Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

प्रशासन और पुलिस का दबदबा ईमानदार पत्रकारों को जेल भेजने की कोशिशों पर मत खर्च कीजिये!

अशोक कुमार शर्मा-

राजनेताओं और अफसरों की छवि क्यों तबाह हो रही है? उनकी विश्वसनीयता क्यों खत्म हो रही है? जनता में फैले आक्रोश को वे नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रहे? क्यों यह महान देश विखंडन की कगार पर धकेला जा रहा है?

किस तरह से कभी फटेहाल पत्रकार मालामाल हो रहे हैं? क्यों अच्छे और चिंतनशील बुद्धिजीवी निष्क्रिय तथा उदासीन होते जा रहे हैं? क्यों PMO India Narendra Modi जैसे वास्तव में बेदाग़ और देश हित की सोचनेवाले राजनेताओं को अनावश्यक निशाना बनानेवाले नेताओं के खिलाफ कोई वातावरण नहीं बन पा रहा है? आखिर क्या कारण है कि सियासत की हवस ना रखनेवाले MYogiAdityanath जैसे निस्वार्थ संत स्वभाव वाले व्यक्तित्वों को विवादित बनाने की कोशिशों के विरुद्ध करोड़ों रूपये के विज्ञापनों के बूते मौज करनेवाली लॉबी कुछ भी नहीं कर पा रही?

क्या ये देश इतना ही खराब है? क्या हमारे सत्तारूढ़ नेता बेदम और बेकार हो गए हैं? क्या उनके चारों ओर जमा मंडलियाँ सिर्फ ताली बजानेवालों की भीड़ है? आखिर इतने सारे बदलाव और हितकारी फैसलों के बावजूद नरेंद्र मोदी तथा उनके वफादार साथियों की विश्वसनीयता को पलीता लगाने का मजमा कौन आयोजित कर रहा है? क्यों सारे तथाकथित विश्वस्त नाकाम नज़र आ रहे हैं?

चालीस साल प्रचंड यशस्वी सेवाकाल और तकरीबन हर दौर की सरकार के लिए मैंने सूचना, संवाद और जनसंपर्क का काम बेमिसाल तरीके से किया. यही वजह थी कि इस धरती पर सबसे बड़े मानव जमावड़े, इस शताब्शदि के पहले दोनों महाकुम्भों को 2010 में हरिद्वार में और 2013 में इलाहाबाद में आयोजित करने की कोर टीम में एक नोडल अधिकारी के रूप में सम्मानित किया गया. लेकिन मैं समझता हूँ कि मेरी हर उपलब्धि में पत्रकारों का बराबर का योगदान रहा. मेरे साथियों ने हमेशा अथक मेहनत की.

आज मुझे रिटायर हुए नौ साल हो गए हैं लेकिन मैं तब से एक दिन भी खाली नहीं रहा हूँ. मुझे फिल्म और टीवी उद्योग ने अपनाया है. मैं देश के अनेक बड़े निर्माताओं का सम्पादकीय सलाहकार, कंटेंट लेखक, गीतकार तथा उनके जटिल विषयों की शोध समितियों का सक्रिय सदस्य हूँ. इसके साथ ही प्रशासन, पुलिस, इंजीनियरों तथा मेडिकल सुपर स्पेशलिस्टों को उनकी सेवाओं में जनसंपर्क मीडिया प्रबंधन की बारीकियां समझाने को बुलाया जाता हूँ.

लेकिन इससे क्या फायदा? आप नयों को सफल होने की शिक्षा तो देते हैं, लेकिन फील्ड में वह सब रंग क्यों नहीं जमा पा रहे? क्या नयी पीढी के अधिकारी उर्जावान नहीं हैं या बड़े पदों वाले अफसरों को अपने ढर्रे बदलने की फ़िक्र नहीं है? क्या मातहत बेईमान हो गए हैं या बड़े अफसरों और उनकी बीवियों को कम से कम समय में इस धरती पर जन्नत के मज़े खानदान समेत लेने हैं?

मुझे भारत में बीबीसी के संस्थापक ब्यूरो प्रभारी मार्क टुली का एक बार उनके जोरबाग कॉलोनी (निजामुद्दीन के पास) घर पर साक्षात्कार लेने का मौक़ा मिला. बहुत से विषयों पर बात हुई. उन्होंने अपनी पत्नी गिलियन से भी परिचय कराया. तब उन्होंने कहा था, “भारत की असली समस्या हमारी नौकरशाही की सोच है! इस तंत्र को बहम ब्रिटिशर्स ने गुलामों पर शासन के लिए बनाया था. लेकिन इस सोच को बदला ही नहीं गया. अपनी कुर्सी बनाये बचाए रखने के लिए सत्तारूढ़ शक्तियों की खुशामद और उनको फुसला बहका कर गलत काम कराना ही ऊपर से नीचे तक भारत में पसरते भ्रष्टाचार की वजह है…” उनका यह साक्षात्कार मेरे पास आज भी प्रकशित अवस्था में सुरक्षित रखा है.

बात फिर से करूंगा भारत की कामयाबियों की जड़ में पलीता लगानेवालों की. ये लोग दीमकों की तरह से सिस्टम को तबाह कर रहे हैं. लेकिन सरकार चलानेवालों को इस पर ध्यान देने का वक्त ही नहीं है.

ज़रा सोचिये कि क्या वजह थी कि नेहरु के समय से कांग्रेस की सभी हुकूमतों में जमकर घोटाले हुए. उनकी सूचियाँ किसके पास नहीं. उनके घोटाले भारत के अब तक के कुल बजट के बराबर हैं. लेकिन क्या उखाड़ लिया कांग्रेस का आप लोगों ने? मोदी ने कौन सा घोटाला किया? उनके चरित्र पर कोई दाग नहीं. योगी बाबा एक प्रबल सफल प्रशासक हैं. लेकिन आपने उनको केवल बुलडोज़र बाबा बना कर रख दिया.

भाजपा का विजय रथ रोकनेवाले उसके विरोधी पत्रकार तो हरगिज़ हरगिज़ नहीं हैं. ये वो लोग हैं जिनको अपने वातानुकूलित दफ्तरों से निकलने की और फील्ड में जाने की फुर्सत नहीं. ये वो लोग हैं जो सरकारों के काम को ग्रामणी जनता को समझा ही नही पाते. ये वो लोग हैं जिनका ध्यान मोबाइल फोन के नए मॉडल्स पर ज्यादा है. जो युवा पीढ़ी के अधिकारियों की आँखों की चमक से घबरा जाते हैं. जो पत्रकारों को सताने में पूरी ताकत झोंक देते हैं और सरकार के नित नए तथा मुखर दुश्मन तैयार करते जाते हैं.

इन लोगों को नहीं निपटाया तो कौन निपटेगा? आपका अनुमान गलत है मेरे दोस्त. भाजपा नहीं निपटेगी. देश निपट जाएगा. सरकार नहीं चेती तो माइक पर भारत को बांग्लादेश बनाने की धमकिया देनेवाले सच साबित होंगे.

कभी कभी मुझे पूर्व मुख्यमंत्री कु मायावती जी का ध्यानआता है. वह प्रशासन और पुलिस के हाकिमों को कोल्हू के बैल की तरह रगडती थीं और उनसे सारी व्यवस्था थर्राती थी. क्यों? क्या वह नरेंद्र मोदी जी से अधिक बेहतर थीं या योगी आदित्यनाथ से अधिक असरदार हैं? फिर क्या कारण है कि प्रशासन में उनके इशारे शासनादेशों से अधिक ताकतवर और असरदार होते थे.

प्रशासन और पुलिस का दबदबा ईमानदार पत्रकारों को जेल भेजने की कोशिशों पर मत खर्च कीजिये. कभी दो चार बिना वजह लाडले बने अधिकारियों की कुर्बानी दीजिये. ये लोग काम नहीं करते और अपनी खबरें दबवाने में लगे रहते हैं. ये ही शासन और उसकी छवि के दुश्मन हैं. इनके चेहरे चमकें बस इनका मकसद इतना ही है. कालिख के लिए भाजपा, आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद् सभी हैं ना!

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन