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महाराष्ट्र

योगेन्द्र यादव ने प्रकाश अंबेडकर की पार्टी पर हमला किया तो कार्यकर्ताओं ने उन पर हमला कर दिया!

संजीव चंदन-

कल अकोला में योगेंद्र यादव पर प्रकाश अंबेडकर के कार्यकर्ताओं ने हमला किया। इस आशय की सूचना वीडियो के साथ खुद योगेंद्र जी ने सोशल मीडिया में शेयर की है। हमले की निंदा होनी ही चाहिए।

लेकिन थोड़ा ठहरकर योगेंद्र जी भी इस आक्रामक राजनीति में अपने मुकाम पर भी विचार करें तो अच्छा। इस विचार के बिंदु उनके आज के इंडियन एक्सप्रेस के लेख में है। उन्होंने मुसलमानों पर लिखा है।

लेख की शुरुआत में उन्होंने अमेरिकी राजनीति से प्रसंग लेते हुए एक राजनीतिक मुहावरा लिखा है ‘ रिपब्लिकन पार्टी ब्लैक की चिंता नहीं करती क्योंकि ब्लैक उन्हें वोट नहीं करते और डेमोक्रेटिक पार्टी दोनो की ही चिंता नहीं करती क्योंकि ब्लैक उसे वोट करेंगे ही करेंगे/ विवश हैं।’ मुसलमानों के बारे में वे यह मुहावरा भारतीय राजनीति में अप्लाई कर रहे हैं।

कल से एक सप्ताह पहले वे पुणे गए थे । वहां दलित/ बुद्धिस्ट/ आंबेडकवादी कार्यकर्ताओं की मीटिंग में उन्होंने आह्वान किया कि महाराष्ट्र चुनाव में दलित संविधान बचाने के लिए महाविकास अघाड़ी को वोट करें। कुल मिलाकर उनका आशय कांग्रेस था। वहां उपस्थित मेरे एक साथी और युवा अंबेडकरवादी बुद्धिजीवी ने पूछ लिया कि योगेंद्र जी हम लोग ही क्यों संविधान बचाएं? यह हमारी जिम्मेवारी ही क्यों? कांग्रेस की क्यों नहीं? वह क्यों नहीं विचार करती कि वह क्या कर रही है?

योगेंद्र जी पुणे वाली मीटिंग से दो कदम आगे बढ़ गए अकोला में। मंच से उन्होंने ‘वोट न बर्बाद ‘ करने की अपील करते हुए प्रकाश अंबेडकर की पार्टी पर हमला किया। तो कार्यकर्ताओं ने उनपर हमला कर दिया।

क्या योगेंद जी आज जो लिख रहे हैं अपने लेख में उसपर रुककर गौर करेंगे? जिस पसमांदा राजनीति और जिन अली अनवर की बात वे कर रहे हैं उन्होंने भी कभी मुसलमान वोट के एकतरफा विवश होने के खिलाफ राजनीति खड़ी की थी। पसमांदा राजनीति की आज भी वे वकालत करते हैं, लेकिन राहुल गांधी एवं कांग्रेस एक शब्द इसपर नहीं बोलते ।

प्रकाश अंबेडकर के समर्थकों में पैंथर के पुराने लोग भी हैं। उनकी स्मृति में रिडल्स ऑफ हिंदुईज्म के लिए आंदोलन के वक्त कांग्रेस की भूमिका है और नामांतर आंदोलन के वक्त भी। पैंथर की राजनीति का एक पैटर्न यह भी था। हमलावर होना।

हालांकि ऐसे हमलों को प्रकाश जी को रोकना चाहिए। खासकर तब जब कांग्रेस समर्थक बुद्धिजीवियों पर भी हो रहे हैं। पैंथर बुद्धिजीवियों का आंदोलन था। संवाद बेहतर रास्ता है।

लेकिन योगेंद्र जी जरा रुकिए आप हो एकतरफा कांग्रेस के लिए सक्रिय हैं, कभी विचार करते हैं कि राहुल गांधी की सूई 1990 में क्यों अटक गई है? और आपकी बैठकों में एक भी कांग्रेस का दलित कार्यकर्ता क्यों नहीं होता?

आपने दुबारा अकोला जाने की धमकी दी है प्रकाश जी के कार्यकर्ताओं को। भाई साहेब आप कर क्या रहे हैं? आप न अपने विचार पर दलित संदर्भों में सोचने को तैयार हैं और न भेड़ियों के साथ चलते हुए, उनकी लाव लश्कर के साथ भेड़ों के बीच बीन बजाने की राहुल गांधी की जिद्द पर। बिना सांगठनिक बदलाव के और राजनीतिक मुहावरों में समावेशी परिवर्तन के राहुल मोदी और संघ की मदद करने वाले ही सिद्ध होंगे।

कनुप्रिया– सिर्फ इसलिये कि योगेंद्र यादव ने महाआघाडी के लिये वोट माँग लिये उनपर हमला कर देना चाहिए? अगर आपके हिसाब से योगेंद्र यादव दोगलापन भी कर रहे हैं तो ये हमला करने की बात है? क्या यह संघी तरीका नही? और फिर वर्तमान सत्ता ने तो दोगलेपन के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए, कितने लोगों पर हमला किया गया? जिन लोगों ने बीजेपी के लिये वोट माँगे क्या उनके साथ भी यही सुलूक किया गया या बीजेपी और उसके गठबंधन के सारे अपराध माफ़ हैं? वैकल्पिक राजनीति खड़ा करने के इस तरीके का समर्थन समझ के बाहर है

सूरज कुमार सिन्हा– योगेंद्र जी ने जो लिखा है। सही ही कहा है। दलितों और अल्पसंख्यकों ने अभी तक उसी पैटर्न पर वोट किया है जिसमें उनके लिए बहुत ज्यादा सोचने की कोई गुंजाइश उन पार्टियों को कभी नहीं रहा जो उनके वोट से लाभ लेते रहे। दलित वादी पार्टियों ने भी वोट लेकर संसद और विधानसभा में दलित और अल्पसंख्यक के किए बहुत नहीं सोचने वालों के गोद में जा बैठते हैं। बिहार में जंगल राज लौटने के डर को दिखाकर अभी तक वोट मांगने वालों ने राज किया और जंगल राज न लौटे उसके लिए प्रतिबद्ध मतदाताओं ने विपक्षी की विजय नौका में सुराख कर दिया।

पंकज यादव– कुल मिलाकर आपने हमले के पक्ष में बहुत शातिराना अंदाज में तर्क गढ़ा है. आपकी वैचारिकी में मायावती, प्रकाश अम्बेडकर और अठावले से सवाल पूछना कभी रहा ही नहीं तो यहाँ क्या ही आप योगेंद्र यादव के हमलावरों का विरोध करते !

विकास राव– थोड़ा जमीन पर उतरकर घोर सांप्रदायिक राजनीति का सामना कीजिए जनाब, केवल फेसबुक पर इतना लंबा जान टाइप करने में समय मत खपाएं। जमीन की राजनीति बहुत वीभत्स हो चुकी है। आने वाले समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी होगी।

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