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उत्तर प्रदेश

यूपी पुलिस की बेईमानी को इलाहाबाद हाईकोर्ट के विद्वान जज विनोद दिवाकर जी ने कुछ यूँ पकड़ा!

यशवंत सिंह-

यह तस्वीर आज की ही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के बाहर अचानक सत्येंद्र कुमार जी से मुलाकात हुई। गोरखपुर वाले जुझारू खोजी पत्रकार सत्येंद्र कुमार। पता चला कि वह भी किसी कोर्ट-कचहरी के काम से इलाहाबाद हाई कोर्ट आए हुए हैं। मैं उस समय कोर्ट में प्रवेश का पास बनवा रहा था। मेरे साथ मेरे वकील, एडवोकेट रमेश यादव जी भी थे। इस मौके पर हमने एक सेल्फी ली, ताकि इस कोर्ट यात्रा को यादगार बनाया जा सके।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित जगह है। कोर्ट की कार्यवाही देखना सीखने का अवसर होता है। न्याय प्रणाली को करीब से समझने का मौका भी देता है। यह मेरे जीवन का पहला अवसर था, जब मैं हाई कोर्ट के भीतर गया था। आज मेरा भी केस था। जब मैं कोर्ट के भीतर गया और अदालत नंबर 78 में पहुंचा, तो वहां बहुत देर तक प्रोसिडिंग देखता रहा।

हाई कोर्ट के कक्ष संख्या 78 में कुछ बेहद दिलचस्प केस सामने आए। वहां के न्यायाधीश, विनोद दिवाकर जी, एक बहुत ही समझदार और विद्वान जज लगे। उन्होंने एक ऐसा मामला हैंडल किया, जो काफी रोचक था। इस मामले में पुलिस की अमानवीय प्रवृत्ति छवि स्पष्ट रूप से सामने आई।

पुलिस ने एक ट्रैक्टर चालक को गैंगस्टर घोषित कर दिया। आश्चर्यजनक बात यह कि उस चालक के पास एक इंच जमीन भी नहीं थी, और जिस ट्रैक्टर को वह चला रहा था, उसके मालिक को उसी के गैंग का सदस्य दिखा दिया। इस विरोधाभास पर जज ने टिप्पणी की, “अगर ये गैंगस्टर ट्रैक्टर चला रहा है, तो बाकी गैंगस्टर क्या कर रहे होंगे?”

जज की इस टिप्पणी को सुनकर कोर्टरूम में बैठे लोग हंस पड़े। यह टिप्पणी न केवल इस मामले की असंगतियों को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि निर्दोष लोगों को अपराधी बनाने के लिए पुलिस के लोग क्या क्या खेल करते हैं।

यह मामला न केवल कानूनी प्रक्रिया की विसंगस्तियों को उजागर करता है, बल्कि कोर्टरूम में हास्य की स्थिति भी पैदा करता है। जज की यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी कि “अगर ये गैंगस्टर ट्रैक्टर चला रहा है, तो बाकी गैंगस्टर क्या कर रहे होंगे,” एक गहरे सवाल को दर्शाता है। यह बताता है कि कभी-कभी कानून की गलत व्याख्या या तथ्यों के अभाव में निर्दोष व्यक्ति को भी अपराधी बना दिया जाता है।

इस तरह की घटनाएं न्यायपालिका की भूमिका और सतर्कता की महत्ता को रेखांकित करती हैं। जज की टिप्पणी ने न केवल कोर्टरूम का माहौल हल्का किया, बल्कि इस बात पर भी ध्यान खींचा कि मामले की गहन जांच और तथ्यों की सटीकता कितनी जरूरी है। और ये भी कि सिर्फ कानून बना देने से काम नहीं चलता है, कानून के रखवालों की मंशा भी ईमानदार होनी चाहिए।

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