कर्मचारियों के द्वेषपूर्ण तबादला मामले में कोर्ट ने दैनिक भास्कर प्रबंधन को फटकारा

ट्रांसफर पर यथास्थिति आदेश के बावजूद कंपनी ने अप्रैल से बैठा दिया था घर… कोर्ट ने कहा- जब तक केस का फैसला नहीं हो जाता, कर्मचारियों को होशंगाबाद में ही पूर्ववत करने दें काम, अप्रैल से अब तक का पूरा वेतन भी दें तत्काल… मजीठिया रिकवरी केस की सुनवाई के दौरान द्वेषपूर्ण तरीके से रायपुर स्थानांतरित किए गए तीन कर्मचारियों के मामले में लेबर कोर्ट ने दैनिक भास्कर को कड़ी फटकार लगाई है। कर्मचारियों को मई से अब तक का पूरा वेतन देने और फैसला होने तक होशंगाबाद में ही कार्य करवाए जाने का आदेश कोर्ट ने दिया है। मामले में कर्मचारियों ने बिना विलंब किए जबलपुर हाईकोर्ट में कैवियट भी फाइल कर दी है। अब यदि भास्कर ने लेबर कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील भी की तो कर्मचारियों का पक्ष सुने बिना भास्कर को कोर्ट से किसी प्रकार की अंतरिम राहत नहीं मिलेगी।

होशंगाबाद से एक बार फिर दैनिक भास्कर प्रबंधन के होश उड़ा देने वाली खबर आई है। मजीठिया वेजबोर्ड की रिकवरी केस लगाने पर यहां के तीन कर्मचारियों प्रणय मालवीय, नरेंद्र कुमार और वीरेंद्र सिंह को भास्कर प्रबंधन ने द्वेषपूर्वक रायपुर स्थानांतरित कर दिया था जिस पर लेबर कोर्ट ने रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए थे। चूंकि इन कर्मचारियों ने कोर्ट में शिकायत की हुई थी इसलिए रायपुर जाइन नहीं किया, वहीं भास्कर प्रबंधन ने एकतरफा रिलीव कर दिया और कोर्ट आदेश के बावजूद होशंगाबाद में जाइन नहीं करने दिया।

इसके बाद प्रबंधन ने कर्मचारियों को आर्थिक रुप से प्रताड़ित करने के लिए काम नहीं तो वेतन नहीं सिद्धांत की आड़ लेकर मई से वेतन रोक लिया जिसे कर्मचारियों के अधिवक्ता श्री महेश शर्मा द्वारा कोर्ट के समक्ष दमदारी से उठाया गया। इसपर कोर्ट ने भास्कर प्रबंधन द्वारा कोर्ट आदेश की मनमानी व्याख्या पर प्रबंधन को कड़ी फटकार लगाते हुए आदेश दिया कि जब तक केस का फैसला नहीं हो जाता कर्मचारियों से होशंगाबाद में ही कार्य करवाया जाए। साथ ही तीनों कर्मचारियों को मई से रोके गए पूरे वेतन का भुगतान करने का भी आदेश दिया। मामले में जल्द फैसला हो इसके लिए कोर्ट ने अगली सुनवाई 15 दिसंबर को ही तय की है।

उधर, इस आदेश से भास्कर प्रबंधन उबर भी नहीं पाया था और कर्मचारियों ने स्टे और वेतन के मामले में ताबड़तोड़ तैयारी कर सोमवार को ही जबलपुर हाईकोर्ट में कैवियट भी फाइल कर दी ताकि भास्कर मैनेजमेंट इस मामले में कोई एकतरफा अंतरिम राहत न ले ले। इतनी जल्दी दो-दो बड़े झटके से दैनिक भास्कर प्रबंधन सकते में है। मामले में भास्कर की गलती स्पष्ट उजागर हो रही है इसलिए इस बात की संभावना कम ही है कि उसे हाई कोर्ट से कोई स्टे मिले; यदि ऐसा हुआ तो अगली सुनवाई से पहले भास्कर को इन तीनों कर्मचारियों को बकाया सैलरी देने के साथ ही होशंगाबाद में ही पूर्ववत कार्य पर रखना होगा अन्यथा प्रबंधन पर लेबर कोर्ट की अवमानना का भी मामला बन जाएगा।

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले में ‘हिंदुस्तान’ अखबार को क्लीनचिट देने वाली शालिनी प्रसाद की झूठी रिपोर्ट देखें

यूपी में अखिलेश यादव सरकार के दौरान श्रम विभाग ने झूठी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दी है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एचटी मीडिया और एचएमवीएल कंपनी यूपी में अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान’ की सभी यूनिटों में मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करके सभी कर्मचारियों को इसका लाभ देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह अनुपालन कर रही है. श्रम विभाग की यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद ने 06 जून 2016 को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में अखबार मालिकों के विरुद्ध विचाराधीन अवमानना याचिका संख्या- 411/2014 में सुनवाई के दौरान शपथपत्र के साथ दाखिल की है.

इसके मुताबिक यूपी में सिर्फ हिन्दुस्तान अख़बार ने ही मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कर न्यायालय के आदेश का अनुपालन किया है. रिपोर्ट में बताया गयाहै कि यूपी में हिन्दुस्तान की कुल दस यूनिटें हैं जिनमें 955 कर्मचारी हैं. रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दुस्तान लखनऊ में 159, मेरठ में 75, मुरादाबाद में 68, गोरखपुर में 51, अलीगढ़ में 48, बरेली में 82, नोएडा में 224, वाराणसी में 84, इलाहाबाद में 47, कानपुर में 117 कर्मचारी हैं. यानि कुल मिलाकर 955 कर्मचारियों को हिन्दुस्तान अखबार मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से लाभान्वित कर रहा है. रिपोर्ट नीचे दिया जा रहा है. पढ़ने के लिए संबंधित स्क्रीनशाट पर क्लिक करें दें…











पूरे मामले को समझने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें :

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सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार का झूठा हलफनामा, कहा- हिंदुस्तान की दसों यूनिटों में मजीठिया लागू है

देश के अन्य राज्यों में भले ही प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतनमान और एरियर न मिल रहा हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में एचटी मीडिया कंपनी का अखबार ‘हिन्दुस्तान’ अपनी सभी यूनिटों में मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करके सभी कर्मचारियों को इसका लाभ देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह अनुपालन कर रहा है। भले ही यह खबर मीडिया जगत के लिए चौंकाने वाली हो, हकीकत इससे परे है, मगर उत्तर प्रदेश में तत्कालीन अखिलेश सरकार के समय बनी श्रम विभाग की रिपोर्ट तो यही दर्शा रही है।

श्रम विभाग की यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद ने 06 जून 2016 को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में अखबार मालिकों के विरुद्ध विचाराधीन अवमानना याचिका संख्या- 411/2014 में सुनवाई के दौरान शपथपत्र के साथ दाखिल की है, जिसके मुताबिक यूपी में सिर्फ हिन्दुस्तान अख़बार ने ही मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कर न्यायालय के आदेश का अनुपालन किया है।

उत्तर प्रदेश में हिन्दुस्तान की कुल दस यूनिटें हैं, जिनमें 955 कर्मचारी होना दर्शाया गया है। शासन की रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दुस्तान लखनऊ में 159, मेरठ में 75, मुरादाबाद में 68, गोरखपुर में 51, अलीगढ़ में 48, बरेली में 82, नोएडा में 224, वाराणसी में 84, इलाहाबाद में 47, कानपुर में 117 यानि कुल मिलाकर 955 कर्मचारियों को हिन्दुस्तान अखबार मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से लाभान्वित कर रहा है।

आइए जानते हैं, श्रम विभाग के रीजनल कार्यालय  के किस अधिकारी ने हिन्दुस्तान की किस यूनिट में कब जाकर जाँच-पड़ताल करके स्टेट्स रिपोर्ट तैयार की। वर्ष 2015 में 15 सितम्बर को डॉ. हरीशचंद्र ने लखनऊ, 17 सितम्बर को रामवीर गौतम ने मेरठ, 20 अगस्त को बी.पी. सिंह ने मुरादाबाद, 20 अगस्त को अमित प्रकाश सिंह ने गोरखपुर, 30 दिसंबर को एस.पी. मौर्या व एस.आर. पटेल ने अलीगढ़, 17 सितम्बर को राधेश्याम सिंह, बालेश्वर सिंह व ऊषा वाजपेयी की टीम ने नोएडा, 21 सितम्बर को आर.एल. स्वर्णकार ने वाराणसी, 04 जुलाई को एस.एन. यादव, आर.के . पाठक और अन्य तीन अधिकारियों की टीम ने इलाहाबाद, 13 अगस्त को सहायक श्रमायुक्त रवि श्रीवास्तव ने कानपुर यूनिट में जाकर पड़ताल की।

यूपी की तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद की ओर से कोर्ट में दाखिल स्टेट्स रिपोर्ट के मुताबिक यूपी के मुजफ्फरनगर का अखबार शाह टाइम्स अपने 22 और लखनऊ में इंडियन एक्सप्रेस अपने सात कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दे रहा है। रिपोर्ट में यहां तक कहा गया कि शाह टाइम्स ने अपने सभी कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक बकाया एरियर का भी भुगतान कर दिया है। अमर उजाला ने आंशिक लागू कर बकाया एरियर 48 समान किस्तों में देने का कर्मचारियों से समझौता कर लिया है। दैनिक जागरण ने 20जे के तहत वेज बोर्ड उनके संस्थान पर लागू न होना बताया।

उत्तर प्रदेश में मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर शासन की सर्वाधिक चौंकाने वाली स्टेट्स रिपोर्ट हिन्दुस्तान समाचार पत्र की है। यही वजह है कि हिन्दुस्तान प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर निश्चिंत नजर आ रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश का श्रम विभाग उनको पहले ही क्लीन चिट दे चुका है, वह यदि परेशान है, तो उन कर्मचारियों को लेकर है, जिन्होंने हाल ही में श्रम विभाग में मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतनमान और बकाया एरियर न मिलने का क्लेम ठोंक कर हिन्दुस्तान प्रबंधन की आरसी जारी करा दी हैं। हिन्दुस्तान के खिलाफ आगरा से 11 और बरेली से 3 आरसी कटने के बाद से प्रबंधन की चूलें हिली हुई हैं। बरेली में एक और आरसी कटने के कगार पर है। इसके अलावा लखनऊ के 16 कर्मचारी भी ताल ठोकर हिन्दुस्तान प्रबंधन के खिलाफ मैदान में कूद पड़े हैं।

इन आरसी के कटने से जहां एक और श्रम विभाग की हिन्दुस्तान के पक्ष में कोर्ट में दाखिल स्टेट्स रिपोर्ट झूठी साबित हो रही है, वहीं हिन्दुस्तान प्रबंधन को यदि इन क्लेमकर्ताओं को पैसा देना पड़ा, तो अन्य कर्मचारियों में जबरदस्त असंतोष फैलेगा। उस गंभीर स्थिति से निपटना प्रबंधन के लिए बेहद मुश्किल भरा होगा।

तत्कालीन श्रमायुक्त की स्टेट्स रिपोर्ट वायरल होते ही हिन्दुस्तान में अभी भी मजीठिया का लाभ मिलने की आस में नौकरी कर रहे कर्मचारियों में अब अंदर ही अंदर असंतोष बढ़ रहा है। इस खुलासे के बाद अब उनकी यह आस भी खत्म होने लगी है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने पर हिन्दुस्तान प्रबंधन उनको मजीठिया का कोई लाभ देगा।

क्या योगी सरकार करेगी कार्रवाई :

उत्तर प्रदेश में श्रम विभाग के रीजनल कार्यालय के जिन अफसरों ने हिन्दुस्तान में मजीठिया वेज बोर्ड लागू होने की स्टेट्स रिपोर्ट श्रमायुक्त को सौंपी, क्या उनको खरीदा गया? अगर नहीं तो इस तरह की रिपोर्ट बनाने का उन पर किसका दबाव था, यह जांच की विषय है। हालांकि सभी दसों यूनिटों की एक जैसी ही रिपोर्ट इस बात का संकेत है कि हिन्दुस्तान के बारे में ऐसी ही रिपोर्ट मांगी गई। हिन्दुस्तान प्रबंधन ने किसको धनलक्ष्मी से मैनेज किया? तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद ने किस वजह से इतना बड़ा महाझूठ देश की सर्वोच्च अदालत में शपथ पत्र देकर बोलना पड़ा? हालांकि उस समय की तत्कालीन सरकार के मुखिया अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव की हिन्दुस्तान अखबार के समूह संपादक शशि शेखर और लखनऊ के प्रादेशिक संपादक केके उपाध्याय से नजदीकियां और गलबहियां भी किसी से छिपी नहीं है।

ये भी संभव है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव में मदद देने के नाम पर मुलायम-अखिलेश की शशि शेखर और केके उपाध्याय से डील हुई हो? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब उत्तर प्रदेश की मौजूदा योगी आदित्यनाथ सरकार ही कोई उच्चस्तरीय जांच बैठाकर तलाश सकती है। अगर ऐसा होता है तो अखबार मालिकों के हाथों की कठपुतली बने श्रम विभाग का बदनुमा चेहरा उजागर हो जाएगा। उधर, केंद्र की मोदी सरकार के ऊर्जा मंत्रालय में तैनात अतिरिक्त सचिव शालिनी प्रसाद की भी मुश्किलें बढ़ जाएंगी।हालाँकि हिंदुस्तान के समूह संपादक शशिशेखर और लखनऊ के संपादक केके उपाध्याय जब से योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली है, तभी से उनकी गणेश परिक्रमा कर सैटिंग में लगे हुए हैं।

कल भड़ास पर अपलोड होगी मजीठिया मामले में उत्तरप्रदेश श्रम विभाग की शर्मनाक स्टेट्स रिपोर्ट. पढ़ते रहिए भड़ास.

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मजीठिया न देना पड़े इसलिए कर्मियों पर वीआरएस का दबाव बना रहा लोकमत

महाराष्ट्र का नंबर वन अखबार कहलाने वाला लोकमत मजीठिया वेतन आयोग की पूरी राशि कर्मचारियों को न देने के लिए हर पैंतरा अपनाने की कोशिश कर रहा है. परमानेंट स्टाफ को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए 100 से ज्यादा कर्मचारियों की सूची तैयार की गई है. बता दें कि लोकमत ने अपने कर्मचारियों को अब तक मजीठिया का आंशिक भुगतान ही किया है.

करीब साढ़े तीन साल पहले लोकमत ने नागपुर में अपने कर्मचारी यूनियन के सदस्यों को अनुशासनहीनता और गैरकानूनी तरीके से हड़ताल करने के आरोपों के साथ बाहर कर दिया गया था. कोर्ट में लंबी लड़ाई के बाद अपनी हार होती देख प्रबंधन ने अब आरोप वापस ले लिए हैं. यूनियन के सदस्यों की वापसी के मद्देनजर प्रबंधन पर कर्मचारियों को पूरा मजीठिया देने और साथ ही ग्रेडेशन से जुड़े एक और कोर्ट केस के अंतिम पड़ाव पर पहुंच जाने के बाद उसका पैसा भी कर्मचारियों को देने का दबाव बढ़ रहा है.

कर्मचारियों के हक की मोटी रकम उन्हें देने से बचने के लिए प्रबंधन ने कुछ स्थाई कर्मचारियों पर वीआरएस के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है. पूरे ग्रुप में ऐसे दर्जनों कर्मचारी उनके निशाने पर हैं. नागपुर यूनिट में ऐसे करीब 10-15 कर्मचारियों (जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं) को यूनिट हेड नीलेश सिंह ने अपने कक्ष में बुलाकार उनपर वीआरएस लेने का दबाव डाला. उन्होंने बची हुई नौकरी का 30 से 40 फीसदी वेतन लेकर नौकरी छोड़ने को कहा. कर्मचारियों द्वारा इनकार किए जाने पर उन्हें लातूर, पूना, जलगांव आदि शहरों में ट्रांसफर करने का भी डर दिखाया.

बता दें कि ‘लोकमत’ खुद अपने नागपुर संस्करण का सर्कुलेशन 3 लाख (मराठी) और 1 लाख (हिंदी, लोकमत समाचार) बताता है. इस प्रसार संख्या के मुताबिक उसके ग्रेडेशन का काफी ज्यादा पैसा नागपुर के कर्मचारियों को मिलना है.

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शेम शेम दैनिक जागरण! मजीठिया मांगने पर संकट से घिरे वरिष्ठ पत्रकार का जम्मू कर दिया तबादला

दैनिक जागरण बिहार का अमानवीय शोषणकारी चेहरा…दैनिक जागरण के वरिष्ठ एवं ईमानदार पत्रकार पंकज कुमार का मजीठिया के अनुसार वेतन मांगने पर जम्मू किया तबादला…. वीआरएस लेने  के लिए जागरण प्रबंधन बना रहा है दबाव… बिहार के गया जिले में दैनिक जागरण के पत्रकार पंकज कुमार अपनी बेख़ौफ़ एवं निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. ये दैनिक जागरण के बिहार संस्करण के स्थापना काल से उससे जुड़े हुए हैं.

इनको स्वास्थ्य संबंधी समस्या के कारण 2004 में पेस मेकर लगा था जिसे वर्ष 2016 में बदलकर पुन: अधिक शक्तिशाली पेसमेकर लगवाना पड़ा था. उसी वर्ष अक्तूबर 2016 में इनका पोस्ट्रेट का आपरेशन भी पटना में हुआ. अपनी गंभीर बीमारी एंव स्वास्थ के कारण इन्होंने माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के आलोक में मजीठिया वेतन आयोग की मांग दैनिक जागरण प्रबन्धक से कर दिया. इसके बाद दैनिक जागरण प्रबन्धक ने शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक रूप से परेशान करना शुरू कर दिया. पोस्ट्रेट ग्रिड के आपरेशन के दौरान ही पंकज कुमार को डायपर और लुंगी पहनकर कार्यालय आने के लिए बाध्य किया गया. इनके वेतन से पहले 14 दिन फिर एक बार 7 दिन की कटौती भी दैनिक जागरण ने कर ली जबकि इनका 92 दिन का उपार्जित अवकाश देय था.

पंकज कुमार ने गया में दैनिक जागरण को एक विश्वसनीयता प्रदान की थी. वर्ष 2003 के नवम्बर माह में राष्ट्रीय राजमार्ग के उप महाप्रबंधक इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे की हत्या ने सनसनी फैला दी थी. जहां सभी अखबार इस हत्या का कारण सत्येन्द्र दुबे द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय में भ्रष्टाचार संबंधी की गई शिकायत बता रहे थे वहीँ पंकज कुमार ने इस हत्या का कारण बिहार में गिरती हुई कानून व्यवस्था को जिम्मेवार मानते हुए सड़क लुटेरों द्वारा इस घटना को अंजाम देना बताया था. सीबीआई की जांच में भी यही सामने आया था.

क्रूर एवं अमानवीय दैनिक जागरण प्रबन्धक ने इस तरह के पत्रकार को भी नहीं बख्शा और मुख्य महाप्रबंधक आनन्द त्रिपाठी ने मजीठिया आयोग के अनुसार वेतन की मांग पर नाराजगी जताते हुए दो माह का वेतन लेकर स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने को कहा दिया तथा इनकार करने पर जम्मू जैसे दुर्गम इलाके में एक बीमार पत्रकार को तत्काल प्रभाव से जाने का फरमान जारी कर दिया. जनता की आवाज होने का दावा करने वाले ये अखबार खुद अपने ही कर्मचारियों का गला हक़ के लिए आवाज उठाने पर घोटने से बाज नहीं आते हैं.  पंकज कुमार ने भी संकल्प ले लिया है कानूनी सबक सिखाने का. उन्होंने पटना के लेबर कोर्ट तथा माननीय उच्च न्यायालय में भी मुकदमा दायर किया है.

अफ़सोस कि राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी शिद्दत के साथ शोषक अखबारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं. मजीठिया वेतन आयोग लागू होने के बाद से अब तक दस हजार से ज्यादा पत्रकारों की नौकरी अखबार प्रबन्धक खा चुके हैं. आज अगर पत्रकार हार गए तो बची खुची पत्रकारिता की भी मौत हो जायेगी.

मीडियाकर्मियों के लिए ये दो लाइनें बहुत प्रासंगिक हो गई हैं….

निकले सड़क पर जनता, बताये शोषक प्रबंधकों को उनकी औकात.
माना कि अन्धेरा घना है पर मशाल जलाए रखना कहाँ मना है?

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : ह्वाट्सएप 9999330099

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बरेली में डीएलसी ने पूरी की मजीठिया क्लेम की सुनवाई, फैसला सुरक्षित

बरेली से बड़ी खबर आ रही है। बरेली के श्रम न्यायालय में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतनमान और एरियर के दाखिल हिंदुस्तान के तीन कर्मचारियों के क्लेम पर शनिवार को उपश्रमायुक्त ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया है। उपश्रमायुक्त ने हिंदुस्तान प्रबंधन को अब और समय देने से दो टूक इंकार कर दिया।

क्लेमकर्ता निर्मल कान्त शुक्ला, पंकज मिश्रा व् मनोज शर्मा ने डीएलसी से कहा कि प्रबंधन का हर तिथि पर जवाब में डेढ़ किलो रद्दी का टोकरा लेकर खड़ा हो जाना और सुनवाई के लिए 15 दिन बाद की डेट मांगना, अब बंद होना चाहिए। प्रबंधन अपना जवाब पिछली तिथि पर दे चुका है। उसने हमको वर्किंग जर्नलिस्ट न मानकर मैनेजर बताया है। इसलिए मजीठिया का पात्र न होना बता चुका है। उसका क्लेमकर्ता दस्तावेजीय साक्ष्य दाखिल कर चुका है। अब हर तिथि को प्रबंधन जवाब का पुलिंदा लेकर आता रहेगा और क्लेमकर्ता से उस पर प्रतिजवाब चाहता रहेगा, तो ये सिर्फ मामले को लंबा खीचने और उपश्रमायुक्त का समय बर्बाद करने का कुत्सित प्रयास है। ये सिलसिला आज और यही रुकना चाहिए। दोनों पक्षों का जवाब आ चुका है। अब हिंदुस्तान बरेली के यूनिट हेड के विरुद्ध आरसी जारी कर क्लेम का भुगतान दिया जाय।

डीएलसी रोशन लाल ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुये प्रबंधन की ओर से आये बरेली हिन्दुस्तान के एचआर हेड सतेंद्र अवस्थी से दो टूक कहा कि वह आरसी काटने जा रहे है, पांच मिनट में केस फाइल पर अपना कथन लिखा दो। प्रबंधन को और सुनवाई का मौका ना देते हुए डीएलसी ने शनिवार को मामले की सुनवाई पूरी घोषित कर आदेश सुरक्षित कर लिया।

बता दें कि 7 सितंबर को यूपी के श्रमायुक्त को मजीठिया के अनुसार वेतन न मिलने की बरेली हिंदुस्तान से चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा की अगुवाई में सीनियर सब एडिटर रवि श्रीवास्तव, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला, चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, पेजिनेटर अजय कौशिक ने शिकायत भेजी थी।

श्रमायुक्त ने बरेली डीएलसी को प्रकरण निस्तारित करने का आदेश दिया, जिस पर डीएलसी बरेली सुनवाई कर रहे हैं। 17 मार्च को सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा के 33,35,623 रुपये, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला के 32,51,135 रुपये, चीफ रिपोर्टर डॉ. पंकज मिश्रा के 25,64,976 रुपये के मजीठिया वेज बोर्ड के वेतनमान के अनुसार एरियर का क्लेम दाखिल किया था। सुनवाई के दौरान मौजूद हिंदुस्तान के राजेश्वर विश्वकर्मा के मामले में डीएलसी ने सोमवार 27 मार्च को हिंदुस्तान प्रबंधन को नोटिस जारी करने की बात कही है।

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लोकसभा में फिर उठी मजीठिया की मांग, अबकी RSP के प्रेमचंद्रन ने उजागर किया पत्रकारों का दर्द

देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियों का दर्द अब संसद सदस्यों को भी समझ में आने लगा है। कल दूसरे दिन भी लोकसभा में पत्रकारों के वेतन, एरियर और प्रमोशन से जुड़ा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का मामला उठा। इससे पहले मंगलवार को झारखंड के कोडरमा से सांसद डॉ रविन्द्र कुमार राय ने पत्रकारों को मिलने वाले वेतन व सुविधाओं का मामला उठाते हुए मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की मांग लोकसभा में की थी।

गुरुवार को लोकसभा में सभी पत्रकार और गैर पत्रकार समाचार-पत्र कर्मियों के लिए मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें तत्काल प्रभाव से लागू किए जाने तथा मीडिया संस्थानों में बड़े पैमाने पर पत्रकारों की हो रही छंटनी को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए जाने की मांग उठाई गई।

अबकी रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के केएनके प्रेमचंद्रन ने शून्यकाल के दौरान सदन में यह मामला उठाया। उन्होंने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है लेकिन आज उसकी ही हालत खराब होती जा रही है। कई साल होने को आया है लेकिन फिर भी कई समाचार पत्र और मीडिया संस्थान मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू करने को तैयार नहीं हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि 1955 में बने वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के तहत पत्रकारों के वेतनमान की हर पांच साल में एक बार समीक्षा करने का प्रावधान किया गया था लेकिन उसे धता बता दिया गया और अब मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू करने से भी मीडिया संस्थान गुरेज कर रहे हैं। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर रहे लोगों का जिक्र करते हुए कहा कि वर्किंग जर्नलिस्ट कानून जब बना था तब देश में इलेक्ट्रानिक मीडिया नहीं था, ऐसे में इस क्षेत्र के लोगों को भी इस कानून में दायरे में लाने की व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रेमचंद्रन ने मीडिया कंपनियों में मनमाने तरीके से पत्रकारों की छंटनी का मामला भी उठाया और कहा कि इसके कारण पत्रकारों के लिए नौकरी की सुरक्षा खत्म होने लगी है। उन्होंने कहा कि वह सरकार से अनुरोध करते हैं कि इस चलन को रोकने के लिए सख्त कानून बनाया जाए और पत्रकारों की नौकरी सुरक्षित की जाए। आपको बता दें कि बुधवार को राज्य सभा में भी जदयू नेता शरद यादव ने मजीठिया वेतन आयोग को लागू ना करना तथा मालिकों की मनमानी का मुद्दा उठाया था। इसके बाद देश भर के पत्रकारों में खुशी की लहर है वहीं मालिकों के खेमे में बेचैनी देखी जा रही है।

डा. रविंद्र कुमार राय ने क्या बोला, वीडियो देखें : https://www.youtube.com/watch?v=sDCC-OeVLLI

शरद यादव ने क्या बोला, वीडियो देखें : https://www.youtube.com/watch?v=L_cGrOGKhWY

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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संसद में दहाड़े शरद यादव- ‘पत्रकारिता छोड़ बाकी सभी धंधा कर रहे मीडिया मालिक, लागू हो मजीठिया वेज बोर्ड’ (देखें वीडियो)

शरद यादव ने राज्यसभा में बोलते हुए पत्रकारिता को राह से भटक जाने का मुद्दा उठाया…. इसके लिए मडिया मालिकों पर जमकर भड़ास निकाली….

नई दिल्ली : राह से भटकी पत्रकारिता पर लंबे अरसे बाद संसद में बहस हुई। वो भी जदयू के पूर्व अध्यक्ष व सांसद शरद यादव की पहल पर। उन्होंने बुधवार को राज्यसभा में देश में पत्रकारिता के नाम पर चल रहे गोरखधंधे पर आवाज मुखर की। कहा कि मौजूदा भाजपा सरकार में मीडिया मालिक गुलामी कर रहे हैं। जो पत्रकार सरकार के खिलाफ लिखने का साहस कर रहा है तो उसे नौकरी से ही निकाल दिया जा रहा। चौथा खंभे पर पहरा बैठा दिया गया है। पत्रकारिता इमजरेंसी का सामना कर रही है।

धंधा कर रहे हैं मीडिया मालिक
शरद यादव राज्यसभा में पूरी रौ में दिखे। बोले कि आज मीडिया के मालिक मूल पेशा पत्रकारिता छोड़कर बाकी सारे धंधे कर रहे हैं। अब वे शुद्ध बिजनेसमैन बन गए हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों के पेशे को दूषित करने का काम हो रहा है। सरकारों से सांठगांठ कर जमीनें खरीदकर उद्योगपति बन रहे हैं। जुगाड़ का आलम यह है कि वे यहां राज्यसभा में घुस जा रहे हैं। बड़ी बुरी स्थिति है।

लागू हो मजीठिया कमेटी की रिपोर्ट
शरद यादव ने इस दौरान पत्रकारों के वेतनमान को लेकर गठित मजीठिया कमेटी की सिफारिशों को भी अमलीजामा पहनाने की मांग की। कहा कि मीडिया मालिक आम पत्रकारों का शोषण कर रहे हैं, लिहाजा सिफारिशें लागू होनी चाहिए।

पूरा भाषण सुनने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://youtu.be/L_cGrOGKhWY

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लोेकसभा और राज्यसभा में उठी मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने की मांग (देखें वीडियो)

देश भर के अखबार मालिकों द्वारा अपने कर्मचारियों का किए जा रहा शोषण और मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने की मांग आज संसद में उठी। २४ घंटे के अंदर मीडियाकर्मियों के साथ अन्याय और वेज बोर्ड न लागू कर मीडिया मालिकों द्वारा की जा रही मनमानी का मसला राज्यसभा और लोकसभा दोनों जगहों में उठाया गया। बुधवार को राज्यसभा में जहां जाने माने नेता जदयू के शरद यादव ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश अभी तक लागू ना किए जाने का सवाल जोरशोर से उठाया वहीं मंगलवार को कोडरमा के सांसद डाक्टर रविंद्र कुमार राय ने इस मुद्दे को लोकसभा में जमकर उठाया।

अखबार मालिकों की मनमानी का मुद्दा राज्य सभा में दूसरे नेताओं ने भी उठाया और वे अखबार मालिकों पर जमकर बिफरे। चुनाव सुधार पर उच्च सदन में हुयी अल्पकालिक चर्चा में भाग लेते हुए जदयू के शरद यादव ने मीडिया में सुधारों की वकालत की और कहा कि अगर मीडिया पर पूंजीपतियों का नियंत्रण हो जाएगा तो इससे लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा। शरद यादव ने कहा कि पत्रकारों को ठेके पर रखा जा रहा है। उन्होंने मांग की कि समाचार पत्रों के लिए मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू किया जाना चाहिए। यादव ने कहा कि उन्होंने खुद ही पेड न्यूज की आयोग से शिकायत की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि लोगों को सही खबरें नहीं मिल रही हैं। पत्रकार ईमानदार हैं लेकिन वे अपने मालिकों के कारण सही खबरें नहीं लिख पाते। उन्होंने कहा कि अब पूंजीपति मीडिया घरानों के मालिक हैं। उन्होंने कहा कि इस विषय पर विस्तार से चर्चा किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि पत्रकार जो लोकहित के संदेशों का प्रमुख वाहक और प्रहरी होता था, वह पूंजीपतियों के मीडिया में बढ़ते वर्चस्व के कारण ठेके पर रखे जाते हैं और हायर एंड फायर के खतरे से जूझते हैं। उन्होंने कहा कि आज मीडिया को आम जनता से काट दिया गया है।

शरद यादव का पूरा भाषण सुनने के लिए नीचे क्लिक करें : 

https://www.youtube.com/watch?v=L_cGrOGKhWY

उधर कोडरमा के सांसद डॉ रविंद्र कुमार राय ने मंगलवार को लोकसभा में नियमावली 377 के अंतर्गत पत्रकारों को मिलने वाले वेतन और सुविधाओं का मामला उठाया। उन्होंने कहा कि पत्रकार लोकतंत्र में अपनी बड़ी भूमिका निभाते हैं, कुछ पत्रकारों को जीवन यापन करने लायक वेतन भी नहीं मिलता। देश में पत्रकारों के वेतन व सुविधाओं में वृद्वि हेतु जस्टिस जी आर मजीठिया वेज बोर्ड का गठन किया गया था। बोर्ड ने सभी तथ्यों को देखकर अपनी सिफारिशे सरकार को दी और 11 नवम्बर 2011 को अधिसूचित कर दिया गया।

बड़े खेद का विषय है कि आज तक भी अखबार मालिको द्वारा पत्रकारो को उनका हक नही दिया जा रहा है, इस तरह की अवमानना के कई मामले माननीय सर्वोच्य न्यायालय में विचाराधीन है । डॉ रविंद्र कुमार राय ने सरकार से अनुरोध किया कि देश के सभी पत्रकारो को मजीठिया बोर्ड की सिफारिशो अनुसार सुविधाएं तत्काल दी जाए और मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशे न मामने वालो के विरूद्व कार्यवाही की जाए ताकि पत्रकारो को उनका हक मिल सकें।  उन्होंने कहा की माननीय मोदी जी के नेतृत्व में चल रही सरकार में हर वर्ग की चिंता हुई है, पत्रकारों के साथ अनदेखी न की जाये।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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मजीठिया क्रांतिकारी मनोज शर्मा की कविता- …होठों को सी कर जीने से तो मरना ही अच्छा है!

मनोज शर्मा हिंदुस्तान बरेली के वरिष्ठ पत्रकार हैं. ये मजीठिया क्लेम पाने के लिए हिन्दुस्तान प्रबंधन से जंग लड़ रहे हैं. इन्होंने आज के वर्तमान परिस्थियों में अखबारों में कार्यरत साथियों की हालत को देखते हुए एक कविता लिखी है. कविता पढ़ें और पसंद आए तो मनोज शर्मा को उनके मोबाइल नंबर 9456870221 पर अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं….

(1)

होठों को सी कर जीने से तो मरना ही अच्छा है
जुल्म सहने से तो बगावत करना ही अच्छा है।

खामोशी आपकी शैतानों को हौसला देती है
दुश्मन बाज न आए तो तलवार उठाना ही अच्छा है।

अमन चैन की तो हम भी पुरजोर हिमायत करते हैं
पर फिजा में जो घोले जहर उससे लड़ना ही अच्छा है।

पहले तो वार नहीं करेंगे हम अपनी बात पे कायम हैं
वो ना समझे तो फिर सबक सिखाना ही अच्छा है।

मजहब के नाम पर जो बेकसूरों का खून बहाते हैं
काफिर हैं लोग वो उनसे इंतकाम लेना ही अच्छा है।

(2)

ये अखबार वाले भी क्या खूब होते हैं
औरों की लिखते हैं खुद खून के आंसू रोते हैं।

इनके जैसे तो हमने जहां में लाचार नहीं देखे
इंसाफ की बात करते हैं, खुद इंसाफ को तरसते हैं।

अजीबो गरीब किरदार है इनका देखिए हुजूर
खुद अंधेरे में हैं और उजाले की बात करते हैं।

मुझसे पूछिए क्या है इनकी खुद्दारी का आलम
चंद सिक्कों की खातिर ये जमीर बेच देते हैं।

रोज जुल्म सहते हैं मगर उफ तक नहीं करते
ये अपने लबों को इस तरह सी के रखते हैं।

इनसे इंकलाब की उम्मीद करना बेइमानी है यारों
ये बाहर से कुछ और, अंदर से कुछ और होते हैं।

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‘हिंदुस्तान’ अखबार से 6 करोड़ वसूलने के लखनऊ के अतिरिक्त श्रमायुक्त के आदेश की कापी को पढ़िए

लखनऊ के श्रम विभाग ने हिंदुस्तान के 16 पत्रकारों व कर्मचारियों को क़रीब 6 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है. लखनऊ के एडिशनल कमिशनर बी.जे. सिंह व सक्षम अधिकारी डॉ. एमके पाण्डेय ने 6 मार्च को हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ आरसी जारी कर दी और पैसा वसूलने के लिए ज़िलाधिकारी को अधिकृत कर दिया है. इस बाबत खबर तो भड़ास4मीडिया पर पहले ही प्रकाशित हो चुकी है लेकिन आज हम यहां आदेश की पूरी कापी दे रहे हैं… नीचे आर्डर कापी का पहला पेज है….

पेज वन..

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‘हिंदुस्तान’ अखबार के खिलाफ आरसी जारी, 6 करोड़ वसूल कर 16 पत्रकारों में बंटेगा

लखनऊ से बड़ी ख़बर है। मजीठिया वेतनमान प्रकरण में दैनिक समाचार पत्र हिंदुस्तान की अब तक की सबसे बड़ी हार हुई है। कम्पनी का झूठ भी सामने आ गया है। यह भी सामने आया है कि मजीठिया की सिफ़ारिश से बचने के लिए कम्पनी ने तरह तरह के षड्यंत्र किए। लखनऊ के श्रम विभाग ने हिंदुस्तान के 16 पत्रकारों व कर्मचारियों को क़रीब 6 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है। लखनऊ के एडिशनल कमिशनर बी.जे. सिंह व सक्षम अधिकारी डॉ. एम॰के॰ पाण्डेय ने ६ मार्च को हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ आरसी जारी कर दी और पैसा वसूलने के लिए ज़िलाधिकारी को अधिकृत कर दिया है।

श्रम अधिकारी ने ज़िलाधिकारी को भेजी रिकवरी-आरसी की धनराशि हिंदुस्तान से वसूल कर श्रम विभाग को देने को कहा है। डीएम की अब यह ज़िम्मेदारी होगी की वह हिंदुस्तान से पैसा वसूल के श्रम विभाग को दें और फिर श्रम विभाग यह राशि मुक़दमा करने वाले 16 कर्मचारियों को देगा। श्रम विभाग के इस आदेश से यह भी साबित हो गया है कि हिंदुस्तान मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक़ वेतनमान नहीं दे रहा है। जबकि हिंदुस्तान प्रबंधन ने श्रम विभाग को यह लिखित जानकारी दी थी कि कम्पनी मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक़ वेतन दे रही है।

इसी आधार पर श्रम विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में यह ग़लत हलफ़नामा लगा दिया कि हिंदुस्तान मजीठिया के अनुसार वेतनमान कर रहा है। अब इस प्रकरण में ग़लत हलफ़नामा देने पर कम्पनी के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी का मुकदमा भी चल सकता है। ख़ुद श्रम विभाग ने यह लिखकर दिया है कि हिंदुस्तान मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतनमान नहीं दे रहा और न ही विभाग को काग़ज़ उपलब्ध करा रहा है।

ग़ौरतलब है कि सितम्बर २०१६ को हिंदुस्तान व हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकारों व ग़ैर पत्रकारों ने प्रमुख सचिव श्रम के यहाँ शिकायत कर कहा था कि प्रबंधन मजीठिया वेतनमान के अनुसार वेतन नहीं दे रहा है। इसके बाद प्रबंधन उत्पीड़न पर उतर आया। आठ पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद श्रम विभाग में सभी पत्रकारों ने नौकरी से निकाले जाने और नवम्बर २०११ से २०१६ के बीच मजीठिया वेतनमान का डिफरेंस दिए जाने का वाद दायर किया। बर्ख़ास्तगी का केस अभी विभाग में लम्बित है जबकि ६ मार्च को श्रम विभाग ने पत्रकारों के पक्ष को सही मानते हुए कम्पनी के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया।

रिकवरी केस फ़ाइल करने में कुल 16 कर्मचारी शामिल थे। इन सभी को श्रम विभाग ने उनके वेतन के हिसाब से 10 लाख रुपए से 60 लाख रुपए तक भुगतान करने का आदेश दिया है। श्रम विभाग ने डीएम को जारी आरसी में कहा है कि यदि कम्पनी इस राशि का भुगतान तत्काल नहीं करती है तो कम्पनी की सम्पत्ति कुर्क कर राशि का भुगतान कराया जाए। हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र का झूठ इसी से समझा जा सकता है कि चार महीने की सुनवायी के बावजूद हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र अपनी ओर से एक भी लिखित जवाब दाख़िल नहीं कर पाया।

कर्मचारियों ने मुक़दमे में साक्ष्यों के साथ यह तर्क दिया कि हिंदुस्तान अखबार एक नम्बर कैटगरी में आता है और इसी हिसाब से भुगतान किया जाना चाहिए। प्रबंधन ने इसके ख़िलाफ़ कोई तर्क नहीं दिया जिससे यह साबित हुआ कि कम्पनी कैटगरी नंबर वन की है और मजीठिया का भुगतान इस कैटगरी के हिसाब से नहीं दिया जा रहा है। कर्मचारियों के वक़ील शरद पाण्डेय ने श्रम विभाग में अपने तर्कोंं से साबित किया कि हिंदुस्तान ने अब तक मजीठिया वेतनमान नहीं दिया है और पूर्व में जो भी पत्र दिए वह झूठे थे।

अनुभवी वक़ील शरद ने कम्पनी के नामी-गिरामी वकीलों की फ़ौज को अपने तर्कों से अनुत्तरित कर दिया। यह भी पता चला है कि हिंदुस्तान प्रबंध तंत्र पूर्व में जालसाज़ी करते हुए कोर्ट में इतने झूठे काग़ज़ात लगाए हैं कि आगे कोई भी वक़ील इनका केस लड़ने को तैयार नहीं हो रहा है। जिन १६ लोगों ने श्रम विभाग में वाद दायर किया था उनमें संजीव त्रिपाठी, प्रवीण पाण्डेय, संदीप त्रिपाठी, आलोक उपाध्याय, प्रसेनजीत रस्तोगी, हैदर, लोकेश त्रिपाठी, आशीष दीप, हिमांशु रावत, एलपी पंत, जितेंद्र नागरकोटी, आरडी रावत, बीडी अग्रवाल, सोमेश नयन, रामचंदर, पंकज वर्मा शामिल है।

पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

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सीनियर कापी एडिटर राजेश्वर ने भी हिंदुस्तान बरेली पर ठोंका श्रम न्यायालय में क्लेम

बरेली से बड़ी खबर आ रही है कि हिंदुस्तान की बरेली यूनिट में मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतनमान और बकाया एरियर को लेकर चीफ कॉपी एडिटर सुनील मिश्रा की अगुवाई में शुरू हुई लड़ाई दिनोंदिन तेज होती जा रही है। हालाँकि सुनील ने प्रबंधन के मनाने पर भले ही अपने कदम पीछे खींच लिए मगर मजीठिया की लड़ाई उनके अन्य साथी पूरी ताकत से लड़कर हिंदुस्तान प्रबंधन की नींद हराम किये हैं।

गुरुवार को हिंदुस्तान बरेली के सीनियर कॉपी एडिटर राजेश्वर विश्वकर्मा ने अपने हक़ की आवाज उठाते हुए बरेली के उप श्रमायुक्त रोशन लाल के समक्ष मजीठिया वेज बोर्ड के मुतबिक वेतनमान न मिलने की शिकायत के साथ ही कंपनी पर 26,13,945  रूपये बकाया एरियर का क्लेम दाखिल कर दिया। राजेश्वर ने डीएलसी से कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसके निर्देशों के क्रम में उनको मजीठिया वेज बोर्ड के वेतनमान के मुताबिक एरियर का हिंदुस्तान प्रबंधन बार-बार मांगने पर भी भुगतान नहीं कर रहा है। लिहाजा उनको दाखिल एरियर क्लेम का भुगतान दिलाया जाय। अगर कंपनी उनके आदेश पर भी क्लेम अदा न करे तो प्रबंधन की आरसी जारी कर वसूली कराके एरियर का भुगतान दिलाया जाय।

हिंदुस्तान बरेली में राजेश्वर विश्वकर्मा की छवि बेहद सीधे और मेहनती कर्मचारी की है। उनका मजीठिया की लड़ाई में अचानक उतारना इस बात का संकेत है कि बरेली हिंदुस्तान में कर्मचारियों ने मजीठिया को लेकर जंग का एलान कर दिया है। प्रबंधन न चेता तो स्थिति आने वाले दिनों में और विस्फोटक होगी। काफी लोग क्लेम बनवाकर श्रम न्यायालय में खड़े होने की पूरी तैयारी में हैं।

दरअसल 7 सितंबर को यूपी के श्रमायुक्त को मजीठिया के अनुसार वेतन न मिलने की बरेली हिंदुस्तान से चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा की अगुवाई में सीनियर सब एडिटर रवि श्रीवास्तव, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला, चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, पेजिनेटर अजय कौशिक ने शिकायत भेजी थी। श्रमायुक्त ने बरेली डीएलसी को प्रकरण निस्तारित करने का आदेश दिया, जिस पर डीएलसी बरेली सुनवाई कर रहे हैं।

17 मार्च शुक्रवार को डीएलसी बरेली सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा के 33,35,623 रुपये, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला के 32,51,135 रुपये, चीफ रिपोर्टर डॉ. पंकज मिश्रा के 25,64,976 रुपये के मजीठिया वेज बोर्ड के वेतनमान के अनुसार एरियर के दाखिल क्लेम पर सुनवाई करेंगे। पिछली तिथि पर डीएलसी रोशन लाल हिंदुस्तान प्रबंधन के विधिक सलाहकार श्रीवास्तव व बरेली के एचआर प्रभारी सत्येंद्र अवस्थी को चेतावनी के साथ तत्काल तीनो क्लेमकर्ताओं को उनके एरियर का भुगतान देने को कह चुके हैं। बरेली श्रम न्यायालय में 17 मार्च को होने वाली सुनवाई पर सभी की निगाहें हैं कि हिंदुस्तान तीनों क्लेमकर्ताओं का भुगतान करता है या फिर उपश्रमायुक्त बरेली हिंदुस्तान बरेली प्रबंधन की आरसी जारी करते हैं।

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मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वाले पत्रकार को एमपी पुलिस ने 31 घंटे तक अवैध हिरासत में रखा

प्रति,
श्रीमान् प्रधान संपादक महोदय
भड़ास मीडिया

पत्रकार के साथ पुलिस की गुंडागर्दी का मामला आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं… मैं पत्रकार विपिन नामदेव बताना चाहूंगा कि मेरे पिताजी को पुलिस वाले 04/03/2017 को सुबह 04:10 मिनट पर उठा के ले गये. घर की महिलाओं के साथ गाली गलौज की. इसका कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है. मैं पुलिस के पास शाम 05:30 पर पहुंचा तो मुझे बिठाकर पिताजी को छोड़ दिया गया.

पिताजी को टोटल 14 घंटे बैठाया गया. मुझे 05/03/2017 को रात्रि 12:00 बजे छोड़ा गया. टोटल 31 घंटे 30 मिनट पुलिस की कस्टडी में रहा. इसका कारण अभी तक पुलिस ने स्पष्ट नहीं किया है. मुझसे एक स्टॉम्प पर लिखवाया गया कि मुझे कम्पनी को 50,000/- देने हैं. पुलिस की गुंडागर्दी मेरे घर पर हुई. पुलिस ने मेरे पिताजी को तभी छोड़ा जब मैं थाने गया और मुझे अवैध रूप से हिरासत में रखा. पुलिस ने बिना वारंट मेरे घर की तलाशी ली.

बताना चाहूंगा कि कुछ दिन पहले मैंने दबंग दुनिया छोड़कर चाय की दुकान खोलकर बिजनेस करना शुरू किया. तब भी मुझे परेशान किया जाता रहा. इसके कारण मुझे फिर पत्रकारिता क्षेत्र में लौटना पड़ा. मैं फिलहाल ‘समय जगत’ भोपाल के पेपर को जबलपुर महाकौशल, विंध संभाग के ब्यूरो हेड के बतौर देख रहा हूं. दंबग दुनिया पर मैंने मजीठिया बेतन बोर्ड के तहत हक पाने के लिए आवेदन लेबर कोर्ट में दिया हुआ हूं. वहां पर मैं एक पेशी को अटेंड कर चुका हूं.

मुझे एक पेशी पर पेश होने के लिए इंदौर जाना था लेकिन वहां मुझे जान का खतरा दिखा. मैंने लेबर कमिश्नर इंदौर को लिखित आवेदन प्रस्तुत करके जबलपुर में लेबर के संयुक्त कमिश्नर के सामने पेश हो गया.

असल में दबंग दुनिया का मालिक गुटखा किंग किशोर बाधवनी मुझसे बंधुवा मजदूरी करवा रहा था. उसने मुझे तीन माह का पेमेंट और 10 माह का टूर का भुगतान नहीं दिया. मैंने इस बारे में कम्पनी के मालिक किशोर वाधवानी जी को मेल करके ईमानदारी से अवगत करा दिया था. मैंने वर्ष 2014, 2015, 2016 में मालिक किशोर वाधवानी को कई बार लिखित में शिकायत की और सी.ई.ओ विजय गुप्ता जी, यूनिट हैड संजीव सक्सेना जी के साथ सभी एजेन्टों से मिलकर स्पष्ट करवा दिया था. तब यूनिट हैड संजीव सक्सेना जी ने उचित कार्यवाही की.

दबंग दुनिया के गीत दिक्षित अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में मुझे फंसाने की साजिश कर रहे हैं. मजीठिया वेतन बोर्ड मांगने की इतनी बडी कीमत चुकानी पड़ रही है.

विपिन नामदेव
जबलपुर महाकौशल
विंध संभाग ब्यूरो
समय जगत
7771016601
samayjagatjbp67@gmail.com

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पीटीआई यूनियन लीडर एमएस यादव की कारस्तानी : फेडरेशन की एक करोड़ की संपत्ति बेटे को सौंपा!

देश की जानी मानी न्यूज़ एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया की फेडरेशन ऑफ़ पीटीआई एम्प्लाइज यूनियंस के महासचिव महाबीर सिंह यादव पर कई गंभीर किस्म के आरोप लगे हैं. महाबीर सिंह यादव उर्फ एमएस यादव की मनमानी के कई किस्से सामने आ रहे हैं. लगभग एक करोड़ रूपये से अधिक कीमत की फेडरेशन की प्रॉपर्टी को इन महाशय ने गलत तरीके से अपने बेटे के नाम पर करा दिया. एमएस यादव की हरकतों से पीटीआई इंप्लाइज फेडरेशन का अस्तित्व खतरे में है.

आप सभी लोगों को मालूम है कि ‘पीटीआई फेडरेशन’ न्यूज़ पेपर इंडस्ट्री में सबसे प्रभावशाली और ताकतवर यूनियन रही है जिसके बदौलत न सिर्फ वेज बोर्ड की लड़ाइयां लड़ी गईं बल्कि मीडियाकर्मियों के हक-हित की सतत दावेदारी की जाती रही. इन्हीं जैसी यूनियनों के कारण मणिसाना और अब मजीठिया वेजबोर्ड का गठन हुआ. ये वेज बोर्ड लागू हुए और जहां नहीं हुआ उसकी लड़ाई जारी है.

लेकिन इसी पीटीआई फेडरेशन के महासचिव एमएस यादव ने अनैतिक रूप से फेडरेशन की संपत्ति और बैंक में रखे पैसे का दुरूपयोग किया है. इनकी कारस्तानी से फेडरेशन में दरार पैदा हो चुका है. इन सब कुकृत्यों के कारण महासचिव को फेडरेशन प्रेसीडेंट जॉन गोनसाल्वेस ने महासचिव के पद से सस्पेंड करते हुए शो कॉज नोटिस जारी किया. इनसे जवाब माँगा गया. इसका जवाब यादव ने दिया. लेकिन उस जवाब से फेडरेशन प्रेसीडेंट और अन्य पदाधिकारी संतुष्ट नहीं दिखे. प्रेसीडेंट ने फेडरेशन की मीटिंग में महासचिव द्वारा प्रॉपर्टी और पैसों का हिसाब न देने पर कानूनी कार्यवाही करके सारा पैसा वसूलने की तैयारी की है.

पढ़ें-देखें कुछ संबंधित दस्तावेज….


गुरु दास की रिपोर्ट. संपर्क : gurudas929@gmail.com

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दिल्ली की श्रम अदालत ने दैनिक जागरण पर ठोंका दो हजार रुपये का जुर्माना

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले से जुड़े दिलीप कुमार द्विवेदी बनाम जागरण प्रकाशन मामले में दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय ने दैनिक जागरण पर दो हजार रुपये का जुर्माना ठोंक दिया है। इस जुर्माने के बाद से जागरण प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है। बताते हैं कि गुरुवार को दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय में दैनिक जागरण के उन 15 लोगों के मामले की सुनवाई थी जिन्होंने मजीठिया बेज बोर्ड की मांग को लेकर जागरण प्रबंधन के खिलाफ केस लगाया था। इन सभी 15 लोगों को बिना किसी जाँच के झूठे आरोप लगाकर टर्मिनेट कर दिया गया था। गुरुवार को जब न्यायालय में पुकार हुयी तो इन कर्मचारियों के वकील श्री विनोद पाण्डे ने अपनी बात बताई।

इस पर जागरण प्रबंधन के वकील श्री आर के दुबे ने कहा कि मेरे सीनियर वकील कागजात के साथ आ रहे हैं, अभी रास्ते में हैं। माननीय जज ने कहा कि अगली तारीख पर दे देते हैं। इस पर वकील विनोद पांडेय ने कहा कि हुजूर, ये लोग मामले को लटकाना चाहते हैं, संबंधित डाक्यूमेंट्स नहीं देना चाहते हैं, वैसे ही हम बहुत लेट हो चुके हैं, आज हम देर से ही सही, आपके सामने इनका जवाब लेंगे। इस पर माननीय जज साहब ने पासओवर दे दिया और कहा कि 12 बजे आइये। तय समय पर वर्कर अपने वकील के साथ हाजिर हुए, तो मैनेजमेंट की ओर से कोई नहीं आया। जज ने फिर वर्कर को साढ़े बारह बजे आने के लिए कहा। फिर सभी उक्त समय पर हाजिर हुए, तब भी मैनेजमेंट के लोग गायब रहे। इसी बात पर और कानून के हिसाब से जागरण पर 2000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस मामले की अगली तारीख 4 मई की लगी है।

सूत्रों के हवाले से दैनिक जागरण से जुड़ी एक और चर्चा भी यहां चल रही है कि प्रबंधन अब वर्करों से हारने वाला है। ऐसा कई मोर्चों पर हो रहा है। सूत्र कहते हैं कि एक ओर जहां अदालत में जागरण प्रबंधन की किरकिरी हुयी है वहीं उनमें अब हार का डर भी समाने लगा है। दैनिक जागरण में एक और चर्चा है कि जागरण में एक बड़ी मीटिंग हुई है, जिसमें यह बात भी सामने आयी कि जितने भी वर्कर बाहर हों, सबको जल्दी अंदर लिया जाये।

खबर है कि मालिकानों में अब हर जगह हो रही फजीहत की वजह से आपस में ही जूतमपैजार होने की नौबत आ गई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मजीठिया मामले को लेकर जागरण का पूरा घराना एक तरफ और संजय गुप्ता अकेले एक तरफ हैं। दूसरी ओर माननीय सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस में भी अब मालिकानों को हार नजर आ रही है, इसलिए भी परेशान हैं। जागरण के मालिक संजय गुप्ता की बात करें तो उन्होंने अपने वर्करों से मजीठिया की मांग करने के दौरान यह कहा था कि नौकरी हम देते हैं, सुप्रीम कोर्ट नहीं, हम जैसे चाहेंगे, वैसे काम कराएँगे, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह तब की बात है, लेकिन आज ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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शिकायत वापस लेने वाले भी डीएलसी से बोले- नहीं मिल रहा मजीठिया का लाभ

बरेली से खबर आ रही है कि हिंदुस्तान के जिन तीन कर्मचारियों से 7 जनवरी को प्रबंधन ने डीएलसी कार्यालय ले जाकर केस फाइल पर गुपचुप तरीके से शिकायत वापसी के लिए लिखवा के चस्पा करा दिया था, उन तीनों को डीएलसी के सख्त रुख के चलते प्रबंधन को पेश करना पड़ गया।

चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा, सीनियर सब एडिटर रवि श्रीवास्तव, पेजिनेटर अजय कौशिक को प्रबंधन डीएलसी के सामने ले गया, जहां डीएलसी ने तीनों से सवाल किए कि क्या उनको मजीठिया का लाभ मिल रहा है? तीनों ने इंकार किया। डीएलसी ने पूछा- क्या शिकायत किसी के दबाव में आकर वापस ले रहे हैं? बोले- नहीं कोई दबाव नहीं। तीनों ने कहा-नौकरी और प्रबंधन से लड़ाई दोनों साथ-साथ तो नहीं चल सकती है।

डीएलसी ने शिकायत वापस लेने वाले इन तीनों हिंदुस्तानियों के कथन का क्या अर्थ निकाला है, ये तो शिकायत के अंतिम निस्तारण पर ही पता चलेगा लेकिन इन तीनों कर्मचारियों ने ये बात तो साफ़ कर दी कि बरेली हिंदुस्तान में कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतनमान नहीं मिल रहा है।

दरअसल 7 सितंबर को यूपी के श्रमायुक्त को मजीठिया के अनुसार वेतन न मिलने की बरेली हिंदुस्तान से चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा की अगुवाई में सीनियर सब एडिटर रवि श्रीवास्तव, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला, चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, पेजिनेटर अजय कौशिक ने शिकायत भेजी थी। श्रमायुक्त ने बरेली डीएलसी को प्रकरण निस्तारित करने का आदेश दिया, जिस पर डीएलसी बरेली सुनवाई कर रहे हैं।

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मजीठिया वेतनमान पाने के लिए संगठन के माध्यम से करें क्लेम

मजीठिया वेतनमान पाने के लिए सबसे पहले आपको श्रम विभाग में आवेदन करना पड़ेगा। इसके लिए सीए रिपोर्ट तो और अच्छी बात है नहीं तो खुद ही अपना शेष बकाया निकाल कर श्रम विभाग में निवेदन कर सकते हैं। हालांकि 17 (1) के तहत आवेदक को कही-कही श्रम विभाग निर्धारित प्रारूप में आवेदन मांगता है। कोशिश करें कि यहां प्रकरण का निराकरण हो जाए, कोर्ट ना जाए। कोर्ट प्रकरण तब जाता है जब किसी बात ऐसा विवाद हो जाता है जिससे क्लेम की विश्वसनियता या कर्मचारी ना होने या किसी अनसुलझे मुद्दे पर विवाद हो जाता है।

यदि आप नौकरी कर रहे हैं तो बेहतर होगा कि खुद क्लेम ना लगाकर किसी जर्नलिस्ट संगठन के माध्यम से क्लेम लगवाएं। गु्रप में जाने पर श्रम अधिकारी पर दबाब बनेगा। चूंकि श्रम विभाग भ्रष्टाचार का गढ़ है ऐसे में विभाग की आडिट रिपोर्ट, कैश पंजी आदि को आरटीआई के माध्यम से मांग कर श्रम अधिकारी पर अपना दबाब बनाए रखे। और कोशिश करें कि श्रम पदाधिकारी आपके पक्ष में रिकवरी आर्डर जारी कर दे। और उसके बाद तय समय के बाद कलेक्टर से मिलकर आरआरसी अर्थात् वसूली पत्रक जारी करा ले। इसके बाद कुर्क कराने में भी कलेक्टर व तहसीलदार से मिलते रहे।

फिर भी यदि श्रम कोर्ट मामला पहुंचा तो यहां भी श्रम न्यायालय कार्यालय में आरटीआई लगाकर जज को डराकर रखें। कोर्ट की आरटीआई में आप फैसले पर आपत्ति छोड़कर कुछ भी पूछ सकते हैं। जैसे 17 (2) के तहत प्रकरण के निराकरण की सीमा, अपने केस में देरी क्यों हो रही है। यहां भी आडिट रिपोर्ट पूछ सकते हैं। यदि जज भ्रष्टज्ञचार लगे तो केस अन्य न्यायालय में ट्रांफर करा ले। इसके लिए आवेदन लिखकर दें कि आपसे मुझे न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है इसलिए प्रकरण अन्य न्यायालय में स्थानांतरित करने की अनुमति प्रदान करें। इससे जिले में पास के लिए में प्रकरण ट्रांसफर हो सकता है।

हालांकि यह कदम अंत में उठाया जाता है क्योंकि ऐसा लिखकर देने से जज की नौकरी संकट में आ सकती है। कोर्ट में इस बात का भी ध्यान रखें कि आप जो आवेदन या निवेदन कर रहे हैं उसे नोटसीट में लिखा जा रहा है या नहीं। कई बार जज आपके महत्वपूर्ण बात को इंगनोर कर अनावेदक को लाभ देने का प्रयास करते हैं। हांईकोर्ट जाने रजिस्टार जनरल से शिकायत करने की चेतावनी से निचली कोर्ट के जज डरते हैं।

ध्यान रखें कि ऐसे कदम उठाए जो सशक्त हो और खुद को नुकसान ना पहुंचे इसलिए गुमनाम से क्लेम लगाना, संगठन के माध्यम से क्लेम लगाना ज्यादा हितकर होगा। सीधे न्यायालय ना जाए यहां आईडी एक्ट के तहत पहले श्रम विभाग जाने की सलाह देते हुए आपका आवेदन निरस्त किया जा सकता है वह भी दो साल बाद। इसलिए पहले श्रम विभाग जाए।

maheshwari mishra
maheshwari_mishra@yahoo.com

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States to go by Delhi model in implementing Wage Board wages for scribes, non-scribes

New Delhi : President of the Indian Federation of Working Journalists K Vikram Rao has urged the state governments to follow the Delhi government in implementing of the Wage Board wages for journalists and non-journalists, already endorsed by the Supreme Court.

Hailing Delhi Rural Development Minister Gopal Rai for strict implementation of the Working Journalists Act which includes jail term for defaulters in implementing the act, he rued that successive governments for the past several years have been patronising the newspaper owners.

‘Defying press freedom, these newspaper owners have taken complete control over the functioning of the scribes,’ Mr Rao observed.

Indian Federation of Working Journalists Vice-President Gopal Misra stated that the organisation has also taken cognisance of the fact that in national dailies, journalists are required to report to the marketing department.

‘Scribes work as bonded labourers as they are hired on contracts and are made to sign on declaration that they are receiving wage board salaries,’ Mr Misra lamented.

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कर्मचारी एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड के, वेतन अभी भी दे रही एचएमवीएल

कई कर्मचारियों से त्यागपत्र लेने के बाद भी नहीं दिया गया पुराना बकाया… शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले अखबार हिन्दुस्तान से खबर आ रही है कि यहां कर्मचारियों को पुरानी कंपनी से इस्तीफा दिलाकर नयी कंपनी में भले ही ज्वाईन करा लिया गया है मगर पटना सहित कई जगह रिजाईन लेने के बाद भी कई कर्मचारियों को उनका पुराना हिसाब नहीं दिया गया है। यही नहीं, हिंदुस्तान अखबार की कंपनी का नाम कल तक हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड था मगर अब एक नयी कंपनी खोलकर अखबार प्रबंधन ने उसका नाम रख दिया एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड। इस नई कंपनी में जबरिया कर्मचारियों को पुरानी कंपनी से त्यागपत्र दिलाकर 1 जनवरी 2017 से ज्वाईन करा दिया गया है।

पटना से तो ये भी खबर आ रही है कि यहां कई कर्मचारियों से त्याग पत्र लेने के बाद भी उनका पुराना हिसाब एक भी पैसे का नहीं दिया गया। इसके बाद कर्मचारियों को संदेह हो रहा है कि उनकी पुरानी कंपनी का ग्रैच्युटी और फंड के पैसे क्यों नहीं दिये गये जबकि नियमानुसार कर्मचारी अगर त्यागपत्र देता है तो उसे उसके काम के साल के ग्रैच्युटी का भुगतान कंपनी करती है। फिर कंपनी ने ऐसा क्यों नही किया। यही नहीं हिन्दुस्तान के कुछ कर्मचारियों ने सूचना दी है कि कर्मचारियों का ट्रांसफर हिन्दुस्तान मल्टीमीडिया से नयी कंपनी में कर दिया गया है मगर वेतन अब भी पुरानी कंपनी से ही आ रहा है।

कर्मचारियों का कहना है कि दोनों कंपनी एक ही हैं और सिर्फ मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर देने से बचने के लिए नई कंपनी बना ली गयी है क्योंकि माह जनवरी और फरवरी का जो वेतन नई कंपनी के कर्मचारियों के बैंक खाते में आया है, वह एचएमवीएल की ओर से देना बैंक के मैसेज में दशार्या गया है। जाहिर है कि नई कंपनी सिर्फ कागजों में बना ली गई और सारे दायित्व व देनदारियां एचएमवीएल ही वहन करती रहेगी। ये सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और श्रम न्यायालय को धोखा देने के लिए हिन्दुस्तान के प्रबंधन ने रास्ता निकाला है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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डीएलसी बरेली ने हिंदुस्तान प्रबंधन से कहा- ”सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर कोई नहीं”

बरेली में मजीठिया वेज बोर्ड के वेतनमान के अनुसार एरियर के दाखिल क्लेम (हिंदुस्तान समाचार पत्र के सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा के 33,35,623 रुपये, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला के 32,51,135 रुपये, चीफ रिपोर्टर डॉ. पंकज मिश्रा के 25,64,976 रुपये) पर शुक्रवार को सुनवाई के दौरान उप श्रमायुक्त बरेली रोशन लाल ने हिंदुस्तान प्रबंधन की ओर से मौजूद बरेली के एचआर हेड व विधि सलाहकार को चेताया कि सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर कोई नहीं है।

उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान प्रबंधन क्लेमकर्ता तीनों कर्मचारियों से सौहार्दपूर्ण वार्ता करे और क्लेम का किश्तों में भुगतान लेने के लिए राजी कर लें। उधर, क्लेमकर्ता निर्मल कान्त शुक्ला ने बहस करते हुए डीएलसी के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि इस मामले में न तो कोई सबूत रखने, न कोई बहस करने और न ही किसी तर्क-वितर्क की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के क्रम में श्रम विभाग को कोर्ट से मिले आदेश के तहत उनके बकाया एरियर क्लेम को दिलाने के लिए बरेली हिंदुस्तान प्रबंधन की आरसी काटी जाए क्योंकि 22 फरवरी को दाखिल क्लेम को देने पर आज जब दस दिन बाद भी हिंदुस्तान बरेली के प्रबंधन ने कोई विचार नहीं किया है तो प्रबंधन दस साल में भी कोई निर्णय नहीं लेगा। लिहाजा इस मामले में प्रबंधन को कोई और मौका देने की आवश्यकता नहीं है। उनके प्रार्थनापत्र के क्रम में हिंदुस्तान बरेली प्रबंधन के विरुद्ध आरसी जारी की जाय।

उपश्रमायुक्त बरेली ने 17 मार्च की तिथि अगली सुनवाई के लिए नियत की है। यूपी के श्रमायुक्त से मजीठिया के अनुसार वेतन न मिलने की बरेली हिंदुस्तान से चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा, सीनियर सब एडिटर रवि श्रीवास्तव, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला, चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, पेजिनेटर अजय कौशिक ने शिकायत भेजी थी। श्रमायुक्त ने बरेली डीएलसी को प्रकरण निस्तारित करने का आदेश दिया, जिस पर डीएलसी बरेली सुनवाई कर रहे हैं।

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हिंदुस्तान बरेली से तीन लोगों ने उप श्रमायुक्त के कोर्ट में किया मजीठिया का क्लेम

बरेली से खबर आ रही है कि हिंदुस्तान अखबार के सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा ने 33,35,623 रुपये, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला ने 32,51,135 रुपये और चीफ रिपोर्टर डॉ. पंकज मिश्रा ने 25,64,976 रुपये का मजीठिया वेज बोर्ड के वेतनमान के अनुसार एरियर का क्लेम उप श्रमायुक्त बरेली के यहाँ ठोंक दिया है। तीनों ने उपश्रमायुक्त बरेली से शिकायत की है कि हिंदुस्तान प्रबंधन मजीठिया के अनुसार वेतन और बकाया देय मांगने पर उनको प्रताड़ित कर रहा है। साथ ही आये दिन धमका रहा है।

बरेली हिंदुस्तान के सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला ने उप श्रमायुक्त से लिखित शिकायत की है कि तीन माह पहले श्रमायुक्त कानपुर को भेजी गई जिस शिकायत पर उनके (उपश्रमायुक्त) द्वारा सुनवाई की जा रही है, उस शिकायत को वापस लेने के लिए हिंदुस्तान प्रबंधन लगातार दबाव बनाता रहा। हिंदुस्तान बरेली के एच आर हेड और मेरठ से आकर रीजनल एचआर हेड ने धमकाया कि यदि शिकायत वापस नहीं लोगे तो तुमको संस्थान से बाहर कर दिया जायेगा, तुम्हारा ट्रांसफर इतनी दूर कर देंगे, जहाँ से साल-साल भर अपने घर नहीं आ सकोगे।

निर्मल कान्त शुक्ला ने डीएलसी से कहा कि वह इन धमकियों से भयभीत हैं। ये दोनों उनके साथ कोई भी अनहोनी कारित करा सकते हैं। इन दोनों पर सख्त कार्रवाई की जाय। डीएलसी ने प्रबंधन से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई की तिथि 3 मार्च नियत की है।

दरअसल यूपी के श्रमायुक्त से मजीठिया के अनुसार वेतन न मिलने की बरेली हिंदुस्तान से चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा, सीनियर सब एडिटर रवि श्रीवास्तव, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला, चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, पेजिनेटर अजय कौशिक ने शिकायत भेजी थी। श्रमायुक्त ने बरेली डीएलसी को प्रकरण निस्तारित करने का आदेश दिया, जिस पर डीएलसी बरेली सुनवाई कर रहे हैं। प्रबंधन के लोगों ने सुनील मिश्रा और रवि श्रीवास्तव को पहली ही सुनवाई पर डीएलसी के यहां ले जाकर ये लिख लिया और फाइल पर चस्पा करा दिया कि हमको मजीठिया के समस्त लाभ मिल रहे हैं, हमें संस्थान से कोई शिकायत नहीं है। हालांकि डीएलसी ने इस तरह स्टेनो की पास ले जाकर फाइल में कागज चस्पा कराने को मानने से इनकार कर दिया और रवि व सुनील को फिर नोटिस भेजकर बुलवाने और उन दोनों के खुद बयान लेने की बात कही है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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पत्रिका, मंदसौर आफिस में कार्यरत मुरली मनोहर शर्मा की अमानवीय और घटिया हरकत

Shri Maan ji, mei Mandsaur Patrika me circulation back office or account ka work dekhta thha. 25.01.2016 Ko muje Murli Manohar Sharma davra cabin me Bulaya Gaya. Khaa Gaya ki kal se aap Ko nokari par nahi aana he. Mene uska reson puchha to bole koi reson nahi hei. Mene Khaa thik hei, mujhe letter de do aap to me kal se office nahi ayunga. Lekin letter Dene se bhi Mana kar diya.

us Adhikari se meri bhot bhas hui or me usse bol ke aaya Ki me labour office jaake aap ki Shikayat karunga. wo bole ki Ha, aap se ho jo aap kar leve. Jub me vaha se Nikla to usse pahle mere pass jitne bhi agent ke Rs the, 30000 Rs, vo maine Murli Manohar Sharma Ko de diye. kyo ki vo Hamra Mandsaur office ka Adhikari he. Mene vo pese usse de diye.

Mene rside kaat Rakhi thhi to usne vo pese JAMA nahi karye or office me bol diya ki Mahesh Patidar office se pese le ke Gaya or mere name se thane me date 01.02.2017 Ko ek latter de aaye ki me office ke pese leke Gaya hu. muje fasaya ja Raha he or mere name se case file karva rahe he.

majethiya ki maang ki gayi thhi mere davra, es liye ESA Kiya ja Raha he. pahle bhi ye 02 Shri taresh Sharma or Shri Ram babu bharthi karmchari Ko Mandsaur office se nikaal chuke he. jinka case Mandsaur laber me chal Raha he. un logo ne case kar rakha he. Mandsaur Patrika ka kesa Insaaf he ki mere saath ESA Kiya ja Raha he or baaki karmchari ke saath bhi.

Mahesh Patidar
Mandsaur
8959262702
mayank8959262702@gmail.com

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मजीठिया वेज बोर्ड से डरे अमर उजाला प्रबंधन ने भी डंडा चलाना शुरू किया

मजीठिया वेज बोर्ड का खौफ अखबार मालिकों पर इस कदर है कि वह सारे नियम कानून इमान धर्म भूल चुके हैं और पैसा बचाने की खातिर अपने ही कर्मचारियों को खून के आंसू रुलाने के लिए तत्पर हो चुके हैं. इस काम में भरपूर मदद कर रहे हैं इनके चमचे मैनेजर और संपादक लोग. खबर है कि अमर उजाला प्रबंधन ने मजीठिया वेज बोर्ड से बचने की खातिर कर्मचारियों का तबादला करना शुरू कर दिया है. साथ ही इंप्लाइज की पोस्ट खत्म की जा रही है.

सूत्रों के मुताबिक अमर उजाला प्रबंधन अपना रजिस्टर्ड आफिस का एड्रेस नोएडा से हटाकर दिल्ली कनाट प्लेस दिखा रहा है. कर्मचारियों की सेलरी स्लिप भी चेंज कर दी गई है. वैसे तो अमर उजाला वाले खुद को भारत का तीसरे नंबर का अखबार बताते फिरते हैं लेकिन जब मजीठिया वेज बोर्ड देने की बारी आती है तो वो अपने को पांचवें ग्रेड का अखबार दिखाने लगते हैं. कहा जा रहा है कि आगे आने वाले दिनों में कई लोगों को नौकरी से निकाला भी जा सकता है.

अमर उजाला के एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मजीठिया वेज बोर्ड से घबड़ाये हिन्दुस्तान प्रबंधन ने कर्मचारियों से लिया त्यागपत्र

एक नयी कंपनी एच टी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड में कराया गया ज्वाईन

देश के प्रतिष्ठित अखबार हिन्दुस्तान से खबर आ रही है कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अवमानना मामले से घबड़ाये प्रबंधन ने संपादकीय विभाग में कुछ संपादक लेबल के या पुराने लोगों को छोड़कर बाकी सभी से त्यागपत्र ले लिया है और इन सभी को एक नयी कंपनी एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड में ज्वाईन करा दिया गया है। साथ ही जितने भी हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग के कर्मचारी हैं, अधिकांश से जबरी इस्तीफे पर साईन करा लिया गया है।

पहले इस कंपनी का नाम हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड था मगर अब एक नयी कंपनी खोलकर अखबार प्रबंधन ने उसका नाम रख दिया एचटी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड। इस नई कंपनी में जबरिया कर्मचारियों को पुरानी कंपनी से त्यागपत्र दिलाकर ज्वाईन करा दिया गया है। पता चला है कि दिल्ली, नोएडा, पटना, बनारस, कानपुर, लखनऊ सभी जगह यह कार्रवाई की गई है। इन सभी जगहोंसे खबर आ रही है कि पुरानी कंपनी में अब सिर्फ उन्ही लोगों को रखा गया है जो बहुत पुराने थे। बाकी सभी को नयी कंपनी में ज्वाईन करा दिया गया है। कर्मचारी भी बेचारे कंपनी प्रबंधन के दबाव में साईन करने को मजबूर हो गये।

सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि पुरानी कंपनी का जहां पटना में पता अशोक सिनेमा है वहीं नयी कंपनी का कागज पर कुछ और पता है, मगर काम पुराने पते पर ही हो रहा है। सूत्र तो यहां तक बता रहे हैं कि हिन्दुस्तान प्रबंधन ने एक नया तरकीब खोजा है और वह ये है कि वह यह साबित करना चाहती है कि वह डिजिटल कंपनी से खबरें खरीद रही है और उस डिजिटल कंपनी के कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आते क्योंकि अभी तक वेब और टीवी के कर्मियों को वेज बोर्ड के दायरे में रखा ही नहीं गया है। मजीठिया वेज बोर्ड सिर्फ प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों पर लागू होता है। इस हिंदुस्तान प्रबंधन एक तीर से दो निशाने साध रहा है। नई नियुक्ति करके वह खर्चे बचा रहा है। साथ ही वेज बोर्ड के दायरे से भी कर्मचारियों को बाहर रखने की तरकीब निकाली है।

इस नई डिजिटल कंपनी एच टी डिजिटल स्टीम्स लिमिटेड से खरीदी गयी खबर को एच टी मीडिया वेंचर में मौजूद सात या आठ कर्मचारी ही बना रहे हैं। कंपनी ने जिन लोगों से इस्तीफे पर साईन कराया है उनको मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ नहीं दिया। सीधे सीधे कहें तो जिन कर्मचारियों ने इस कागजात पर साईन किया है उनका हाथ कंपनी ने काट लिया है। हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स के कई एडिशनों से ऐसी ही खबरें आ रही हैं जिससे यहां कर्मचारियों में हड़ंकप का माहौल है। हालांकि कानून के कई जानकारों का कहना है कि इसका भी तोड़ है और जल्द ही इस बारे में विस्तार से चर्चा की जाएगी। 

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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डीएलसी पाठक साहब, आखिर प्रकरण में बहस कराते क्यों हो?

डिप्टी लेबर कमिश्नर एल.पी. पाठक के कार्यालय में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप बकाया वेतन और एरियर की माँग कर रहे अनेक पत्रकारों और गैर-पत्रकार साथियों के प्रकरण इन निरन्तर सुनवाई चल रही है। केस की सुनवाई में आवेदक और अनावेदक पक्ष द्वारा जो जवाब लिखित में दिए जा रहे हैं, उन जवाबों को ही श्री पाठक अपने आदेश में शामिल कर अंतिम फैसला दे रहे हैं।

प्रोसीडिंग के दौरान दोनों पक्षों की लिखित जवाबों पर बहस कराई जाती है। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि इस बहस को कराये जाने का कोई औचित्य नहीं क्योंकि श्री पाठक जब प्रकरण में अंतिम आदेश जारी कर रहे हैं तो आदेश की प्रति में शब्दशः उन तर्कों को शामिल करते हैं जो लिखित जवाबों के रूप में पक्षकारों द्वारा पहले से ही श्री पाठक के कार्यालय में जमा कराये जाते हैं। ऐसे में प्रकरण में बहस कराये जाने का कोई औचित्य नजऱ नहीं आ रहा है।

बहस के दौरान अनेक प्रकरणों में आवेदक पक्ष के वकील द्वारा अख़बार प्रबंधन के अधिकारियों अथवा उनके वकीलों को सच्चाई का आईना दिखाया गया। बहस के दौरान आवेदक द्वारा माँगे जा रहे बकाया वेतन और एरियर राशि के समर्थन में दिये गए सबूतों के आधार पर प्रबन्धन के अधिकारी सिर्फ सच्चाई सुन मौन हुए बेशर्म बनकर बैठे रहते हैं क्योंकि आवेदक पक्ष के पास प्रबंधन को आईना दिखाने हेतु इतने पर्याप्त सबूत होते हैं कि प्रबंधन के अधिकारियों का मौन बैठे रहना उनकी मजबूरी होती है।

डी.एल.सी श्री पाठक अपने अंतिम फैसले में बहस के दौरान वकीलों द्वारा दिए गए सबूतों एवं तर्कों को शामिल करने की बजाय पूर्व में दिए गए लिखित तर्क ही शामिल कर रहे हैं। यह तो डी.एल.सी श्री पाठक भी भली भांति जानते और समझते हैं कि अगर बहस सुनकर फैसला देना पड़ा तो मीडिया संस्थान के खिलाफ आरसी जारी करना मजबूरी हो जायेगा, जो वह कतई नही चाहेंगे।

पाठक साहब! अगर ठान ही लिया है कि 17 (2) में ही फैसला देना है तो अपने कार्यालय में बहस कराना बन्द कर दीजिए और लिखित जवाबों के आधार पर एक दो तारीखों में ही फैसले दे दीजिये। कम से कम गरीब पत्रकारों का आपके कार्यालय में आने जाने का खर्चा ही बचेगा क्योंकि करना आपको वही है, जो अख़बार प्रबन्धन चाहता है। फिर इतनी लम्बी चौड़ी कार्रवाई का ड्रामा क्यों? और किसलिये?

इंदौर से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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कौन करेगा बर्खास्त मीडियाकर्मियों के साथ न्याय?

क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पक्ष में आवाज उठाना गुनाह है? अमित नूतन की पत्नी की मौत है या हत्या?

भड़ास फॉर मीडिया पर पढ़ा कि राजस्थान पत्रिका से बर्खास्त अमित नूतन की पत्नी का निधन हो गया। अमित नूतन का दोष यह था कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए प्रबंधन से मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन की मांग की थी। इस साहस की कीमत उन्हें पहले बखार्रस्तगी और अब अपनी पत्नी के निधन के रूप में चुकानी पड़ी। यह घटना भले ही लोगों को आम लग रही हो पर जिन हालातों में अमित नूतन की पत्नी का निधन हुआ है यह मामला बड़ा है। देश की सर्वोच्च संस्था सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पक्ष में आवाज उठाना क्या गुनाह है ? जब अमित नूतन को बर्खास्त किया गया तो सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?

जिन अखबार मालिकों ने अमित नूतन के परिवार के सामने इस तरह की परिस्थिति पैदा की, उन पर क्या कार्रवाई की ? क्या यह हत्या का मामला नहीं है ? जो लोग किसी व्यक्ति को मरने के लिए मजबूर कर दें वे उसके हत्यारे होने चाहिए? कौन बताएगा कि कविता नूतन की मौत का दोषी कौन है ? वे लोग जिन्होंने अमित नूतन को बर्खास्त किया या फिर वे लोग जो उसे न्याय न दिलवा सके या न दे सके। अमित नूतन की पत्नी का निधन हो गया तो लोगों को उनकी दयनीय हालत का पता चल गया पर जो दूसरे लोग मजीठिया मांगने पर बर्खास्त किए गए हैं, क्या उनके सामने भी इसी तरह के हालात नही होंगे?

दैनिक जागरण में 450, राष्ट्रीय सहारा में 47 और अन्य अखबारों में ऐसे कितने मीडियाकर्मी मजीठिया मांगने पर बर्खास्त किए गए हैं। राष्ट्रीय सहारा में 25 कर्मचारी ऐसे हैं कि जिन्हें 17 माह का बकाया वेतन और मजीठिया मांगने पर बर्खास्त किया गया है। देश बड़े वकील इस मामले की पैरवी कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट अखबार मालिकों के खिलाफ दायर किए गए अवमानना केस की सुनवाई सुन रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिरकार यह सुनवाई हो रही है किन कर्मचारियों के हित में ? जिन कर्मचारियों ने साहस दिखाकर अखबार मालिकों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया उन्हें तो बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। मान भी लिया जाए कि मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन मिलने लगेगा। बर्खास्त कर्मचारियों को तो इससे भी कोई फायदा होता नहीं दिखाई दे रहा है।

लंबे समय से बेरोजगारी का दंश झेल रहे ये कर्मचारी इस दयनीय हालत में भी मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे हैं। अपनी आंखों के सामने ही अपने बच्चों को अभाव में जीते देख रहे हंै। मेरी तो समझ में यह ही नहीं आ रहा है कि हम लोग आखिरकार लड़ किसके लिए रहे हैं ? मेरा माननीय सुप्रीम कोर्ट और मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे वकीलों से प्रश्न है कि क्या मजीठिया वेज बोर्ड से वेतन मिलने से पहले उन बर्खास्त कर्मचारियों के साथ न्याय नहीं होनी चाहिए, जिन्होंने साहस दिखाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करने के लिए अखबार प्रबंधन और मालिकों से कहा।

इस मामले की पैरवी कर रहे वकील कह रहे हैं कि मीडियाकर्मी मजीठिया  के लिए क्लेक करें। जिन कर्मचारियों ने मजीठिया की मांग की हैं वे तो सभी बर्खास्त कर दिए गए हैं। उनके लिए आप क्या कर रहे हैं ? ऐसे में कौन उठाएगा मजीठिया वेज बोर्ड की आवाज ? कौन करेगा बड़े वकीलों और सुप्रीम कोर्ट पर विश्वास ? यदि बर्खास्त होते ही अमित नूतन को न्याय मिल गया होता तो शायद उनकी पत्नी का निधन न होता। साथ ही अन्य अखबारों के मालिक मजीठिया मांगने पर किसी मीडियाकर्मी को बर्खास्त न करते । जब ये लोग बर्बाद हो जाएंगे तब मिलेगा इन्हें न्याय। या जब इनके पास कुछ नहीं बचेगा तब इन्हें बहुत कुछ मिलेगा। क्या फायदा होगा इस न्याय का ? बात अमित नूतन की ही नहीं है कि बर्खास्त किए गए लगभग सभी कर्मचारियों के हालात ऐसे ही हैं। सुप्रीम कोर्ट और मजीठिया वेज बोर्ड के मुकदमे की पैरवी कर रहे वकीलों ने बर्खास्त कर्मचारियों के साथ यदि जल्द न्याय नहीं किया तो हालात और भयावह हो सकत हैं। अखबार मालिकों का मनोबल बढ़ा हुआ है। जो भी कर्मचारी मजीठिया कीम मांग करता है उसे बर्खास्त कर दिया जाता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट और वकील क्या कर रहे हैं ?

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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हिन्दुस्तान रांची के हेचआर हेड ने मजीठिया मांगने वाले दो कर्मियों के साथ की बदतमीजी, कॉलर पकड़ हड़काया, गाली दी

हिन्दुस्तान अखबार प्रबंधन इन दिनों मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाया मांगने वालों के खिलाफ लगातार दमन की नीति अपना रहा है और अपने ही किये वायदे से मुकर रहा है। रांची में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप वेतन और भत्ते मांगने वाले दो कर्मचारियों ने जब श्रम आयुक्त कार्यालय में क्लेम लगाया तो इनका ट्रांसफर कर दिया गया। जब ये लोग कोर्ट से जीते तो हिन्दुस्तान प्रबंधन को उन्हें वापस काम पर रखना पड़ा। तीन दिन बाद ही जब ये कर्मचारी कार्यालय आकर काम करने लगे तो उन्हें कार्मिक प्रबंधक ने कालर पकड़ कर अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुये जबरी ट्रांसफर लेटर थमाने का प्रयास किया।

लखनऊ में भी हिन्दुस्तान प्रबंधन इसी तरह की रणनीति मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वालों के साथ इस्तेमाल कर चुका है। रांची में भी ऐसा ही किया जा रहा है। यहां मजीठिया वेजबोर्ड की लडाई लड रहे रांची हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग में कार्यरत मुख्य उप संपादक अमित अखौरी और वरीय उप संपादक शिवकुमार सिंह के साथ एचआर हेड हासिर जैदी ने 17 फरवरी को करीब पौने पांच बजे शाम को काफी बदतमीजी की।

पहले शिवकुमार सिंह को अपने कक्ष में बुलाकर कॉलर पकड़ा और हड़काया, फिर अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए कहा कि इस लेटर पर साइन करो। उन्होंने पूछा कि लेटर में क्या है, तो एचआर हेड ने कहा कि तुम दोनों का तबादला रांची हेड आफिस से उत्तराखंड के हल्द़वानी में कर दिया गया है। जब शिवकुमार सिंह ने लेटर पर साइन करने से इनकार कर दिया, तो उनके साथ अभद्रता से पेश आते हुए हासिर जैदी ने गाली देते हुए कहा- ”साले पेपर पर साइन करो, नहीं तो दोनों को बड़ी मार मारेंगे, साले तुम लोगों के कारण हम अपनी नौकरी को खतरे में क्यों डालें, अब तुम लोगों को कोई सैलेरी-वैलेरी नहीं मिलेगी, दिल्ली से साला एचआर हेड राकेश गौतम ने तुम लोगों के कारण मेरी नींद हराम कर रखी है।”

शिवकुमार सिंह के हल्ला करने पर कक्ष के बाहर खड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहे अमित अखौरी दौड़कर कक्ष में घुसे तो उन्हें भी गाली देते हुए हासिर जैदी ने जबरन लेटर पर साइन मांगा। दोनों के इनकार करने पर गार्ड को गेट बंद करने को कहा। फिर कहा कि ठहरो, दोनों ऐसे नहीं मानेगा, सालों तुम दोनों को ठीक करता हूं। यह कहते हुए कक्ष का दरवाजा लगाने के लिए जैसे ही वह आगे बढा, तो अमित अखौरी और शिवकुमार सिंह कक्ष से निकलकर गेट से बाहर भाग खड़े हुए। 

बता दें कि दोनों को श्रम अधीक्षक कोर्ट से तो बड़ी राहत मिली थी। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद हिन्दुस्तान प्रबंधन ने 13 फरवरी को दोनों कर्मियों को ज्वाइन करा दिया था। लेकिन हाजिरी बनाने के बाद भी इनसे संपादकीय विभाग में काम नहीं लिया जा रहा था। मजीठिया वेजबोर्ड की अनुशंसा के तहत वेतन, एरियर, भत्ता समेत अन्य सुविधाओं की मांग करने पर इन दोनों कर्मियों को क्रमश: 17 नवंबर और छह दिसंबर 2016 से प्रबंधन ने मौखिक रूप से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

श्रम अधीक्षक कोर्ट के समक्ष हिन्दुस्तान रांची के एचआर हेड हासिर जैदी ने आठ फरवरी को सुनवाई के दौरान इन दोनों कर्मियों का बिना सर्विस ब्रेक किए ज्वाइन कराने और वेतनादि देने पर सहमति व्यक्त की थी। लेकिन पांच दिन के बाद ही दोनों को तबादले का लेटर थमाया जा रहा था। इन दोनों कर्मचारियों का तबादला लेटर बाद में उनके मेल पर भेज दिया गया। आपको बता दें कि इसके पहले भी हिन्दुस्तान प्रबंधन ने लखनऊ में इसी रणनीति का इस्तेमाल किया था। पहले सम्मान के साथ वापस काम पर रखा जाता है फिर बाद में मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वाले कर्मचारियों को टार्चर किया जाता है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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मजीठिया वेतनमान : आगे से कौन डरेगा सुप्रीम कोर्ट से…

मजीठिया वेतनमान को लेकर भले ही देश की कानून व्यवस्था और उसका पालन आलोचनाओं के घेरे में हो लेकिन प्रिंट मीडिया में भूचाल देखा जा रहा है, एबीपी अपने 700 से अधिक कर्मचारियों को निकाल रही है, भास्कर, पत्रिका आधे स्टाफों की छंटनी करने जा रहा है, हिंदुस्तान टाइम्स बिक गया आदि बातें स्पष्ट संकेत दे रही हैं सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेतनमान को लेकर कुछ बड़ा फैसला आने वाला है। अब ये उठा पटक नोटबंदी के कारण हो रही है या किसी और कारण? यह तो समय बताएगा लेकिन मार्च-अप्रैल तक प्रिंट मीडिया में बड़े उलट फेर देखने को मिल सकते हैं. क्योंकि डीएवीपी की नई नीति से उसी अखबार को विज्ञापन मिलेगा जो वास्तव में चल रहा है और जहां के कर्मचारियों का पीएफ कट रहा हो या फिर पीटीआई, यूएनआई या हिन्दुस्थान न्यूज एजेंसी से समाचार ले रहा हो। साथ ही लगने वाला समाचार कापी पेस्ट ना हो, कि बेवसाइट से उठाकर सीधे-सीधे पेपर में पटक दी गई हो। इसका असर प्रिंट मीडिया में पड़ेगा.

ऐसी अवमानना सब पर चले
मजीठिया वेतनमान दिलाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लगी अवमानना याचिका में जिस तरह सुनवाई चल रही है उससे पत्रकारों की परेशानी बढ़ रही है। यदि भारत का यही कानून है तो ठीक है, ऐसी ही सुनवाई हर केस में हो…  यदि ऐसा होगा तो कानून का भय किसे सताएगा? कोई भी बंदा कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करेगा। पीड़ित बंदा अवमानना में जाएगा तो आरोपी कुछ जवाब नहीं देगा। पीड़ित के साक्ष्य मान्य नहीं होंगे. पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी जो जांच करेंगे उस पर भी पीड़ित और अधिकारी के अलग-अलग बयान मानकर कार्रवाई नहीं की जाएगी. आरोपी लिखित कह देगा कि हम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे हैं  तो उससे कुछ साक्ष्य नहीं मांगे जाएंगे क्योंकि 3 करोड़ केस पेंडिंग हैं, एक-एक व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट न्याय थोड़े ही दिला पाएगा। मजीठिया वेतनमान में जब सुप्रीम कोर्ट 18 हजार केसों में नियमानुसार वेतन दिलाने में असमर्थतता जता रहा हो तो उसे सवा अरब आबादी को न्याय दिलाना है, वह कैसे दिलाएगा?

सुनवाई भी अजीब है
चूंकि न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 5 के अनुसार न्यायालय के फैसले के बाद यदि कोई व्यक्ति न्यायालय की निष्पक्ष आलोचना करता है तो उसे न्यायालय अवमानना का दोषी नहीं माना जाएगा। इस अधिकार के तहत कुछ तथ्य पर चर्चा करना चाहूंगा। कोर्ट ने यह पूछा कि अपने मजीठिया वेतनमान क्यों नहीं दिया तो इस पर कुछ ने बाद में कहा कि हम 20 जे के अधिकार का उपयोग कर वेतन नहीं दे रहे हैं।

अब बात यह उठती है कि परिवादी ने प्रकरण लगाया है उसने 20 जे के तहत कुछ लिखकर नहीं दिया. यदि दिया होता तो वेतन मांगने क्यों आता। पूर्व में चले मजीठिया वेतनमान की वैधानिकता में यह सवाल नहीं उठा तो अवमानना में यह बात कहां से आ गई? यह बात पत्रकार पक्ष के वकीलों ने भी रखी। कुल मिलकर प्रकरण को जानबूझकर लटकाने के लिए जबरन 20 जे का प्रकरण सुना जा रहा है। जबकि उसकी सुनवाई का कोई वैधानिक औचित्य ही नहीं है क्योंकि अवमानना में वही बात उठाई जा सकती है जो मूल प्रकरण में उठाई गई हो। जैसे आप हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में वही बात उठा सकते हैं जो निचले अदालत में रखी हो और उसे इगनोर कर फैसला सुनाया गया हो। अब हर अदालत में उसी प्रकरण के लिए नया तथ्य और नया साक्ष्य नहीं ला सकते।

सैलरी स्लिप और उपस्थिति पंजीयन मांगे
सुप्रीम कोर्ट तो इस मामले में सिर्फ कर्मचारियों की ओरिजनल सैलरी स्लीप और ओरिजनल उपस्थिति पंजीयन मांगना चहिए और मजीठिया वेतन मान के अनुसार वेतन भुगतान का आदेश देना चहिए। वो भी जमानती वारंट के साथ, जो ना भुगतान करें उसे गैर जमानती वारंट में बदल दो। बस इत्ता सा न्याय करने के लिए बरसों बरस लग गए और अभी भी एक बड़ा कन्फ्यूजन है कि देश के आका जनता द्वारा चुनी सरकार है या मीडिया के मालिक हैं?

रमेश मिश्र
पत्रकार
swargeshmishra@rediffmail.com

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निकाले गए दो कर्मियों को काम पर वापस बुलाने को मजबूर हुआ हिन्दुस्तान प्रबंधन

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में रांची हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग में कार्यरत मुख्य उप संपादक अमित अखौरी और वरीय उप संपादक शिवकुमार सिंह को श्रम अधीक्षक कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल हिन्दुस्तान प्रबंधन को 13 फरवरी को दोनों कर्मियों को ज्वाइन कराने के लिए मजबूर होना पड़ा है। हालांकि हाजिरी बनाने के बाद भी इनसे संपादकीय विभाग में काम नहीं लिया जा रहा है।

यहां बता दें कि मजीठिया वेजबोर्ड की अनुशंसा के तहत वेतन, एरियर, भत्ता समेत अन्य सुविधाओं की मांग करने पर इन दोनों कर्मियों को क्रमश: 17 नवंबर और छह दिसंबर 2016 से प्रबंधन ने मौखिक रूप से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। श्रम अधीक्षक कोर्ट के समक्ष हिन्दुस्तान प्रबंधन ने आठ फरवरी को सुनवाई के दौरान इन दोनों कर्मियों का बिना सर्विस ब्रेक किए ज्वाइन कराने और वेतनादि देने पर सहमति व्यक्त की थी। इसके बाद हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग में कार्यरत दोनो कर्मचारियों को हिन्दुस्तान प्रबंधन ने ज्वाईन करा लिया।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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