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मजीठिया न देना पड़े इसलिए कर्मियों पर वीआरएस का दबाव बना रहा लोकमत

महाराष्ट्र का नंबर वन अखबार कहलाने वाला लोकमत मजीठिया वेतन आयोग की पूरी राशि कर्मचारियों को न देने के लिए हर पैंतरा अपनाने की कोशिश कर रहा है. परमानेंट स्टाफ को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए 100 से ज्यादा कर्मचारियों की सूची तैयार की गई है. बता दें कि लोकमत ने अपने कर्मचारियों को अब तक मजीठिया का आंशिक भुगतान ही किया है.

महाराष्ट्र का नंबर वन अखबार कहलाने वाला लोकमत मजीठिया वेतन आयोग की पूरी राशि कर्मचारियों को न देने के लिए हर पैंतरा अपनाने की कोशिश कर रहा है. परमानेंट स्टाफ को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए 100 से ज्यादा कर्मचारियों की सूची तैयार की गई है. बता दें कि लोकमत ने अपने कर्मचारियों को अब तक मजीठिया का आंशिक भुगतान ही किया है.

करीब साढ़े तीन साल पहले लोकमत ने नागपुर में अपने कर्मचारी यूनियन के सदस्यों को अनुशासनहीनता और गैरकानूनी तरीके से हड़ताल करने के आरोपों के साथ बाहर कर दिया गया था. कोर्ट में लंबी लड़ाई के बाद अपनी हार होती देख प्रबंधन ने अब आरोप वापस ले लिए हैं. यूनियन के सदस्यों की वापसी के मद्देनजर प्रबंधन पर कर्मचारियों को पूरा मजीठिया देने और साथ ही ग्रेडेशन से जुड़े एक और कोर्ट केस के अंतिम पड़ाव पर पहुंच जाने के बाद उसका पैसा भी कर्मचारियों को देने का दबाव बढ़ रहा है.

कर्मचारियों के हक की मोटी रकम उन्हें देने से बचने के लिए प्रबंधन ने कुछ स्थाई कर्मचारियों पर वीआरएस के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है. पूरे ग्रुप में ऐसे दर्जनों कर्मचारी उनके निशाने पर हैं. नागपुर यूनिट में ऐसे करीब 10-15 कर्मचारियों (जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं) को यूनिट हेड नीलेश सिंह ने अपने कक्ष में बुलाकार उनपर वीआरएस लेने का दबाव डाला. उन्होंने बची हुई नौकरी का 30 से 40 फीसदी वेतन लेकर नौकरी छोड़ने को कहा. कर्मचारियों द्वारा इनकार किए जाने पर उन्हें लातूर, पूना, जलगांव आदि शहरों में ट्रांसफर करने का भी डर दिखाया.

बता दें कि ‘लोकमत’ खुद अपने नागपुर संस्करण का सर्कुलेशन 3 लाख (मराठी) और 1 लाख (हिंदी, लोकमत समाचार) बताता है. इस प्रसार संख्या के मुताबिक उसके ग्रेडेशन का काफी ज्यादा पैसा नागपुर के कर्मचारियों को मिलना है.

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