महेश झालानी-
राजस्थान में मीडिया इस समय गहरे संकट से गुजर रही है। ज़ी राजस्थान न्यूज़ के पूर्व चीफ रिपोर्टर राम सिंह राजावत और पूर्व बिज़नेस हेड जितेन्द्र शर्मा की गिरफ्तारी ने पूरे पत्रकारिता जगत को हिला दिया है। आरोप है कि दोनों ने अपने पूर्व चैनल हेड आशीष दवे के निर्देश पर प्रभावशाली व्यवसायियों, बिल्डर्स, खनन ठेकेदारों और अस्पताल संचालकों को निशाना बनाकर उनसे धन उगाही की। यह उगाही फर्जी खबरें प्रसारित करने और उनके खिलाफ तथाकथित “एक्सक्लूसिव रिपोर्ट” चलाने की धमकी देकर की जाती थी।
पुलिस जांच में यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित रैकेट था। पहले किसी व्यापारी या संस्थान के खिलाफ मनगढ़ंत रिपोर्ट तैयार की जाती, फिर उनसे संपर्क कर कहा जाता कि “खबर रोकी जा सकती है अगर आप सहयोग करें।” सहयोग का मतलब था पैसा। जिन लोगों ने इस ब्लैकमेलिंग के आगे घुटने नहीं टेके, उनके खिलाफ चैनल पर झूठी और नकारात्मक खबरें प्रसारित कर दी गईं, जिससे उनकी सामाजिक साख को गंभीर धक्का लगा।
अशोक नगर थाना पुलिस ने जब शिकायतों का संज्ञान लिया, तो जांच का जिम्मा एसीपी बालाराम को सौंपा गया। कॉल रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजेक्शन और व्हाट्सऐप चैट्स जैसी तकनीकी जांच में यह सामने आया कि कुछ खबरों के प्रसारण से पहले ही पैसों की डील हो चुकी थी। पुलिस के पास अब कई ऑडियो रिकॉर्डिंग्स, चैट प्रिंटआउट्स और ट्रांजेक्शन डिटेल्स हैं, जो इस संगठित उगाही नेटवर्क की पुष्टि करते हैं।
इस मामले की राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल उगाही का मामला नहीं है, बल्कि पत्रकारिता की गरिमा और विश्वसनीयता पर लगा गंभीर कलंक है। अगर कोर्ट सख्त रुख अपनाता है, तो इससे जुड़ी और परतें खुल सकती हैं और कई नाम सामने आ सकते हैं।
मगर यह कहानी सिर्फ दो लोगों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। आज पत्रकारिता, जिसे कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, कुछ लोगों के लिए कमाई और सौदेबाजी का जरिया बन चुकी है। राज्य में 80 फीसदी ऐसे अखबार हैं, जो केवल सरकारी विज्ञापन पाने के लिए पंजीकृत हैं।
इनमें से कई अखबार कभी छपते नहीं, और जो छपते हैं, वे केवल दिखावे के लिए दस–बीस कॉपियां छापते हैं ताकि फाइल तैयार हो सके और विज्ञापन का पैसा मिल सके। आजकल पीडीएफ के जरिए पत्रकारिता में फर्जीवाड़े का नया प्रादुर्भाव हुआ है। ये अखबार पत्रकारिता नहीं, बल्कि विज्ञापन ठेकेदारी का माध्यम बन गए हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इन फर्जी अखबारों को पीआईबी और डीआईपीआर जैसे सरकारी विभागों का संरक्षण प्राप्त है।
स्थिति और भी विकट इसलिए है क्योंकि यूट्यूब पत्रकारिता ने इस खेल को नई दिशा दे दी है। दो सौ रुपये का माइक खरीदो और बन जाओ पत्रकार। नेताओं और अफसरों के सामने जैसे ही माइक आता है, वे तुरंत सावधान मुद्रा में आ जाते हैं, मानो उनके सामने बीबीसी का संवाददाता बैठा हो।
यह प्रवृत्ति अब भयंकर रोग बन चुकी है। छुटभैये नेताओं से लेकर नामी-गिरामी लोग तक इस ढोंग में शामिल हैं। कैमरा और माइक साथ रखना ही अब “पत्रकार” होने की पहचान बन गई है। न भाषा का ज्ञान, न तथ्यों की पड़ताल, न रिपोर्टिंग की समझ—बस लाइक, व्यू और शेयर के लालच में हर कोई “एक्सक्लूसिव” बन गया है।
जरूरत है कि राज्य सरकार, प्रेस परिषद और मीडिया संस्थान मिलकर इस गिरती स्थिति पर ठोस कदम उठाएं। फर्जी और अपंजीकृत पत्रकारों की पहचान की जाए, ऐसे अखबारों का पंजीकरण रद्द किया जाए जो केवल सरकारी विज्ञापनों के लिए बने हैं। साथ ही सोशल मीडिया पर पत्रकारिता के नाम पर चल रही मनमानी पर भी कड़ा नियमन लाया जाए।
अगर अब प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में पत्रकारिता पूरी तरह अविश्वसनीय बन जाएगी। आम जनता सच्चे पत्रकारों और फर्जी माइकवालों में फर्क नहीं कर पाएगी। वह दिन लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक होगा, जब जनता मीडिया को सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि सौदेबाज़ी का मंच मानने लगेगी।
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