Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

क्या 2019 में कांग्रेस दे पाएगी भाजपा को टक्कर?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जो खबरें अमेरिका से आ रही है, वे ऐसी हैं, जैसे किसी रेगिस्तान में झमाझम बारिश हो। भारत में जिसे लोग नेता मानने को तैयार नहीं हों, जिसे अखबारों में कभी-कभी अंदर के कोनों में कुछ जगह मिल जाती हो और जिसे लोगों ने तरह-तरह के मज़ाकिया नाम दे रखे हों, वह युवा नेता अमेरिका के बर्कले और प्रिंसटन जैसे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और छात्रों को सीधे संबोधित कर रहा हो, यह असाधारण घटनाक्रम है। खास बात यह है कि राहुल की ये खबरें भारतीय अखबारों के मुखपृष्ठों पर चमक रही हैं। जाहिर है कांग्रेस के हताश-निराश कार्यकर्ताओं में इन खबरों ने उत्साह का संचार कर दिया है। राहुल के जिन सहयोगियों ने इस अमेरिका-दौरे की योजना बनाई है, वे बधाई के पात्र हैं। राहुल के भाषणों और उन पर हुई चर्चाओं की जैसी रिपोर्टें छप रही हैं, उनसे जाहिर है कि इस बार कांग्रेस का खबर-प्रबंध सफल रहा है।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जो खबरें अमेरिका से आ रही है, वे ऐसी हैं, जैसे किसी रेगिस्तान में झमाझम बारिश हो। भारत में जिसे लोग नेता मानने को तैयार नहीं हों, जिसे अखबारों में कभी-कभी अंदर के कोनों में कुछ जगह मिल जाती हो और जिसे लोगों ने तरह-तरह के मज़ाकिया नाम दे रखे हों, वह युवा नेता अमेरिका के बर्कले और प्रिंसटन जैसे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और छात्रों को सीधे संबोधित कर रहा हो, यह असाधारण घटनाक्रम है। खास बात यह है कि राहुल की ये खबरें भारतीय अखबारों के मुखपृष्ठों पर चमक रही हैं। जाहिर है कांग्रेस के हताश-निराश कार्यकर्ताओं में इन खबरों ने उत्साह का संचार कर दिया है। राहुल के जिन सहयोगियों ने इस अमेरिका-दौरे की योजना बनाई है, वे बधाई के पात्र हैं। राहुल के भाषणों और उन पर हुई चर्चाओं की जैसी रिपोर्टें छप रही हैं, उनसे जाहिर है कि इस बार कांग्रेस का खबर-प्रबंध सफल रहा है।

लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या 2019 में कांग्रेस भाजपा को टक्कर दे पाएगी? अकेली कांग्रेस तो आज इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती। आज कांग्रेस जैसी दुर्दशा में है, वैसी वह पिछले सवा सौ साल में कभी नहीं रही। 2014 के चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 45 सीटें मिलीं थी, जबकि आपातकाल के बावजूद 1977 में उसे 154 सीटें मिली थीं। कर्नाटक और पंजाब के अलावा सीमांत के पांच छोटे-मोटे राज्यों में ही कांग्रेस की सरकारें सिमट गई हैं। यह ठीक है कि इससे भी कम क्षमतावाली पार्टी चुनाव जीतकर सरकार बना सकती है लेकिन, उसके लिए आपातकाल-जैसा या भ्रष्टाचार-जैसा बड़ा मुद्‌दा होना जरूरी है। ऐसा कोई ज्वलंत मुद्‌दा विपक्षियों के हाथ में नहीं है। नोटबंदी, जीएसटी, ‘फर्जीकल’ स्ट्राइक और बेरोजगारी-जैसे मुद्‌दे हैं जरूर, लेकिन उन्हें उठाने वाले कहां हैं? कांग्रेस के पास न तो कोई नेता है और न कोई नीति है। कांग्रेस में एक से एक काबिल और अनुभवी लोग हैं लेकिन, उनकी हैसियत क्या है? कांग्रेसी ढर्रे में पल-बढ़कर वे नौकरशाहों से भी बढ़कर नौकरशाह बन गए हैं। उनकी दुविधा यह है कि वे अपना मुंह खोलें या अपनी खाल बचाएं?

यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सिर्फ 30 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी राज कर रही है और 70 प्रतिशत वोट पाने वाले विरोधियों के पास एक भी आवाज़ ऐसी नहीं है, जो राज्यतंत्र पर लगाम लगा सके। इसका नुकसान विरोधी दल तो भुगतेंगे ही, सबसे ज्यादा नुकसान सत्तारूढ़ भाजपा और सरकार को होगा। ये दोनों बिना ब्रेक की मोटरकार में सवार हैं। देश की अर्थव्यवस्था और सांप्रदायिक सद्‌भाव की स्थिति विषम होती जा रही है। 2019 तक पता नहीं देश कहां तक नीचे चला जाएगा? गाड़ी गुड़कती-गुड़कती पता नहीं, कहा जाकर रुकेगी ?

क्या ऐसे में सारे विरोधी दल एक होकर देश की गाड़ी संभाल सकते हैं? नहीं। क्योंकि उनका एक होना कठिन है। पहली समस्या तो यह है कि वे मूलतः प्रांतीय दल हैं। अपने प्रांतीय प्रतिद्वंदी दलों से वे समझौता कैसे करेंगे? क्या उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और माकपा एकजुट हो सकते हैं? क्या सभी प्रांतीय दल कांग्रेस को यानी राहुल गांधी को अपना नेता मान सकते हैं?

इन तथाकथित प्रांतीय दलों के नेता राहुल के जन्म के पहले से राजनीति में सक्रिय हैं। देश के राजनीतिक दलों में आजकल विचारधारा की बाधा बिल्कुल खत्म हो गई-सी लगती है। भाजपा का हिंदुत्व और माकपा का मार्क्सवाद हवा में खो गया है। अब यह सुविधा हो गई है कि कोई भी पार्टी किसी भी पार्टी से हाथ मिला सकती है लेकिन, प्रांतीय दलों का जनाधार प्रायः जाति-आधारित है। ये जातीय-समीकरण एकता में सबसे बड़ी बाधा बन सकते हैं। इन सब बाधाओं के बावजूद देश में प्रचंड विरोध की जबर्दस्त लहर उठ सकती है। लेकिन, उस लहर को उठाने वाले न तो कोई नेता आज दिखाई पड़ रहे हैं और न ही कोई राजनीतिक दल।

यदि सारे नेता एक हो जाएं तो भी वे नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते, क्योंकि राष्ट्रव्यापी लहर उठाने के लिए देश को एक नया और बेदाग चेहरा चाहिए। तीन ऐसे चेहरे हो सकते थे। नीतीश कुमार, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल लेकिन, तीनों तात्कालिक लोभ में फंसकर दीर्घकालिक लाभ के मार्ग से अलग हट गए। हमारे दलीय नेताओं की आज हालत ऐसी हो गई है, जैसी लकवाग्रस्त पहलवानों की होती है। 2019 तक मोदी कितने ही कमजोर हो जाएं लेकिन, इन सब लकवाग्रस्त पहलवानों को वे पटकनी मारने लायक तब भी रहेंगे। ये पारम्परिक नेता वर्तमान सरकार का बाल भी बांका नहीं कर सकते, क्योंकि मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है और इस बीच भाजपा ने 2019 के चुनाव के लिए हर तरह से जबर्दस्त तैयारी कर ली है। जब भी देश में किसी एक नेता की पकड़ जरूरत से ज्यादा हो जाती है, उसकी पार्टी में उसके आगे कोई मुंह खोलने लायक नहीं रहता और विरोधी दल भी लुंज-पुंज हो जाते हैं, तब कोई न कोई अराजनीतिक ताकत उभरती है। 1977 में जयप्रकाश नारायण न होते और 2014 के पहले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे न होते तो क्या इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी को सफल चुनौती दी जा सकती थी? मोदी को सफल चुनौती देनेवाला कोई अ—राजनीतिक नेता आज कौन हो सकता है ?

राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार नेताओं ने मिलकर जरूर गिराई लेकिन, मोदी पर बोफोर्स-जैसे किसी आरोप के लगने की संभावना नहीं है और भाजपा, भाजपा है, कांग्रेस नहीं है। भाजपा में विश्वनाथप्रताप सिंह जैसे किसी बागी मंत्री की कल्पना करना भी असंभव है। यह तो अनुशासितों की पार्टी है। इसके जीवनदानी बुजुर्ग नेताओं की सहनशीलता भी बेजोड़ है। वे मुंह खोलने की बजाय आंखें खोलकर सिर्फ ‘मार्गदर्शन’ करते रहते हैं। अत: 2019 तक इस सरकार के लिए खतरे की घंटी बजना मुश्किल-सा ही लगता है। इस सरकार के लिए तो राहुल गांधी वरदान की तरह हैं। जब तक वे सबसे बड़े विरोधी दल के नेता हैं, मोदी खूब खर्राटे भर सकते हैं। लेकिन, वे खर्राटे भरने की बजाय देश और विदेश में निरंतर दहाड़ते रहते हैं। पता नहीं, उन अनवरत दहाड़ों के बीच उन्हें वह कानाफूसी भी सुनाई देती है या नहीं, जो उनकी पार्टी में उनके खिलाफ चल पड़ी हैं और वे टीवी चैनलों पर खुद को दमकता हुआ तो रोज ही देखते हैं लेकिन, उन्हें वंचितों और पीड़ितों का वह मौन मोह-भंग भी कभी दिखाई देता है या नहीं, जो किसी भी समय बगावत की लहर बन सकता है?

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन