तो बना बनाया लिए या.. हा… हा..
बहुत जल्दी चल दिए जूनियर। गला रुंध रहा। ….।


