अटलजी के बाद जो बीजेपी शेष है, वह संजय गांधी की ‘गुंडा’ कांग्रेस पार्टी-सी है…

Girijesh Vashistha : अटल जी के निधन के बाद बीजेपी ने जो चाल चरित्र और चेहरा दिखाया है वो शायद नयी बीजेपी की पहचान है. एक के बाद एक कई तरह की चीज़ें सामने आईं जिनसे वो लोग कतई आहत नहीं होंगे और प्रभावित भी नहीं होंगे जो यूथ कांग्रेस के भगवा संस्करण की तरह दिखाई देने वाली नयी बीजेपी से ही परिचित हैं.

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नेहरू की पहल पर कांग्रेस में आईं थीं राजमाता सिंधिया

डॉ राकेश पाठक

आज पं जवाहरलाल नेहरू का जन्म दिन है। आइये नेहरू के ग्वालियर से सरोकार की पड़ताल करते हैं। दरअसल रियासतों के विलय के बाद जब “मध्य भारत” राज्य बना तो तत्कालीन सिंधिया शासक जीवाजी राव सिंधिया नेहरू जी की ही सम्मति से “राज प्रमुख”(वर्तमान राज्यपाल समान पद) बनाये गए। आज़ादी के बाद के शुरुआती वर्षों में ग्वालियर हिन्दू महासभा का गढ़ था। सबसे पहले सांसद भी हिमस के ही थे। दूसरे आम चुनाव से पहले पं नेहरू के आग्रह पर तत्कालीन महारानी विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस में शामिल हुईं और 1957 का लोकसभा चुनाव गुना सीट से लड़ा। सिंधिया राजघराने की लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह पहली आमद थी।उन्होंने हिन्दू महासभा के दिग्गज विष्णुपंत घनश्याम देशपाण्डे को करारी शिकस्त दी।

17 जुलाई 1961 को जीवाजीराव सिंधिया का देहांत हो गया। सं 1962 का आमचुनाव सामने था। राजमाता शोक के कारण चुनाव लड़ने को अनिच्छुक थीं। लेकिन नेहरू के व्यक्तिगत आग्रह पर वे ग्वालियर से लोकसभा चुनाव लड़ीं। अब तक भारतीय जनसंघ का उदय हो चुका था। जनसंघ ने माणिकचंद बाजपेयी को राजमाता के खिलाफ प्रत्याशी बनाया।  इसी चुनाव के मौके पर जवाहरलाल नेहरू ग्वालियर आये। एस ए एफ ग्राउंड पर आमसभा हुई।तब डॉ रघुनाथ राव पापरीकर महापौर थे। इस सभा की जिम्मेदारी उन पर ही थी। नेहरू जी को देखने,सुनने के लिए पूरी गालव नगरी उमड़ पड़ी। मंच पर नेहरू जी के साथ इंदौर की भूतपूर्व महारानी शर्मिष्ठा देवी भी थीं।

राजमाता विजयाराजे शोक के कारण जयविलास महल में ही रहीं और एक दो अवसर के अलावा प्रचार के लिए भी नहीं निकलीं। उन्होंने माणिकचंद बाजपेयी को भारी अंतर से हराया।बाद में बाजपेयी ने राजनीति से नाता तोड़ लिया और प्रखर और सम्मानित पत्रकार के रूप में स्थापित हुए। बताना मुनासिब होगा कि राजमाता के कांग्रेस में प्रवेश के साथ ही इस अंचल में हिन्दू महासभा के सफाया हो गया।कालांतर में द्वारिकप्रसाद मिश्र से विवाद होने पर इंदिरा गांधी के दौर में राजमाता जनसंघ में शामिल हो गईं। नेहरू की आमसभा और उनका करिश्माई व्यक्तित्व लंबे समय लोगों की चर्चायों में दर्ज रहा।

दुर्लभ चित्र- ये तस्वीर SAF ग्राउंड की आमसभा की है जिसमें नेहरू जी के साथ महारानी शर्मिष्ठा देवी और डॉ रघुनाथराव पापरीकर साथ हैं।

लेखक डा. राकेश पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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क्या 2019 में कांग्रेस दे पाएगी भाजपा को टक्कर?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जो खबरें अमेरिका से आ रही है, वे ऐसी हैं, जैसे किसी रेगिस्तान में झमाझम बारिश हो। भारत में जिसे लोग नेता मानने को तैयार नहीं हों, जिसे अखबारों में कभी-कभी अंदर के कोनों में कुछ जगह मिल जाती हो और जिसे लोगों ने तरह-तरह के मज़ाकिया नाम दे रखे हों, वह युवा नेता अमेरिका के बर्कले और प्रिंसटन जैसे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और छात्रों को सीधे संबोधित कर रहा हो, यह असाधारण घटनाक्रम है। खास बात यह है कि राहुल की ये खबरें भारतीय अखबारों के मुखपृष्ठों पर चमक रही हैं। जाहिर है कांग्रेस के हताश-निराश कार्यकर्ताओं में इन खबरों ने उत्साह का संचार कर दिया है। राहुल के जिन सहयोगियों ने इस अमेरिका-दौरे की योजना बनाई है, वे बधाई के पात्र हैं। राहुल के भाषणों और उन पर हुई चर्चाओं की जैसी रिपोर्टें छप रही हैं, उनसे जाहिर है कि इस बार कांग्रेस का खबर-प्रबंध सफल रहा है।

लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या 2019 में कांग्रेस भाजपा को टक्कर दे पाएगी? अकेली कांग्रेस तो आज इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती। आज कांग्रेस जैसी दुर्दशा में है, वैसी वह पिछले सवा सौ साल में कभी नहीं रही। 2014 के चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 45 सीटें मिलीं थी, जबकि आपातकाल के बावजूद 1977 में उसे 154 सीटें मिली थीं। कर्नाटक और पंजाब के अलावा सीमांत के पांच छोटे-मोटे राज्यों में ही कांग्रेस की सरकारें सिमट गई हैं। यह ठीक है कि इससे भी कम क्षमतावाली पार्टी चुनाव जीतकर सरकार बना सकती है लेकिन, उसके लिए आपातकाल-जैसा या भ्रष्टाचार-जैसा बड़ा मुद्‌दा होना जरूरी है। ऐसा कोई ज्वलंत मुद्‌दा विपक्षियों के हाथ में नहीं है। नोटबंदी, जीएसटी, ‘फर्जीकल’ स्ट्राइक और बेरोजगारी-जैसे मुद्‌दे हैं जरूर, लेकिन उन्हें उठाने वाले कहां हैं? कांग्रेस के पास न तो कोई नेता है और न कोई नीति है। कांग्रेस में एक से एक काबिल और अनुभवी लोग हैं लेकिन, उनकी हैसियत क्या है? कांग्रेसी ढर्रे में पल-बढ़कर वे नौकरशाहों से भी बढ़कर नौकरशाह बन गए हैं। उनकी दुविधा यह है कि वे अपना मुंह खोलें या अपनी खाल बचाएं?

यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सिर्फ 30 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी राज कर रही है और 70 प्रतिशत वोट पाने वाले विरोधियों के पास एक भी आवाज़ ऐसी नहीं है, जो राज्यतंत्र पर लगाम लगा सके। इसका नुकसान विरोधी दल तो भुगतेंगे ही, सबसे ज्यादा नुकसान सत्तारूढ़ भाजपा और सरकार को होगा। ये दोनों बिना ब्रेक की मोटरकार में सवार हैं। देश की अर्थव्यवस्था और सांप्रदायिक सद्‌भाव की स्थिति विषम होती जा रही है। 2019 तक पता नहीं देश कहां तक नीचे चला जाएगा? गाड़ी गुड़कती-गुड़कती पता नहीं, कहा जाकर रुकेगी ?

क्या ऐसे में सारे विरोधी दल एक होकर देश की गाड़ी संभाल सकते हैं? नहीं। क्योंकि उनका एक होना कठिन है। पहली समस्या तो यह है कि वे मूलतः प्रांतीय दल हैं। अपने प्रांतीय प्रतिद्वंदी दलों से वे समझौता कैसे करेंगे? क्या उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और माकपा एकजुट हो सकते हैं? क्या सभी प्रांतीय दल कांग्रेस को यानी राहुल गांधी को अपना नेता मान सकते हैं?

इन तथाकथित प्रांतीय दलों के नेता राहुल के जन्म के पहले से राजनीति में सक्रिय हैं। देश के राजनीतिक दलों में आजकल विचारधारा की बाधा बिल्कुल खत्म हो गई-सी लगती है। भाजपा का हिंदुत्व और माकपा का मार्क्सवाद हवा में खो गया है। अब यह सुविधा हो गई है कि कोई भी पार्टी किसी भी पार्टी से हाथ मिला सकती है लेकिन, प्रांतीय दलों का जनाधार प्रायः जाति-आधारित है। ये जातीय-समीकरण एकता में सबसे बड़ी बाधा बन सकते हैं। इन सब बाधाओं के बावजूद देश में प्रचंड विरोध की जबर्दस्त लहर उठ सकती है। लेकिन, उस लहर को उठाने वाले न तो कोई नेता आज दिखाई पड़ रहे हैं और न ही कोई राजनीतिक दल।

यदि सारे नेता एक हो जाएं तो भी वे नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते, क्योंकि राष्ट्रव्यापी लहर उठाने के लिए देश को एक नया और बेदाग चेहरा चाहिए। तीन ऐसे चेहरे हो सकते थे। नीतीश कुमार, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल लेकिन, तीनों तात्कालिक लोभ में फंसकर दीर्घकालिक लाभ के मार्ग से अलग हट गए। हमारे दलीय नेताओं की आज हालत ऐसी हो गई है, जैसी लकवाग्रस्त पहलवानों की होती है। 2019 तक मोदी कितने ही कमजोर हो जाएं लेकिन, इन सब लकवाग्रस्त पहलवानों को वे पटकनी मारने लायक तब भी रहेंगे। ये पारम्परिक नेता वर्तमान सरकार का बाल भी बांका नहीं कर सकते, क्योंकि मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है और इस बीच भाजपा ने 2019 के चुनाव के लिए हर तरह से जबर्दस्त तैयारी कर ली है। जब भी देश में किसी एक नेता की पकड़ जरूरत से ज्यादा हो जाती है, उसकी पार्टी में उसके आगे कोई मुंह खोलने लायक नहीं रहता और विरोधी दल भी लुंज-पुंज हो जाते हैं, तब कोई न कोई अराजनीतिक ताकत उभरती है। 1977 में जयप्रकाश नारायण न होते और 2014 के पहले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे न होते तो क्या इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी को सफल चुनौती दी जा सकती थी? मोदी को सफल चुनौती देनेवाला कोई अ—राजनीतिक नेता आज कौन हो सकता है ?

राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार नेताओं ने मिलकर जरूर गिराई लेकिन, मोदी पर बोफोर्स-जैसे किसी आरोप के लगने की संभावना नहीं है और भाजपा, भाजपा है, कांग्रेस नहीं है। भाजपा में विश्वनाथप्रताप सिंह जैसे किसी बागी मंत्री की कल्पना करना भी असंभव है। यह तो अनुशासितों की पार्टी है। इसके जीवनदानी बुजुर्ग नेताओं की सहनशीलता भी बेजोड़ है। वे मुंह खोलने की बजाय आंखें खोलकर सिर्फ ‘मार्गदर्शन’ करते रहते हैं। अत: 2019 तक इस सरकार के लिए खतरे की घंटी बजना मुश्किल-सा ही लगता है। इस सरकार के लिए तो राहुल गांधी वरदान की तरह हैं। जब तक वे सबसे बड़े विरोधी दल के नेता हैं, मोदी खूब खर्राटे भर सकते हैं। लेकिन, वे खर्राटे भरने की बजाय देश और विदेश में निरंतर दहाड़ते रहते हैं। पता नहीं, उन अनवरत दहाड़ों के बीच उन्हें वह कानाफूसी भी सुनाई देती है या नहीं, जो उनकी पार्टी में उनके खिलाफ चल पड़ी हैं और वे टीवी चैनलों पर खुद को दमकता हुआ तो रोज ही देखते हैं लेकिन, उन्हें वंचितों और पीड़ितों का वह मौन मोह-भंग भी कभी दिखाई देता है या नहीं, जो किसी भी समय बगावत की लहर बन सकता है?

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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जब केजरी पार्टी ‘पीटी’ जा रही थी तो कांग्रेसी उपदेश देते थे, अब कांग्रेसी ‘मारे’ जा रहे तो आपिये आइना दिखाने लगे!

Sheetal P Singh : अनुभवी लोग… अहमद पटेल पर बन आई तो अब बहुतों को लोकतंत्र याद आ रहा है ………आना चाहिये पर शर्म भी आनी चाहिये कि जब बीते ढाई साल यह बुलडोज़र अकेले केजरीवाल पर चला तब अजय माकन के नेतृत्व में कांग्रेसी राज्यपाल के अधिकारों के व्याख्याकारों की भूमिका में क्यों थे? जब एक बेहतरीन अफ़सर राजेन्द्र कुमार को सीबीआई ने बेहूदगी करके सिर्फ इसलिये फँसा दिया कि वह केजरीवाल का प्रिंसिपल सेक्रेटरी था तब भी लोकतंत्र की हत्या हुई थी कि नहीं? जब दिल्ली के हर दूसरे आप विधायक को गिरफ़्तार कर करके पुलिस और मीडिया परेड कराई गई तब भी यमुना दिल्ली में ही बह रही थी! तब कांग्रेसी बीजेपी के साथ टीवी चैनलों में बैठकर केजरीवाल को अनुभवहीन साबित कर रहे थे! अब अनुभव काम आया?

मोदी जी व अमित शाह की जोड़ी इस देश के हर मानक को चकनाचूर करके एक तानाशाह राज्य के चिन्ह स्थापित कर रही है। इनकम टैक्स ई डी सीबीआई आदि नितांत बेशर्मी से स्तेमाल किये जा रहे हैं। फिलवक्त इनकम टैक्स ने कर्नाटक के उस मंत्री के यहाँ छापा मारा है जिसके यहाँ गुजरात के कांग्रेसी विधायकों को पोचिंग से बचाकर रक्खा गया है! इंदिरा / संजय की तानाशाही का भी एक दौर था! कांग्रेस को वहाँ तक पहुँचने में कई दशक लग गये थे ये डिजिटल पार्टी है सो बुलेट स्पीड से हर पड़ाव पार कर रही है।

पत्रकार से उद्यमी फिर आम आदमी पार्टी के नेता बने शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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कांग्रेस के मनसबदार

अनेहस शाश्वत, लखनऊ

कांग्रेस का फिलहाल का पराभव देख दिमाग में अनायास मुगलों की मनसबदारी प्रथा की याद कौंध गयी। यह मनसबदार ही थे जिन्होंने मुगलों को दुनिया की अतुलनीय और चकाचौंध वाली ताकत बनाया और मनसबदारों के ही चलते आखिरी मुगल बादशाहों की ताकत लाल किले के भीतर तक ही सीमित होकर रह गयी। आज के माहौल में भी मनसबदार हालांकि एक जाना-माना और चलता हुआ शब्द है लेकिन मनसबदार और मनसबदारी दरअसल होती क्या थी, यह बहुत कम लोग जानते हैं। इसके विश्लेषण से शायद कांग्रेस के पराभव पर भी कुछ रोशनी पड़ सके इसलिए इसे जानना अप्रासंगिक नहीं होगा।

मुगल साम्राज्य को ताकतवर बनाने के लिए सम्राट अकबर ने कई नई मौलिक संस्थाओं की स्थापना की। मनसबदारी भी ऐसी ही एक संस्था थी। यह संस्था साम्राज्य के लिए प्रशासन, कर वसूली और सैन्य संचालन हेतु योग्य व कुशल व्यक्ति तैयार करती थी। संस्था के भीतर चेक और बैलेंस सिस्टम का भी अनोखा इंतजाम किया गया था। मनसबदारी की सबसे छोटी इकाई थे जात और सवार।

जात का मतलब पैदल सैनिक और सवार का मतलब घुड़सवार। सबसे छोटी मनसबदारी में दो सौ सवार और दो सौ जात होते थे। उनके नेतृत्व के लिए एक मनसबदार होता था। इस को एक छोटी जागीर दी जाती थी जिसकी आमदनी से वह खुद को और अपने जात-सवारों को तनख्वाह देता था। और बचा लगान सरकारी कोष में जमा करा देता था। उस जागीर में लगान वसूली और शुरूआती कानून व्यवस्था कायम रखने का काम भी उसी मनसबदार का था। यह अपने से ऊंचे मनसबदार से संबद्व होता था जो पांच सौ सवार-जात का मनसबदार होता था।

मनसबदारों का यह क्रम सात हजारी तक जाता था, यानि सात हजार सवार और सात हजार जात पर एक सात हजारी मनसबदार होता था, जो आमतौर पर मुगल साम्राज्य के इक्कीस सूबों में से किसी एक सूबेदार के प्रति जवाबदेह होता था, और यह इक्कीस सूबेदार सीधे मुगल सम्राट को रिपोर्ट करते थे। भिन्न स्तर के मनसबदारों को उनकी हैसियत से जागीरें दी जाती थीं जो उनके खर्च के लिए होती थीं, बची रकम सरकारी कोष में जमा कर दी जाती थीं।

मुगलों के साम्राज्य में सारे प्रशासनिक और सैन्य पदों पर नियुक्ति इसी संस्था में से होती थी और मुगलों के गौरवशाली समय में अक्सर यह होता था कि दो सौ सवार-जात का मनसबदार अपनी योग्यता और कार्यकुशलता से सात हजारी मनसबदार बनने में सफल रहता था। इन मनसबदारों का बाकायदा तबादला भी होता था ताकि किसी एक जगह शक्ति संचय कर वे बादशाह को चुनौती न दे सकें।

मनसबदारी का यह ढांचा जहांगीर के शासनकाल तक जैसे का तैसा बना रहा जहां उन्नति के लिए योग्यता एक मात्र शर्त थी। शाहजहां का समय आते-आते इसमें वंशानुगत होने के चिन्ह प्रगट होने लगे थे। तब बड़ा और ठहरा हुआ साम्राज्य था, इसमें योग्यता से अधिक इतर गुणों की आवश्यकता थी। आरंगजेब के समय में यह ढांचा पूरी तरह भ्रष्ट और वंशानुगत हो गया। अब मनसबदारों की पहली प्राथमिकता साम्राज्य और बादशाह का नहीं वरन अपना कल्याण करने की थी।

कई बार ऐसा हुआ कि दिल्ली में बैठे शाहजहां या औरंगजेब ने दक्षिण के उपद्रवियों से निपटने के लिए वहां के स्थानीय मनसबदारों को आदेश दिया लेकिन आदेश का पालन करने के बजाय वे विद्रोहियों से मिलकर चैन की वंशी बजाते रहे। बहरहाल प्रतापी औरंगजेब के चलते उसके समय तक मनसबदारी प्रथा काफी कुछ सफलतापूर्वक कार्य करती रही लेकिन उसके बाद के बादशाहों के समय मनसबदार खुदमुख्तार होते गये और इनमें जो सूबेदार थे उन्होंने अपने-अपने सूबों में अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली, जिसमें वे बादशाह के लिए नाममात्र के लिए जिम्मेदार थे। नतीजे में आखिरी मुगल बादशाह लालकिले तक सीमित होकर रह गये।

याददाश्त पर जोर डालें तो याद आयेगा कि कांग्रेस का ढांचा भी ऐसा था कि शुरुआत चवन्निहा मेंबरशिप से करके कांग्रेस का अदना सा कार्यकर्ता मुख्यमंत्री, राज्यपाल और प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा था। कांग्रेस के शुरुआती समय में चवन्नी देकर कांग्रेस की मेंबरशिप ली जाती थी। यह साधारण कांग्रेसी स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में सक्रिय कार्यकर्ता थे जो अपने कार्यों और योग्यता के बल पर वरिष्ठ पदाधिकारी बन जाते थे। स्वतंत्रता के बाद ये ही सत्ता के विभिन्न स्तरों पर काबिज हो गये।

यह सिलसिला इंदिरा गांधी के समय तक कमोबेश बदस्तूर चला। अगर जवाहरलाल नेहरू को वंशानुगत शासन की मानसिकता का मान भी लिया जाये तो यह कांग्रेस के कामराज सरीखे मनसबदार ही थे जो नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री के पक्ष में लामबन्द हुये। हालांकि इंदिरा गांधी के करिश्माई नेतृत्व के तले कांग्रेस संगठन का काफी कुछ क्षरण भी हुआ लेकिन काफी हद तक नीचे से ऊपर जाने की परंपरा बनी रही।

राजीव गांधी के साथ ही कांग्रेस पूरी तरह से और घोषित तौर पर शीर्ष से निम्न स्तर तक वंशानुगत संगठन के सहारे चलने लगी, इसमें निष्ठा, नेतृत्व के प्रति कम अपने प्रति ज्यादा होती है। ऐसे संगठन बहुत दिन नहीं चलते। कांग्रेस भी नरसिंह राव के बाद लड़खड़ाई, लेकिन सहानुभूति से उपजे सोनिया गांधी के करिश्माई नेतृत्व में उसे फिर संजीवनी मिली। लेकिन इस लंबी अवधि का उपयोग संगठन और सत्ता के वंशानुगत मनसबदारों ने केवल स्वार्थ सिद्धि में किया।

नतीजे में कांग्रेस का ढांचा पूरी तरह बिखर गया और फिलहाल महारानी दस जनपथ तक सीमित होकर रह गयी हैं। दुखद यह भी है कि भयानक हार के बावजूद कांग्रेस के इस वंशानुगत मनसबदारी से निकलने के कोई संकेत नहीं हैं। भारत के लोकतंत्र को सामंती लोकतंत्र भी कहा जाता है। हो सकता है ‘समय‘ भारतीय लोकतंत्र को इस अवस्था से गुजारने के बाद अमेरिका और इंग्लैंड सरीखा आधुनिक लोकतंत्र बनाने की ओर अग्रसर करे।

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. घुमक्कड़ी, यायावरी, किस्सागोई और आरामतलबी इनके स्वभाव में हैं. इन दिनों वे लखनऊ में रहकर जीवन की आंतरिक यात्रा के कई प्रयोगों से दो-चार हो रहे हैं. उनसे संपर्क 9453633502 के जरिए किया जा सकता है.

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यूपी में पीके ने सीएम पद के लिए राहुल, प्रियंका और शीला दीक्षित का नाम सुझाया

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश कांग्रेस में हमेशा से काबिल नेताओं की लम्बी-चौड़ी फौज रही है। कई नेताओं के नाम गिनाये जा सकते हैं जिन्होंने अपने दम से प्रदेश ही नहीं पूरे देश में अपना नाम रोशन किया। फिर भी यूपी में कांग्रेस मरणासन स्थिति में हो तो आश्चर्य होता है। 27 वर्षो से वह सत्ता से बाहर है। इन 27 वर्षो में सत्ता में वापसी के लिये कांग्रेस लगातार प्रयासरत् रही है। जब भी चुनावी बिगुल बजता है कांग्रेसी ‘सपनों की उड़ान’ भरने लगते हैं, लेकिन अंत में निराशा ही हाथ लगती है।

यूपी में असफलता का लम्बा दौर कांग्रेस का पीछा ही नहीं छोड़ रहा है, जो कांग्रेस कभी यूपी में सबसे अधिक ताकतवर हुआ करती थी आज मात्र 28 सीटों पर सिमट गई है। पिछले 27 वर्षो में न तो पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता राजीव गांधी कुछ कर पाये न ही सोनिया और राहुल गांधी का यहां सिक्का चला। प्रियंका वाड्रा गांधी ने सीधे तौर पर तो यूपी की राजनीति में दखल नहीं दिया, लेकिन मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्रों में वह जरूर जनता से संवाद स्थापित करके मां-भाई के लिये वोट मांगती नजर आती रहती थीं।

यूपी में नेताओं की दमदार फौज होने के बाद भी कांग्रेस अगर हासिये पर है तो इसकी वजह भी यही नेता हैं, जो अपने आप को पार्टी से बड़ा समझते हैं। यह नेता मौके-बेमौके अपने आचरण से संगठन की फजीहत कराते हैं। पार्टी की लाइन से हट कर बयानबाजी करते हैं। कद बड़ा होने के कारण इन नेताओं के खिलाफ आलाकमान भी कार्रवाई करने से कतराता रहता है। कांग्रेस जिस समय सत्ता से बाहर हुई उस समय बलराम सिंह यादव प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। उनके हटने के बाद महाबीर प्रसाद को दो बार प्रदेश की कमान सौंपी गई। इसी प्रकार नारायण दत्त तिवारी को भी दो बार प्रदेश अध्यक्ष बनने का सौभाग्य मिला। सलमान खुर्शीद भी सात वर्षो तक प्रदेश अध्यक्ष रहे। इसी कड़ी मंे श्री प्रकाश जायसवाल,जगदम्बिका पाल(अब भाजपा में), डा; रीता बहुगुणा जोशी और अब निर्मल खत्री का नाम लिया जा सकता है।

महावीर प्रसाद प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के राज्यपाल बने। उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनने का भी मोका मिला। नारायण दत्त तिवारी यूपी के सीएम बने और बाद में उत्तराखंड के भी मुख्यमंत्री रहे। मुसलमानों को लुभाने के लिये सलमान खुर्शीद को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह दी गई। इसी प्रकार श्री प्रकाश जायसवाल भले ही प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर सफल नही रहे हों, लेकिन उन्हें भी यूपीए सरकार में मंत्री बनने का मौका मिला। मौजूदा नेताओं में सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद वर्मा, डा0 रीता बहुगुणा जोशी, निर्मल खत्री जैसे तमाम नेताओं का नाम लिया जा सकता है, जो अपने आप को पार्टी से बड़ा समझते हैं। इन नेताओं के अहंकार का खामियाजा पार्टी भुगत रही है। कांग्रेस में गुटबाजी और सिरफुटव्वल का यह हाल है कि यहां कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा गांधी तक के समाने कांग्रेसी आपस में भिड़ जाते हैं।

अपने कर्मो से मरणासन कांग्रेस को नया जीवनदान देने के लिये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सेवा क्या ली, प्रशांत को लेकर कांग्रेसी आपस में ही झगड़ने लगे हैं, जबकि इससे बेफिक्र प्रशांत किशोऱ उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के साथ-साथ प्रियंका गांधी, शीला दीक्षित पर दांव लगाने का मन बना रहे हैं। पहले मोदी, फिर नीतीश और अब राहुल गांधी के लिए सियासी प्लान बना रहे प्रशांत किशोर यानी पीके का प्लान कुछ इस तरह का है, जिसके तहत यूपी में मायावती और अखिलेश के सामने कांग्रेस की तरफ से एक बड़ा और भरोसेमंद चेहरा होना जरूरी है। पीके को लगता है कि अगर राहुल गांधी खुद मुख्यमंत्री का चेहरा बन जाये तो इसका फायदा उसे न केवल यूपी के विधान सभा चुनाव में होगा, बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस की स्थिति मजबूत होगी।

पीके की रणनीति अगड़ी जाति, मुस्लिम और पासी का समीकरण बनाने की है। बीजेपी पहले ही ओबीसी पर दांव लगा चुकी है. इसीलिए वो लगातार बड़े ब्राह्मण चेहरे पर जोर दे रहे हैं। रणनीति के तहत अगर ब्राह्मणों की कांग्रेस में घर घर वापसी होती है, आधा राजपूत मुड़ता है तो मुस्लिम भी कांग्रेस के पाले में आ सकते हैं। दरअसल, पीके यूपी चुनाव में कांग्रेस को आर-पार की लड़ाई लड़ने की सलाह दे रहे हैं और पूरी ताकत झोंकने को कह रहे हैं. इसके लिए वो बिहार की तर्ज पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की बीजेपी की सियासत से भी निपटने को तैयार हैं। पीके के करीबी मानते हैं कि बड़ा चुनाव जीतकर ही राहुल और कांग्रेस दोबारा खोयी ताकत वापस पा सकते हैं।

पीके की सलाह पर गांधी परिवार इसी महीने फैसला सुना सकता है। अगर सीए की कुर्सी के लिये राहुल- प्रियंका पर सहमति नहीं हुई तो पीके ने शीला दीक्षित का भी नाम सुझाया है। दरअसल, पीके की सलाह है कि कांग्रेस के वो ब्राह्मण चेहरे जो पिछले 27 सालों से यूपी की सियासत में हैं, उनसे काम नहीं चलेगा।इसी लिये वह पुराने चेहरों को किनारे करके कुछ नये और दमदार चेहरे तलाश रहे हैं। पुराने चेहरों को किनारे करने के चक्कर में ही पीके कांग्रेसियों के निशाने पर चढ़े हुए हैं। वह न तो पीके को कोई तवज्जो दे रहे हैं, न ही उनकी रणनीति पर अमल कर रहे हैं। पूरे प्रदेश की बात छोड़ दी जाये राहुल और सोनिया के सियासी गढ़ अमेठी और रायबरेली में भी पीके की नहीं सुनी जा रही है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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भाजपा और कांग्रेस दोनों अपराधी पार्टियां : जस्टिस काटजू

Markandey Katju : Criminal Organizations… I regard the Congress and the BJP as criminal organizations. In 1984 that criminal gangster Indira Gandhi, who imposed a fake ‘ Emergency’ in 1975 in India in order to hold on to power after she had been declared guilty of corrupt election practices by the Allahabad High Court, an ‘ Emergency in which even the right to life was suspended, and lacs of Indians were falsely imprisoned, was assassinated.

As a reaction, the Congress Party led by Rajiv Gandhi organized a slaughter of thousands of innocent Sikhs, many of whom were burnt alive by pouring petrol or kerosene on them and setting them on fire. When there were protests against this horrendous crime, Rajiv Gandhi said ‘ jab bada ped girta hai, dharti hil jaati hai’ (when a big tree falls, the earth shakes). It is believed that he gave oral instructions to the police not to interfere with the massacres for 3 days (see my blog ‘The 1984 Sikh riots’).

Soon after these horrible massacres, elections to the Lok Sabha was declared, and Congress swept the polls on this emotional wave winning a record 404seats in the 532 seat Lok Sabha, while BJP won only 2 seats.

In 2002 the massacre of Muslims was organized in Gujarat by BJP led by our friend, and the result was that BJP has been regularly winning the Gujarat elections ever since, and has even won the Lok Sabha elections in 2014.

So the message which has been sent is loud and clear : organize massacre of some minority in India, and you will sweep the polls. Never mind how much misery you cause to many people.

Are not the Congress and BJP, and even many smaller political parties, which are responsible for horrible deeds and for systematically looting the country of a huge amount of money for decades, and for causing such terrible sufferings and misery to the people, criminal organizations, most of whose members deserve the gallows?

देश के शीर्षस्थ चर्चित न्यायाधीश रहे और अपनी बेबाक बयानी व बेबाक लेखनी के लिए विख्यात जस्टिस मार्कंडेय काटजू के फेसबुक वॉल से.

जस्टिस काटजू साहब का लिखा ये भी पढ़ें>

Great Injustice to Urdu in India

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भारत में क्रांति के लिए माहौल तैयार… वजह गिना रहे हैं जस्टिस काटजू

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कानपुर में कांग्रेस नेता ने सम्पादक को दी जूतों से मारने की धमकी

कानपुर : स्वतंत्रता दिवस पर शहर में कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला द्वारा लगवाई गई त्रुटि पूर्ण होर्डिंग्स के बारे में खबर प्रकाशित करने पर ‘जन सामना’ के सम्पादक श्याम सिंह पंवार को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। शुक्ला ने कहा है कि ‘जन सामना’ समाचार पत्र का लाइसेन्स जब्त करवा दूंगा। पत्रकार को अपने घर बुलाकर जूते से मारने की दी धमकी। 

 

शुक्ला ने यह भी कहा कि कार्यालय का घेराव करवा दूंगा और भविष्य में खबर चलाने पर कहा कि गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार हो जाओ। पुलिस के पास जाकर देखो, नतीजा सामने आ जायेगा। कानपुर में छुट भैये कांग्रेसी नेताओं का बोलबाला है। गत 14 अगस्त को कानपुर दक्षिण के कई प्रमुख चैराहों पर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं के बैनर कथित कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला ने लगवा रखे थे, जिसमें आजाद हिन्द फौज के सेनानी शुभाष चन्द्र बोस की फोटो के नीचे चन्द्रशेखर आजाद का नाम छपा था और शहीद चन्द्रशेखर आजाद की फोटो के नीचे भगत सिंह का नाम छपा था। इसके अलावा इन्दिरा गांधी का भी नाम शहीदों में शुमार था।

कानपुर सहित पूरे यूपी में शहीदों के इस अपमान की चर्चा खूब वायरल हुई। कानपुर के एक साप्तहिक समाचार ‘जन सामना’ ने भी इस खबर को प्रमुखता से छापा। ये बात अम्बुज शुक्ला को बर्दाश्त नहीं हुई। उसने अखबार के सम्पादक को फोन कर अखबार का लाइसेंस जब्त करवाने, पत्रकार को जूते – जूते मारने, और कार्यालय का घेराव करवाने जैसी कई धमकियां दे डालीं। सम्पादक को खुली धमकी उनके मोबाइल में रिकार्ड हो गयी और उन्होंने इसकी शिकायत आईजी के एक भरोसे के नंम्बर पर की। खबर लिखे जाने तक सूत्रों के अनुसार एक कांग्रेसी विधायक के दबाव में एफआईआर दर्ज नहीं हो सकी थी। 

बड़ा सवाल ये है कि क्या पत्रकार खबर लिखना छोड़ दें, अगर नहीं तो अपनी जान जोखिम में डाल सच्चाई सबके सामने रखने वाले पत्रकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है ? दूसरी ओर एक बार फिर कानपुर के पत्रकार संगठनों ने इस मामले में उदासीनता दिखायी है क्योंकि इस मामले में एक दबंग कांग्रेसी विधायक का नाम भी आया है।

अपना कद ऊँचा करने की जद्दोजेहद में काँग्रेसी विधायक अजय कपूर और नेता अम्बुज शुक्ला और बर्रा इलाके में स्थित राशी एडवर्टाइज़र दोनों ने देश के वीर सपूतों का मज़ाक बनाया। “चंद्र शेखर आज़ाद” को बना दिया “भगत सिंह” और “सुभाष चन्द्र बोस” को बना दिया “चंद्र शेखर आजाद”। शहीदों के नाम भूल गए हवाबाज़ नेता। इंडिया न्यूज के रिपोर्टर ज्ञानेंद्र शुक्ला ने इस संबंध में आईजी को शिकायती पत्र लिखा है- 

श्री मान आईजी ज़ोन महोदय, 

थाना कल्याणपुर के छापेड़ा पुलिया इलाके में कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला और विधायक अजय कपूर ने होर्डिंग लगवाई थी जिसमे शहीदों के नाम गलत अंकित थे । इस पर सभी चैनल्स और अखबारों ने खबर छापी थी । कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला ने दैनिक जन सामना के पत्रकार महेंद्र कुमार को फोन से धमकी दी और अपशब्द कहे । ये पत्रकारिता का हनन है । लिहाजा इस मामले में कांग्रेसी नेता अम्बुज शुक्ला पर देश के लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर हमला करने का मुकदमा दर्ज किया जाए । फोन से धमकी का ऑडियो भेज दिया गया है ।

ज्ञानेन्द्र शुक्ला, रिपोर्टर – इंडिया न्यूज, कानपुर Mob. 9648330888

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राहुल गांधी के एक्शन से संघ परिवार के मीडिया नियंत्रण और सरकार नियंत्रण की चूलें हिलीं

राहुल गांधी की नई इमेज परिवर्तनकामी है, खुली है, यह कांग्रेस के मूल स्वभाव से भिन्न है। कांग्रेस का मूल स्वभाव सत्ता अनुगामी और छिपाने वाला रहा है, जबकि राहुल गांधी सत्ता से मुठभेड़ कर रहे हैं, पार्टी को खेल रहे हैं। वे इस क्रम में दो काम कर रहे हैं, पहला यह कि वे कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन कर रहे हैं, पुरानी नीतियों से अपने को अलगा रहे हैं, उन पर क्रिटिकली बोल रहे हैं। इससे नई राजनीतिक अनुभूति  अभिव्यंजित हो रही है।

कांग्रेस के शिखर नेतृत्व में यह प्रवृत्ति रही है कि वह नीतियों पर हमले कम करता रहा है लेकिन राहुल इस मामले में अपवाद हैं, वे मनमोहन सिंह के जमाने में भी नीतिगत मसलों पर निर्णायक हस्तक्षेप करते थे और इन दिनों तो वे भिन्न तेवर में नजर आ रहे हैं। इस क्रम में समूची कांग्रेस की मनोदशा में परिवर्तन घटित हो रहा है।

आज राहुल गांधी पहल करके जनता के मसलों को उठा रहे हैं, जनांदोलनों के बीच में जा रहे हैं। हाल ही में पूना फिल्म एवं टीवी संस्थान और पूर्व सैनिकों के आंदोलन स्थल पर राहुल गांधी का जाना शुभलक्षण है। राहुल गांधी पूना संस्थान के छात्रों के जुलूस के साथ राष्ट्रपति से मिलने गए, यह सामान्य घटना नहीं है।

कांग्रेस ने कभी इस तरह के जनांदोलनों में, अन्य के द्वारा संचालित आंदोलन में शिरकत नहीं की है। मेरी जानकारी में राहुल गांधी से पहले कभी किसी कांग्रेसी शिखर नेता ने जनांदोलन के साथ खड़े होकर राष्ट्रपति को मांगपत्र पेश नहीं किया। यह नया फिनोमिना है और इसका स्वागत होना चाहिए।

यह बात साफ नजर आ रही है कि राहुल गांधी जो कह रहे हैं वैसा ही वे आचरण कर रहे हैं और उसी दिशा में राजनीतिक चक्र घूम भी रहा है।

जगदीश्वर चतुर्वेदीभूमि अधिग्रहण कानून को लेकर कांग्रेस ने जो कहा उसे तकरीबन करके दिखा दिया है, मोदी सरकार कई बार अध्यादेश निकालकर भी इस कानून को लागू नहीं कर पाई है। साथ ही भाजपा करप्ट है यह संदेश आम जनता में सम्प्रेषित करने में राहुल गांधी पूरी तरह सफल रहे हैं। इससे मोदी सरकार की साख में बट्टा लगा है, उनके भाषणों की लय टूटी है। चमक फीकी पड़ी है।

राहुल गांधी के नए रूप ने कांग्रेसी राजनीति को पारदर्शी, आक्रामक और सेल्फ क्रिटिकल बनाया है। बार-बार हर कदम पर कांग्रेस को अपनी ही सरकार के नीतिगत फैसलों की आत्मालोचना भी करनी पड़ रही है। इससे कांग्रेस में नई संस्कृति बन रही है और इससे भाजपा-संघ बहुत परेशान हैं। यही वजह है कि वे हर मसले पर राहुल गांधी पर व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं, अ-राजनीतिक कमेंटस कर रहे हैं।

दूसरी बड़ी बात यह है कि राहुल के एक्शनों पर मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक सकारात्मक राय बन रही है और इससे नए किस्म की कांग्रेस के जन्म की संभावनाएं पैदा हो रही हैं।

हस्तक्षेप से साभार

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अपना न्यूज चैनल शुरू करने पर गंभीरता से विचार कर रही कांग्रेस

दिल्ली : पूर्व केंद्रीय मंत्री एके एंटनी ने संकेत दिया है कि कांग्रेस पार्टी जनता तक सीधी पहुंच बनाने के लिए एक राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल शुरू करने पर गंभीरता से विचार कर रही है।

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एके एंटनी ने कहा है कि जयहिंद टीवी को एक राष्ट्रीय चैनल में तब्दील करने को लेकर चर्चा जारी है। गौरतलब है कि जयहिंद टीवी को केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से कुछ समय पहले शुरू किया गया था। 

एंटनी ने दिल्ली में जयहिंद टीवी के राष्ट्रीय ब्यूरो के नये कार्यालय के उदघाटन के बाद बोलते हुए नये जमाने की संचार प्रणालियों के इस्तेमाल में पीछे रह जाने की बात स्वीकार की। उनका मानना है कि टीवी चैनल के माध्यम से लोगों तक कांग्रेस की विचारधारा कारगर तरीके से पहुंचाई जा सकती है। 

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एक तरफ ‘मेक इन इंडिया’ का नारा, दूसरी तरफ छंटनी से लेकर मंदी तक की परिघटनाएं

कांग्रेस की श्रम विरोधी व कारपोरेट परस्त नीतियों से त्रस्त जनता को मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया‘ और ‘कौशल विकास‘ के नारे से बहुत उम्मीद जगी थी। परन्तु आशा की यह किरण धुंधली पड़ने लगी है। उद्योगों  के निराशाजनक व्यवहार को साबित करते हुये देश की दूसरे नम्बर की ट्रैक्टर बनाने वाली कम्पनी ने अपने संयत्रों से 5 प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी कर दी है। गनीमत यह रही कि एक प्रतिष्ठित दक्षिण भारतीय महिला की छत्रछाया में चलने वाले इस औद्योगिक समूह से निकाले जाने वाले कर्मियों के प्रति संवेदना दिखाते हुये प्रबन्धन ने उन्हें पहले से ही सूचना देने के साथ साथ न केवल तीन माह का ग्रोस वेतन दिया। बल्कि छंटनी ग्रस्त कर्मियों के लिये एक सुप्रसिद्व जॉब कन्सलटेंट की सेवायें दिलवाकर उन्हें दूसरी कम्पनियों में नौकरी दिलवाने की भी कोशिश की। 

वहीं दूसरी और दिल्ली आधारित आटोमोटिव कलपुर्जे  बनाने व लगभग 16990 करोड़ टर्नआवर एवं हजारों कर्मचारियों की मदद से चलने वाली एक नामी कम्पनी अपने प्रमुख संयत्रों से 20 प्रतिशत स्थाई व 10 प्रतिशत अस्थाई कर्मियों को बाहर करने का लक्ष्य पूरा करने के करीब है। कम्पनी के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के हरियाणा, राजस्थान सहित पूरे देश स्थित बहुत से संयत्रों से अभियन्ताओं, प्रबन्धकों व अन्य कर्मियों को सड़क पर खड़ा कर दिया गया है। इसी कम्पनी में 7 वर्ष से कार्यरत व अपने काम में पूणतया दक्ष हरियाणा के एक इंजीनियर जिनको एक दिन दिल्ली स्थित कार्यालय बुलाकर त्यागपत्र लिया गया।

वे कहते हैं सरकार अकुशल नौजवानों को कुशलता का प्रक्षिक्षण देने के लिये (स्किल डवेलपमेन्ट) कौशल विकास के तहत करोड़ों रूपये खर्च करके रोजगार दिलाने की बात करती है। परन्तु जो इंजीनियर, कामगार पहले से ही अपने खर्चे पर डिग्री, डिप्लोमा लेकर कुशलता प्राप्त कर देश के निर्माण में लगे हुये हैं। अगर उन्हें इस तरीके से बाहर किया जा रहा है। तो सरकार के नये युवकों को कुशल बनाने के ‘कौशल विकास‘ के नारे पर कौन विश्वास करेगा?

नई दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया से इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री लेकर 15 वर्षों से इसी कम्पनी में कार्यरत एक दूसरे शख्स के मुताबिक उदारीकरण व वैश्वीकरण की नीतियों के चलते विकास व तकनीक के गुब्बारे ने मानवीय मूल्यों को धराशायी कर दिया। कभी अच्छी कम्पनियों में कार्यरत कर्मियों के 10 या 15 साल का कार्यकाल पूरा होने पर चेयरमैन अपने हाथों से ‘लम्बी अवधि पुरस्कार‘ देता था। आज मुझे 15 वर्षों की सेवा के वदले पहले से ही लिखित त्यागपत्र पर हस्ताक्षर करने के लिये 15 मिन्ट का भी समय नहीं दिया गया। क्या भारतीय संस्कृति का दम भरने वाली सरकार की छत्रछाया में कारपोरेट को ‘यूज़ एण्ड थ्रो‘ (इस्तेमाल करो व फेंको) जैसी पश्चिमी अवधारणा को अपनाने की खुली छूट मिल चुकी है?

क्या विगत 20 वर्षों में मात्र कुछ करोड़ से लगभग 16990 करोड़ की टर्नआवर पर पहुंची इस कम्पनी को मोदी सरकार की असहयोग की नीतियों के चलते ऐसा कदम उठाना पड़ा या कांग्रेस के शासन में ऐसी कम्पनियां गलत ढंग से विकसित हुई, जिसे वर्तमान सरकार की दूरगामी व खराब कम्पनियों पर लगाम कसने की नीति के परिणाम स्वरूप यह सव हुआ? या इसका कारण केवल आर्थिक मन्दी है? यह बहस का विषय हो सकता है। 

एक प्रमुख आर्थिक अखबार के मार्च 2015 के एक अंक के अनुसार इस कम्पनी द्वारा जर्मनी की एक कम्पनी को 175 मिलियन यूरो (लगभग 1200 करोड़ रू) में खरीदने की योजना थी। भारतीय मूल की इस कम्पनी के वैश्विक मुखिया जोकि एक विदेशी है, ने इस अधिग्रहण की पुष्टि समूह की वेबसाईट पर 22 मई को जारी प्रेस रिलीज में की । यद्यपि इस में अधिग्रहण की राशि का जिक्र नहीं किया गया। तो क्या कम्पनी भारतीय संयत्रों को आंशिक रूप में ही चलाकर विदेश में पैसा लगा रही है ? अर्थात कम्पनी  ‘मेक इन इंडिया‘ की अपेक्षा ‘मेक इन जर्मनी‘ के नारे में ज्यादा विश्वास करती है ? 

सड़क पर आ चुके कुशल व शिक्षित कर्मचारी क्या इसे अच्छे दिनों का आगमन मान रहे हैं। कुछेक के अनुसार टेलिवजन चैनल व मीडिया कुछ भी कहें। परन्तु उनके 15-20 वर्ष के कैरियर में शायद यह सबसे बुरे दिन हैं। मोदी सरकार की ‘बीमा सुरक्षा योजना‘, ‘अटल पेंशन योजना‘ व ‘स्वच्छ भारत अभियान‘ निश्चित रूप से सराहनीय कदम हैं। पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक रिश्तों व आंतकवाद के विरूद्व अगर पूर्णरूपेण नहीं तो कम से कम पुरानी सरकार की अपेक्षा सरकार का प्रर्दशन कहीं बेहतर है।  परन्तु एक और जहां सरकार 7.5 प्रतिशत विकास दर बताकर विदेशों में भारत को एक उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में पेश कर रही है। वहीं देश के आर्थिक विकास की रीढ़ माने जाने वाले नामी उद्योगों में कार्यरत शिक्षित कर्मियों की ऐसी बदहाली के क्या संकेत माने जाने चाहिये ? यह कटु सत्य है कि वर्तमान व्यवस्था व अधिकांश मीडिया कारपोरेट व शोषक वर्ग के पक्ष में होने के कारण ऐसी घटनाएं आमजन तक कम ही पहुंचती हैं। परन्तु अगर यही क्रम छुपते छुपाते भी चलता रहा तो इसका परिणाम अंततः उद्योगपतियों, मानव संसाधन, सत्ता व देश किसी के भी हित में नहीं होगा। 

लेखक संजीव सिंह ठाकुर से संपर्क : singhsanjeev7772@gmail.com

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कांग्रेस के पास रॉबर्ट वाड्रा, भाजपा के पास दुष्यंत, अब खेल बराबरी का

मेरे पास माँ है… यह फिल्मी डायलॉग तो पुराना हो गया है। अब तो राजनीति में नया डायलॉग चल रहा है कि तुम्हारे पास (कांग्रेस) अगर रॉबर्ट वाड्रा है तो हमारे पास (भाजपा) भी दुष्यंत सिंह है। भला हो ललित मोदी का, जिसने कम से कम कांग्रेस की कुछ तो लाज रख ली और दामादजी वाले मामले पर पीट रही भद के बीच अब वसुंधरा के लाड़ले का मामला उजागर हो गया। 

अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ और देश की जनता की याददाश्त भी कमजोर नहीं है, जब उसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर पूरी भाजपा को भाषणों में यह कहते सुना होगा कि रॉबर्ट वाड्रा के पास ऐसा कौन सा जादुई कारोबारी नुस्खा है, जिसके बलबूते पर उन्होंने अपने एक रुपए को एक करोड़ में तब्दील कर डाला। हालांकि इन भाषणवीरों ने सत्ता में आते ही दामादजी यानि रॉबर्ट वाड्रा को जेल भिजवाने की कसमें भी कम नहीं खाई थी, मगर हर पार्टी में रॉबर्ट वाड्रा हैं इसलिए ऐसे भाषण चुनावों तक ही सीमित रहते हैं। सत्ता में आने पर भाजपा भी दामादजी को भूल गई और साथ ही विदेशों में जमा काला धन जुमले में तब्दील हो गया। 

और तो और काले धन के एक बड़े प्रतीक और भगोड़े ललित मोदी को बचाने का कलंक अवश्य सालभर तक भ्रष्टाचार के मामले में खुद को पाक साफ बताने वाली भाजपा के माथे पर लग गया है। सुषमा स्वराज ने तो ललित मोदी की मदद की ही, मगर उससे भी बड़ी मददगार तो राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे निकली, जिन्होंने ललित मोदी पर किए गए उपकारों के बदले में अपने बेटे दुष्यंत सिंह की कम्पनी नियंत हैरीटेज होटल्स प्रा.लि. में 11.63 करोड़ रुपए का निवेश ललित मोदी की कम्पनी आनंद हेरीटेज होटल्स के मार्फत करवाया और 10 रुपए मूल्य के शेयर मोदी ने 96 हजार 190 रुपए में खरीदे। अब कांग्रेस भी पूछ सकती है कि दुष्यंत सिंह ने ऐसा क्या करतब दिखाया कि उनका 10 रुपए का शेयर 96190 हजार रुपए का हो गया? यह ठीक उसी तरह का मामला है जैसा रॉबर्ट वाड्रा ने डीएलएफ के साथ संगनमत होकर किया था। हालांकि तमाम बड़े राजनेताओं ने इसी तरह के गौरखधंधे कर रखे हैं। 

ये तो रॉबर्ट वाड्रा के बाद दुष्यंत सिंह का खुलासा हो गया, जिस पर अब राजनीति से लेकर मीडिया में हल्ला मचा है। इस पूरे प्रकरण से अब भाजपा को भी रॉबर्ट वाड्रा से कारोबारी समझ लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि उनकी खुद की पार्टी के पास दुष्यंत सिंह जैसा जादूगर मौजूद है। यानि भाजपा फिजूल ही बगल में छोरा और गांव में ढिंढोरा पीटती रही। रॉबर्ट वाड्रा तो सक्रिय राजनीति में नहीं कूदे और दामादजी होने का ही पर्याप्त सुख भोगते रहे, लेकिन वसुंधरा राजे के करतबी कारोबारी पुत्र दुष्यंत सिंह तो बकायदा झालावाड़ से निर्वाचित भाजपा सांसद हैं। अब देश की निगाह प्रधानमंत्री के उन बयानों पर भी टिकी है, जिसमें वे स्वच्छ और पारदर्शी शासन देने के दावे करते हुए खम ठोंककर अपने छप्पन इंची सीने के साथ यह कहते रहे कि वे ना खाएंगे और ना खाने देंगे। हुजूर अब तो आपकी नाक के नीचे ही खाऊ ठिये खुल गए हैं। सुषमा-वसुंधरा पर ही कार्रवाई करके अपने दावों की लाज रख लो।

लेखक राजेश ज्वेल से संपर्क : 9827020830, jwellrajesh@yahoo.co.in

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कृपलानी ने सिद्धांतों की खातिर 57वें कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था

हमारे देश में राज्य श्रेष्ठ मान लिया जाता है, समाज दोयम। शायद यही कारण है कि राजपुरुष प्रधान हो जाते हैं और समाज का पहरुआ गौण। जी हाँ, इस देश में अगर ‘राज्य-समाज समभाव’ दृष्टिकोण अपनाया गया होता तो आज आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी उतने ही लोकप्रिय और प्रासंगिक होते जितने कि सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग। वह व्यक्ति खरा था, जिसने गांधीजी के ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ के सिद्धांत को जीवन पद्धति मानकर उसे अंगीकार कर लिया। उक्त विचार मशहूर स्वतंत्रता सेनानी आचार्य जे बी कृपलानी की 126वीं जयंती पर आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए गए।

यह आयोजन संयुक्त रूप से आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट तथा गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की ओर से किया गया था।  मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए कृपलानी जी के निकट सहयोगी रहे दीनानाथ तिवारी ने उनसे जुड़े अनेक प्रसंगों का जीवंत वर्णन किया। उनका कहना था कि कृपलानी कभी भी हाशिये पर नहीं गए, सिर्फ चिंतन-प्रक्रिया में आये बदलाव के कारण वे थोड़ा ओझल हो गए हैं। उन जैसे व्यक्तित्व समय, देश और काल की मर्यादा से ऊपर उठकर सदैव आदरणीय और पूजनीय रहेंगे। समाजवादी सोच रखने वाले दिल्ली वि.वि. के सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. रामचन्द्र प्रधान ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कृपलानी (दादा) को उद्धृत करते हुए कहा – ‘जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, वही सरकार चलाएगा’। कृपलानी एक मिशन के रूप में युद्ध-स्तर पर कार्य करने में विश्वास रखते थे। गांधी के सच्चे अनुयायी की तरह कुशलता में विश्वास रखते थे। उनके लिए बीच का कोई रास्ता नहीं होता था।

वरिष्ठ पत्रकार एवं कृपलानी के जीवनी लेखक रामबहादुर राय ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल (1946 -47) का जिक्र  करते हुए कहा कि उस समय देश विभाजन के दौर से गुजर रहा था लेकिन लगभग सारे नीतिगत  निर्णय सरकार के लोगों द्वारा लिए जा रहे थे। ऐसे में कृपलानी ने यक्ष-प्रश्न उठाया कि ‘पार्टी सरकार के अनुसार चलेगी या सरकार पार्टी के अनुसार?’ देश में अस्थायी सरकार का गठन 2 सितम्बर, 1946 को हो चुका था और पंडित जवाहर लाल नेहरू उपाध्यक्ष की हैसियत से शासन संचालित कर रहे थे। इसी मुद्दे पर आ. कृपलानी ने सिद्धांतों की खातिर कांग्रेस अध्यक्ष (57 वें) पद से त्यागपत्र दे दिया। पार्टी और सरकार के बीच शक्ति-पृथक्करण का यह प्रश्न आज भी जीवंत है और आचार्य कृपलानी इसके उत्तर। अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने काम तलाश रहे एक युवा पत्रकार देवदत्त से कहा था कि ‘आजकल तो मैं खुद ही बेरोजगार हूँ’। रामबहादुर राय ने कृपलानी के जीवन वृतांत को पांच खण्डों में विश्लेषित कर उपस्थित श्रोताओं का ज्ञानवर्धन किया। प्रख्यात गांधीवादी रामचन्द्र राही ने बिहार के भागलपुर जिला अंतर्गत बेराई ग्रामदान का सजीव वर्णन किया। उन्होंने यह विमर्श भी छोड़ा कि आखिर क्यों सत्ता शिखर पर मौजूद व्यक्ति सर्वगुणसंपन्न मान लिया जाता है?

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी अभय प्रताप ने कहा कि आज की पीढ़ी आचार्य कृपलानी के अवदान से ठीक से परिचित नहीं है। जबकि कृपलानी दंपत्ति आज ज्यादा प्रासंगिक और सारगर्भित हैं। देश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री (उत्तर-प्रदेश) श्रीमती सुचेता कृपलानी एवं आचार्य जे बी कृपलानी ने सात्विक और सैद्धांतिक राजनीति को अपना आदर्श माना। अभय प्रताप ने ने ट्रस्ट द्वारा हर पखवाड़े एक गोष्ठी करने की बात कही। इस अवसर पर अभय प्रताप द्वारा संपादित पुस्तिका ‘शहादत का रास्ता’ का लोकार्पण भी किया गया। यह आ. कृपलानी के पांच महत्वपूर्ण लेखों/भाषणों का संकलन है।  कार्यक्रम की शुरुआत मणिकुंतला जी (गन्धर्व महाविद्यालय) के भजनों से हुई। अंत में, गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति की निदेशक मणिमाला ने सभी के प्रति आभार प्रकट करते हुए उन्हें धन्यवाद दिया। कार्यक्रम का संचालन संत समीर ने किया।

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चिदंबरम ने किया 2जी घोटाला : हंसराज भारद्वाज

लोकसभा चुनाव और हरियाणा व महाराष्ट्र में करारी हार के बाद कांग्रेस में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। हार के बाद कई नेताओं ने पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल खड़े किए थे। अब इस कड़ी में संप्रग शासन में केंद्रीय मंत्री और कर्नाटक के राज्यपाल रहे हंसराज भारद्वाज का भी नाम जुड़ गया है। उन्होंने कहा है कि पार्टी की डूबती नैया को प्रियंका गांधी वाड्रा ही किनारे लगा सकती है।

2जी घोटाला के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को निर्दोष ठहराते हुए वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भारद्वाज ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटालों के लिए पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम दोषी हैं। एक निजी न्यूज चैनल से बातचीत में भारद्वाज ने चिंदबरम को सीधे तौर पर आरोपी ठहराते हुए कहा कि घोटाला चिदंबरम का किया है, जिसमें मनमोहन सिंह को कोई हाथ नहीं है। भारद्वाज ने बताया कि चूंकि चिदंबरम खुद पीएम बनना चाहते थे इसलिए जो भी चिदंबरम करते थे उसमें उनका साथ कपिल सिब्बल भी देते थे। यही नहीं, उन्होंने कहा कि चिदंबरम के इस खेल में यूपीए की सहयोगी पार्टी डीएमके भी शामिल थी।

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न्यूज चैनलों के लिए ‘वाड्रा मीडिया दुर्व्यवहार प्रकरण’ सत्ता के प्रति निष्ठा जताने का मौका

हरियाणा में भूमि घोटाला पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा से पूछे गए सवाल पर तिलमिलाये वाड्रा ने पत्रकारों से जो बदसलूकी की उसकी गर्मी 24 घंटे तक कायम है और शायद आगे भी कायम रहेगी। प्रायः हर चैनल एएनआई का माईक झटकने का सीन हजार बार दिखा चुका है। एक पत्रकार के रूप में हम वाड्रा के कृत्य की कड़े से कड़े शब्दों में निन्दा करते हैं। पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से कार्य करते रहने की आजादी की पुरजोर मांग करते हैं। शनिवार के प्रकरण में घटना से बड़ी राजनीति है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता।

सोनिया गांधी के दामाद को इच्छा को कोई कांग्रेस शासित प्रदेश का मुख्यमंत्री क्यों और कैसे इनकार करेगा। शायद इतनी कुव्वत किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री में नहीं हो सकती। इसलिए हरियाणा या किसी दूसरे राज्य में जहां भी राबर्ट वाड्रा की रुचि रही होगी, ना का सवाल ही नहीं हो सकता। यदि बिना सोचे-समझे हां है, तो घपले से भी इनकार नहीं हो सकता। वर्तमान में बदली राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस पार्टी के दामाद को घेरने का कोई मौका भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारें नहीं छोड़ेगी. भारतीय मीडिया इस प्रकरण में सरकार के प्रति निष्ठावान होने का अवसर देखे तो आश्चर्य क्या है? क्या कथित राष्ट्रीय मीडिया ने छोटे शहरों, गांव-देहात, कस्बों में पत्रकारों पर आये  दिन होने वाली घटनाओं दुर्घटनाओं को कभी अपनी खबर बनाया भी है?

मीडिया संस्थानों और उसके बड़े पत्रकारों के लिए गांव देहात का पत्रकार किसी कीड़े मकोड़े से अधिक अहमियत नहीं रखता। पत्रकारों की किसी भी बड़ी यूनियन ने किसी संस्थान से नहीं पूछा कि वह कस्बों गांवों के पत्रकारों के लिए क्या नीति रखती है? उनके शोषण को तो मानों ईश्वरी देन मान लिया गया है। क्षेत्रीय अखबारों ने वर्षों से काम कर रहे पत्रकार से पत्रकार न होने और शैकिया तौर पर समाचार भेजने के अनुरोध का 10 रुपये के स्टाम्प पर अवैधानिक रुप से शपथपत्र भरवाया है। इसे संपादक जबरन भरवाता है। उनके वेतन का तो सवाल नहीं उठता। मानदेय, चिकित्सा, स्वास्थ्य और आर्थिकी सब भगवान भरोसे है।

छोटे शहरों, कस्बों और गांव देहात के पत्रकारों की समस्या का यहां उल्लेख करने का कतई मतलब नहीं है कि राबर्ट वाड्रा के मामले में कोई ढील बरती जाए। राबर्ट वाड्रा के खिलाफ जांच हो और उसे दंडित किया जाए। साथ ही हम वाड्रा मीडिया दुर्व्यवहार प्रकरण को दिखाने वाले संस्थानों, चैनलों और पत्रकारों से विनम्रता पूर्वक कहना चाहते हैं कि गांव कस्बों के पत्रकारों की सुध लें, भारत में सच्ची पत्रकारिता गांव-कस्बों से ही होती है। उस पत्रकारिता और पत्रकार के लिए आप कभी भी सहिष्णु नहीं रहे हैं बल्कि उसके शोषण में आप भी छोटे बड़े पुर्जे हैं। इसलिए पत्रकार और पत्रकारिता की दुहाई देने के बजाय अपने पाला बदलने की सहूलियत, जो आगे-पीछे आपको मिलनी थी, उसका उपयोग कर रहे हैं। इस तरह हम आपके अवसरवादी और सत्ता परस्त चेहरे को देख पा रहे हैं।

पत्रकार पुरुषोत्तम असनोरा की रिपोर्ट. संपर्क : purushottamasnora@gmail.com

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चाहे जो कहो… सड़ी हुई कांग्रेसी सरकारों से ज्यादा सक्रिय है भाजपा की मोदी सरकार…

Yashwant Singh : चाहे जो कहो… सड़ी हुई कांग्रेसी सरकारों से ज्यादा सक्रिय है भाजपा की मोदी सरकार… कांग्रेसी सरकारों में वामपंथियों और सोशलिस्टों को अच्छी खासी नौकरी, लाटरी, मदद, अनुदान, पद, प्रतिष्ठा टाइप की चीजें मिल जाया करती थी… अब नहीं मिल रही है तो साले ये हल्ला कर रहे हैं … पर तुलनात्मक रूप से निष्पक्ष होकर देखो तो भाजपा की मोदी सरकार जनादेश के दबाव में है और बेहतर करने की कोशिश करती हुई दिख रही है… हां, अगर जनता ने भाजपा को जिताया है तो भाजपा अपने एजेंडे को लागू करेगी ही.. वो एजेंडा हमको आपको पसंद आता हो या न आता हो, ये अलग बात है… पर सक्रियता और जनपक्षधरता को लेकर कांग्रेस व भाजपा में से किसी एक की बात करनी हो तो कहना पड़ेगा कि भाजपा सरकार ज्यादा सक्रिय और ज्यादा सकारात्मक है.

एक बात तय है कि दोनों पूंजीवादी पार्टी हैं और कार्पोरेट से पोषित हैं. इसलिए अगर कांग्रेस की तरह भाजपा भी कार्पोरेट को लाभ पहुंचाकर अपना कामकाज कर रही है तो ये कोई आश्चर्य की बात नहीं है. सोचिए आप भी. अगर कांग्रेस फिर से जीत आती तो क्या केंद्र में सरकार बनाकर वो सब कर पाती जो मोदी सरकार ने किया है.. दुनिया को लगा कि हां, भारत में एक ठीकठाक नेता आया है. देश को लगा कि हां, देश को समझने वाला एक नेता आया है. वो साला रिमोट संचालित मुर्दा मनमोहन से तो ये लाख गुना अच्छा है नरेंद्र मोदी…. जिनको बुरा मानना हो बुरा मानो… पर सच्ची बात कहेंगे हम… अपनी बात कहेंगे हम… हम कोई पेशेवर किस्म के एक्टिविस्ट नहीं है कि एक ही तान, एक ही सुर, एक ही लाइन पर आंय बांय सांय करके जिन्दगी खपा दे. जो बेहतर करे उसकी तारीफ करो, जो खराब करे उसको खुलकर गरियाओ..

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ विरोधी कमेंट और उनके जवाब इस प्रकार हैं…

Pawel Parashar : पत्रकारिता जगत में जो “लहर” चल रही है उससे आप भी अछूते नहीं ये दिख रहा है । अब आपका भविष्य पत्रकार के रूप में बहुत उज्जवल है , ये भी दिख रहा है । इंडिया न्यूज़ , इंडिया टीवी के भी कई बड़े पत्रकारों का “भविष्य उज्जवल” हुआ है मोदी “लहर” में । आपको भी शुभकामनाएं

Yashwant Singh : भाई Pawel Parashar भाई… भड़ास पर जितनी खबरें मोदी विरोध में लगी हैं, और, जितना मैंने मोदी के खिलाफ लिखा है, उसको एक बार देख लेंगे तो समझ में आ जाएगा. पर अगर आप चाहते हैं कि विरोध के लिए विरोध करूं तो ऐसा न होगा. गलत कामों का सदा विरोध है. अच्छे का स्वागत.

Saleem Akhter Siddiqui अपनी-अपनी समझ है। आपको यदि मोदी सरकार कुछ करती लग रही है, तो आपको यह कहने का हक है। बस एक बात पूछना चाह रहा हूं कि पेशेवर एक्टिविस्ट कैसा होता है? साथ में यह भी बता दीजिए कि कौन-सा ऐसा काम हुआ है, अब तक जिससे आम आदमी के अच्छे दिन आ जाएंगे? नारों, वादों और योजनाएं घोषित करना समाधान नहीं है। वैसे इस चुनाव के दौरान मैंने अपने ऐसे दोस्त खोए हैं, जिन्हें मैं सेकुलर सोच का समझता था, लेकिन वह भी मोदी लहर में ऐसे बहके कि उन्हें मेरे शब्द देशविरोधी लगने लगे हैं। आपके ह्दय परिवर्तन की वजह क्या है, मुझे नहीं मालूम, लेकिन यह दौर ऐसा है, जिसमें वफादारियां ही नहीं, विचारधारा बदलते हुए देख रहा हूं।

Pawel Parashar : एक ऐसा जनहितकारी कदम , या यूँ कहें “सराहनीय” कदम जो मोदी सरकार ने उठाया हो , हमें तो नहीं दिखा।

Yashwant Singh : भाइयों Saleem Akhter Siddiqui और Pawel Parashar, कांग्रेस शासनकाल में ऐसा क्या हुआ एक काम कि उसके लिए हम लोग उसे मिस करें, जरा बता दीजिए… रही बात भाजपा राज की तो, कह चुका हूं कि इसमें भी लाभ अंततः कार्पोरेट को मिलेगा और जनता मारी जाएगी. पर कांग्रेस सरकार और भाजपा सरकार के बीच आज के समय में अगर तुलनात्मक अध्ययन करें तो लगेगा कि मोदी के नेतृत्व में देश में एक डायनमिज्म का माहौल बना है. कम से कम अभी तक कोई करप्शन का मामला तो नहीं सामने आया. याद करिए कांग्रेस. सालों ने एक के बाद एक लाइन लगा दी. और, बेरोजगारी, महंगाई उन्हीं के राज की उपज है. और, मोदी भी कांग्रेस राज की ही उपज हैं. अगर टाइट जांच कराई होती तो मोदी जेल में होते लेकिन कांग्रेस ने इन्हें पनपने दिया ताकि इसे आगे रखकर डराकर मुस्लिम वोट बैंक का वोट लिया जा सके और दुबारा सत्ता में आया जा सके. लेकिन ढेर सारी गल्तियां कर चुका मोदी अब हर कदम फूंक फूंक कर रख रहा है और सबको लेकर चलने की नीति बना अपना रहा है… ऐसा मुझे प्रतीत है आज के वक्त तक. कल चीजें खराब दिखेंगी तो खराब लिखा जाएगा.

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