नई दिल्ली। अगर आप यूट्यूब चैनल पर समाचारों से जुड़े वीडियो बनाते हैं, तो यह खबर आपके लिए है। स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स ने आरोप लगाया है कि यूट्यूब की “थ्री-स्ट्राइक पॉलिसी” को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे कंटेंट क्रिएटर्स को डराया-धमकाया जा रहा है और उनसे पैसों की उगाही की जा रही है।
कॉमेडियन और लोकप्रिय यूट्यूबर आकाश बनर्जी उर्फ “देशभक्त” ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अब हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि महज तीन सेकेंड का कोई न्यूज क्लिप इस्तेमाल करने पर भी चैनल को तीन स्ट्राइक मिल सकती हैं, जिससे पूरा चैनल हमेशा के लिए बंद हो सकता है।
“जिस क्लिप को हटाया जा सकता था या उसकी कमाई मूल मालिक को दी जा सकती थी, उसके लिए पूरा चैनल खतरे में डाल देना एक ठगी का तरीका बन गया है,” आकाश ने कहा।
एक अन्य स्वतंत्र पत्रकार ने दावा किया कि उन्हें एक न्यूज एजेंसी से कॉपीराइट उल्लंघन का नोटिस मिला और फिर उनसे पैसे मांगे गए ताकि उनका चैनल चलता रहे।
आकाश बनर्जी ने लिखा, “हम जैसे न्यूज़ क्रिएटर्स के लिए यूट्यूब का एल्गोरिदम भी अनफ्रेंडली है। कई बार न्यूज कंटेंट को एज-रिस्ट्रिक्टेड, डिमॉनेटाइज्ड या डाउनरैंक कर दिया जाता है, जबकि मनोरंजन और वल्गर कंटेंट को अनदेखा किया जाता है।”
हाल के वर्षों में कई पत्रकारों ने यूट्यूब का रुख किया है, जहां वे समाचारों का विश्लेषण करते हैं। लेकिन अब उन पर भी कॉपीराइट के नाम पर शिकंजा कसा जा रहा है।
राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने गूगल को पत्र लिखकर यूट्यूब की कॉपीराइट नीति पर स्पष्टीकरण मांगा है। उन्होंने लिखा कि “समाचार एजेंसी के वीडियो रचनात्मक कंटेंट नहीं होते, बल्कि सार्वजनिक घटनाओं की रिपोर्ट होते हैं, जो पहले ही पब्लिश हो चुके होते हैं।”
लोकप्रिय यूट्यूबर ध्रुव राठी ने सुझाव दिया कि “अगर कोई क्लिप 10 सेकेंड से कम की है, तो यूट्यूब पहले उसे हटाने का मौका दे, स्ट्राइक देने से पहले। इससे ब्लैकमेल और उगाही पर रोक लगेगी।”
पत्रकार अभिसार शर्मा, जिनके यूट्यूब चैनल पर 8.46 मिलियन सब्सक्राइबर हैं, ने लिखा कि “पूरे शो को चुरा लेना गलत है, लेकिन सिर्फ 7-10 सेकेंड की क्लिप पर चैनल बंद कर देना अनुचित है।”
आईपी कानून विशेषज्ञ अमीत दत्ता ने भी यूट्यूब की इस नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि “कानून केवल कॉपीराइट वाले कंटेंट को हटाने को कहता है, चैनल बंद करने की कोई बाध्यता नहीं है। लेकिन यूट्यूब की थ्री-स्ट्राइक पॉलिसी अब एक हथियार बन चुकी है।”
कुल मिलाकर, यूट्यूब की मौजूदा नीतियों ने स्वतंत्र पत्रकारों और न्यूज़ क्रिएटर्स की राह में कई नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। सवाल यह है कि क्या यूट्यूब इस “डिजिटल सेंसरशिप” को रोकने के लिए कोई कदम उठाएगा?
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