शीर्षासन की मुद्रा में संघ!

Dr. Ved Pratap Vaidik : शीर्षासन की मुद्रा में संघ… राष्ट्रीय स्वयंसवेक के सरसंघचालक मोहन भागवत के भाषण में मैं तीसरे दिन नहीं जा सका, क्योंकि उसी समय मुझे एक पुस्तक विमोचन करना था लेकिन आज बड़ी सुबह कई बुजुर्ग स्वयंसेवकों के गुस्सेभरे फोन मुझे आ गए और उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मोहन भागवत ने संघ को शीर्षासन नहीं करा दिया ? क्या उन्होंने वीर सावरकर और गुरु गोलवलकर की हिंदुत्व की धारणा को सिर के बल खड़ा नहीं कर दिया? Continue reading

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उन्नीस का चुनाव बीजेपी जीत गई तो हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए संविधान संशोधन हो जाएगा! देखें वीडियो

जाने-माने राजनेता और चिंतक शशि थरूर का दावा है कि भारतीय जनता पार्टी अभी केवल राज्यसभा में बहुमत में नहीं है इसलिए वह संविधान संशोधन अपने मन मुताबिक करके इसका हिंदूकरण नहीं कर पा रही है. Continue reading

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अटलजी के बाद जो बीजेपी शेष है, वह संजय गांधी की ‘गुंडा’ कांग्रेस पार्टी-सी है…

Girijesh Vashistha : अटल जी के निधन के बाद बीजेपी ने जो चाल चरित्र और चेहरा दिखाया है वो शायद नयी बीजेपी की पहचान है. एक के बाद एक कई तरह की चीज़ें सामने आईं जिनसे वो लोग कतई आहत नहीं होंगे और प्रभावित भी नहीं होंगे जो यूथ कांग्रेस के भगवा संस्करण की तरह दिखाई देने वाली नयी बीजेपी से ही परिचित हैं.

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बीजपी लोकसभा में अल्पमत में आ गयी

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डॉ राकेश पाठक
प्रधान संपादक, कर्मवीर

लगातार उपचुनाव हार रही है, अब सहयोगी दल भी छिटक रहे हैं, अगला आम चुनाव आसान नहीं… उत्तर प्रदेश और बिहार की तीन लोकसभा सीटें बीजपी हार गई है। इनमें से दो उसके पास थीं और एक राजद के पास। खास ख़बर ये है कि इन सीटों को गंवाते ही भारतीय जनता पार्टी अकेले अपने दम लोकसभा में सामान्य बहुमत खो बैठी है। गठबंधन के रूप में उसके पास बहुमत फिलहाल बना हुआ है लेकिन सहयोगियों के छिटकना जारी है। ऐसे में अगले साल होने वाले आम चुनाव बीजपी के लिए टेढ़ी खीर साबित होते लग रहे हैं।

बीजपी गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें हार चुकी है। बिहार की अररिया सीट भी वो राजद से छीन नहीं सकी। ये नतीजे सिर्फ इतना भर नहीं हैं। आंकड़े इसके भीतर छुपे संदेश का खुलासा करते हैं जो कि बीजपी के माथे पर चिंता की लकीरें उभारने वाला है। संख्या का खेल बता रहा है कि 2014 में प्रचंड बहुमत से जीती बीजपी अब अकेले के दम पर लोकसभा में बहुमत खो चुकी है। गठबंधन के दम पर बहुमत बचा हुआ है।

गौरतलब है कि मोदी लहर पर सवार बीजपी को बीते चुनाव में अकेले ही 282 सीटें मिली थीं। लोकसभा में बहुमत के लिए 272 का आंकड़ा चाहिए होता है। तब पार्टी ने अकेले बहुमत होते हुए भी सभी सहयोगी दलों को सरकार में शामिल किया था। एनडीए गठबंधन को कुल 335 सीटें मिली थीं।

सन 2014 के तुरंत बाद हुए दो उपचुनाव बीड और बड़ोदरा बीजपी ने जीते थे। उसके बाद शहडोल और लखीमपुर में जीत दर्ज की। लेकिन बाक़ी अपने कब्जे वाली सीटों पर पार्टी लगातार हार रही है। गुरुदासपुर, अजमेर, अलवर, झाबुआ और आज गोरखपुर और फूलपुर जैसे अपने गढ़ भी नहीं बचा पाई। आज के नतीजों से पहले अकेले बीजपी के सांसदों की संख्या 273 बची थी और आज 271 रह गयी है। अकेले अपने दम पर तो पार्टी अल्पमत में आ गयी है लेकिन सहयोगी दलों की टेक से सरकार को कोई खतरा नहीं है।

उपचुनाव में लगातार हार के अलावा गिनती में कमी गोंदिया भंडारा सीट के सांसद नाना भाऊ महोड़ के संसद से इस्तीफा देने से आई थी। नाना भाऊ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रवैये की आलोचना कर पार्टी भी छोड़ गए थे। गुजरात चुनाव के दौरान वे कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। एनडीए में शामिल सहयोगी दलों को साथ रखने में भी बीजपी को मुश्किल हो रही है। कुछ महीनों शिवसेना कह चुकी है कि वह अगला चुनाव बीजपी से अलग होकर लड़ेगी। और अब हाल ही में तेलगु देशम पार्टी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। उसके मंत्रियों ने सरकार से इस्तीफे भी दे दिए हैं।

फिलहाल लोकसभा में शिवसेना के 18 और तेलगू देशम के 16 सदस्य हैं। अन्य छोटी छोटी कई पार्टीयों का समर्थन भी बीजपी को हासिल है। ऐसे में बीजपी के लिए अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव आसान नहीं लग रहे।

लेखक डॉ राकेश पाठक ‘कर्मवीर’ के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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भाजपा वालों के झूठ की उमर बस चंद मिनट ही है…

डॉ राकेश पाठक

असत्य और अर्ध सत्य की आधी रोटी पर दाल लेकर भागने वाले अब हर दिन लद्द पद्द औंधे मुंह गिर रहे हैं..लेकिन हद ये है कि बाज फिर भी नहीं आते। राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष के लिये नामांकन भरा तो भाई लोगों को पेट में मरोड़ उठी। मध्य प्रदेश में बीजेपी के मीडिया सेल  “जॉइंट मीडिया इंचार्ज” के सर्वेश तिवारी ने तुरंत फोटो शॉप की शरण गही और गांधी की फोटो की जगह किसी मुगल बादशाह की फोटो चैम्प दी। तिवारी ने अपनी फेसबुक वॉल और तमाम व्हाट्सएप्प ग्रुप्स में ये फ़र्ज़ी फोटो पटक दी और सवाल पूछा कि “राहुल गांधी की फोटो में कौन से महापुरुष दृष्टिगोचर हो रहे हैं..?

चंद मिनट में इस फ़र्ज़ी फोटो की कलई खुल गई। जाहिर है राहुल गांधी के नामांकन के समय पीछे किसी मुगल बादशाह की फोटो न थी न हो सकती थी। बीजेपी के इस फोटोशॉपिये सुरमा को अच्छी लानत मलामत सोशल मीडिया पर ही हो गयी। ये कोई पहला मौका नहीं है जबकि इस तरह के झूठ का शीराज़ा थोड़ी ही देर में न बिखर गया हो। अब तो हालात ये हो गयी है कि बीजेपी का आईटी सेल फोटो शॉप , कट पेस्ट का कारनामा करता है तो अगले कुछ मिनट में उसकी बखिया उधड़ जाती है। अगर आप पिछले चार पांच सालों पर नज़र डालें तो आसानी से साफ हो जाएगा कि उनके झूठ की उमर धीरे धीरे कम होती गयी है।

सन 2014 से पहले उनका झूठ कुछ महीनों ज़िंदा रहता था। जैसे नेहरू के गाज़ी खां का वंशज होने वाला मसाला। फिर 2015 में सुभाष चंद बोस के खिलाफ ब्रिटिश पीएम क्लीमेंट एटली को लिखी गई नेहरू की “फ़र्ज़ी” चिट्ठी कुछ घंटे जीवित रह पायी। 2016 में भी उनके परोसे गए झूठ कुछ घंटे से ज्यादा टिक नहीं पाए। और अब 2017 की इस उतरती सांझ में उनके झूठ चंद मिनट में ही दम तोड़ देते हैं। बीजेपी के आईटी सेल के राष्ट्रीय मुखिया अमित मालवीय हाल के दिनों लगभग हर पोस्ट पर चारों खाने चित्त गिरे। “नारियल के जूस” का मामला “आलू से सोने का जुमला” या नेहरू की अपनी सगी बहन को लाड़ करने वाली तस्वीरें अमित मालवीय का झूठ चार पाँच मिनट में ही काल कवलित हो गया।

और तो और प्रधान सेवक भी झूठ की सवारी गांठने में फिसल चुके हैं। अभी चार दिन पहले मोदी जी ने मोरबी की बाढ़ के समय इंदिरा गांधी द्वारा नाक पर रुमाल रखने का आरोप लगाया तो कुछ मिनट में “चित्रलेखा” पत्रिका की पूरी तस्वीर हक़ीक़त बयान करने को आ गयी। साफ दिख रहा था कि RSS कार्यकर्ता और प्रशासन के लोग भी नाक पर कपड़ा बांधे थे। लाशों और भीषण गंदगी के कारण प्रशासन ने बाकायदा निर्देश दिया था कि सब मास्क लगाएं।

ये बहुत थोड़े से नमूने हैं..बाक़ी आप याद कर लीजिए कि पिछले महीनों में इनके कितने झूठ ढेर हो चुके हैं।  दरअसल संघ और बीजेपी ने 2010- 11 के आसपास तमाम झूठ गढ़े और इतिहास से अनभिज्ञ नई पीढ़ी को परोस दिये। “व्हाटसएप्प और फेसबुक विश्वविद्यालय” में पली बढ़ी इस पीढ़ी ने सहज ही इस पर यकीन कर लिया। “सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ” जैसे निराधार जुमले पर यकीन करते वक्त उसे यह भी नहीं दिखा कि जिस इंटरनेट और आधुनिक युग में वो जी रही है उस में कुछ ठहर कर सच जानना ज्यादा कठिन नहीं है।

सच ये है कि जब इस झूठ और फर्जीवाड़े की सुनामी आ रही थी तब कांग्रेस और उसके कर्ताधर्ता कम्बल ओढ़ कर घी पी रहे थे। खाये अघाये इन लोगों ने झूठ के खिलाफ कमर नहीं कसी तब समाज के स्वतंत्रचेता लोगों ने कमान अपने हाथ मे ले ली। अब जब आधी लड़ाई साधारण लोग जीत चुके तब जाकर कांग्रेस की नींद टूटी। ये सच है कि दिव्य स्पंदन उर्फ राम्या के कांग्रेस आईटी सेल का मुखिया बनने के बाद सोशल मीडिया पर बीजेपी और संघ को कड़ी चुनौती मिल रही है लेकिन असल पटखनी तो वे लोग दे रहे थे जिनका कांग्रेस से सीधा कोई लेना देना नहीं है। ऐसे लोग बस अपनी मर्ज़ी से फर्जीवाड़े और झूठ के खिलाफ लड़ रहे थे।

आखिर में सवाल उन भले और भोले लोगों से… क्या आपको लगता है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहा व्यक्ति किसी मुगल बादशाह की तस्वीर अपने पीछे रखवायेगा? अगर आप इस तरह की तस्वीर पर यकीन कर उसे शेयर,फारवर्ड कर रहे थे तो माफ कीजिये झूठ परोसने वालों से ज्यादा मूर्ख आप ख़ुद हैं! वे तो जो हैं सो हइये हैं!

लेखक डॉ राकेश पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क rakeshpathak0077@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पत्रकारों ने चलाया अभियान- मजीठिया नहीं तो भाजपा को वोट नहीं

कांग्रेस औऱ सपा के समर्थन में खड़े हुए कलम के सिपाही… लखनऊ। उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में इस बार पत्रकारों की नाराजगी भाजपा के लिए भारी पड़ सकती है। पत्रकारों के मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में सुप्रीम कोर्ट के 6 माह के टाइम बाउंड फैसला आने के बाद भी उत्तर प्रदेश का श्रम विभाग और श्रम न्यायालय पत्रकारों के प्रति सौतेला व्यवहार कर रहा है। अपनी जायज मांगों को पूरा न होता देख पत्रकारों ने भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में करीब 50 हजार पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड की मांग कर रहे हैं। जिनमे क़रीब 5 हजार पत्रकार मजीठिया वेज बोर्ड की मांग के चलते प्रिंट मीडिया से निकाले जा चुके हैं। और उनमें से ज्यादातर पत्रकार अब इलेट्रॉनिक मीडिया की ओर रुख कर चुके है।

कैसे हो रहा विरोध
उत्तर प्रदेश के पत्रकारों ने ‘ भाजपा हराओ, मजीठिया पाओ’ नामक व्हाट्सएप ग्रुप तैयार किया है। लगातार 24 घंटे सक्रिय होकर इस ग्रुप में भाजपा हराने की रणनीति तैयार की जा रही है। इस ग्रुप में दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुतान, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान और हिन्दुतान टाइम्स समेत कई बड़े अखबार के  पत्रकार सदस्य हैं।

क्या है मामला
प्रिंट मीडिया में देश भर के पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वर्ष 2011 से वेतन मिलना था। देश भर के पत्रकार अपना वाजिब मेहनताना मांगते रहे लेकिन कंपनी मालिकों का दिल आज तक नहीं पसीजा। इसमें श्रम विभाग भी पूरी तरह अखबार मालिकों के साथ खड़ा दिखा। जिस पत्रकार ने मजीठिया वेज बोर्ड की मांग की उसे या तो नौकरी से निकल दिया गया या फिर इतना परेशान किया गया कि वह स्वतः नौकरी छोड़ने को मजबूर हो गया। उत्तर प्रदेश के करीब 50 हजार पत्रकारों ने अब अपनी मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

वरिष्ठ पत्रकारों ने सराहा
लखनऊ समेत पूरे प्रदेश भर के पत्रकारों ने पत्रकारों की इस पहल की सराहना की है। पत्रकारों के संगठन यूपी प्रेस क्लब, जर्नलिस्ट एसोसिएशन, उपजा, मानवाधिकार प्रेस संगठन,  मजीठिया समिति आदि सभी ने एक सुर में भाजपा के इस सौतेले व्यवहार की निंदा की है।

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भाजपाई गुंडों ने दो टीवी पत्रकारों के साथ ये क्या कर दिया.. सुनिए पूरी कहानी…

Chander Mauli Sharma :  शायद अब मैं हिमाचल कभी जाऊँ…. जी हां, हम और हमारी टीम लगातार पिछले एक महीनें से डीपीआर से आज्ञा लेकर चुनावी कवरेज पर थे. सब कुछ अच्छा जा रहा था हिमाचल को बेहद करीब से देखा, जैसा सुना वैसा लगा भी. पर शायद मैं किसी भ्रम में ही था, या शायद कोई बुरा सपना जो परसों रात टूट गया. हम पावंटा साहिब में राहूल की रैली कवर कर के नाहन के लिए निकलें, क्यूँकि वहा भी सीएम राजा वीरभद्र की रैली थी. बहुत अच्छा जा रहा था और हम निकलनें वाले थे कि स्थानिय लोगों से पता चला यहां रात को शराब बंटती हैं. एक गज़ब की स्टोरी हमारे सामने थी, और हम सुबह से उस स्टोरी पर काम करना शुरू भी कर चुके थे।

चूंकि हम बाहरी थे तो हमारे चैनल के वहा के रिपोर्टर का साथ हमें चाहिए था, जो कि मिला भी। दिन में मैंने मेरे हरियाणा के कुछ मंत्री और एमएलए वहा मिलें जिनकी मैंने बाईट भी ली. चुनावी माहौल पर चर्चा भी की. पर हमें वहा कुछ ऐसा नहीं लगा जो सुत्रों से पता लगता. पर लगता हैं ये मेरे जीवन की सबसे काली रात में से एक थी 7 नवंम्बर को 5 बजे तक प्रचार थमने वाला था, जैसे शाम हुई वाकई शरेआम चुनाव आयोग की धज्जियां उड़ी मिली. भाजपा कार्यलय में शराब का वितरण हो रहा था. और ग्रामीण लोगो को पर्जी दी जा रहीं थी जो किसी निजी होटल में दिखा शराब लें सकतें थे ।

मैं और मेरे सर चंद्र मौली शर्मा ने जैसे पुरा माहौल देखा और कुछ हिला देने वाले विजूवल हाथ लगें तो हम भी हिल गयें की शराब की इतनी खेप । हमारे हाथ इतना मैटिरियल लग चुका था कि हम चैनल पर चला सकें । उसके साथ हमें भाजपा प्रत्याशी नाहन का पक्ष भी जानना था तो हम स्थानिय पत्रकार को काॅल की, पर उस समय वो बाहर थे तो हमने भाजपा के मीडिया सलाहकार से समय मांगा की एक बाईट चाहिए तो भाजपा प्रत्यासी ने हमारी टीम को ऑफिस में बाईट लेने का समय दिया. जैसै ही हमनें बिंदल जी को बाहर ही पार्टी के ऑफिस के बाईट लेनी चाही और बताया की आपके यहां के कुछ दृश्य भी हाथ लगें हैं तो भाजपा प्रत्याशी वहां से निकल पड़े और उनके जाने के करीब 2-3 मिनट बाद सभी पार्टी कार्यकर्ता हम पर टूट पड़े.

Mob lynching को अभी तक सिर्फ टीवी पर देखा था. शिकार पहली बार हुए थे । जैसे ही हमारे साथ छीना-झपटी हुई तो उन्होंने सबसे पहलें कैमरा छीना और मुझे अंदर खींचने लगे. जैसे ही मेरे सर चंद्र मौली जी बीच बचाव को आये तो उनको वे भाजपा कार्यालय में ले जा रहे थे.. तभी सर ने कहा भाग और S.P. को फोन करो…  मैंने फोन किया लेकिन पुलिस 1 घंटे बाद आकर उल्टा हमें ही थाने ले जाती है. युद्धवीर सिंह थाना प्रभारी गुन्नूघाट (नाहन) थाने ले जाकर कहते हैं “तुम साले पत्रकार हो जुत्ती खाने लायक” और भी न जाने क्या-क्या… मेडिकल में जान बूझ कर रात से अगले दिन की शाम करना, ताकि बिना मेडिकल के बात रुक जाये..

सहन बहुत किया पर कुछ लोकल पत्रकारों की वज़ह से बहुत सहायता मिली.. सर का फोन नहीं था.. सिर्फ मेरा फोन था. किस-किस प्रकार का दबाव झेला, फोन पर फोन…. एफआईआर वापस लेने का.. मैं टूट चुका था, पर सर की हिम्मत से संघी और भाजपा के गुंडों से लड़ाई जारी है…. जो सहा सब लिखना चाहता हूँ पर हिम्मत नहीं अब…

JK 24X7 NEWS चैनल के रेजीडेंट एडिटर चंद्रमौली शर्मा उर्फ पंकज शर्मा की एफबी वॉल से.

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बीजेपी ही क्यों नैतिकता की दुहाई दे?

Narendra Nath : इस हफ्ते तीन चुनाव हुए। महाराष्ट्र नगरपालिका। और आज गुरुदासपुर लोकसभा और केरल में विधानसभा उपचुनाव। महाराष्ट्र में कांग्रेस पहले से थी और इस बार और बड़े मार्जिन से जीती। गुरुदासपुर लोकसभा बीजेपी के पास थी और विनोद खन्ना यहां से 20 साल से एमपी थे। उनके मरने के बाद चुनाव हुआ। लेकिन सहानुभूति फैक्टर काम नहीं आया और रिकार्ड मतों से कांग्रेस जीत रही। केरल में जिस विधानसभा सीट पर उपचुनाव था वहां मुस्लिम वोट काफी थी। लेकिन बीजेपी ने लव जेहाद का बहुत बड़ा मुद्दा अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की। लेकिन 2016 में वहां तीसरा स्थाान पाले वाली बीजेपी आज चौथे स्थान पर आ गयी। हाल में केरल में किस हाई वोल्टेज बीजेपी ने कैंपेन किया वह सब देख सकते हैं। वहीं इलाहबाद यूनिवर्सिसटी में भी कर देर रात एसपी ने चुनाव जीता।

अब इन परिणाम को समझें। कायदे से इसका बहुत खास महत्व नहीं है। यह निहायत लोकल टाइम चुनाव हैं जिसका कोई एक समग्र निहितार्थ नहीं निकाला जा सकता है। अगले महीने हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव होंगे और फिर बीजेपी चुनाव जीत लेगी तो यह विपक्ष के लिएचार दिन की चांदनी वाली बात साबित हो जाएगी।

तो क्यों जीत रही है बीजेपी?

इसका भी उत्तर आज ही मिला। इधर जब बीजेपी गुरुदारसपुर लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार रही थी तभी पार्टी हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस नेता सुखराम के पूरे परिवार को अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए रेड कारपेट वेलकम दे रही थी। वही सुखराम, टेलीकॉम घोटाले वाले, जो मार्डन करप्शन के प्रतीक है। वही सुखराम जिनके घर करोड़ों का कैश मिलने के बाद बीजेपी ने कभी संसद का पूरा सत्र नहीं चलने नहीं दिया था। मतलब नैतिकता और किसी भी कीमत पर जीत के सवाल पर मोदी-शाह की टीम किसी भी कीमत पर जीत को तरजीह देते हैं। यही कारण है कि 2019 से पहले पश्चिम बंगाल में नारदा घोटाले वाले मुकुल राय, महाराष्ट्र में करप्शन के प्रतीक नारायण राणे भी बीजेपी की दहजीज पर खड़े हैं और उन्हें रेड कार्पेट वेलकम दिया जा रहा है।

फिर पूछेंगे कि इसमें गलत क्या है? राजनीतिक दल चुनाव नैतिकता नहीं जीत-हार के लिए लड़ते हैं। बीजेपी क्यों इससे पीछे हटे। दुरुस्त है। कांग्रेस और विपक्ष भी तो यही कर इतने दिनों सत्ता में रही।

यही सही जवाब है। बीजेपी ही क्यों नैतिकता की दुहाई दे? मेरे हिसाब से कुछ भी गलत नहीं है। पब्लिक के सामने सबकुछ है। बीजेपी भी छुपकर नहीं कर रही। और बीजेपी नेता मुगालते में भी नहीं है। कल जाकर उन्हें लालू,सुरेश कालमाड़ी या ए राजा से राजनीतिक मदद लेनी पड़े तो भी वह खुशी-खुशी लेंगे। राष्ट्रवाद के नाम पर लड़ने वाली पार्टी ने बुरहान बानी को शहीद बताने वाली पार्टी से सरकार बना रखी है ना? गोवा और नार्थ-ईस्ट में बीफ का सपोर्ट करती है ना? जीत के लिए साम-दाम-दंड-नीति की बदौलत पिछले कुछ सालों से अजेय है, इस पर कोई संदेह या विवाद नहीं है और छोटी-मोटी हार के बाद पार्टी खुद को करेक्ट करती रही है।

इन सबके बीच मेरी आपत्ति बस इन्हें अंधे सपोर्टरों से हैं जो राजनीति की असलियत पर आंख मूंदते हुए holier-than-thou की दुहाई देते हैं। हर विरोध करने वालों को करप्ट,एंटी नेशनल टाइप बोलते रहते हैं। मैं पुण्य और दूसरे पापी, मैं साधु दूसरे शैतान, का चोला ओढ़ा नायाब-नायाब तर्क देते हैं। बाबू मोशाय, यह राजनीति एक हमाम है और हम सब इसमें नंगे हैं। जॉनी, जिनके घर शीशे बने के होते हैं, दूसरों पर शीशा नहीं फेंका करते हैं।

टाइम्स आफ इंडिया में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र नाथ की एफबी वॉल से.

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क्या 2019 में कांग्रेस दे पाएगी भाजपा को टक्कर?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जो खबरें अमेरिका से आ रही है, वे ऐसी हैं, जैसे किसी रेगिस्तान में झमाझम बारिश हो। भारत में जिसे लोग नेता मानने को तैयार नहीं हों, जिसे अखबारों में कभी-कभी अंदर के कोनों में कुछ जगह मिल जाती हो और जिसे लोगों ने तरह-तरह के मज़ाकिया नाम दे रखे हों, वह युवा नेता अमेरिका के बर्कले और प्रिंसटन जैसे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और छात्रों को सीधे संबोधित कर रहा हो, यह असाधारण घटनाक्रम है। खास बात यह है कि राहुल की ये खबरें भारतीय अखबारों के मुखपृष्ठों पर चमक रही हैं। जाहिर है कांग्रेस के हताश-निराश कार्यकर्ताओं में इन खबरों ने उत्साह का संचार कर दिया है। राहुल के जिन सहयोगियों ने इस अमेरिका-दौरे की योजना बनाई है, वे बधाई के पात्र हैं। राहुल के भाषणों और उन पर हुई चर्चाओं की जैसी रिपोर्टें छप रही हैं, उनसे जाहिर है कि इस बार कांग्रेस का खबर-प्रबंध सफल रहा है।

लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या 2019 में कांग्रेस भाजपा को टक्कर दे पाएगी? अकेली कांग्रेस तो आज इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती। आज कांग्रेस जैसी दुर्दशा में है, वैसी वह पिछले सवा सौ साल में कभी नहीं रही। 2014 के चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 45 सीटें मिलीं थी, जबकि आपातकाल के बावजूद 1977 में उसे 154 सीटें मिली थीं। कर्नाटक और पंजाब के अलावा सीमांत के पांच छोटे-मोटे राज्यों में ही कांग्रेस की सरकारें सिमट गई हैं। यह ठीक है कि इससे भी कम क्षमतावाली पार्टी चुनाव जीतकर सरकार बना सकती है लेकिन, उसके लिए आपातकाल-जैसा या भ्रष्टाचार-जैसा बड़ा मुद्‌दा होना जरूरी है। ऐसा कोई ज्वलंत मुद्‌दा विपक्षियों के हाथ में नहीं है। नोटबंदी, जीएसटी, ‘फर्जीकल’ स्ट्राइक और बेरोजगारी-जैसे मुद्‌दे हैं जरूर, लेकिन उन्हें उठाने वाले कहां हैं? कांग्रेस के पास न तो कोई नेता है और न कोई नीति है। कांग्रेस में एक से एक काबिल और अनुभवी लोग हैं लेकिन, उनकी हैसियत क्या है? कांग्रेसी ढर्रे में पल-बढ़कर वे नौकरशाहों से भी बढ़कर नौकरशाह बन गए हैं। उनकी दुविधा यह है कि वे अपना मुंह खोलें या अपनी खाल बचाएं?

यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सिर्फ 30 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी राज कर रही है और 70 प्रतिशत वोट पाने वाले विरोधियों के पास एक भी आवाज़ ऐसी नहीं है, जो राज्यतंत्र पर लगाम लगा सके। इसका नुकसान विरोधी दल तो भुगतेंगे ही, सबसे ज्यादा नुकसान सत्तारूढ़ भाजपा और सरकार को होगा। ये दोनों बिना ब्रेक की मोटरकार में सवार हैं। देश की अर्थव्यवस्था और सांप्रदायिक सद्‌भाव की स्थिति विषम होती जा रही है। 2019 तक पता नहीं देश कहां तक नीचे चला जाएगा? गाड़ी गुड़कती-गुड़कती पता नहीं, कहा जाकर रुकेगी ?

क्या ऐसे में सारे विरोधी दल एक होकर देश की गाड़ी संभाल सकते हैं? नहीं। क्योंकि उनका एक होना कठिन है। पहली समस्या तो यह है कि वे मूलतः प्रांतीय दल हैं। अपने प्रांतीय प्रतिद्वंदी दलों से वे समझौता कैसे करेंगे? क्या उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और माकपा एकजुट हो सकते हैं? क्या सभी प्रांतीय दल कांग्रेस को यानी राहुल गांधी को अपना नेता मान सकते हैं?

इन तथाकथित प्रांतीय दलों के नेता राहुल के जन्म के पहले से राजनीति में सक्रिय हैं। देश के राजनीतिक दलों में आजकल विचारधारा की बाधा बिल्कुल खत्म हो गई-सी लगती है। भाजपा का हिंदुत्व और माकपा का मार्क्सवाद हवा में खो गया है। अब यह सुविधा हो गई है कि कोई भी पार्टी किसी भी पार्टी से हाथ मिला सकती है लेकिन, प्रांतीय दलों का जनाधार प्रायः जाति-आधारित है। ये जातीय-समीकरण एकता में सबसे बड़ी बाधा बन सकते हैं। इन सब बाधाओं के बावजूद देश में प्रचंड विरोध की जबर्दस्त लहर उठ सकती है। लेकिन, उस लहर को उठाने वाले न तो कोई नेता आज दिखाई पड़ रहे हैं और न ही कोई राजनीतिक दल।

यदि सारे नेता एक हो जाएं तो भी वे नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते, क्योंकि राष्ट्रव्यापी लहर उठाने के लिए देश को एक नया और बेदाग चेहरा चाहिए। तीन ऐसे चेहरे हो सकते थे। नीतीश कुमार, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल लेकिन, तीनों तात्कालिक लोभ में फंसकर दीर्घकालिक लाभ के मार्ग से अलग हट गए। हमारे दलीय नेताओं की आज हालत ऐसी हो गई है, जैसी लकवाग्रस्त पहलवानों की होती है। 2019 तक मोदी कितने ही कमजोर हो जाएं लेकिन, इन सब लकवाग्रस्त पहलवानों को वे पटकनी मारने लायक तब भी रहेंगे। ये पारम्परिक नेता वर्तमान सरकार का बाल भी बांका नहीं कर सकते, क्योंकि मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है और इस बीच भाजपा ने 2019 के चुनाव के लिए हर तरह से जबर्दस्त तैयारी कर ली है। जब भी देश में किसी एक नेता की पकड़ जरूरत से ज्यादा हो जाती है, उसकी पार्टी में उसके आगे कोई मुंह खोलने लायक नहीं रहता और विरोधी दल भी लुंज-पुंज हो जाते हैं, तब कोई न कोई अराजनीतिक ताकत उभरती है। 1977 में जयप्रकाश नारायण न होते और 2014 के पहले बाबा रामदेव और अन्ना हजारे न होते तो क्या इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी को सफल चुनौती दी जा सकती थी? मोदी को सफल चुनौती देनेवाला कोई अ—राजनीतिक नेता आज कौन हो सकता है ?

राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार नेताओं ने मिलकर जरूर गिराई लेकिन, मोदी पर बोफोर्स-जैसे किसी आरोप के लगने की संभावना नहीं है और भाजपा, भाजपा है, कांग्रेस नहीं है। भाजपा में विश्वनाथप्रताप सिंह जैसे किसी बागी मंत्री की कल्पना करना भी असंभव है। यह तो अनुशासितों की पार्टी है। इसके जीवनदानी बुजुर्ग नेताओं की सहनशीलता भी बेजोड़ है। वे मुंह खोलने की बजाय आंखें खोलकर सिर्फ ‘मार्गदर्शन’ करते रहते हैं। अत: 2019 तक इस सरकार के लिए खतरे की घंटी बजना मुश्किल-सा ही लगता है। इस सरकार के लिए तो राहुल गांधी वरदान की तरह हैं। जब तक वे सबसे बड़े विरोधी दल के नेता हैं, मोदी खूब खर्राटे भर सकते हैं। लेकिन, वे खर्राटे भरने की बजाय देश और विदेश में निरंतर दहाड़ते रहते हैं। पता नहीं, उन अनवरत दहाड़ों के बीच उन्हें वह कानाफूसी भी सुनाई देती है या नहीं, जो उनकी पार्टी में उनके खिलाफ चल पड़ी हैं और वे टीवी चैनलों पर खुद को दमकता हुआ तो रोज ही देखते हैं लेकिन, उन्हें वंचितों और पीड़ितों का वह मौन मोह-भंग भी कभी दिखाई देता है या नहीं, जो किसी भी समय बगावत की लहर बन सकता है?

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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‘भारत समाचार’ चैनल की भविष्यवाणी सच साबित हुई, महेंद्रनाथ पांडेय बने भाजपा यूपी के प्रदेश अध्यक्ष

दो रोज पहले भारत समाचार चैनल पर एडिटर इन चीफ ब्रजेश मिश्रा के नेतृत्व में हुई एक महाबहस में बताया गया कि सबसे ज्यादा चांस महेंद्र नाथ पांडेय के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने का है. इस महाबहस में वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी ने महेंद्र नाथ पांडेय को नया अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे बड़ा कारण बताया कि यूपी में अपनी उपेक्षा से ब्राह्मण बहुत नाराज हैं, खासकर पूर्वांचल में. लोकसभा के 2019 में होने वाले चुनाव के लिए ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ कर रखना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है. यही वजह है कि भाजपा नेतृत्व किसी ठीकठाक ब्राह्मण नेता पर दांव लगा सकता है.

भारत समाचार चैनल के एडिटर इन चीफ ब्रजेश मिश्र के नेतृत्व में हुई इस बहस का विषय था- यूपी में भाजपा की कमान किसके हाथ?. कई नामों पर विचार विमर्श और चर्चा के बाद महाबहस से यही निकल कर आया कि महेंद्र नाथ पांडेय पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व दांव लगाने जा रहा है. आज हुआ भी यही. सारे समीकरण ध्वस्त करते हुए भाजपा नेतृत्व ने महेन्द्र पांडेय के नाम पर मुहर लगाकर उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा का नया प्रदेश अघयक्ष बना दिया. महेंद्र नाथ पांडेय चंदौली के सांसद हैं. महेन्द्र पांडेय के यूपी भाजपा का नया अध्यक्ष बनने से पूर्वांचल के लोग काफी खुश हैं. गोरखपुर से सीएम और चंदौली से प्रदेश अध्यक्ष देकर पूर्वी उत्तर प्रदेश का इलाका इन दिनों राजनीति और सत्ता में छाया हुआ है.

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जब केजरी पार्टी ‘पीटी’ जा रही थी तो कांग्रेसी उपदेश देते थे, अब कांग्रेसी ‘मारे’ जा रहे तो आपिये आइना दिखाने लगे!

Sheetal P Singh : अनुभवी लोग… अहमद पटेल पर बन आई तो अब बहुतों को लोकतंत्र याद आ रहा है ………आना चाहिये पर शर्म भी आनी चाहिये कि जब बीते ढाई साल यह बुलडोज़र अकेले केजरीवाल पर चला तब अजय माकन के नेतृत्व में कांग्रेसी राज्यपाल के अधिकारों के व्याख्याकारों की भूमिका में क्यों थे? जब एक बेहतरीन अफ़सर राजेन्द्र कुमार को सीबीआई ने बेहूदगी करके सिर्फ इसलिये फँसा दिया कि वह केजरीवाल का प्रिंसिपल सेक्रेटरी था तब भी लोकतंत्र की हत्या हुई थी कि नहीं? जब दिल्ली के हर दूसरे आप विधायक को गिरफ़्तार कर करके पुलिस और मीडिया परेड कराई गई तब भी यमुना दिल्ली में ही बह रही थी! तब कांग्रेसी बीजेपी के साथ टीवी चैनलों में बैठकर केजरीवाल को अनुभवहीन साबित कर रहे थे! अब अनुभव काम आया?

मोदी जी व अमित शाह की जोड़ी इस देश के हर मानक को चकनाचूर करके एक तानाशाह राज्य के चिन्ह स्थापित कर रही है। इनकम टैक्स ई डी सीबीआई आदि नितांत बेशर्मी से स्तेमाल किये जा रहे हैं। फिलवक्त इनकम टैक्स ने कर्नाटक के उस मंत्री के यहाँ छापा मारा है जिसके यहाँ गुजरात के कांग्रेसी विधायकों को पोचिंग से बचाकर रक्खा गया है! इंदिरा / संजय की तानाशाही का भी एक दौर था! कांग्रेस को वहाँ तक पहुँचने में कई दशक लग गये थे ये डिजिटल पार्टी है सो बुलेट स्पीड से हर पड़ाव पार कर रही है।

पत्रकार से उद्यमी फिर आम आदमी पार्टी के नेता बने शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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देश को ‘कांग्रेस मुक्त’ करने के मायने

श्रीगंगानगर। कांग्रेस मुक्त भारत। कांग्रेस मुक्त देश। बीजेपी के महापुरुष नरेंद्र मोदी के ये शब्द लगभग 3 साल से मेरे कानों मेँ गूंज रहे हैं। अकेले मेरे ही नहीं और भी ना जाने कितने करोड़ देश वासियों के कानों मेँ होंगे ये शब्द। किसी के कानों मेँ मिठास घोल रहे होंगे और किसी के जहर। इन शब्दों का मायने ना जानने वालों के लिए ये शब्द गुड़ है और जो समझ रहे हैं उनके लिए कड़वाहट है। चिंता भी है  साथ मेँ चिंतन भी।

देश को कांग्रेस मुक्त बनाना है… भारत को कांग्रेस से मुक्त करने का सपना है…. इन शब्दों को राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति के साथ इस प्रकार से जोड़ दिया गया कि यूं लगने लगा जैसे फिर किसी ने अंग्रेज़ो भारत छोड़ो का नारा बुलंद किया हो। देश  मेँ ना जाने कितनी राजनीतिक पार्टियां हैं। मगर देश को मुक्त केवल कांग्रेस से करना है। क्यों? क्योंकि मोदी जी कांग्रेस का अर्थ जानते हैं ! मोदी जी समझते हैं कि कांग्रेस क्या है! कांग्रेस के रहने के परिणाम से भी मोदी जी अंजान नहीं। मोदी जी के नेतृत्व वाली बीजेपी कांग्रेस से डरती है। मोदी जी जानते हैं कि मात्र कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसका भारत के हर गली कूचे मेँ प्रभाव है। जिसका नाम है।

यही एक पार्टी है जो किसी दिन उनकी सरकार को, बीजेपी को सत्ता से बाहर करने की क्षमता रखती है। कांग्रेस ही है जिसमें गिर गिर के उठ जाने की अपार क्षमता है। कांग्रेस के अतिरिक्त कोई और चुनौती है ही नहीं। जब चुनौती देने वाला ही कोई नहीं रहेगा तब अपना राज, केवल और केवल अपना राज। कुछ भी करो, कोई विरोध नहीं। कुछ भी करो, कोई बोलने वाला नहीं। और, जब सरकार की नीतियों, निर्णयों का विरोध करने वाला ही ना रहे तो फिर लोकतन्त्र खतरे मेँ पड़ जाता है। शासक मनमर्जी करता है। क्योंकि उसे किसी राजनीतिक विरोध की चिंता ही नहीं रहती। पब्लिक का विरोध अर्थ हीन हो जाता है। मोदी जी जानते हैं कि जब बीजेपी 30 साल बाद 2 सीटों से यहां तक आ सकती है तो कांग्रेस क्यों नहीं?

बस, इस डर ने मोदी जी और उनके खास दो चार नेताओं ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा इस प्रकार से उछाला कि यह देश प्रेम का प्रतीक हो गया। राष्ट्रवाद की पहचान बन गया। असल मेँ कांग्रेस मुक्त भारत का अर्थ है, विपक्ष का ना रहना। हालांकि लगभग हर स्टेट मेँ राजनीतिक पार्टी है, लेकिन मोदी जी और आज की बीजेपी ने कभी भारत को उनसे मुक्त करने का नारा नहीं दिया। जरूरत भी नहीं है, क्योंकि उनके साथ तो सत्ता का बंटवारा कर उनको अपने साथ लिया जा सकता है। किसी से विचार मिले ना मिले कोई खास बात नहीं। सिद्धांतों मेँ जमीन-आसमान का अंतर है, तब भी चलेगा।

सत्ता का सवाल है। उसे पाने और फिर उसे बनाए रखने की बात है। छोटे छोटे दलों की औकात ही कितनी है! सत्ता के लालच मेँ वे बीजेपी के साथ आने मेँ क्यों हिचकिचाएंगी। कश्मीर और अब बिहार इसके उदाहरण है। जब छोटे दलों को सत्ता का टुकड़ा मिल गया तो वे उसी मेँ मस्त हो जाएंगे और कांग्रेस रहेगी नहीं, तब! तब देश मेँ एक मात्र बीजेपी। बीजेपी मेँ एक मात्र मोदी जी और उनके अमित शाह। बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी नहीं कहा कि देश को कांग्रेस से मुक्त करना है। जे पी नारायण ने भी ऐसा तो नहीं कहा होगा। चूंकि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए उसको मार दो, उसके बाद राज अपना ही अपना।

असली लोकतन्त्र उसी देश मेँ है जहां विपक्ष मजबूत हो। लोकतन्त्र वहीं समृद्ध होता है जहां पक्ष के साथ साथ विपक्ष भी ताकतवर  हो। सत्ता के कामों का विश्लेषण करने वाला हो। उसको रोकने और टोकने वाला हो। परंतु मोदी जी एंड कंपनी ने राजनीति की परिभाषा ही बदल ही। बड़े विरोधी को खत्म कर दो, छोटे मोटे तो खुद शरणागत हो जाएंगे दंडवत करते हुए। कांग्रेसियों से कोई परहेज नहीं, बस देश को कांग्रेस मुक्त करना है। ताकि मोदी जी एंड कंपनी निष्कंटक राज कर सके। लोकतन्त्र ! जब राजनीति की नई परिभाषा गढ़ दी गई है तब लोकतन्त्र की परिभाषा भी तो बदलेगी ही। दो लाइन पढ़ो-

बिहार ने हरयाणा को साफ कर दिया
नितीश ने गिरगिट को मात कर दिया।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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यूपी में बीजेपी की सियासी बेचैनी : अखिलेश, माया और राहुल मिल कर दे सकते हैं मात!

संजय सक्सेना, लखनऊ

उत्तर प्रदेश में बीजेपी लगातार जीत का परचम फहराती जा रही है। यूपी में उसकी सफलता का ग्राफ शिखर पर है, लेकिन शिखर पर पहुंच कर भी बीजेपी एक ‘शून्य’ को लेकर बेचैन नजर आ रही है। उसे चुनावी रण में हार का अंजाना सा डर सता रहा है। इस डर के पीछे खड़ी है अखिलेश-माया और राहुल की तिकड़ी, जो फिलहाल तो अलग-अलग दलों से सियासत कर रहे हैं, मगर मोदी के विजय रथ को रोकने के लिये तीनों को हाथ मिलाने से जरा भी गुरेज नहीं है। बीजेपी का डर लखनऊ से लेकर इलाहाबाद तक में साफ नअर आता है। असल में 2014 के लोकसभा चुवाव मे मिली शानदार जीत का ‘टैम्पो’ बीजेपी 2019 तक बनाये रखना चाहती है।

यह तभी हो सकता है जब बीजेपी के किसी सांसद के इस्तीफे की वजह से बीजेपी को उप-चुनाव का सामना न करना पड़ जायें। बात यहां यूपी के उप-मुख्यमंत्री और फूलपुर से सांसद केशव प्रसाद मौर्या की हो रही है। मौर्या को अगर डिप्टी सीएम बने रहना है तो छह माह के भीतर (नियुक्ति के समय से) उन्हें विधान सभा या विधान परिषद का सदस्य बनना पड़ेगा। इसके लिये सबसे पहले केशव को संासदी छोड़ना पड़ेगी। सांसदी छोड़ेगें तो जिस (फूलपुर) लोकसभा सीट का केशव प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वहा चुनाव भी होगा और चुनाव में बीजेपी को जीत नहीं हासिल हुई तो विपक्षी ऐसा माहौल बना देंगे मानों यूपी में बीजेपी शिखर से शून्य पर पहुंच गई है। बात यहीं तक सीमित नहीं रहेगी। मोदी ने यूपी में जो चमत्कार किया था, उस पर भी सवाल खड़े होंगे? ऐसे में पूरे देश में गलत संदेश जायेगा, जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव तक पर पड़ सकता है।

फूलपुर लोकसभा चुनाव के पुराने नतीजे भी बीजेपी में भय पैदा कर रहे हैं। फूलपुर संसदीय सीट से तीन बार पंडित जवाहर लाल नेहरू, दो बार विजय लक्ष्मी पंडित से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह तक चुनाव जीत चुके हैं। 1952 से लेकर 2009 तक बीजेपी का यहां कभी खाता नहीं खुला। 2009 के लोकसभा चुनाव में तो यहां से बीजेपी को पांयवें नबर पर ही संतोष करना पड़ा था और उसे मात्र 8.12 प्रतिशत वोट ही मिले थे। यहां तो कभी राम लहर तक का असर नहीं दिखा। हॉ, 2014 के चुनाव में जरूर चमत्कारिक रूप से मोदी लहर में यह सीट बीजेपी की झोली में आ गई थी। इसी लिये यह कयास लगाये जा रहे हैं कि बीजेपी आलाकमान केशव को सासदी से इस्तीफा दिलाने की बजाये उन्हें डिप्टी सीएम के पद से इस्तीफा दिलाकर दिल्ली में कहीं समायोजित कर सकती है।

वैसे, तमाम कयासों के बीच कहा यह भी जा रहा है कि बीजेपी की चिंता बेकार की नहीं है। असल में यहां चुनाव की नौबत आती है तो गैर भाजपाई दल यहां अपना संयुक्त प्रत्याशी उतार सकती है। फूलपुर संसदीय सीट पर चुनाव की नौबत आती है तो बसपा सुप्रीमों मायावती भी विपक्ष की संयुक्त प्रत्याशी बन सकती हैं। मायावती के राज्यसभा से इस्तीफे को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। वह लोकसभा पहुंच कर मोदी को दलितों सहित सामाजिक समरसता के तमाम मुद्दों पर आमने-सामने खड़े होकर घेरना चाहती हैं, जिसका सीधी असर यूपी की भविष्य की सियासत पर पड़ेगा। कुछ लोग इससे इतर यह भी तर्क दे रहे है कि बीजेपी आलाकमान योगी को पूरी स्वतंत्रता से काम करने की छूट देने का विचार कर रही है। मगर इसके लिये वह पिछड़ा वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहता है। पार्टी नेतृत्व का केशव पर भरोसा और पिछड़े वर्ग से होने के नाते भी उनके दिल्ली जाने की खबरों को बल मिलता दिख रहा है।

केशव प्रसाद के भविष्य को लेकर एक-दो दिन में तस्वीर साफ हो जाएगी। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 29 जुलाई को तीन दिवसीय प्रवास पर लखनऊ आ रहे हैं। वह अपने प्रवास के दौरान एक तरफ सरकार और संगठन के बीच समन्वय बैठाने की कोशिश करेंगे तो दूसरी तरफ 2019 के लोकसभा चुनाव के अभियान की बुनियाद भी रखेंगे। शाह पहली बार तीन दिन के प्रवास पर आ रहे है। इसके कई संकेत हैं। तीन दिन में शाह 25 बैठकें करेंगे। बताते चलें की हाल में पीएम मोदी से मुलाकात के दौरान सांसदों ने योगी के मंत्रियों की शिकायत की थी। मोदी ने इसे काफी गंभीरता से लिया थां। इसका प्रभाव भी शाह के दौरे पर दिखाई पड़ सकता है।

उधर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चुनाव को लेकर यही संभावना जताई जा रही है कि वह अपने संसदीय क्षेत्र गोरखपुर में ही विधानसभा की किसी सीट से चुनाव लड़ेंगे। दूसरे डिप्टी सीएम डॉ. दिनेश शर्मा को विधान परिषद भेजा जा सकता है। इस समय योगी, मौर्य और डॉ.शर्मा सहित परिवहन राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार स्वतंत्र देव सिंह और वक्फ व विज्ञान प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री मोहसीन रजा भी विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं है।

योगी और मौर्य की सांसदी फिलहाल उप-राष्ट्रपति चुनाव तक तो बरकरार रहेगी ही, लेकिन 19 सितंबर से पहले दोंनो को विधानमंडल के किसी सदन की सदस्यता लेनी ही पड़ेगी, लेकिन विधान सभा और विधान परिषद की मौजूदा स्थिति को देखते हुए वर्तमान सदस्यों से त्याग पत्र दिलाए बिना इन सबके समायोजन की स्थिति दिखाई नहीं दे रही। भाजपा विधायक मथुरा पाल और सपा एमएलसी बनवारी यादव के निधन के चलते हालांकि विधानसभा और विधान परिषद में एक- एक स्थान रिक्त है, पर इन सीटों की स्थिति देखते हुए यहां से मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री या राज्यमंत्रियों मंे किसी को लड़ाने की संभावना दूर- दूर तक नहीं दिखती। ऐसे में संभावना यही है कि भाजपा नई सीटें खाली कारकर इन सबका समायोजन कराएगी।

अखिलेश की चुटकी
केशव के दिल्ली भेजे जाने की चर्चा के बीच सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुटकी लेते हुए कहा कि अभी तो तीनों मिले नहीं, फिर क्यों घबरा गए। अखिलेश ने केशव प्रसाद मौर्य का नाम लिए बगैर कहा,सुना हैं कि आप लोग किसी को दिल्ली भेज रहे है। अभी तो समझौता नहीं हुआ है फिर क्यों घबरा गए। अगर हम तीनों (सपा, बसपा व कांग्रेस) एक हो जाएं तो आप कहां ठहरोगे, यह आप समझ सकते हो।

लेखक संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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गोरखपुर लोकसभा सीट से बीजेपी शलभ मणि त्रिपाठी को देगी टिकट!

Vikas Mishra : योगी आदित्यनाथ तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। अब सवाल ये उठ रहा है कि गोरखपुर से सांसद कौन बनेगा। दरअसल सवाल ये उठना चाहिए था कि गोरखपुर से सांसद के उपचुनाव में बीजेपी का प्रत्याशी कौन होगा, लेकिन ये सवाल इस नाते नहीं उठ रहा, क्योंकि गोरखपुर में योगी के उत्तराधिकारी की जीत पक्की है। मेरी राय में तो बीजेपी को गोरखपुर लोकसभा सीट से शलभ मणि त्रिपाठी Shalabh Mani Tripathi को टिकट देना चाहिए। इसकी वजहें भी हैं।

शलभ योगी की तरह तेज तर्रार हैं, जरूरत पड़ने पर कड़क तो जरूरत पड़ने पर नरम हैं। पत्रकारों के बीच प्रचलित तमाम व्यसनों से शलभ कोसों दूर हैं। योगी और शलभ के बीच उम्र का फासला भी बहुत ज्यादा नहीं होगा, शलभ तीन-चार साल छोटे होंगे। योगी गोरखपुर के युवा सांसद रहे तो गोरखपुर को युवा सांसद ही मिलना चाहिए। शलभ मणि नेटवर्क 18 में एक दशक से ज्यादा वक्त तक उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहे हैं। पूरे प्रदेश को जानते हैं। गोरखपुर के रहने वाले हैं, तो गोरखपुर को क्या चाहिए, उसे अच्छी तरह समझते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त हैं।

हाल ही में शलभ ने पत्रकारिता की पारी घोषित करके सियासत की दुनिया में नई पारी बीजेपी के साथ शुरू की है। इतिहास गवाह है कि तमाम पत्रकार अच्छे राजनेता साबित हुए हैं। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर एमजे अकबर तक पत्रकारों के अच्छे राजनेता बनने की नजीर भी है। इसीलिए मेरी नजर में गोरखपुर लोकसभा सीट से शलभ मणि त्रिपाठी बेहतरीन उम्मीदवार हैं।

शलभ को मैं व्यक्तिगत रूप से भी जानता हूं। वो ऐसी जगह, ऐसे पद-पोजीशन में रहे, जहां दिमाग खराब हो जाने की गुंजाइश बहुत ज्यादा होती है, लेकिन शलभ हमेशा वैसे बने रहे, जैसे वो 12 साल पहले थे। उतने ही सभ्य, उतने ही विनम्र, उतने ही सौम्य और चेहरे पर उतनी ही मुस्कान। बड़ों को सम्मान, छोटों को स्नेह और हमउम्रों को सहयोग देने में शलभ ने कभी कोताही नहीं की। इसी नाते मेरी नजर में शलभ गोरखपुर से सांसद बनने के लिए सर्वथा योग्य हैं। गोरखपुर और आसपास के लोगों से मैं जानना चाहता हूं कि सांसदी के लिए शलभ मणि की उम्मीदवारी की दावेदारी पर उनकी क्या राय है..?

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत और गोरखपुर के निवासी विकास मिश्र की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर शलभ मणि त्रिपाठी का जो कमेंट आया है, वह इस प्रकार है…

Shalabh Mani Tripathi बहुत देर तक सोचता रहा लिखूँ या ना लिखूँ, कुछ कहूँ या ना कहूँ, पर लगा कि विकास भइया ने इतनी बडी बहस छेड़ दी है तो ख़ामोश रहना भी मुनासिब नहीं होगा……… विकास भइया आपकी इस पोस्ट के एक एक शब्द से मेरे लिए आपका अथाह प्यार टपक रहा है, और ऐसा ही प्यार-लगाव उन सभी दोस्तों की प्रतिक्रियाओं में भी साफ़ दिख रहा है जो विकास भइया की इस पोस्ट के पक्षधर हैं……मैं आप सबके प्यार से सच में अभिभूत हूं, पर सच तो यही है कि गोरखपुर की जिस लोकसभा सीट की गरिमा आदरणीय योगी जी ने देश और दुनिया में बढ़ाई है, मैं ख़ुद को उस सीट के क़ाबिल नहीं पाता, मुझे अभी बहुत काम करना है, बहुत कुछ सीखना है, मुझसे ज़्यादा क़ाबिल, कर्मठ और बेहतर लोग हैं गोरखपुर में इस सीट के लायक, मैं सौभाग्यशाली हूँ कि आप सबका इतना स्नेह और भरोसा है मुझ पर, और मेरा सबसे बड़ा दायित्व है इसे हमेशा बरक़रार रखना, इसीलिए आप सभी का हृदय से आभार जताते हुए उन सभी को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया या फिर मेरी कमियाँ बता कर भी, खुद को और बेहतर बनाने की मेरी मुहिम में अपना महती योगदान दिया, आप सबके प्यार का हमेशा आकांक्षी रहूंगा, धन्यवाद. 

Vikas Mishra मैंने इसी सौम्यता का जिक्र अपनी पोस्ट में किया था Shalabh Mani Tripathi । आज जहां तुम हो, बेशक वहां से वैसा दिखता होगा, जहां की बात कर रहे हो, लेकिन मैं जहां पर हूं, वहां से देखता हूं तो वैसा दिखता है, जैसा मैंने अपनी पोस्ट में लिखा है। मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि जैसे टीवी 18 ग्रुप ने तुम्हारी पूरी प्रतिभा का उपयोग किया, बीजेपी भी तुम्हारे पूरे टैलेंट, कमिटमेंट और उत्तर प्रदेश में डेढ़ दशक की पत्रकारिता के अनुभव का पूरा इस्तेमाल करे। मैं बतौर पत्रकार किसी पार्टी का पक्षधर नहीं हो सकता, लेकिन व्यक्तिगत रूप से जो मेरे करीब है, उसकी उन्नति तो हमेशा चाहता हूं। मुझे यकीन है कि जो भी जिम्मेदारी तुम्हें मिलेगी, तुम साबित करोगे कि इसके लिए तुमसे बेहतर कोई और नहीं था।

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भाजपा : वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति का समय

उत्तर प्रदेश अरसे बाद एक ऐसे मुख्यमंत्री से रूबरू है, जिसे राजनीति के मैदान में बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उनके बारे में यह ख्यात था कि वे एक खास वर्ग की राजनीति करते हैं और भारतीय जनता पार्टी भी उनकी राजनीतिक शैली से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भारी विजय के बाद भाजपा ने जिस तरह का भरोसा जताते हुए राज्य का ताज योगी आदित्यनाथ को पहनाया है, उससे पता चलता है कि ‘अपनी राजनीति’ के प्रति भाजपा का आत्मदैन्य कम हो रहा है।

भाजपा का आज तक का ट्रैक हिंदुत्व का वैचारिक और राजनीतिक इस्तेमाल कर सत्ता में आने का रहा है। देश की राजनीति में चल रहे विमर्श में भाजपा बड़ी चतुराई से इस कार्ड का इस्तेमाल तो करती थी, किंतु उसके नेतृत्व में इसे लेकर एक हिचक बनी रहती थी। वो हिचक अटल जी से लेकर आडवानी तक हर दौर में दिखी है। भाजपा का हर नेता सत्ता पाने के बाद यह साबित करने में लगा रहता है वह अन्य दलों के नेताओं के कम सेकुलर नहीं है।

उत्तर प्रदेश की ‘आदित्यनाथ परिघटना’ दरअसल भाजपा की वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति को स्थापित करती नजर आती है। नरेंद्र मोदी के राज्यारोहण के बाद योगी आदित्यनाथ का उदय भारतीय राजनीति में एक अलग किस्म की राजनीति की स्वीकृति का प्रतीक है। एक धर्मप्राण देश में धार्मिक प्रतीकों, भगवा रंग, सन्यासियों के प्रति जैसी विरक्ति मुख्यधारा की राजनीति में दिखती थी, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भाजपा जैसे दल भी इस सेकुलर विकार से कम ग्रस्त न थे। धर्म और धर्माचार्यों का इस्तेमाल, धार्मिक आस्था का दोहन और सत्ता पाते ही सभी धार्मिक प्रतीकों से मुक्ति लेकर सारी राजनीति सिर्फ तुष्टीकरण में लग जाती थी। प्रधानमंत्रियों समेत जाने कितने सत्ताधीशों के ताज जामा मस्जिद में झुके होगें, लेकिन हिंदुत्व के प्रति उनकी हिचक निरंतर थी। 

यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं की एक समय में दीनदयाल जी उदार थे, तो अटलजी और बलराज मधोक अपनी वक्रता के चलते उग्र नेता माने जाते थे। अटलजी का दौर आया तो लालकृष्ण आडवाणी उग्र कहे जाने लगे, फिर एक समय ऐसा भी आया जब आडवानी उदार हो गए और नरेंद्र मोदी उग्र मान जाने लगे। आज की व्याख्याएं सुनें- नरेंद्र मोदी उदार हो गए हैं और योगी आदित्यनाथ उग्र  माने जाने लगे हैं। यह मीडिया, बौद्धिकों की अपनी रोज बनाई जाती व्याख्याएं हैं। लेकिन सच यह है कि अटल, मधोक, आडवानी, मोदी या आदित्यनाथ कोई अलग-अलग लोग नहीं है। एक विचार के प्रति समर्पित राष्ट्रनायकों की सूची है यह। इसमें कोई कम जा ज्यादा उदार या कठोर नहीं है। किंतु भारतीय राजनीति का विमर्श  ऐसा है जिसमें वास्तविकता से अधिक ड्रामे पर भरोसा है। भारतीय राजनेता की मजबूरी है कि वह टोपी पहने, रोजा भले न रखे किंतु इफ्तार की दावतें दे। आप ध्यान दें सरकारी स्तर पर यह प्रहसन लंबे समय से जारी है। भाजपा भी इसी राजनीतिक क्षेत्र में काम करती है। उसमें भी इस तरह के रोग हैं। वह भी राष्ट्रनीति के साथ थोड़े तुष्टिकरण को गलत नहीं मानती। जबकि उसका अपना नारा रहा है सबको न्याय, तुष्टिकरण किसी का नहीं। उसका एक नारा यह भी रहा है-“राम, रोटी और इंसाफ। ”

लंबे समय के बाद भाजपा में अपनी वैचारिक लाइन को लेकर गर्व का बोध दिख रहा है। असरे बाद वे भारतीय राजनीति के सेकुलर संक्रमण से मुक्त होकर अपनी वैचारिक भूमि पर गरिमा के साथ खड़े दिख रहे हैं। समझौतों और आत्मसमर्पण की मुद्राओं के बजाए उनमें अपनी वैचारिक भूमि के प्रति हीनताग्रंथि के भाव कम हुए हैं। अब वे अन्य दलों की नकल के बजाए एक वैचारिक लाइन लेते हुए दिख रहे हैं। दिखावटी सेकुलरिज्म के बजाए वास्तविक राष्ट्रीयता के उनमें दर्शन हो रहे हैं। मोदी जब एक सौ पचीस करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते हैं तो बात अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक से ऊपर चली जाती है। यहां देश सम्मानित होता है, एक नई राजनीति का प्रारंभ दिखता है। एक भगवाधारी सन्यासी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है तो वह एक नया संदेश देता है। वह संदेश त्याग का है, परिवारवाद के विरोध का है, तुष्टिकरण के विरोध का है, सबको न्याय का है।

आजादी के बाद के सत्तर सालों में देश की राजनीति का विमर्श भारतीयता और उसकी जड़ों की तरफ लौटने के बजाए घोर पश्चिमी और वामपंथी रह गया था। जबकि बेहतर होता कि आजादी के बाद हम अपनी ज्ञान परंपरा की और लौटते और अपनी जड़ों को मजबूत बनाते। किंतु सत्ता,शिक्षा, समाज और राजनीति में हमने पश्चिमी तो, कहीं वामपंथी विचारों के आधार पर चीजें खड़ी कीं। इसके कारण हमारा अपने समाज से ही रिश्ता कटता चला गया। सत्ता और जनता की दूरी और बढ़ गयी। सत्ता दाता बन बैठी और जनता याचक।  सेवक मालिक बन गए। ऐसे में लोकतंत्र एक छद्म लोकतंत्र बन गया। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हम सत्तर साल के बाद सड़कें बना रहे हैं। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हमारे अपने नौजवानों ने भारतीय राज्य के खिलाफ बंदूकें उठा रखी हैं। लोकतंत्र की विफलता की ये कहानियां सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं। राजनीतिक तंत्र के प्रति उठा भरोसा भी साधारण नहीं है।

बावजूद इसके 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम एक उम्मीद का अवतरण भी हैं। वे आशाओं, उम्मीदों से उपजे परिणाम हैं। नरेंद्र मोदी, आदित्यनाथ इन्हीं उम्मीदों  के चेहरे हैं। दोनों अंग्रेजी नहीं बोलते। दोनों जन-मन-गण के प्रतिनिधि है। यह भारतीय राजनीति का बदलता हुआ चेहरा है। क्या सच में भारत खुद को पहचान रहा है ? वह जातियों, पंथों, क्षेत्रों की पहचान से अलग एक बड़ी पहचान से जुड़ रहा है- वह पहचान है भारतीय होना, राष्ट्रीय होना। एक समय में राजनीति हमें नाउम्मीद करती हुयी नजर आती थी। बदले समय में वह उम्मीद जगा रही है। कुछ चेहरे ऐसे हैं जो भरोसा जगाते हैं। एक आकांक्षावान भारत बनता हुआ दिखता है। यह आकांक्षाएं राजनीति दलों के एजेंडे से जुड़ पाएं तो देश जल्दी और बेहतर बनेगा। राजनीतिक विमर्श और जनविमर्श को साथ लाने की कवायद हमें करनी ही होगी। जल्दी बहुत जल्दी। यह जितना और जितना जल्दी होगा भारत अपने भाग्य पर इठलाता दिखेगा।

(लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्वेषक हैं)

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यूपी में भाजपा विधायक ने सीओ को धमकाया

यूपी में भारी बहुमत पाने वाली भाजपा की छवि पर पलीता लगाने का काम उसके कुछ नए बने विधायकों ने शुरू कर दिया है. सत्ता के नशे में चूर इन विधायक महोदय को मर्यादा का खयाल नहीं है. इस आडियो में सुनिए एक भाजपा विधायक (सवायजपुर, हरदोई) की सीओ (शाहाबाद, हरदोई) से बातचीत. लोग इस टेप को सुनकर कहने लगे हैं कि लगता है यूपी के अच्छे दिन आ गए हैं… टेप सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

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एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को!

यूपी में रक्तहीन क्रांति पर भड़ास एडिटर यशवंत की त्वरित प्रतिक्रिया- ‘मीडियाकर्मियों का अंतहीन उत्पीड़न करने वाले अखिलेश राज का खात्मा स्वागत योग्य’

Yashwant Singh : यूपी में हुए बदलाव का स्वागत कीजिए. सपा और बसपा नामक दो लुटेरे गिरोहों से त्रस्त जनता ने तीसरे पर दाव लगाया है. यूपी में न आम आदमी पार्टी है और न कम्युनिस्ट हैं. सपा और बसपा ने बारी बारी शासन किया, लगातार. इनके शासन में एक बात कामन रही. जमकर लूट, जमकर झूठ, जमकर जंगलराज और जमकर मुस्लिम तुष्टीकरण. इससे नाराज जनता ने तीसरी और एकमात्र बची पार्टी बीजेपी को जमकर वोट दिया ताकि सपा-बसपा को सबक सिखाया जा सके.

प्रचंड बहुमत से यूपी में सत्ता पाने वाली भाजपा ने अगर अगले दो साल में शासन करने का ढर्रा नहीं बदला, सपा-बसपा वाली लूट मार शैली से इतर एक नया सकारात्मक कल्चर नहीं डेवलप किया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यूपी में थउंस जाएगी यानि ढेर हो जाएगी. मैंने निजी तौर पर अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को हराने के लिए अपील किया था क्योंकि इन महोदय के राज में एक पत्रकार जिंदा जला दिया गया, पत्रकार ने मरने से पहले जलाने वाले मंत्री का नाम भी लिया लेकिन उस मंत्री को सत्ता से बेदखल नहीं किया गया. आपको यह भी याद होगा कि अखिलेश यादव ने यूपी में सरकार बनाते हुए मुझे कुछ भ्रष्ट पतित संपादकों और मीडिया हाउसों के इशारे पर उठवा कर अवैध तरीके से 68 दिनों तक जेल में बंद करवाया था.

मेरे बाद भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को भी जेल में डलवाया गया. बाद में आफिस और घरों पर छापे डलवाए गए. खैर, हम लोग तो जेल से जश्न मनाते हुए निकले और ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिख डाला. पर फकीर का श्राप आह तो पड़ता ही है. एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को! मैंने सपा को वोट न देकर किसी को भी वोट देने की अपील की थी. ढेर सारे लखनवी चारण पत्रकारों और ढेर सारे मीडिया हाउसों के ‘अखिलेश जिंदाबाद’ वाली पेड न्यूज पत्रकारिता के बावजूद अखिलेश यादव को जनता ने दक्खिन लगा दिया.

बीजेपी वाले जश्न बिलकुल मनाएं, लेकिन ध्यान रखें कि जनता ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी दे दी है. अब शासन का नया ढर्रा विकसित करना होगा और जंगलराज-लूटराज से यूपी को मुक्ति दिलानी होगी. हम सबकी नजर यूपी की नई भाजपा सरकार पर रहेगी. फिलहाल मोदी और शाह की करिश्माई जोड़ी को बधाई… ये लोग सच में इस लोकतंत्र में वोटों की राजनीति-गणित के शहंशाह साबित हो रहे हैं. जैजै

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. उपरोक्ट स्टेटस पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें : YASHWANT FB POST

ये है वो खबर जिसे भड़ास की तरफ से यूपी चुनाव से ठीक पहले एक अपील के रूप में जारी किया गया था…

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झंडा लगाने वाले भाजपा कार्यकर्ता को पुलिस ने बुरी तरह पीटा (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश में बेलगाम पुलिस के जंगलराज का एक और वीभत्स घटनाक्रम सामने आया है. मथुरा में भाजपा के एक जुनूनी कार्यकर्ता प्रदीप बंसल को कृष्णानगर पुलिस चौकी इंचार्ज ने बुरी तरह पीटा. सिर्फ इसलिए कि वे मोटर साइकिल पर भाजपा का और राष्ट्र का झंडा लगा कर घूम रहे थे.

कृष्ण नगर पुलिस चौकी के इंचार्ज ने इस देश भक्त कार्यकर्ता को ना केवल मारा पीटा बल्कि अश्लील गाली भी दी और रात भर चौकी में बंद रखा. सरेआम भाजपा कार्यकर्ता को पीटे जाने से भाजपा कार्यकर्ताओं और आम जनता में आक्रोश है. वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=d9wbQor1Fqs

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भाजपा का मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम पर आकर क्यों अटक जाता है?

…आखिर कब तक काटोगे नफरत की राजनीति की फसल? उत्तर प्रदेश में चुनावी घमासान चल रहा है। वैसे तो कई संगठन चुनावी समर में हैं पर असली मुकाबला सपा-कांग्रेस गठबंधन, बसपा और भाजपा के बीच है। बसपा भापजा पर निशाना साधते हुए कानून व्यवस्था पर उंगली उठा रही है तो सपा सरकार की उपलब्धियां गिना रही है और कांग्रेस केंद्र सरकार की खामियां गिनाकर अपने को साबित कर रही है। इन सबके बीच भाजपा केंद्र में ढाई साल से ऊपर हो जाने के बावजूद भावनाओं का सहारा लेकर वोटों का ध्रुर्वीकरण करने का खेल खेल रही है।

चुनावी शुरुआत में भले ही भाजपा प्रचारकों ने कानून व्यवस्था पर उंगली उठाई हो पर हर चुनाव की तरह ही इन चुनाव में भी उसका एकसूत्रीय एजेंडा हिन्दू वोटों का ध्रुर्वीकरण करना है। जहां भाजपा अध्यक्ष  अमित शाह ने कांग्रेस, सपा व बसपा को ‘कसाब’ की संज्ञा दे दी वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कब्रिस्तान और श्मशान के लिए आवंटित जमीन पर हिन्दू वाटबैंक को रिझाने की कोशिश की वहीं और ईद व दीवाली पर लाइट को लेकर वोटों का ध्रुर्वीकरण करने का प्रयास किया। यहां तक कि अब ट्रेन हादसे को लेकर एक विशेष वर्ग पर हमला बोला।

इसमें दो राय नहीं कि चुनाव के समय वोटों के ध्रुर्वीकरण को लेकर तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं पर क्या हर चुनाव में भाजपा के पास बस भावनात्मक मुद्दे ही हैं। किसी देश का प्रधानमंत्री किसी प्रदेश की सरकार की नीतियों पर उंगली उठाए तो उससे उसका कद गिराता है। यदि किसी प्रदेश में कहीं गलत हो रहा है तो आप तो केंद्र में बैठे हैं। आप सब कुछ कर सकते हैं, तो क्यों नहीं करते। अमित शाह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार में उनकी सरकार बनते ही बूचड़खाने बंद करा दिये जाएंगे। गो हत्या नहीं होगी। प्रधानमंत्री कहते हैं किसानों का कर्जा माफ कर दिया जाएगा।

मेरी समझ में तो यह नहीं आता कि जब ये लोग केंद्र में सरकार चला रहे हैं तो केंद्र की उपलब्धि पर वोट क्यों नहीं मांगते? वैसे भी जनता ने मोदी जी को प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनाया है। जहां तक कर्जा माफ करने की बात है तो आप तो पूरे देश के किसानों का कर्जा माफ कर सकते हैं। गो हत्या की बात है तो देश के आधे प्रदेशों में तो आपकी ही सरकरा चल रही है तो इतने बड़े स्तर पर मांस का निर्यात कैसे हो रहा है। बात गो हत्या की ही क्यों पशु हत्या की क्यों नहीं करते ? भैंसा, भैंस, बकरी, बकरा, सूअर क्या जीव नहीं हैं क्या?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगरा एक्सप्रेस, लखनऊ मेट्रो, पेंशन आदि उपलब्धियां गिना तो रहे हैं पर भाजपा का मुद्दा तो बस हिन्दू मुस्लिम पर आकर अटक जाता है। बेरोजगारी की बात नहीं करेंगे। भ्रष्टाचार की बात नहीं करेंगे। शिक्षा में सुधार की बात नहीं करेंगे।  किसान आत्महत्या की बात नहीं करेंगे ? महंगाई की बात नहीं करेंगे ? नोटबंदी के चलते हुई परेशानी की बात नहीं करेंगे? भाईचारे की बात नहीं करेंगे। देश व प्रदेश को कैसे विकास के रास्ते पर ले जाएंंगे, यह नहीं बताएंगे। बस समाज में जातिवाद, धर्मवाद, हिन्दू-मुस्लिम, तेरा-मेरा का जहर खोलकर सत्ता हासिल करनी है।

देश के बंटवारे के समय गांधी जी ने मुस्लिमों को रोकते हुए यही तो कहा था कि हम देश को विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न जातियों व विभिन्न धर्मों का ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश बनाएंगे जो दूसरे देशों के लिए मिसाल होगा तो फिर यह बांटने की नीति क्यों? नफरत की नीति क्यों? हमारे समाज में तो बड़ा छोटों के प्रति त्याग व बलिदान की भावना रखता है। करना आपको हिन्दुओं के लिए भी कुछ नहीं है। बस राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं। यदि करना है तो बताओ विवादित ढांचे के ध्वस्त होने में मरे युवाओं के लिए आपने क्या किया? मुजफ्फरनगर दंगे में मरे लोगों के लिए आपने क्या किया? किसी गरीब हिन्दू की बेटी की शादी में दो रुपए का कन्या भिजवाया।

किसी गरीब हिन्दू बच्चे की पढ़ाई में दो पैसे का  योगदान दिया। किसी गरीब बेसहाय परिवार की मदद की? आप तो भूमि अधिग्रहण कानून लागू कर किसानों की जमीन हड़पना चाहते थे। श्रम कानून में संशोधन कर मजदूर की मजदूरी गिरवी रखना चाहते थे। तो आप कैसे हुए किसान व मजदूर के हितैषी? आपको तो बस समाज को बांटने की राजनीति करनी है। कब तक काटोगे नफरत की राजनीति पर खड़ी की गई इस वोटबैंक की फसल को। इस देश को आपस में मिलकर विकास के रास्ते पर ले जाने की जरूरत है। मिलजुल कर भाईचारा कायम करने की जरूरत है।

लेखक चरण सिंह राजपूत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं और मीडियाकर्मियों की हक की लड़ाई के लिए सक्रिय रहते हैं.

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भाजपा के पक्ष में प्रायोजित तरीके से लिखने वाले प्रदीप सिंह कोई अकेले पत्रकार नहीं हैं

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

Sanjaya Kumar Singh : चुनाव जीतने की भाजपाई चालें, मीडिया और मीडिया वाले… उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं। भक्त, सेवक, कार्यकर्ता, प्रचारक सब अपनी सेवा भक्ति-भाव से मुहैया करा रहे हैं। इसमें ना कुछ बुरा है ना गलत। बस मीडिया और मीडिया वालों की भूमिका देखने लायक है। नए और मीडिया को बाहर से देखने वालों को शायद स्थिति की गंभीरता समझ न आए पर जिस ढंग से पत्रकारों का स्वयंसेवक दल भाजपा के पक्ष में लगा हुआ है वह देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा एक सांप्रादियक पार्टी है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन मजबूरी में ही करती है।

नरेन्द्र मोदी को जिन स्थितियों में जिस तरह प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया और उसके बाद जीतने पर उन्होंने जो सब किया, जो कार्यशैली रही वह काफी हद तक तानाशाह वाली है। इसे उनकी घोषित-अघोषित, दिखने वाली और न दिखने वाली अच्छाइयों के बदले तूल न दिया जाए यह तो समझ में आता है। पर अपेक्षित लाभ न होने पर भी नरेन्द्र मोदी और आज की भाजपा का समर्थन भारत जो इंडिया बन रहा था उसे हिन्दुस्तान बनाने का समर्थन करना है। मीडिया का काम आम लोगों को इस बारे में बताना और इंडिया से हिन्दुस्तान बनने के नफा-नुकसान पर चर्चा करना है पर मीडिया के एक बड़े हिस्से ने तय कर लिया हो उग्र हिन्दुत्व ही देशहित है।

मीडिया पैसे के लिए और दबाव में ऐसा करे – तो बात समझ में आती है। उसे रोकने के लिए भी दबाव बनाया जा सकता है। पाठकों को बताया जा सकता है और उम्मीद की जा सकती है कि जनता चीजों को समझेगी तो मीडिया से ऐसे प्रभावित नहीं होगी जैसे आमतौर पर हो सकती है। लेकिन स्थिति उससे विकट है। मीडिया के लोग खुलकर भाजपा का समर्थन कर रहे हैं। कुतर्क कर रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं वे तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्ति वाली और हिन्दुत्व की पत्रकारिता कर रहे हैं। जो पुराने लोग संघ समर्थक पत्रकार माने जाते हैं उन्हें भी अब घोषित रूप से समर्थन करने में हिचक नहीं है।

इसी क्रम में आज वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने आज जागरण में प्रकाशित अपने लेख, “उत्तर प्रदेश की चुनावी हवा” का लिंक फेसबुक पर साझा किया है। पूरा लेख क्या होगा इसका अंदाजा है इसलिए पढ़ा नहीं और जो अंश हाइलाइट किया गया है उसे पढ़ने के बाद समझ में आ जाता है कि लेखक कहना क्या चाहता है। संबंधित अंश है, “यदि भाजपा मोदी के प्रचि वंचित तबकों के आदर भाव को वोट में बदल लेती है तो चुनाव जातीय समीकरणों से परे जा सकता है।” प्रदीप सिंह फेसबुक पर सक्रिय नहीं है। इस लेख से पहले उनका जो लेख उनकी वाल पर दिख रहा है वह 2 दिसंबर का है। आज 23 फरवरी को एक लेख का लिंक देने भर से यह आरोप लगाना उचित नहीं है कि वे भाजपा का प्रचार कर रहे हैं। पर दो दिंसबर की उनकी पोस्ट है, “राज्यसभा में हंगामा और नारेबाजी कर रहे सदस्यों से सभापति हामिद अंसारी ने पूछा ये नारे सड़कों पर क्यों नहीं लग रहे? सवाल तो बड़ा वाजिब है। पर अभी तक कोई जवाब आया नहीं है।” इसे 17 लोगों ने शेयर किया है।

दो दिसंबर को ही उनकी एक और पोस्ट है जो एक दिसंबर को जागरण में ही प्रकाशित उनके लेख का लिंक है या उसे साझा किया गया है। इससे पहले उनकी पोस्ट 6 अक्तूबर की है। यह भी जागरण में प्रकाशित उनके लेख का लिंक है। लेख का शीर्षक है, “कुतर्कों के नए देवता” और यह सर्जिकल स्ट्राइक पर है। इसकी शुरुआत इस तरह होती है, “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। फिल्म अमर प्रेम का यह गाना भारतीय नेताओं पर सटीक बैठता है। नेता किसी घटना, बयान या भाषण पर प्रतिक्रिया देने से पहले यह सोचता है कि जो हुआ है उसका फायदा किसे होगा। फायदा अपने विरोधी को होता दिखे तो वह विरोध में किसी हद तक जाने को तैयार रहता है। इस मामले में अमूमन फौज को अपवाद माना जाता था, लेकिन अब नहीं। यह नरेंद्र मोदी का सत्ता काल है।” इस पोस्ट में लिखा है, “मित्रों लम्बे अंतराल के बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं। दैनिक जागरण के आज के संस्करण में सम्पादकीय पेज पर छपा मेरा लेख आपकी सेवा में पेश है।”

इससे पहले की पोस्ट सात जुलाई की है जो उन्होंने किसी और का लिखा साझा किया है और अंग्रेजी में है। यह पोस्ट राजनीतिक नहीं है। प्रदीप सिंह का रुझान भाजपा की तरफ है, यह कोई नई बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वे इनदिनों अपने सामान्य कार्य से अलग जागरण में लिख रहे हैं उसे फेसबुक पर साझा कर रहे हैं और जागरण उनके नाम के साथ उनकी ई-मेल आईडी नहीं, response@jagran.com छाप रहा है। क्या यह पेड न्यूज या प्रायोजित लेख है? कहने की जरूरत नहीं है कि Pradeep Singh अकेले ऐसे पत्रकार नहीं हैं।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से यह मीडिया विश्लेषण लिया गया है. संजय से संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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राम मंदिर सुप्रीम कोर्ट से ही बनना है तो भाजपा किस मर्ज की दवा?

मोदी सरकार के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही राम मंदिर निर्माण का संवैधानिक रास्ता निकलेगा… अब सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट से ही राम मंदिर बनना है तो फिर भाजपा, संघ या उससे जुड़े विहिप सहित तमाम संगठन किस मर्ज की दवा हैं और सालों से वे किस आधार पर ये दावे करते रहे कि कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे..? विपक्ष में रहते भाजपा ने कभी भी संवैधानिक तरीके से राम मंदिर निर्माण की बात नहीं की, उलटा यह नारा लगाया जाता रहा कि दुनिया की कोई अदालत यह तय नहीं कर सकती कि भगवान राम का जन्म कहां हुआ और मंदिर निर्माण कोर्ट का नहीं, बल्कि आस्था का विषय है…

यह तो सबको पता है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सभी के लिए बाध्यकारी है और कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दलों को मान्य करना ही पड़ेगा… तो फिर भाजपा कैसे राम मंदिर निर्माण का साफा अपने माथे बंधवाएगी..? अभी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भी राम मंदिर निर्माण की बात कही गई और इस चुनाव सहित कुल 14 मर्तबा अपने घोषणा-पत्रों में मंदिर निर्माण के दावे भाजपा कर चुकी है… अब भाजपा और उसके भक्तों की दलील यह भी रहती है कि धारा 370 सहित मंदिर का निर्माण तब होगा जब राज्यसभा सहित उत्तरप्रदेश में भाजपा को पर्याप्त सीटें मिल जाए। यानि न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी… जबकि विपक्ष में रहते ये तमाम बहाने याद नहीं थे…

आज भाजपा और संघ को स्पष्ट घोषणा करना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कुछ भी रहे मंदिर का निर्माण तो हर हाल में होकर रहेगा और इसकी तारीख और मंदिर निर्माण पूरा होने की घोषणा भी लगे हाथ कर देना चाहिए… जब शाहबानो प्रकरण में और अभी जल्लीकट्टू के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विपरित सरकारों ने अध्यादेशों के जरिए नियम-कानून ही बदल डाले, तो फिर राम मंदिर के निर्माण में क्यों नहीं इस तरह का अध्यादेश लाया जाता..? कुल मिलाकर भाजपा राम मंदिर के साथ-साथ अपने तमाम कोर इश्यू जिनमें धारा 370, सामान नागरिक संहिता पर एक्सपोज हो चुकी है… रामलला तो सालों से तम्बू में बैठे हैं और मंदिर बनाने वाले सत्ता के महलों में मस्ती छान रहे हैं…

राजेश ज्वेल
वरिष्ठ पत्रकार
jwellrajesh66@gmail.com

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अखिलेश यादव पितृ हंता मुगल शासकों सरीखे! (देखें वीडियो)

आगरा में भाजपा प्रत्याशी का नामांकन कराने कलेक्ट्रेट आए सांसद राम शंकर कठेरिया ने यूपी के सीएम अखिलेश यादव की तुलना पिता के हत्यारे मुगल शासकों से कर दी. सांसद कठेरिया ने मुगल शासकों को उदाहरण देते हुए हुए बोले कि मुगल काल में शासक लोग सत्ता पाने के लिए अपने पिता तक की हत्या कर देते थे और राजपाठ पर कब्जा कर लेते थे. ठीक इसी तरह सीएम अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह को अपमानित करते हुए उनकी राजनीतिक हत्या कर पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद हथिया लिया.

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मोदी ने भाजपा जैसे दल में जो करिश्मा किया है, वह असाधारण है

मैं ही, मैं हूं दूसरा कोई नहीं! : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देखकर अनेक राजनीतिक टिप्पणीकारों को इंदिरा गांधी की याद आने लगी है। कारण यह है कि भाजपा जैसे दल में भी उन्होंने जो करिश्मा किया है, वह असाधारण है। कांग्रेस में रहते हुए इंदिरा गांधी या सोनिया गांधी हो जाना सरल है। किंतु भाजपा में यह होना कठिन है, कठिन रहा है, मोदी ने इसे संभव किया है। संगठन और सत्ता की जो बारीक लकीरें दल में कभी थीं, उसे भी उन्होंने पाट दिया है। अटल जी के समय में भी लालकृष्ण आडवानी नंबर दो थे और कई मामलों में प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर पर आज एक से दस तक शायद प्रधानमंत्री ही हैं। खुद को एक ताकतवर नेता साबित करने का कोई मौका नरेंद्र मोदी नहीं चूकते। अरसे से कारपोरेट और अपने धन्नासेठ मित्रों के प्रति उदार होने का तमगा भी उन्होंने नोटबंदी कर एक झटके में साफ कर दिया है। वे अचानक गरीब समर्थक होकर उभरे हैं। यह अलग बात है कि उनके भ्रष्ट बैंकिग तंत्र ने उनके इस महत्वाकांक्षी कदम की हवा निकाल दी। बाकी रही-सही कसर आयकर विभाग के बाबू निकाल ही देगें।

“मैं देश नहीं झुकने दूंगा” और “अच्छे दिन” के वायदे के साथ आई सरकार ने अपना आधे से ज्यादा समय गुजार लिया है। इसमें दो राय नहीं कि इन दिनों में प्रधानमंत्री प्रायः अखबारों के पहले पन्ने की सुर्खियों में रहे और लोगों में राजनीतिक चेतना जगाने में उनका खास योगदान है। या यह कहें कि प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द भी खबरें बनती हैं, यह अरसे बाद उन्होंने साबित किया है। छुट्टियों के दिन रविवार को भी मन की बात जैसे आयोजनों या किसी रैली के बहाने टीवी पर राजनीतिक दृष्टि के खाली दिनों में भी काफी जगह घेर ही लेते हैं। उनका चतुर और चालाक मीडिया प्रबंधन या चर्चा में रहने का हुनर काबिले तारीफ है।

बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर इंदिरा जी ने राष्ट्रीय राजनीति में खुद के होने को साबित किया था और एक बड़ी छलांग लगाई थी, नोटबंदी के बहाने भी नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल दिया। हालात यह हैं कि संसद नोटबंदी के चलते नहीं चल सकती। सरकार के ढाई साल के कामकाज किनारे हैं। पूरा विपक्ष नोटबंदी पर सिमट आया है। नोटबंदी के अकेले फैसले से नरेंद्र मोदी ने यह बता दिया है कि सरकार क्या कर सकती है। इससे उनके मजबूत नेता होने की पहचान होती है, जिसे फैसले लेने का साहस है। आप देखें तो इस अकेले फैसले ने उनकी बन रही पहचान को एक झटके में बदल दिया है। सूट-बूट का तमगा लेकर और भूमि अधिग्रहण कानून के बहाने कारपोरेट समर्थक छवि में लिपटा दिए प्रधानमंत्री ने अपनी विदेश यात्राओं से जितना यश कमाया उससे अधिक उन पर तंज कसे गए। यह भी कहा गया “कुछ दिन तो गुजारो देश में।”

लेकिन विमुद्रीकरण का फैसला एक ऐसा फैसला था जिसे गरीबों का समर्थन मिला। विपक्ष भी इस बात से भौंचक है कि परेशानियां उठाकर भी आम लोग नरेंद्र मोदी के इस कदम की सराहना कर रहे हैं। अपेक्षा से अधिक तकलीफों पर भी लोग सरकार की बहुत मुखर आलोचना नहीं कर रहे हैं। दिल्ली और बिहार की चुनावी हार से सबक लेकर प्रधानमंत्री ने शायद समाज के सबसे अंतिम छोर पर खड़े लोगों को साधने की सोची है। उनकी ‘उज्जवला योजना’ को बहुत सुंदर प्रतिसाद मिला है। इसके चलते उनके अपने दल के सांसद अपनी न पूरी होती महत्वाकांक्षाओं के बावजूद भी खामोश हैं। अभी दल के भीतर-बाहर कोई बड़ी चुनौती खड़ी होती नहीं दिख रही है। मोदी ने स्मार्ट सिटी, स्टैंड अप इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया जैसे नारों से भारत के नव-मध्य वर्ग को आकर्षित किया था किंतु बिहार और दिल्ली की पराजय ने साबित किया, कि यह नाकाफी है। असम की जीत ने उन्हें हौसला दिया और नोटबंदी का कदम एक बड़े दांव के रूप में खेला गया है। जाहिर तौर पर एक गरीब राज्य उत्तर प्रदेश में इस कदम की पहली समीक्षा होगी। उत्तर प्रदेश का मैदान अगर भाजपा जीत लेती है तो मोदी के कदमों को रोकना मुश्किल होगा। विपक्षी दलों की यह हड़बड़ाहट साफ देखी जा सकती है।

शायद यही कारण है कि सपा और कांग्रेस के बीच साथ चुनाव लड़ने को लेकर बात अंतिम दौर में हैं। काले धन के खिलाफ इस सर्जिकल स्ट्राइक ने नरेंद्र मोदी के साहस को ही व्यक्त किया है। नोटबंदी के समय और उससे मिली परेशानियों ने निश्चय ही देश को दुखी किया है। देवउठनी एकादशी के बाद जब हिंदू समाज में विवाहों के समारोह प्रारंभ होते हैं ठीक उसी समय उठाया गया यह कदम अनेक परिवारों को दुखी कर गया। इतना ही नहीं अब तक 125 से अधिक लोग अपनी जान दे चुके हैं।

कालेधन के खिलाफ यह जंग दरअसल एक आभासी जंग है। हमें लग रहा है कि यह लड़ाई कालेधन के विरूध्द है पर हमने देखा कि बैंक कर्मियों ने प्रभुवर्गों की मिलीभगत से कैसी लीलाएं रचीं और इस पूरे अभियान पर पानी फेर दिया। यह आभासी सुख, आम जनता को भी मिल रहा है। उन्हें लग रहा है कि मोदी के इस कदम से अमीर-गरीब की खाईं कम होगी, अमीर लोग परेशान होगें पर इस आभासी दुख के हमारे पास कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं। परपीड़न से होने वाला सुख हमें आनंदित करता है। नोटबंदी भी कुछ लोगों को ऐसा ही सुख दे रही है। इस तरह के भावनात्मक प्रयास निश्चित ही भावुक जनता की अपने नेता के प्रति आशक्ति बढ़ाते हैं। उत्तर प्रदेश का मैदान इस भावुक सच की असली परीक्षा करेगा, तब तक तो मोदी और उनके भक्त कह ही सकते हैं- “मैं ही, मैं हूं दूसरा कोई नहीं।”

लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्वलेषक हैं. संपर्क : 123dwivedi@gmail.com

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इंदौर की लग्जरी होटलों में भाजपा की कैशलेस सादगी…

मितरों / नोटबंदी का इतना भयानक असर शायद ही देश के किसी शहर पर पड़ा हो… मगर मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर में इसका असर यह देखा गया कि लाखों रुपए के किराए वाले लग्जरी होटल, मैरिज गार्डन और बैंक्वेट हॉल अत्यंत सस्ते हो गए। इंदौर के बायपास पर नवधनाढ्यों के तमाम आयोजन इन लग्जरी होटल-रिसोर्ट में होते रहे हैं, मगर मोदी जी ने नोटबंदी के ऐतिहासिक कदम से इन लग्जरी होटलों को समाज के अंतिम पंक्ति के लोगों के लिए भी सुलभ करा दिया है। मोदी जी ने सही कहा कि उन्होंने गरीबों को अमीर बना दिया है और 50 तथा 100 रुपए के मामूली नोट की कीमत भी बढ़ा दी। मुझे पता नहीं इस बात का असर देश पर कितना पड़ा, मगर अपने शहर इंदौर में इसका साक्षात उदाहरण अभी देखने को मिला।

मध्यप्रदेश भाजपा ने पं. दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण महाअभियान के तहत 19 से 22 दिसम्बर तक 4 दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन किया। इसमें मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से लेकर उनका पूरा मंत्रीमंडल, प्रदेश अध्यक्ष से लेकर तमाम पदाधिकारी, सांसद और निगम मंडलों, प्राधिकरण के अध्यक्षों को प्रशिक्षण दिया गया। 700 से अधिक प्रशिक्षण में शामिल इन महानुभावों को इंदौर के बायपास स्थित होटलों – रिसोर्ट में ठहराया और अम्बर गार्डन में यह प्रशिक्षण वर्ग चला। ठहरने, खाने सहित सभी व्यवस्थाएं अम्बर, जलसा, वॉटरलिली और ऐसी अन्य जगहों पर की गई। यह नोटबंदी का ही चमत्कार हुआ कि इन लग्जरी होटलों और रिसोर्ट में कैशलेस सादगी के साथ भाजपा ने यह प्रशिक्षण वर्ग सम्पन्न किया।

जिस देश में भिखारी और चायवाले भी कैशलेस हो गए हों, वहां ये पूरा आयोजन भी भाजपा ने कैशलेस किया और जल्द ही प्रदेश भाजपा इस आयोजन का पूरा खर्चा जनता-जनार्दन के सामने रखेगी भी… ऐसा मेरा मानना है। मैंने तो प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान से पत्रकार वार्ता में यह सवाल भी पूछ लिया था। जवाब में बताया गया कि 500-500 रुपए शामिल होने वाले प्रशिक्षार्थियों से लिए गए। अब मुझे यहां मोदी जी की बात फिर याद आ गई, जिसमें उन्होंने कहा कि 50 और 100 रुपए की नोट की कीमत उन्होंने बढ़ा दी है, जिसके चलते इंदौर के ये लग्जरी होटल और रिसोर्ट इतने सस्ते हो गए कि 500 रुपए की राशि का कैशलेस भुगतान कर 700 से अधिक प्रशिक्षार्थी 4 दिनों तक यहां ठहरे और खाये-पीये भी… अपन तो भाई समाज की अंतिम पंक्ति की चिंता करने वाले पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के नाम पर हुए इस प्रशिक्षण वर्ग को देखकर गद्गद् हो गए… नि:संदेह लग्जरी होटलों – रिसोर्ट में इतने सस्ते और सादगी से कैशलेस हुए इस आयोजन को तो देशभर में एक मिसाल माना जाना चाहिए…

मोदी जी भी अपनी अगली कैशलेस सभा में किसी कैशलेस गरीब का उदाहरण देते हुए इस महागरीब इंदौरी आयोजन को ठसके के साथ बता सकते हैं… मोदी जी अपनी रैलियों और सभाओं पर होने वाले कैशलेस खर्च की जानकारी भी देना शुरू करें, ताकि एक आम आदमी, जिसने नोटबंदी के निर्णय में आपका भरपूर साथ दिया, उसे यह भरोसा हो सके कि उसका त्याग और बलिदान व्यर्थ नहीं जा रहा है। तमाम राजनीतिक दलों को छोडि़ए, सबसे पहले भाजपा और उससे जुड़े संगठनों पर नकद चंदाबंदी लागू कर दी जाए, जिस तरह नोटबंदी की योजना अत्यंत गोपनीय रखी गई और किसी भी राजनीतिक दल को इसकी भनक न लगने दी, उसी तर्ज पर मोदी जी आप भाजपा को कैशलेस राजनीतिक दल बनाने की घोषणा पहली फुर्सत में कर दो, ताकि अन्य सभी राजनीतिक दल एक्सपोज भी हो जाएं और जनता-जनार्दन के सामने भाजपा एक पारदर्शी, स्वच्छ और ईमानदार पार्टी के रूप में सामने आ सके। इसके साथ ही सूचना का अधिकार अधिनियम यानि आरटीआई के तहत भी भाजपा को आ जाना चाहिए, तब ही न खाऊँगा और न खाने दूंगा की बात लाख टके की साबित होगी।   जय हो नोटबंदी की..!

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत. 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय. संपर्क : 9827020830

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…और इस तरह चली गई भाजपा मीडिया सेल से मनीष शुक्‍ला की कुर्सी!

यूपी भाजपा से बहुत जली-भुनी खबर आ रही है कि प्रदेश मीडिया प्रभारी मनीष शुक्‍ला को पार्टी के मीडिया सेक्‍शन से उजाड़ने में उनके अपने खास लोगों का ही हाथ है. उन्‍हीं अपनों का, जिन्‍होंने लंबे समय से इस पार्टी के इस कमाऊ पद पर अपनी नजरें गड़ाए रखी थी और पॉलिटिकल डिमोशन झेलने को भी तैयार बैठे थे. उन्‍होंने प्रदेश संगठन महामंत्री से महीनों से मनीष शुक्‍ला की चुगली करते आ रहे थे. दीपावली पर उन्‍हें मौका भी मिल गया और इसका पूरा लाभ उठाते हुए उन्‍होंने मनीष शुक्‍ला से गद्दी छीनकर खुद मुख्‍य मीडिया प्रभारी बन बैठे. इसके साथ ही विधानसभा चुनाव में मनीष शुक्‍ला के कमाई करने के सारे अरमान धूल-धूसरित हो गए.

दरअसल, खाली-ठाले बैठे सूत्र बताते हैं कि पूर्व प्रदेश अध्‍यक्ष डा. लक्ष्‍मीकांत बाजपेयी के खासमखास रहे और लोकसभा चुनाव में जमकर कमाने वाले मनीष शुक्‍ला इन दिनों संगठन महामंत्री सुनील बंसल के खेमे में फिट होने की कोशिश कर रहे थे. लंबे समय से कई दरबारों पर मत्‍था टेक रहे थे. उनकी यह कोशिश प्रदेश प्रवक्‍ता हरिश्‍चंद्र श्रीवास्‍तव को लंबे समय से रास नहीं आ रही थी, क्‍योंकि श्रीवास्‍तव जी लंबे समय से इस कमाऊ कुर्सी पर अपनी नजरें गड़ाए हुए थे. मीडिया सेल की एक-एक बात बंसलजी और अध्‍यक्ष केशवजी मौर्या तक बजरिए दिलीप श्रीवास्‍तव पहुंचा रहे थे. दिलीपजी, मौर्याजी के खास सहयोगी हैं. इधर, शुक्‍लाजी भाजपा के राष्‍ट्रीय नेता श्रीकांत शर्मा के जरिए अपने खंडहराते अरमानों के ईंट-पलस्‍टर को ठीक करने में जुटे हुए थे कि इसी बीच दीपावली आ गई. इसी दीपावली पर मेरे अपने-तेरे अपने के खेल ने शुक्‍लाजी का खेल खराब कर दिया और श्रीवास्‍तवजी का बना दिया. यानी इस दीपावली के चलते एक के अरमान जल गए दूसरे के मन में दीए.

अब हुआ यूं कि चुनावी साल को देखते हुए भाजपा ने इस बार पत्रकारों को महंगे तोहफे देने का निर्णय लिया था ताकि ओबलाइज-सोबलाइज किया जा सके. अब कुछ विघ्‍नसंतोषी बताते हैं कि इसके लिए तीन सौ के आसपास पत्रकारों की लिस्‍ट बनाई गई थी, लेकिन कई स्‍क्रीनिंग टेबुल से घूमने-फिरने तथा मेरे-तेरे के बाद इनकी संख्‍या 200 तक सिमट गई. इसमें भाइयों ने अपने-अपने गुड लिस्‍ट और जातियों के पत्रकारों को पूरी वरीयता दी. अब कुछ चुगलखोरों का कहना है कि मनीष शुक्‍ला ने गिफ्ट कुछ ऐसे लोगों को भी पकड़ा दिया, जिनका लिस्‍ट में पहले से नाम नहीं था. जिन चैनलों में उनका आना जाना था, वहां के चपरासी तक को उपकृत करने की असफल कोशिश कर डाली. श्रीवास्‍तवजी को यह बात नागवार लगी. आनन-फानन में उन्‍होंने अपने खास पत्रकार मित्र योगेश श्रीवास्‍तव समेत कुछ अन्‍य वास्‍तवों का लिस्‍ट में नाम श्रीगणेश करवाया, साथ ही दो-चार बोरी शिकायत सुनील बंसल तक पहुंचा दी.

इधर, लंबे समय से इसी ताक में लगे बंसलजी ने उचित मौका देखकर चौका लगा दिया. मनीष शुक्‍ला को बहरिया कर प्रदेश प्रवक्‍ता रहे हरिश्‍चंद्र श्रीवास्‍तव को मुख्‍य मीडिया प्रभारी बना डाला. श्रीवास्‍तवजी लंबे समय से इस पद पर नजरें गड़ाए बैठे हुए थे. प्रवक्‍ता की बिना पैसे की ठेकेदारी में मजा नहीं आ रहा था. श्रीवास्‍तवजी इसके पहले भी मीडिया सेल में रह चुके थे. इसकी हरियाली देख चुके थे, लिहाजा विधानसभा चुनाव से पहले किसी भी कीमत पर सेट होने की तैयारी कर रहे थे. अब बोरी-बोरी शिकायतें कई जगह पहुंचाने का उनको ईनाम भी मिल गया. खैर, फोन करने पर श्रीवास्‍तवजी तो बकाएदे बाहर होने की बात कह डाली, जबकि शुक्‍ला जी का फोन नहीं लगा. जब मनीषजी और हरिश्‍चंद्रजी से बजरिए मैसेज उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई तो उन्‍होंने कोई जवाब नहीं दिया.

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कलराज मिश्र के खास पत्रकार साथी यूपी में बिगाड़ेंगे भाजपा का खेल!

चुनाव से पहले यूपी भाजपा में खलबली मचनी शुरू हो गई है. प्रमुख दावेदारों ने अब अपने विरोधियों को शह-मात देने के लिए पत्रकारों की सेवा लेनी शुरू कर दी है. सभी क्षत्रपों ने अपने-अपने खेमे के पत्रकारों को चोरी-चुपके बुलाकर अपना काम शुरू कर दिया है. लंबे समय से यूपी का मुख्‍यमंत्री बनने का सपना संजोए कलराज मिश्र ने उत्‍तर प्रदेश में राजनाथ सिंह के समर्थकों को महत्‍व मिलता देखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ही अभियान को हवा देनी शुरू कर दी है. नोटबंदी को लेकर चुनिंदा पत्रकारों से मिलकर श्री मिश्रा लघु उद्योगों एवं छोटे व्‍यापारियों को होने वाली परेशानी को आधार बनाकर खबरें प्रकाशित करवाने की गुजारिश कर ही रहे थे कि कुछ बाहरी पत्रकार भी पहुंच गए, जिसके बाद उन्‍होंने अपना लाइन बदल दिया.

गुरुवार को परिवर्तन रथयात्रा पर चर्चा के लिए केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र भाजपा मुख्‍यालय पहुंचे थे. इसकी भनक किसी पत्रकार को नहीं लगने दी गई. कलराज के चेले प्रदेश महामंत्री विजय बहादुर पाठक के शार्गिद और भाजपा के मीडिया सह प्रभारी मनीष दीक्षित ने अपने खेमे के कुछ चुनिंदा पत्रकारों को फोन से सूचना देकर भाजपा मुख्‍यालय बुलाया, जिसमें नवभारत टाइम्‍स के प्रेम शंकर मिश्र, अमर उजाला के राजेंद्र सिंह, राष्‍ट्रीय सहारा के कमल तिवारी तथा एक न्‍यूज एजेंसी के विद्याशंकर राय शामिल थे. मनीष दीक्षित ने इस मामले में पूरी गोपनीयता बरती थी. उन्‍होंने दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान अखबार के पत्रकारों को भी इसकी सूचना नहीं होने दी. कलराज मिश्र बंद कमरे में अनौपचारिक बातचीत में नोटबंदी के फैसले को गलत साबित करने में जुटे हुए थे.

इसी बीच एकाध और पत्रकारों को इसकी भनक लग गई और वह मौके पर पहुंच गए. जब वे पहुंचे तो कलराज मिश्र अपने चुनिंदा पत्रकारों से मोदी के नोट बंदी के फैसले से लघु उद्योगों और छोटे व्यापारियों पर असर पड़ने जैसी बात कर रहे थे, लेकिन दूसरे लोगों के पहुंचने के बाद उन्‍होंने मोदी का गुणगान शुरू कर दिया. दरअसल, कई सालों से यूपी का सीएम होने का सपना देख रहे कलराज मिश्र की जगह अब उत्‍तर प्रदेश में उनके राजनीतिक विरोधी माने जाने वाले राजनाथ सिंह के खास लोगों को महत्‍व मिलना शुरू हो चुका है. राजनाथ सिंह के करीबी हृदय नारायण दीक्षित को मुख्‍य प्रवक्‍ता बनाया गया तो उनके एक और नजदीकी अशोक तिवारी को भी प्रमुखता देकर पिछड़ा एवं अन्‍य वर्ग का संगठन मंत्री बना दिया गया.

भाजपा के सूत्रों का कहना है कि अधिक उम्र के कारण कलराज मिश्रा को यूपी चुनाव के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर कर कहीं का राज्‍यपाल बना दिया जाएगा. मोदी बस यूपी चुनाव का इंतजार कर रहे हैं. मोदी नजमा हेपत्‍तुला समेत कई उम्रदराज लोगों को मोदी मंत्रिमंडल से बाहर कर राज्‍यपाल बना चुके हैं. अब अपनी संभावनाओं को बिगड़ते देख कलराज मिश्र उत्‍तर प्रदेश में भाजपा का खेल खराब करने की तैयारी में जुट गए हैं. वह राजनाथ सिंह या उनकी टीम के किसी सदस्‍य को यूपी सीएम बनता नहीं देखना चाहते हैं. इसलिए नोटबंदी के बहाने मोदी पर निशाना साध रहे हैं ताकि उत्‍तर प्रदेश में भाजपा की हवा खराब हो, इसके लिए वह और उनकी टीम अपने विश्‍वासी पत्रकारों पर भरोसा जता रही है. इसी कड़ी में गुरुवार को चुनिंदा पत्रकारों को बुलाकर मनीष दीक्षित ने उन्‍हें भीतर की सूचनाएं उपलब्‍ध कराईं ताकि वह दो-चार दिन बाद उसका इस्‍तेमाल कर सकें. दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान के रिपोर्टरों को इसलिए नहीं बुलाया कि वे इस समय भाजपा या राजनाथ सिंह के खिलाफ लिखने की स्थिति में नहीं हैं, और कलराज की टीम की गुड लिस्‍ट में भी नहीं हैं.

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भाजपा नेता को पत्रकारिता पसंद न आई तो पत्रकार पर कर दिया तलवार से हमला

ये भाजपा वाले जन्मजात मीडिया विरोधी होते हैं.. या तो पटा लेते हैं या फिर हमला कर देते हैं.. इन्हें डेमोक्रेसी कतई पसंद नहीं… मध्य प्रदेश में एक भाजपा नेता को पत्रकारिता पसंद न आई तो पत्रकार पर कर दिया तलवार से हमला.. मध्य प्रदेश में जगह जगह पत्रकार भाजपा नेताओं के हाथों पीटे जाते हैं… कइयों की जान तक ले ली गई..

घटना मध्य प्रदेश की. खबर छापे जाने से नाराज था बीजेपी का नेता.. पत्रकार को तलवार मारी… जबलपुर में भाजपा नेता और पार्षद पति ने पत्रकार आशीष विश्वकर्मा को घर बुलाकर तलवार से जानलेवा हमला किया. पत्रकार को गंभीर हालत में इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती किया गया है. बताया जा रहा है कि एक खबर छापे जाने से नाराज होकर भाजपा नेता ने जानलेवा हमला किया. स्थानीय हिंदी दैनिक के पत्रकार आशीष विश्वकर्मा पर शुक्रवार रात को भाजपा गढ़ा जोन अध्यक्ष और पार्षद रीना राजपूत के पति हृदयेश और उसके भाई नीरज ने घर बुलाकर जानलेवा हमला कर दिया.

बताया जा रहा है कि आरोपियों ने आशीष को बर्थडे पर शुभकामनाएं देने के बहाने घर पर बुलाकर तलवार और बेसबॉल के डंडे से हमला कर दिया. हमले में आशीष को गंभीर चोटे आई हैं. आशीष ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि दो दिन पहले एक खबर को लेकर पार्षद पति ने आपत्ति जताई थी. हालांकि, बाद में मामला शांत हो गया था. शुक्रवार रात को आशीष जैसे ही पार्षद के घर पर पहुंचा, तो ह्रदयेश और नीरज ने उस पर जानलेवा हमला कर दिया. गंभीर रूप से घायल आशीष ने किसी तरह भागकर अपनी जान बचाई. बाद में परिचितों को फोन कर उसने हमले की जानकारी दी. आशीष को पहले इलाज के लिए मेडिकल अस्पताल भर्ती किया गया. हालत बिगड़ने पर आशीष को जबलपुर अस्पताल रेफर किया गया.

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रिटायरमेंट का फैसला मेरा खुद का था, चुनाव लड़ने को ना किसी ने कहा ना ही रोका : यशवंत सिन्‍हा

: इंतजार कीजिए, अगले साल मेरी किताब बहुत कुछ कहेगी : पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने अनौपचारिक चर्चा में की अपने दिल की बातें : देश के वित्त व विदेश मंत्री रह चुके वरिष्ठ राजनेता यशवंत सिन्हा अब सार्वजनिक बात करने से थोड़ा परहेज करते हैं। उनकी शिकायत है कि जो वो कहते हैं, उससे लोगों में गलतफहमी ज्यादा हो जाती है। श्री सिन्हा का कहना है कि यह रिटायरमेंटउन्होंने खुद चुना है। इन दिनों वह अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं, जो साल भर में पाठकों के समक्ष होगी। इसलिए उनका कहना है कि- हमेशा मेरा कहना जरूरी नहीं, अब जो कहेगी मेरी किताब कहेगी।

इसी महीने 2 सितंबर की सुबह मैं नोएडा स्थित उनके निवास पर था। 4 साल पहले अपने शहर भिलाई पर मैंने जो किताब लिखी थी, उसमें सिन्हा दंपत्ति का भी इंटरव्यू था। तब से सिन्हा दंपत्ति से मुलाकात नहीं हो पाई थी। उस रोज यशवंत सिन्हा और उनकी पत्नी नीलिमा सिन्हा अनौपचारिक मूड में घर में थे। ऐसे में अलग-अलग कई मुद्दों पर हमारी बातचीत हुई। यशवंत सिन्हा किसी तरह का इंटरव्यू नहीं देना चाहते थे, इसलिए सारी बातें अनौपचारिक ही हुई। उस बातचीत का कुछ हिस्सा सवाल-जवाब की शक्ल में-

yash

आप मुख्यधारा की राजनीति से बिल्कुल दूर हो गए हैं, क्या यह आपका राजनीतिक वनवास है

यशवंत सिन्‍हा : इसे वनवास कहना ठीक नहीं। दरअसल यह एक तरह का रिटायरमेंट है, जिसे मैंने खुद चुना है। क्योंकि मेरा मानना है कि दो तरह की राजनीति में सक्रिय रह कर देशहित में कार्य किया जा सकता है। पहला तो आप सक्रिय राजनीति में रह कर चुनाव लड़ें और मंत्री या जनप्रतिनिधि रहते हुए योगदान दें और दूसरा किसी राजनीतिक दल अथवा संगठन में रहते हुए देश की चिंता करें। जैसा कि गांधी जी और जयप्रकाश जी ने करते हुए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई थी। हालांकि अभी मैं गांधी जी और जयप्रकाश जी वाली भूमिका से कुछ दूर हूं।

-..तो क्या 2014 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला आपका खुद का था

यशवंत सिन्‍हा : मुझे चुनाव लड़ने से न किसी ने रोका न ही किसी ने कोई प्रस्ताव दिया। जब उन्होंने (इशारा पार्टी के नीति निर्धारकों की तरफ) 75 साल से उपर वालों का नियम बनाया था तो मैंने उसके पहले ही तय कर लिया था कि अब संसदीय चुनाव नहीं लड़ूंगा और इस तरह 2014 में मैं अपनी परंपरागत सीट हजारीबाग (झारखंड) से उम्मीदवार नहीं था।

मोदी सरकार में मंत्री आपके सुपुत्र जयंत सिन्हा के कामकाज में आपका कितना मार्गदर्शन या दखल रहता है

यशवंत सिन्‍हा : बतौर मंत्री जयंत का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है और मैं नहीं समझता कि मुझे उन्हें इसमें किसी तरह का मार्गदर्शन देना चाहिए। हां, एक परिवार में जैसे पिता-पुत्र की बात होती है हमारे रिश्ते भी वैसे ही हैं। मंत्री के तौर पर जयंत क्या करते हैं, उसमें मेरा कोई दखल नहीं रहता लेकिन हजारीबाग के विकास को लेकर हमारी चर्चा जरूर होती है।

-आज केंद्र में भाजपा सरकार है और आप पूर्व में बाजपेयी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दोनों सरकारों में भूमिका को लेकर क्या फर्क देखते हैं?

यश्‍वंत सिन्‍हा : आज की सरकार पर टिप्पणी करना मेरा मकसद नहीं है क्योंकि इससे गलतफहमी ज्यादा बढ़ जाती है। वैसे भी हम तो संघ के बाहर के हैं। इतना जरूर है कि तब (बाजपेयी सरकार के दौरान) हमारे वक्त में संघ तो हावी नहीं हो पाया था और ज्यादातर फैसलों में संघ के लोग हमारे विरोध में ही थे।

सार्वजनिक जीवन में अब कैसी सक्रियता या व्यस्तता रहती है

यशवंत सिन्‍हा : देखिए, अपने परंपरागत निर्वाचन क्षेत्र रहे हजारीबाग के लिए तो लगातार काम कर रहा हूं। पिछले साल वहां रेल नेटवर्क आ गया। यहां दिल्ली में टेलीविजन चैनलों के शाम के डिबेट में मैं जाता नहीं। क्योंकि आधे घंटे की चिल्लपो में आपको 2 मिनट बोलने का मौका मिलता है और उसमें भी एंकर हावी होने लगता है। इसलिए मैंने सभी चैनलों को साफ मना कर दिया है। पिछले साल हिंदी के एक बड़े अखबार ने मुझे साप्ताहिक कॉलम लिखने प्रस्ताव दिया था। तीन हफ्ते मैंने कॉलम लिखा भी। फिर मुझे लगा कि वह अखबार पत्रकारिता के मानदंडों पर खरा नहीं उतर रहा है तो मैंने वहां लिखना बंद कर दिया। अब सिर्फ एनडीटीवी के लिए हर हफ्ते ब्लॉग लिख रहा हू्ं।

कलराज मिश्र जैसे कुछेक अपवादों को छोड़ कर पार्टी के 75 पार वरिष्ठ नेताओं को मंत्री न सही राज्यपाल तो बनाया जा रहा है। क्या ऐसा कोई प्रस्ताव मौजूदा सरकार की ओर से आपको मिला

यशवंत सिन्‍हा : यह सवाल ही नहीं उठता। मुझे अपने फैसले खुद लेने की आदत है। राज्यपाल बनना होता तो 1990 में ही बन जाता। तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक रोज बुलाया और बोले -आपको पंजाब का राज्यपाल बना कर भेजना चाहते हैं। तब मैंने साफ मना कर दिया था। आज ऐसा कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार की तरफ से नहीं आया और न ऐसा प्रस्ताव स्वीकार कर सकता हूं।

अगले साल राष्ट्रपति चुनाव को लेकर क्या उम्मीदें दिखाई देती हैं

यशवंत सिन्‍हा : प्रत्याशी तय करना उनका (केंद्र सरकार) फैसला है। मैंने अपनी लाइफ तय कर ली है। तो,ऐसी उम्मीदें मैं क्यों पालूं। हां, पार्टी के अंदर कुछ नाम जरूर सुन रहा हूं। जिनका मैं खुलासा नहीं कर सकता। हालांकि धारणा यह बन रही है कि जो चर्चा में नहीं है, ऐसा कोई नया नाम सामने आएगा।

पाकिस्तान को लेकर हमारे देश की नीति कैसी होनी चाहिए?

यशवंत सिन्‍हा : (मोदी सरकार पर टिप्पणी नहीं करने की शर्त पर उन्होंने कहा) मैं जनरल मुशर्रफ की जीवनी पढ़ रहा था, उसमें एक जगह वह लिखते हैं-इंडिया से वालीबॉल का मैच जीतने पर पाकिस्तान में जबरदस्त खुशी का माहौल था। तो दोनों देशों में खेल में हार-जीत पर खुश होने वाली स्थिति है। बहुत सी बातें ऐसी हैं कि जिनसे यह बार-बार जाहिर करने की कोशिश होती है कि पाकिस्तान हमारे बराबर का देश है। कश्मीर को लेकर अब तक हमारे देश में एक नीति नहीं रही है। अब तक जो भी प्रधानमंत्री आए, उन्होंने अपने अनुसार नीति बना ली।

देश की आर्थिक नीति और विदेश नीति से कितने संतुष्ट हैं

यशवंत सिन्‍हा : इन पर मेरा कुछ भी सार्वजनिक कहना ठीक नहीं।

राजनीतिक जीवन में इतने अनुभव के बाद अचानक चुप्पी को जनता क्या समझे

यशवंत सिन्‍हा : इसे चुप्पी न समझें। अपनी बायोग्राफी (आत्मकथा) लिख रहा हूं। अगले साल तक पूरी हो जाएगी। उसमें सारी बातें लिखूंगा। पब्लिशर से बात हो गई है। जरा इंतजार कीजिए।

छत्तीसगढ़, खास कर भिलाई से भी आपका रिश्ता रहा है, उसे कैसे बयां करेंगे

यशवंत सिन्‍हा : अब इस बात को पूरे 56 साल हो चुके हैं। (पत्नी नीलिमा सिन्हा की तरफ इशारा करते हुए) इनके पिता निर्मलचंद्र श्रीवास्तव जी भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के जनरल मैनेजर थे और वहीं भिलाई के डायरेक्टर बंगला में हमारी शादी हुई। अरसा बीत गया है लेकिन भिलाई की तरक्की की खबर मिलते रहती है। अब पुराने भिलाई वाली बात तो नहीं होगी वहां..? छत्तीसगढ़ तो पिछले 16 साल में काफी बदल गया है। केंद्र में मंत्री रहते हुए छत्तीसगढ़ आना हुआ था। नए राज्य की तरक्की की खबर सुन कर और जानकर अच्छा लगता है।

(पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन छत्तीसगढ़ भिलाई से हैं। उनकी भिलाई के अतीत से वर्तमान तक पर केंद्रित किताब भिलाई एक मिसालप्रकाशित हो चुकी है। उनसे मोबाइल नंबर 09425558442 पर संपर्क किया जा सकता है।

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स्वामी प्रसाद मौर्य का भाजपा में शामिल होना तय (देखें वीडियो)

ऐसा कहना है केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री राम शंकर कठेरिया का. बहुजन समाज पार्टी से नाता तोड़ने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य के बारे में कठेरिया ने कहा कि स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा में शामिल होंगे और बहुत जल्द शामिल होंगे. ताजनगरी आगरा में सेवला स्थित खत्ताघर का लोकापर्ण करने के बाद रामशंकर कठेरिया पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे.

केंद्रीय मंत्री राम शंकर कठेरिया ने सपा और बसपा पर निशाना साधते हुए कहा कि सपा में भगदड़ मची हुई है और अंतर्कलह से अपने आप खत्म हो जाएगी. वहीं बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती पर रुपये लेकर टिकट देने का आरोप लगाते हुए कहा कि बहुजन समाज पार्टी में जो जाएगा उसे टिकट के लिए एक से पांच करोड़ रुपया देना पड़ेगा, इसलिए सब परेशान हैं और बसपा टूट जायेगी. उन्होंने कहा कि 2017 में यूपी में भाजपा की सरकार बनेगी.

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https://youtu.be/ebu8eU8Ssnc

आगरा से syed shakeel की रिपोर्ट.

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इन हिन्दी चैनलों की बीजेपी से ‘दोस्ती’ हो गई है!

Nadim S. Akhter : टीवी पर देखकर आप तय कर सकते हैं कि किन-किन हिन्दी चैनलों की बीजेपी से ‘दोस्ती’ हो गई है और वे बेवजह कैराना मामले को जबरदस्त हाइप दे रहे हैं। खूब खबर चला रहे हैं, बहस-डिबेट करवा रहे हैं और उनकी कोशिश है कि कैराना मामले को जिंदा रखा जाए। बीजेपी को और क्या चाहिए, मनमांगी मुराद मिल रही है। बात ये नहीं है कि कैराना का फर्जी मामला उठाकर बीजेपी यूपी में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहती है। बात यहां पब्लिक परसेप्शन की है और झूठ को हर मंच से इतनी बार बोलो कि पब्लिक को ये सच लगने लगे। और बीजेपी के इस एजेंडे में कुछ हिन्दी चैनल उनका खूब साथ दे रहे हैं।

आश्चर्यजनक रूप से एनडीटीवी इंडिया जैसा प्रणव राय वाला चैनल भी कैराना मामले को खूब तूल दे रहा है। अब किसकी गर्दन कहां अटकी है ये मुझे नहीं पता, पर एनडीटीवी इंडिया में मुझे ये एक खास किस्म का शिफ्ट नजर आ रहा है। दूसरी बात। अगर कैराना मामले में जरा भी सच्चाई है तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री तो यूपी से ही सांसद हैं। क्यों नहीं वे दूध का दूध और पानी का शर्बत करने के लिए कोई केंद्रीय टीम कैराना भेजते या न्यायिक जांच ही करा लेते हैं?

कैराना में बीजेपी की टीम जांच करने क्यों गई है, ये समझ से परे और हास्यास्पद है। पीएम साहब और गृहमंत्री जी!! आप विपक्ष में नहीं सरकार में हैं। सो रूदाली रूदन बंद करिए और सरकार की तरह बिहेव करिए। सिर्फ टीवी पे बयानबाजी करके और अखिलेश यादव को कोस कर आपकी पार्टी क्या साबित करना चाहती है, ये पब्लिक अच्छे से समझ रही है। उसकी समझ को हल्के में ना लीजिएगा, अटलजी और प्रमोद महाजन के काल वाले इंडिया शाइनिंग का चीरहरण याद तो होगा ना आप लोगों को?

सो काम करिए और पब्लिक को बरगलाना छोड़िए। बिहार ने पहले ही बोलती बंद करवा दी है, अब यूपी में भी भद्द पिटवाएंगे क्या!!?? दोनों सहोदर हिन्दी बेल्ट है, जरा संभल के मोदी जी, अमित शहंशाह साहेब!!! मियां की जूती मियां के सिर वाली कहावत का मतलब तो जानते होंगे ना आपलोग!!!

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के एफबी वॉल से.

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