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साहित्य

मृदुला गर्ग जी ने हिंदी की दमघोंटू बुजुर्गियत को हवा में उड़ा कर, क्या मस्ती में लिखा है!

मृदुला गर्ग-

2022 में पढ़ीं क़िताबें जो गहरा नशा कर गईं… पिछले दो-तीन बरसों में, एक के बाद दूसरी आंख की रेटीना सर्जरी होने की वजह से, अपना प्रिय शौक पूरा नहीं कर पा रही थी। शौक क्या, वह जो लत से आगे बढ़ नशा बन चुका था। किताबें पढ़ना, उन्हें महसूस करना, याद रखना। जब कहना पड़ता, मुझे किताब न भेजना, आजकल पढ़ नहीं पा रही तो दिल में कटार सी लगती। इस साल सज़ा की सख्ती में ढिलाई आई और पूरी रफ़्तार से तो नहीं पर अतिरिक्त इच्छा शक्ति का इस्तेमाल कर, छांट कर कुछ किताबें पढ़ लीं।

ज़ाहिर है छांट कर पढ़ीं तो उम्दा रही होंगी। पर नशा तार्किक ढंग से नहीं किया जाता। तलब उठे और ज़ब्त की इबादत में लगे रहो तो नशा कैसा! वह तो खुशकिस्मती जानिए की कई अलहदा किस्म की रूहानी किताबें पढ़ पाई। एक बात बतलाते चलें। चूंकि हम क़िताब को वाईन की तरह पीते हैं तो उसकी समीक्षा करना नशे की तौहीन है। हर वाईन अलग सुरूर देती है। कुछ अलमस्त कर देती हैं तो कुछ का हैंग ओवर ज़बरदस्त होता है।

पहला नाम अनिल यादव की “कीड़ा जड़ी” का। जो इसे सफ़रनामा कह एक विधा में महदूद करे, साहेब हमारी नज़र में किताब का पाठक भले हो, उसके नशे के असरात से वाकिफ़ नहीं है कतई। यह ऐसी दिल को लगने वाली किताब है कि फिरदौस और जहन्नूम दोनों का नज़ारा साथ करवाए, नशा भी करवाए और हैंगओवर भी ज़बरदस्त हो। कभी खाने का मौक़ा मिला नहीं वरना कह सकते थे कि नशा कीड़ा जड़ी खाने जैसा था। न सही। हम बस सोचते रह गए कि ऐ खुदा हमने क्या गुनाह किया था कि ऐसी डगर से महरूम रखा।

जानते हैं यार, खुदा का क्या क़ुसूर, क़ाहिल तो हम ही थे। तभी न किताब को दारू, दवा और दुआ की तरह काम में लाते रहे, घर से बाहर गए भी तो कुछ कोस भर।

इसके अलावा जो दिलदार किताबें पढ़ीं इस बरस, वे थीं, मधु कांकरिया की “ढलती सांझ का सूरज”, नीलेश रघुवंशी की “शहर से दस किलोमीटर,” अलका सरावगी की “कुलभूषण का नाम दर्ज हो,”सुमन केशरी की “निमित्त नहीं”। हर कथानक का कथ्य बेमिसाल, कोई किसी विमर्श या वाद या विचारधारा का मोहताज नहीं।

ऋण से बर्बाद गांव का ग़म प्रेमचंद के बाद, उसी गर्मजोशी से उकेरा मधु ने “ढलती सांझ का सुरज” में। आज के ऋण प्रमुख विश्व में, जब कर्ज लेने वाला विपन्न हो और देनेवाला, साहूकार की तरह सम्पन्न ही नहीं, सत्ता पर काबिज़ कानून बनाने वाला, तो असर बेहद खौफ़नाक होता है। ज़िंदा नहीं रहने देता। टर्मिनल बीमारी की तरह निगल जाता है, आत्महत्या का आह्वान कर के। साहूकार ज़मीन हड़पता था पर ज़मीन से किसान का रिश्ता नहीं लीलता था, उसकी पहचान नहीं मिटाता था। एक आशा बाकी रहती थी कि अगली बारिश होने पर, ज़मीन छुड़वाई भी जा सकती है। तब तक दूसरे की ज़मीन पर बुआई, रोपाई, कटाई सही। पर अब तो बाक़ायदा साज़िश है, किसान को गांव से बाहर निकाल, दिहाड़ी मजदूर बनाने की। न भी जाए शहर तो गांव में ही सरकारी राहत कार्य में भीख जैसे दी गई दिहाड़ी कर के जिए।

दूसरी किताब नीलेश रघुवंशी का उपन्यास “‘शहर से दस किलोमीटर।” इस उपन्यास में साइकिल से भोपाल शहर के महज़ दस किलोमीटर इर्द गिर्द घूम कर एक कमसिन लड़की उन्हीं गावों में पहुँच जाती है, जहां ढलती सांझ का अमरीका से लौटा नायक काफ़ी जद्दोजहद और वैचारिक मंथन के बाद पहुँचा था, वह भी दिवंगत माँ की जासूसी क़िताब नुमा खुलती हिदायतों के बाद। उपन्यास साइकिल के इश्क़ में डूबे एक जोड़ी पैरों की परिक्रमा के साथ शुरु होता है जो शहर के बीच से हो कर उसके दस किलोमीटर बाहर तक जाती है।

उस कमसिन लडकी के लिए साइकिल चला पाना एक नियमत है, बल्कि परिवार से क्रान्ति। गिर पड़ कर चलाना सीख वह उस दुनिया में क्यों न दाख़िल होती, जो न शहरों की कल्पना का हिस्सा है, न सपनों का। वह अपने दुखों, अपने सुखों, अपनी हरियाली और सूखों के साथ अपने आप में भरी पूरी है। वहाँ खेत है, ज़मीन है, कुछ बंजर, कुछ पठार, कुछ उपजाऊ, कुछ बंजर और उनसे जूझते, उनकी वायु में साँसें भरते लोग हैं, उनकी गाएँ-भैसें और कुत्ते हैं; और सबको जोड़नेवाली उनकी रिश्तेदारियाँ हैं, झगड़े हैं, शिकायतें हैं, प्यार है! शहर से सिर्फ़ दस किलोमीटर परे यह दुनिया ‘शहरवाली सभ्यता’ से स्वतंत्र हमारे देश का वह आबादी बहुल हिस्सा है जो विकास की अनेक धाराओं में पैर जमाने की कोशिश करता मरता-जीता है।

साइकिल पर सवार लड़की को, शहर से दस किलोमीटर दायरे के सफ़र में ही असली हिंद दिख जाता है, जो 1947 से ही हमारी योजनाओं के हाशिए में रहा है। उसका प्रयोजन मात्र मुख्यपृष्ठ में कामगारों की भरपाई करवाना रहा है। इस सफर में लड़की हम आप से बड़ी हो जाती है। यह लेखन का कमाल है भी, नहीं भी। किरदार आसपास से उभरे तो लेखकीय कमाल खुद ब खुद नुमाया हो जाता है।

फिर पढ़ा अलका सरावगी का उपन्यास “कुलभूषण का नाम दर्ज हो।” यह ऐसी वाईन थी कि हैंगओवर से बेख़बर, पीते चलो और नशे में डूबते रहो। उपन्यास की राजनीति पर बात नहीं करूंगी, यूं वह ज़बर राजनीतिक शोध से उपजा ग्रन्थ है। पर कहा न मुझे समीक्षा नहीं लिखनी। तो कुलभूषण के किरदार पर मर्कूज़ रहूँगी।
देश से बेदखल, परिवार से बेदखल, बिरादरी से बेदखल, नाम बदल कर भी चैन से बेदखल कुलभूषण जैसा प्राणी हर परिवार में होता है । सब के सब भूलने के बटन की तलाश में भटकते हैं पर मिल कर नहीं देता।

इस उपन्यास में मिलता है एक किरदार को, वैसे ही भइया जैसे सुना है, मोक्ष भी मिल सकता है, वाक़ई चाहने वालों को। हम नहीं कह रहे, महात्मा बुद्ध कह गये हैं कि मिलने को तो मिल सकता है कमी रहती है चाहत में। ऐसा आदमी जो बेईमान भी है और ईमान का पुतला भी, जो अपनों की चोरी कर सकता है तो चुराए माल से बेगानों की जिंदगी संवार सकता है। जो सैंकड़ों से बेहतर इंसान है पर इंसानियत कमाने के साधनों के अभाव में, समाज में इंसान की तरह स्वीकृत नहीं है। उसकी त्रासदी चेखव की “ग्रीफ़” कहानी के नायक की जैसी है, जो बेटे की मौत सिर्फ़ अपने घोड़े से साझा करने पर मजबूर है। और लोग तो उसकी ख़बर तक सुनने को तैयार नहीं जैसे कुलभूषण का नाम दर्ज करने को कोई तैयार नहीं। अन्त में मिलता तो है एक अधपगला रिपोर्टर जिसे कुलभूषण तैयार तो कर लेता है। पर पता नहीं, अन्ततः पूरा नाम दर्ज करेगा या नहीं।

सुमन केशरी का कविता संग्रह “निमित्त नहीं” भी पढ़ा। लोकोक्ति है कि महाभारत में सबकुछ है, तो वहाँ से उन्होंने कुछ औरतों को चुना और उनकी दास्तान कही। इस वाईन का ब्रांड नहीं था। अंगूर में गेहूं, अलूचे में जौ, रोज़मेरी में अदरक मिला कर अलग वाईन इजाद की गई थी। चाहें तो कह लें उसे सुमन केशरी वाईन। इतने मन से कही उन तमाम तमाम औरतों की कहानी पढ़ी तो सोचे बगैर न रह पाये कि पहले किसी को क्यों न सूझा। इन हाशियाई औरतों की दास्तान नहीं सुनाई क्योंकि भाईजान, दिलदारी की कमी थी। हमदर्दी कर भी लें पर दिल को कचोटता वह दर्द कहां से लायें जो साबित कर दे वाईन अंगूर से ही नहीं, रागी से भी बन सकती है।

क्या-क्या नाम लें, हिडिम्बा, उलूपी, चित्रांगदा, दुशाला, सुभद्रा, भानुमती (दुर्योधन की पत्नी), और दासी (विदुर की माँ)! उत्तरा और अम्बालिका अम्बिका तो खैर अंगूर के आस पास की प्रजाति की थीं। पर अम्बा! मेरे लिए वह महाभारत की केन्द्रीय बिन्दु है। सुमन की उस पर कविता यही कहती है।

नामालूम सा हल्का नशा, जो दरअसल सुरूर से आगे नहीं जाता, उसका ज़ायका भी लिया ममता कालिया की “जीते जी इलाहाबाद” में। क्या हुआ जो उसमें अपनी चित्तकोबरा पर, बिना संदर्भ कटाक्ष शामिल है। ऐसी छोटी बातों को हम दिल पर नहीं लेते। चित्तकोबरा तो वह शै थी कि बिला संदर्भ, पूरे एक साल सारिका पत्रिका में कत्ल होती रही। मोहतरमा सूर्यबाला ने बक़लम खुद, बिला संदर्भ यानी बिना पढ़े, तलवार का पहला वार कर दिया। साहब नशा करने का हक़ सिर्फ़ हमें नहीं, क़िताब लिखने वाले को भी है न। सुरूर में लिखे को सुरूर की तरह ही पढ़ना चाहिए।

तो मन में आया कि कोई पूछे चाहे नहीं, किस्म किस्म की वाईन पीने की अपनी कहानी खुद बयान कर डालें। तो कर दी।

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