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सियासत

लैंगिक असमानता में डूबते भारत की नारियों को पुरुषों से आधा भी हिस्सा नहीं मिलता

सौमित्र रॉय-

कुछ दिन पहले बीजेपी महिला मोर्चे की सदस्य सज–धजकर आप के खिलाफ प्रदर्शन करने दिल्ली में इकट्ठा हुईं। तख्तियां लेकर फोटू खिंचवाई और उसी शाम को किटी पार्टी में जमकर ठूंसा। उसकी भी फोटू डाली।

चंद रोज़ पहले कांग्रेस की प्रवक्ता को रजत शर्मा ने ऑन एयर गंदी गाली दी। दो दिन तक सोशल मीडिया पर औरतें उसे कोसती रहीं। वही घिसी–पिटी मां–बहनों की मिसालें।

कांग्रेस की महिला मोर्चा राहुल भगवान के नॉन बायोलॉजिकल इशारे का इंतजार कर रही हैं। इस महफिल में जब भी पेट में आलू भरी हट्टी–कट्टी, पति का हाथ पकड़े, घूंघट ओढ़े, सजी–धजी और सियासत की बेअसर बातें करती स्त्रियों को देखता हूं, देश का दुर्भाग्य याद आ जाता है।

इस महफिल में उन कथित नारीवादियो को देखकर और बोलती–लिखती नादान सी महिलाओं को भी, जिनके भीतर स्त्री सिर्फ दो रूपों में–कंगना और स्मृति में बंट चुकी है। पत्थर तोड़ती स्त्री किताबों में गुम है। लेकिन, घर की चौखट लांघकर मेहनत और स्वाभिमान की कमाई कर रही असल नारियों को पुरुषों से आधा भी हिस्सा नहीं मिलता।

संभ्रांत, कुलीन औरतें ऐसे आंकड़ों को फिजूल मानती हैं। वे तभी बोलती हैं, जब एक करारा तमाचा “उनकी” कंगना पर पड़ जाए, जो उनके गालों को भी झिंझोड़ दे। बाहरी सुंदरता की आत्ममुग्धता और फोटूबाज़ी के इतर लैंगिक असमानता में डूबते भारत की तरफ भी देखिए मैडम। कभी मोर्चा तो निकालिए। सिस्टम के दो–चार लट्ठ भी खाइए।

मेरे लिए आज भी वृंदा करात आदर्श हैं, जिनके पास बुलडोजर को रोकने का कलेजा है। बाकी तो सिर्फ बातें हैं, बातों का क्या।

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