राकेश कायस्थ-
हरिशंकर परसाई लिख गये हैं- “दिवस हमेशा कमज़ोर का मनाया जाता है, जैसे महिला दिवस, शिक्षक दिवस, मज़दूर दिवस। कभी थानेदार दिवस नहीं मनाया जाता।“
आज महिला दिवस है। पूरा भारत स्त्रियों के हाथ मजबूत करने निकल पड़ा है। आज का टॉप अप लेकर नारी शक्ति दोगुने उत्साह से बच्चों के होमवर्क, घर के काम और सास-ससुर सेवा के साथ नौकरी का दायित्व निभाने के मिशन पर अगले एक साल के लिए जुट जाएगी।
नारी शक्ति को मजबूत करने के लिए हिंदी के सबसे प्रतिष्ठित अख़बार नवभारत टाइम्स ने एक पन्ने का विज्ञापन छापा है। लगता है कि ये धाँसू आइडिया किसी मार्केटिंग वाले का है और उसने संपादकीय विभाग के किसी व्यक्ति की राय लिये बिना चुपचाप अपने बॉस को प्रेजेंट किया है। बॉस के लिए भी ये यूरेका मोमेंट रहा होगा—ब्रिलिएंट! यू नेल्ड इट, टाइप।
भाषा क्रांति के ज़रिये नारी सशक्तिकरण की अपनी पहल पर मुदित अख़बार पाठकों से पूछ रहा है- चौक गए?
अखबार का कहना है कि अगर किसी स्त्री के लिए पुल्लिंग शब्द का इस्तेमाल किया जाये तो उसकी उपलब्धियां छोटी हो जाती हैं। इसलिए नवभारत टाइम्स बल्लेबाज़ के लिए एक नया शब्द दे रहे हैं, बल्लेबाज़नी।

पहली बात ये कि ये शब्द कोई नया नहीं है। शब्द वैसा ही जैसे पंडित से पंडिताइन, ठाकुर से ठकुराइन और दरोगा से दरोगाइन। यानी किसी पुरुष विशेषण में एक पुछल्ला प्रत्यय जोड़कर घोषित तौर पर स्त्रियों को सेकेंड सेक्स की तरह ट्रीट करना। समझना कठिन है कि इससे नारी सम्मान किस तरह बढ़ता है?
अद्भुत है ये तर्क और ज्ञान। मुझे डर है कि इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए अखबार राष्ट्रपति को राष्ट्रपत्नी ना लिखने लगे। मुझे चिंता ये भी है कि कोई समझदार इस तर्क को आगे बढ़ाकर पुलिस या सेना की महिला जवानों पर भी लागू ना कर दे।
भाषा को जेंडर न्यूट्रल रखने की कोशिशें पूरी दुनिया में चल रही है। नियम हर जगह एक ही लागू होता है। अगर कोई जेंडर न्यूट्रल शब्द उपलब्ध है, तो स्त्री-पुरुष दोनों के लिए उसका इस्तेमाल करें। अगर नहीं है तो फिर पुल्लिंग शब्द को जेंडर न्यूट्रल मान लें और इस्तेमाल करें जैसे अभिनेत्रियों के लिए भी आजकल एक्टर शब्द इस्तेमाल होता है एक्ट्रेस नहीं। यही नियम राष्ट्रपति पर भी लागू होता है।
अगर भाषा की गर्दन मरोड़े बिना कोई नया जेंडर न्यूट्रल शब्द बन सकता है तो बनायें, जैसे इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल ने बैट्समैन के लिए बैटर बनाया है जो पुरुष और महिला दोनों खिलाड़ियों के लिए इस्तेमाल होता है।
नवभारत टाइम्स वो अखबार है, जिसने हिंदी-भाषा की ऐसी-तैसी करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। ये वही अखबार है, जो प्रचलित हिंदी शब्दों के लिए ना सिर्फ अंग्रेजी इस्तेमाल करता है बल्कि अपनी हेडलाइन तक में उन्हें रोमन में लिखता है। किसी भाषा की अस्मिता के साथ यह गंभीर किस्म की छेड़छाड़ है और उसकी लिपि को धीरे-धीरे मिटाने का जघन्य अभियान है।
आज ही नवभारत टाइम्स की दो हेडलाइन में मुझे BMC और CM रोमन में लिखे नज़र आये। ऐसे में ये समझ पाना कठिन है कि जब विश्व क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था आईसीसी ने एक जेंडर न्यूट्रल शब्द `बैटर’ पुरुष और महिला दोनों खिलाड़ियों के लिए चलाया है और यह अखबार की संपादकीय नीतियों के अनुरूप भी है, तो फिर इतनी मेहनत करके उसे बल्लेबाज़नी जैसे हास्यास्पद शब्द से रिप्लेस करने की क्या ज़रूरत है?
विमेंस डे एक इवेंट है और अखबार किसी भी तरह इस इवेंट का फायदा उठाकर अपनी ब्रांडिंग करना चाहता है। 13 साल पहले दिल्ली में हुआ निर्भया कांड भी मीडिया के लिए एक इवेंट बन गया था। निर्भया कांड के ठीक बाद उत्तर भारत के एक अग्रणी अखबार ( नवभारत टाइम्स नहीं) ने अपनी वेबसाइट के हर पन्ने के टॉप पर एक स्लोगन कैंपेन चलाया था—`मैं नारी के सम्मान की शपथ लेता हूं’.. इसी के ठीक नीचे नारी को प्रोडक्ट बनाती हुईं अधनंगी तस्वीरें छपी होती थीं। मुझे अच्छी तरह याद उस वक्त भी मैंने इसे लेकर कई पोस्ट लिखे थे।
नारी शक्ति का पूजन, वंदन वगैरह छोड़ दीजिये, मामला समान पारिवारिक, सामाजिक और नागरिक अधिकारों का है। जेंडर सेंसेटाइजेशन किस चिड़िया का नाम है, ये आज से दस पहले किसी ने सुना तक नहीं था। कार्यस्थल को सुरक्षित और उत्पीड़न मुक्त बनाने की कोशिशों का सिलसिला भी कोई बहुत पुराना नहीं है।
अब लगभग हर कंपनी में सेक्सुअल हरासमेंट से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए कमेटियां होती हैं। अवसर और वेतन की समानता की मांग भी पूरी दुनिया में सिर उठा रह है। ये एक सुखद बदलाव का संकेत है। उम्मीद की जानी चाहिए सिर्फ स्त्री नहीं बल्कि समाज के हर वंचित समूह के सशक्तिकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। हैप्पी विमेंस डे।



Om Prakash Jha
March 11, 2025 at 10:23 am
Boss Ye Newspaper Nahi Balki Multinational Company Type Behave Karti Hai. Inka kaam sirf bade advertiser ko convience karna hai chahe times group ka koi bhi akhbar ho. TOI bhi wahi hai news se jyada advertiser pe focus karti hai. Main 10 saal yahaan kaam kiya hoon. Aab Indian Express main hoon.
Ye sirf aur sirf paisa dekhte hain aur kuch nahi