
इसके बावजूद, ममता बनर्जी ‘जिम्मेदार’ जबकि उन्होंने कहा है कि बंगाल में वक्फ कानून लागू नहीं होगा। ऐसे में राज्य में विरोध का मतलब नहीं है और अगर इसी के लिए विरोध हो रहा है तो रुक जाना चाहिये। लेकिन कोर्ट के आदेश पर अर्धसैनिक बल के जवान तैनात किये जा चुके हैं। भाजपा नेता कह रही हैं कि बंगाल में वक्फ कानून क्यों नहीं लागू होगा और हिंसा की खबर आज दूसरे दिन कुछ ज्यादा ही छपी है।
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों की खबर यही है कि वक्फ कानून के विरोध में पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद जल रहा है (दि एशियन एज), 500 से ज्यादा हिन्दुओं ने पलायन किया है (अमर उजाला) और 24 अप्रैल को बिहार दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुसलमानों को इसके फायदे बतायेंगे। दि एशियन एज की इस खबर में कहा गया है, बिहार में भाजपा नेतृत्व वाले राजग गठबंधन द्वारा संशोधित कानून का समर्थन जारी रखने के मुख्य कारणों में एक है, बिहार की करीब 17 प्रतिशत मुस्लिम आबादी में 70 प्रतिशत से ज्यादा पसमादा मुसलमान हैं। यह वह वर्ग है जिसे प्रभावित करने के लिए एनडीए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है और उम्मीद जताई है कि वक्फ कानून से फायदा होगा। इसके लिए अखिल भारतीय पसमादा मुस्लिम मंच को भी साथ ले लिया गया है। दूसरे शब्दों में यह बांटों और राज करो की कोशिश जैसा मामला है। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार जनता के लिए, अक्सर जनता की मांग पर कानून बनाती है, काम करती है। लेकिन नरेन्द्र मोदी की सरकार अक्सर बिना मांग जन विरोधी कानून बताती है, ऐसे ही काम करती है। विरोध होता है तो उसके फायदे बताती है और किसान कानून को तो वापस ही ले लिया था। चुनाव नतीजों में जनता की नाराजगी नहीं दिखती है लेकिन जनविरोधी कानून से सरकार को फायदे की उम्मीद जरूर रहती है। फायदा हो या नहीं, वक्फ कानून से पश्चिम बंगाल सरकार का विरोध हो रहा है और हजारों शिक्षकों की नियुक्ति रद्द कर दिये जाने से वह पहले से परेशान है। राज्य में चुनाव होने हैं।
नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी दो बार राज्य विधानसभा चुनाव हार चुकी है और इस बार जीतने के लिए फिर जोर लगा रही है। यह जोर ध्रुवीकरण का अपना पुराना फॉर्मूला खुलकर लागू करने के रूप में है। इसमें सत्ता में होने, वादे पूरे नहीं करने तथा जनविरोधी काम करके भी चुनाव जीतते जाने का आत्मविश्वास दिख रहा है। इसीलिए, वक्फ कानून का विरोध बंगाल में हो रहा है और बयानबाजी वगैरह है ही। आज के अखबारों और खबरों की बात करें तो अमर उजाला ने शीर्षक में ही 500 से अधिक हिन्दुओं के पलायन की खबर दी है। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, लाठी चलाने में शर्माने वाली पुलिस को झाड़ू चलाने में कोई असुविधा नहीं है। अखबार ने (पहले पन्ने पर) यह भी बताया है कि बेहरमपुर से तृणमूल सांसद, पूर्व क्रिकेटर युसूफ पठान की उनके ‘नीरो मोमेन्ट’ के लिए आलोचना हो रही है। मुद्दा पश्चिम बंगाल के बाहर किसी स्थान से एक्स पर उनकी तस्वीर और पोस्ट है। अखबार ने लिखा है कि कोलकाता में तृणमूल पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि पठान की पोस्ट ने पार्टी को शर्मसार किया है। फिर भी आज ज्यादातर अखबार तृणमूल को बदनाम करने में लगे हैं।
दूसरे अखबारों में जब हिन्सा और पलायन की खबर छपी है तब टेलीग्राफ ने तस्वीरों के जरिये बताया है कि आंदोलन से दोनों समुदायों को नुकसान हुआ है। और जो पुलिस बल प्रयोग कर हिंसा को नियंत्रित करने में नाकाम रही वह अब सफाई करवा रही है और वह भी ऐसी कि जली हुई मोटरसाइकिल के टायर के टुकड़े को भी हटा देने के लिये कहा जा रहा है। यह पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से मुकाबले की कोशिश में किया जा रहा हो सकता है। पर समस्या यह है कि कानून का विरोध असम में भी हो रहा है। नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार वक्फ कानून के विरोध में असम में भी प्रदर्शन, पथराव और लाठीचार्ज हुए हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने बंगाल के ग्राउंड जीरो की खबर दी है (यह लीड नहीं है) और कहा है कि वहां दोनों पक्षों में दुख और डर है तथा सवाल यह है कि न्याय कौन करेगा? हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक है, मुर्शिदाबाद तनाव में, पार्टियों में आरोप-प्रत्यारोप। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड है और शीर्षक है, मुर्शिदाबाद हिन्सा से बचने के लिए सैकड़ों लोग गंगा पार कर गये। अखबार ने यह भी लिखा है कि दो युवा लापता हैं, रिश्तेदारों का कहना है कि हथियारबंद भीड़ ने अपहरण किया है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, डीजीपी ने कहा, मुर्शिदाबाद में सीएपीएफ तैनात, स्थिति नियंत्रण में। दि एशियन एज की खबर का शीर्षक है, नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, मुर्शिदाबाद छोड़कर भागे सैकड़ों लोग। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, वक्फ विरोध पर मुर्शिदाबाद जल रहा है, 600 से ज्यादा भागे।
जाहिर है कि मु्र्शिदाबाद की हालत खराब है तो वक्फ कानून (में संशोधन) के कारण। हिंसा में मौत की खबर कल थी आज पलायन की है और स्थिति नियंत्रण में है। कोर्ट के आदेश पर ही सही, सुरक्षा कर्मी तैनात कर दिये गये हैं। सफाई हो रही है और स्थिति को सामान्य बनाने की कोशिश चल रही है। नुकसान का आकलन किसी भी अखबार ने (शीर्षक में) नहीं किया है। फिर भी यह खबर मेरे आठ में से सात अखबारों में लीड है। इस तथ्य के बावजूद कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह चुकी हैं कि बंगाल में वक्फ कानून लागू नहीं होगा। हिंसा और दंगे के आरोप में बड़े पैमाने पर लोगों को गिरफ्तार किये जाने की खबर नहीं है और न ही यह आरोप है कि दंगाइयों को संरक्षण दिया जा रहा है। तोड़फोड़ या नुकसान की तस्वीरें भी ज्यादा नहीं हैं। ऐसे में मुझे लगता है कि बंगाल में मामला जितना गंभीर है उससे ज्यादा दिखाया गया है। यही नहीं, एएनआई की खबर के अनुसार भाजपा नेता लॉकेट चटर्जी ने मुर्शिदाबाद हिंसा के लिए सीएम ममता बनर्जी को दोषी ठहराया है, इस्तीफे की मांग की है।
यह भी कहा बताते हैं कि, ‘वक्फ बिल स्वीकार करना होगा, क्या पश्चिम बंगाल भारत से अलग है? नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार, असम में भी प्रदर्शन, पथराव और लाठीचार्ज हुआ है लेकिन वहां के लिए ऐसी बात नहीं है। बिहार में वक्फ कानून का लाभ उठाने की कोशिश या राजनीति के बारे में आप ऊपर दि एशियन एज की खबर के हवाले से पढ़ चुके हैं। जाहिर है वक्फ कानून का मकसद हिन्दू-मुसलमान करना ही है। आंदोलन से ध्रुवीकरण ज्यादा होता है और अमर उजाला का शीर्षक इस इच्छा का गवाह है। भाजपा नेता इसी लाइन पर काम करते दिख रहे हैं। ऐसे में जो विरोध वक्फ कानून के लिए केंद्र सरकार का किया जा रहा है उसे पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के रूप में दिखाया जा रहा है। वैसे भी, कुल मिलाकर, मुर्शिदाबाद हिंसा में अब तक तीन मौत की खबर है और कोर्ट के आदेश पर हिंसाग्रस्त इलाकों में अर्धसैनिक बलों के 1600 जवान तैनात कर दिये गये हैं। पर खबर दिल्ली के आठ में से सात अखबारों में लीड है जो मणिपुर और कश्मीर के मामले में कब हुआ था, मुझे याद नहीं है।
आज की दूसरी बड़ी खबर भाजपा नेता और तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि से संबंधित है। राजभवन में रहते हुए भाजपा की उनकी राजनीति पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बारे में आप पढ़ चुके हैं। आज खबर है कि कॉलेज के एक कार्यक्रम में उन्होंने जय श्री राम का नारा लगाया और मौजूद लोगों से भी ऐसा ही करने के लिए कहा। शिक्षाविदों ने इसे शिक्षा संस्थानों का भगवाकरण कहा है और इसके लिए उनके इस्तीफे की मांग की है। यह खबर द हिन्दू में पहले पन्ने पर है लेकिन कई और अखबारों में नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में यह सिंगल कॉलम में है। इसी तरह, तमिलनाडु के बाद केरल ने भी लंबित विधेयकों को पास माने जाने की अपील की है। द हिन्दू में यह खबर भी टॉप पर दो कॉलम में है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में ये दोनों खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं।



