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आयोजन

भोपाल से चलकर मॉरीशस में संपन्न हुआ साहित्य और कला-संस्कृति का उत्सव ‘विश्वरंग’, पढ़िए ओम थानवी की रिपोर्ट

ओम थानवी-

साहित्य और कला-संस्कृति के उत्सव “विश्वरंग” का सिलसिला भोपाल से शुरू हुआ था। इस बार का अनुष्ठान मॉरीशस में संपन्न हुआ। भोपाल के विश्वरंगों में शामिल होता रहा हूँ। मॉरीशस एक बार फिर जाना हुआ। वहाँ हिंदी का विश्व सचिवालय है, जो भारत और मॉरीशस के आपसी सहयोग से चलता है। भारत ने सचिवालय को शानदार इमारत बनवा कर दी है। मॉरीशस के सत्तर प्रतिशत बाशिंदे भारत-मूल के हैं।

आयोजन में पचास देशों के कोई डेढ़ सौ संभागी जमा हुए। क़रीब सौ भारत से थे। आयोजन की परिकल्पना रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय से रही है, जिसे विश्वरंग सचिवालय, भोपाल और विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस ने अंजाम दिया। वहाँ का महात्मा गांधी संस्थान भी साथ रहा। ख़ास बात यह रही कि मॉरीशस के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपप्रधानमंत्री और संस्कृति मंत्री सहज भाव से शामिल हुए और बोले।

जैसा कि विश्वरंग के निदेशक और टैगोर विश्वविद्यालय के संस्थापक चांसलर संतोष चौबे ने उद्घाटन के समय कहा, साहित्य-संस्कृति जीवन को बदलते हैं। लेकिन इस ओर अधिक उद्यम देखने में नहीं आते।

इतने बड़े पैमाने पर दूसरा आयोजन विश्व हिंदी सम्मेलन ही ठहरता है, जो विदेश मंत्रालय के ख़र्च पर होता है। उसमें भी शामिल होता रहा हूँ। पर विश्वरंग के व्यापक कलेवर में साहित्य के साथ रंगकर्म, सिनेमा, मीडिया, शिक्षण और तकनीकी विकास आदि अनेक पहलू आ जुड़ते हैं।

तीन सभागारों — प्रेमचंद, अभिमन्यु अनत और वनमाली के नाम से सज्जित — में समान्तर चले सत्रों में इन सब को समेटा गया। न चाहते हुए भी कोई न कोई सत्र हर किसी का छूटा होगा। मैं भी जब कविता पाठ सुन रहा था, अंत में अरुण कमल बोलने को हुए तो विश्वपटल पर हिंदी और संचार माध्यमों पर हमारे सत्र का बुलावा आ गया, जिसकी मुझे ही अध्यक्षता करनी थी।

अच्छा लगा कि अभिमन्यु अनत की स्मृति को इस आयोजन में, उचित ही, तवज्जोह दी गई। जितेंद्र श्रीवास्तव ने शिद्दत से उनके रचना संसार को याद किया। अनत मॉरीशस के गिरमिटिया वंशज थे, पर आत्मा भारत में बसती थी। दिल्ली में मेरे बेटे मिहिर और ऋचा के वैवाहिक समारोह में आशीर्वाद देने पहुँचे थे।

आयोजन के बंदोबस्त देखने को मॉरीशस में भोपाल से टैगोर विवि की फ़ौज मौजूद थी। सब का नहीं तो प्रो. संगीता जौहरी, अरविंद चतुर्वेदी, महीप निगम, जवाहर कर्नावट और संजय राठौड़ का कृतज्ञ उल्लेख मुझे करना चाहिए। लीलाधर मंडलोई और मुकेश वर्मा तो हर ‘विश्वरंग’ की छाया हैं ही।

चार दिन के प्रवास में नए मित्र बने। विभिन्न देशों में हिंदी पढ़ाने और मीडिया के काम में सक्रिय लोगों से मिलना हुआ। संगोष्ठियों में जितनी चर्चा सभागारों में होती है, उससे कहीं ज़्यादा बाहर। लोग सागर-तट पर भी बतियाते मिले। अखिलेश (तद्भव वाले) ने मौन साधा। अच्छा लगा जब नंदकिशोर आचार्य और प्रियदर्शन ने अज्ञेय की ‘सागर मुद्रा’ की पंक्तियाँ स्मरण कीं।

अनेक उम्रदराज़ लेखकों को मॉरीशस के धवल सागर-तट पर मंडराते देख आलोचक मित्र अच्युतानंद मिश्र के मुँह से बरबस क्या ख़ूब निकला — Old Men and the Sea!

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