यशवंत-
हर व्यक्ति के जीवन की अपनी अपनी कहानियाँ होती हैं। हर कहानी एक दूसरे से अलग। सफलता असफलता की कहानियाँ! चंद्रसेन वर्मा (Chandrasen Verma) जी हिंदुस्तान अख़बार लखनऊ में नौकरी किया करते थे। एक दिन इनके गुरु कृपालु महाराज ने नौकरी छोड़ने का आदेश दे दिया। फिर तो ऐसी गुरु कृपा हुई कि अब ये ख़ुद ही कई कंपनियों के मालिक हैं। कई न्यूज़ चैनलों के मालिक हैं। कई राज्यों में फ़ार्म हाउस, रिसोर्ट, वेलनेस सेंटर, सेवाश्रम के स्वामी हैं चन्द्रसेन जी। जलने वाले इनसे खूब जलते फुंकते हैं। तरह तरह की कहानियाँ प्रचारित करते हैं लेकिन चन्द्रसेन जी इन सबसे बेपरवाह। वे कहते हैं, “मैं अच्छी सोच का आदमी हूँ। सकारात्मक सोचता हूँ। पॉजिटिविटी में जीता हूँ। दूसरों की बातों पर ध्यान देने लगे तो ख़ुद का काम कब करेंगे!”
मुझे पसंद आए चंद्रसेन जी। वैसे भी मैं अब किसी में बुराई नहीं देखता। मुझे उदात्त, सकारात्मक और सहज लोग पसंद हैं। “क्रांति से शांति की ओर” केवल नारा नहीं बल्कि मेरा जीवन सूत्र हैं। कोई क्रांति की बात करता है तो मैं उससे कह देता हूँ कि सारी क्रांति लिख कर दीजिए, भड़ास पर आपके नाम से छाप दूँगा। यह सुनते ही वह या तो क्रांति से भाग लेता है या फिर सच में लिख कर दे देता है और जेन्युइन सप्रमाण क्रांति हुई तो भड़ास पर पब्लिश भी कर दिया जाता है। शांति की बात करने वालों को मैं अपनी मित्र सूची में शामिल कर उसका नंबर सेव कर लेता हूँ। लखनऊ में चन्द्रसेन भाई के फार्महाउस के तालाब में नौका विहार करते हुए मछली भून कर खाने का कार्यक्रम बना है।
अब कोई ये ज्ञान देने न आ जाए कि आप तो मांसाहार छोड़ दिए थे। बता देता हूँ अब फिर से पकड़ लिया हूँ। ये प्राकृतिक जीव भोजन चक्र जिस पेटू शैतान ने बनाया, उससे पूछिए कि उसने ऐसा क्यों बनाया। हम सीमित दृष्टि के जीव आपस में एक दूसरे को मारकर खा कर ही ज़िंदा हैं। ये हमारी नियति है। हमें भी कोई खायेगा। सहज मृत्यु मरे तो हवा जल थल के बैक्टीरिया में समाहित हो जाएँगे हम।
खैर, प्रसंग चेंज हो गया। चंद्रसेन जी आवास पर कल आए और राम मंदिर की प्रतिकृति भेंट की। देर तक बातचीत हुई। न्यूज़ इंडिया 24×7 और इंडिया डेली लाइव न्यूज़ चैनलों के निदेशक हो गए हैं चन्द्रसेन से। मैं भी शीघ्र ही इन चैनलों का कंसलटेंट बन जाऊँगा। चन्द्रसेन जी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। बता दें, इस वक्त अपन देश के एक दर्जन मीडिया हाउसों के सवैतनिक कंसलटेंट हैं। ये सब ऑन पेपर है। पर ज़िन्दगी सड़क छाप ही जी है अब तक तो कभी सड़क छाप के स्ट्रीट ब्रांड से निकलने का दिल नहीं करता। जीवन को खुली किताब की तरह सहज भाव से जीने का सुख ये है कि आदमी बहुत सुख से सोता है और बहुत आनंद से मरता है।
जय जय


