Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

आवाजाही

विश्ववार्ता अखबार में भगदड़ : गोलेश स्वामी, राजीव, बागीश समेत दर्जन भर लोगों ने गुडबॉय बोला

लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक विश्ववार्ता में भगदड़ मच गई है। लॉकडाउन में इस अखबार के रीलांच होने से पत्रकारों में उत्साह था। कई बड़े नामों ने ज्वाइन भी किया था जिनमें गोलेश स्वामी, बागीश धर द्विवेदी, शोभित मिश्रा, राजीव तिवारी बाबा आदि प्रमुख है। डेस्क पर और लोकल स्तर पर कई युवा पत्रकार शामिल हुए।

मैनेजमेंट के सैलरी के मामले में ढुलमुल रवैए को भांप कर राजीव तिवारी बाबा एक माह के भीतर ही अपने निजी कार्य का बहाना मार निकल लिए थे। बाद में बाबा की ये आशंका सही साबित हुई। दो तीन महीने तक की सैलरी रुकने लगी। बाद में मांगने पर थोड़ा थोड़ा चुग्गे की तरह दाना चुगाया जाने लगा। मैनेजमेंट के इस रवैए से दुखी होकर राजीव तिवारी के बाद पद्माकर पांडे भी मौका देखकर अपने काम का बहाना कर निकल गये।

बागीशधर द्विवेदी और शोभित मिश्रा ने दफ्तर जाना बन्द कर दिया। मैनेजमेंट के बार बार बुलाने पर हफ्ता दस दिन में एकाध बार आफिस चले जाते हैं, वो भी सिर्फ मुंह दिखाने और तगादा करने।

इस बीच खबर है ब्यूरो प्रमुख से एसोसियेट एडिटर के रूप में प्रोन्नत गोलेश स्वामी ने भी मैनेजमेंट के रवैए से आजिज होकर विश्ववार्ता छोड़ दिया है। उन्हें ब्यूरो प्रमुख से एसोसियेट एडीटर बनाना भी मैनेजमेंट द्वारा उन्हें किसी तरह रोके रखने की कवायद थी। गोलेश स्वामी ने हालात खराब देख अखबार को अलविदा कहना ही बेहतर समझा।

समय पर सैलरी न मिलने और मिलने पर भी तय सैलरी से कम मिलने से क्षुब्ध करीब एक दर्जन लोग विश्ववार्ता छोड़ चुके हैं। कई और बकाया सैलरी मिलने तक ही रुके हुए हैं।

सूत्रों के मुताबिक अशोक पांडेय और जगदीश जोशी जैसे बड़े नामों ने आशीष वाजपेई को लुभावने सपने दिखाकर उसका पैसा रीलांच में फंसवा दिये हैं। योजना थी कि लाकडाउन का फायदा उठा कर काफी कम पैसे में पत्रकारों को रख कर अख़बार तान दिया जाएगा। लेकिन तामझाम के दिखावे में आवश्यकता से अधिक लोगों को रख लिया गया।

कोरोना काल में जब स्थापित बड़े बैनर छंटनी और अखबारों में पन्ने कम कर रहे थे तब विश्ववार्ता जैसे जुगाड़ू बैनर बीस पन्ने का अखबार निकाल रहे थे और कम पैसे में ही सही लेकिन लोगों को भर रहे थे। इतना ही नहीं एक पाक्षिक मैगजीन और दो दो यू ट्यूब चैनल भी चलाने लगे। नतीजा यही कि आवश्यकता से अधिक दिखावे के चक्कर में सैलरी संकट हो गया और अब अखबार भी रोजाना प्रिंट होने पर संकट मंडराने लगा है।

वैसे कहा ये भी जा रहा है कि अशोक पांडेय जहां जहां गए हैं, वहां वहां की लुटिया डुबोने का ही काम किया है. मीठी मीठी बातों में फंसाकर दूसरों के पैसे बर्बाद करना उनका प्रिय शगल है. इस प्रक्रिया में वह खुद का पैसा काफी बना चुके होते हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन