
संजय कुमार सिंह
देशबन्धु में आज छपी चार कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, राहुल के खिलाफ 272 रिटायर्ड जजों-अफसरों ने लिखा पत्र। देश भर के इन 272 (जी हां, 272 ही 250 या 300 नहीं) प्रख्यात नागरिकों ने अपने पत्र में चुनाव आयोग पर राहुल गांधी के आरोपों को लेकर चिन्ता जताई है। पत्र में राहुल गांधी को यह ज्ञान भी दिया गया है कि संवैधानिक संस्थाओं को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। इसपर कांग्रेस की प्रतिक्रिया भी साथ ही छपी है। इसका शीर्षक है, पहले प्रतिष्ठित नागरिक सरकार से सवाल पूछते थे। जाहिर है कि मन की बात करने वाली सरकार से सवाल पूछने का रिवाज तो नहीं ही था। अब विपक्ष के नेता से सवाल पूछने का नया चलन शुरू हुआ है। आज यह खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर तो नहीं है लेकिन नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर चार कॉलम में है। शीर्षक है, चुनाव आयोग की छवि खराब कर रही है कांग्रेस। यही नहीं, पत्र में कहा गया है और अखबार में भी छपा है कहा, बार-बार चुनावी विफलता के कारण राहुल कर रहे हैं ऐसा। इस खबर के साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, वामपंथी झुकाव वाले संगठन राहुल के साथ। प्रख्यात नागरिकों को अगर लग रहा है कि राहुल गांधी उनकी तरह दक्षिणपंथी झुकाव वाले नहीं हैं और उनके साथ वामपंथी झुकाव वाले लोग हैं तो यह सामान्य ही है। वैसे, राहुल गांधी के साथ के दक्षिणपंथी झुकाव के लोग जाने-पहचाने हैं। कई वाशिंग मशीन में धुलकर भाजपा में हैं और कइयों से दल बदल करवाकर उनका भाजपा में विलय करा लिया गया है। कुछ लोग अक्सर कोशिश में रहते हैं – यह भी किसी से छिपा नहीं है और यह सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया का भाग है या लोकतंत्र में सामान्य है फिर भी खबर है।
मुद्दा यह होना चाहिए था कि दक्षिणपंथी झुकाव वाले लोग चुनाव आयोग की चुप्पी पर चुप क्यों रहे। जहां तक प्रख्यात नागरिकों की चिट्ठी का सवाल है, इन प्रख्यात नागरिकों ने राहुल गांधी से सवाल नहीं किया है अपना परिचय ही सार्वजनिक किया है। संभव है, सरकार से लाभ मिल जाए और सरकारी लाभ पाने वालों की संख्या एक-दो नहीं है। अपने चाल, चरित्र और चेहरे से यह नैरेटिव बनाने की सरकार की नई कोशिश हो सकती है। वैसे भी, इन दिनों फलाने हैं तो मुमकिन है। दूसरी ओर, यह अपेक्षा की जाती है कि राहुल गांधी के पास सबूत हैं तो कोर्ट जाएं। तथ्य है कि पुराने कई मामलों में अदालतों ने आदेश नहीं दिए हैं और जहां आदेश दिए हैं वहां सरकार ने कानून बदल दिए हैं। इसलिए, अदालत जाने का कोई मतलब नहीं है लेकिन प्रचारित यह किया गया था कि राहुल गांधी को शिकायत के साथ शपथपत्र देना चाहिए। हालांकि, ऐसे ही आरोप अनुराग ठाकुर ने भी लगाए थे और उनसे शपथपत्र नहीं मांगा गया था दूसरी बार का मामला बिल्कुल अलग रहा। इसलिए, यह पत्र राहुल गांधी के आरोपों को कमजोर करने की कोशश है और यह बताना या प्रचारित करना चाहता है कि राहुल गांधी के पास सबूत हैं तो अदालत जाएं। सच्चाई यह है कि राहुल गांधी निराधार आरोप लगा रहे हैं तो मुख्य चुनाव आयुक्त को अधिकारहीन नहीं होना चाहिए और वे भी अदालत जा सकते थे। लेकिन अभी तक राहुल गांधी को पप्पू साबित करने में लोग अगर अदालत जाकर भी पिट जाते तो कुछ और ही मामला हो जाता। इसलिए अदालत जाना नहीं है और आरोपों से बचने का काम भाजपा के आरोपों और मीडिया की खबरों से नहीं हुआ तो यह भी एक आसान विकल्प था।
आपको याद होगा, राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त की फोटो दिखाकर कहा था कि यह आदमी वोट चोरों की सहायता कर रहा है। यह मुख्य चुनाव आयुक्त को बदनाम करना हो तो हो, उनपर बहुत गंभीर आरोप खुलेआम लगाया गया था। तथ्य यह है कि चुनाव आयोग ने आरोप का जवाब नहीं दिया। जो दिया उसी समय खारिज हो गया और अभी तक जवाब देने की खबर नहीं है। जवाब सरकारी जांच प्रक्रिया में सहयोग करने और नहीं करने का मामला है तब भी। 272 प्रख्यात नागरिक तब चुप रहे, बिहार चुनाव में खेल होने के सबूत सामने आने लगे तो सक्रिय हो गए। इनकी सक्रियता खबर होती तो और भी अखबारों में छपी होती लेकिन आज मेरे छह अंग्रेजी अखबारों में से किसी में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है। मेरे तीन में से दो हिन्दी अखबारों ने देश भर के प्रख्यात 272 प्रचारकों के आरोपों को पहले पन्ने पर जगह दी है लेकिन अंग्रेजी के छह में से सिर्फ एक ने इसे पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में जगह दी है तो आप समझ सकते हैं कि यह खबर कितनी महत्वपूर्ण है। वैसे तो हेडलाइन मैनेजमेंट के इस दौर में खबरों का सीधा संबंध विज्ञापनों से है फिर भी इस खबर को महत्व नहीं मिलने के अपने मायने हैं ऐसे में आज नीतिश कुमार के 10वीं बार शपथ लेने की तैयारी की खबर का अपना महत्व है और यह दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर है।
अगर आपको गुजरात के मुख्यमंत्री का नाम याद हो तो उनके शपथग्रहण की खबर याद कीजिए और तय कीजिए कि बिहार के मुख्यमंत्री बहुत योग्य सक्षम, लोकप्रिय और बहुमत वाले नेता हैं तो बिहार को क्या मिला। तथ्य यह है कि बिहार जिन मानकों पर देश भर के सबसे पिछड़े राज्यों में था वहीं हैं। चुनाव से पहले महिलाओं को 10,000 रुपए नकद देकर वोट खरीदने की कोशिश को चुनाव आयोग ने रोका नहीं और जीत जाने पर देश भर के 272 प्रख्यात प्रचारकों ने चुनाव आयोग के बचाव में मोर्चा संभाल लिया है। आज नीतिश कुमार का शपथग्रहण हो जाएगा और प्रधानमंत्री विकास की सड़क पर सरपट दौड़ने का दावा दोहराने लगेंगे। जहां तक खबर की बात है, दि एशियन एज में पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है – “प्रधानमंत्री ने कहा, ‘विकसित भारत’ हासिल करने के लिए वोकल फॉर लोकल रहिए। द हिन्दू में शीर्षक है, “संबंधों में तेजी लाने, पाकिस्तान पर निर्भरता कम करने के लिए तालिबन के उद्योग मंत्री ने भारत दौरा शुरू किया”। आप समझ सकते हैं कि स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत के साथ तालिबान से दोस्ती चल रही है ताकि वह पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता कम कर सकें।
इंडियन एक्सप्रेस ने आज उत्तर प्रदेश के बिसादा में मोहम्मद अखलाक के घर की रिपोर्ट की है और 10 साल पहले की कहानी ताजी कर दी है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि 10 साल बाद भी परिवार को न्याय (क़ानूनी और सामाजिक दोनों) मिलना कितना कठिन रहा है। सरकार का अभियोजन वापस लेने का फैसला बेहद संवेदनशील है। यह लिंचिंग के मामलों में जवाबदेही और पीड़ितों की आवाज़ को कमजोर कर सकता है। खबर के साथ प्रकाशित तस्वीर से पता चलता है कि घर अब खाली सुनसान पड़ा है तथा परिवार बिसादा छोड़ चुका है। यह संकेत है कि घटना का असर दीर्घकालीक रहा। साथ ही, यह मामला “पड़ोसियों, गांव के सामाजिक तंत्र और स्थानीय राजनीति” के जुड़े पहलुओं को भी उजागर करता है कि कैसे आरोपी सामान्य ज़िंदगी जी रहे हैं जबकि पीड़ित परिवार पीछे छोड़ दिया गया है। खबर के अनुसार, अखलाक की माँ अब नहीं रही, उनकी मौत हो चुकी है। उनकी पत्नी, बूढ़ी और बीमार हैं। उनका बेटा, दानिश जो उस दिन भीड़ की हिंसा का शिकार हुआ था, गंभीर रूप से घायल हुआ था और अब शादीशुदा है। उनकी बेटी भी अब शादीशुदा है। रिपोर्ट कहती है कि जब अखलाक का नाम लिया जाता है, तो गाँव वालों की आवाज़ दब जाती है। पड़ोसियों ने मीडिया से बात करने में संकोच किया है। आरोपी अब अपनी ज़िंदगी “सामान्य” बना चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार 19 लोगों पर हत्या का मामला था, उनमें अधिकतर आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। यूपी सरकार ने एक याचिका दायर करके 19 आरोपियों के खिलाफ केस वापस लेने की अनुमति मांग रही है। सरकार की दलीलें अहम हैं: अखलाक के परिवार (गवाहों) ने अपने बयानों में “परिवर्तन” किया है। अलग-अलग समय पर उन्होंने आरोपी व्यक्तियों की संख्या बदल दी है। यह भी कहा गया है कि इन आरोपी पर कोई फायरआर्म या धारदार हथियार नहीं मिला था, सिर्फ “लकड़ी की छड़ें, ईंटें” जैसी चीजें बरामद हुई थीं। याचिका में संविधान के “समता” अधिकार का हवाला भी दिया गया है, यह तर्क देते हुए कि आरोपी भी संविधान के तहत बराबर हैं। इस तरह का कदम इसलिए भी विवादास्पद है, क्योंकि यह एक लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) का मामला था, और अब 10 साल बाद सरकार केस वापस लेना चाह रही है। अखलाक के वकील का कहना है कि अभी तो सबूत अदालत में पेश हो रहे हैं। ऐसे में मामला वापस लेना “चौंकाने वाला” है क्योंकि बहुत कुछ अभी तय नहीं हुआ है। रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि पिछले दस सालों में, बिसादा गाँव में बहुत कम विकास हुआ है। सड़क, बिजली, अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी अभी भी बनी हुई है।
द टेलीग्राफ के साथ हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज सुप्रीम कोर्ट की खबर को प्राथमिकता दी है। इस खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स ऐक्ट, 2021 के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया है। द टेलीग्राफ के मुताबिक ये एक्ट न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करता है। कोर्ट ने कहा कि यह कानून असल में पहले ही ख़ारिज किए गए प्रावधानों का “थोड़ा बदला रूप” है। यानी, संसद ने पुराने, पहले कबूले गए हिस्सों को मामूली बदलावों के साथ फिर से पेश कर दिया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कानूनी रूप से यह माना कि ट्रिब्यूनल सिस्टम को संरचनात्मक रूप से ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ न्यायपालिका स्वतंत्र रहे। द एक्ट में जो नियम थे, वे “कार्यपालिका के नियंत्रण” को बढ़ाते थे और यह संविधान की व्यवस्था से मेल नहीं खाता है। एक्ट ने ट्रिब्यूनल के सदस्यों (चेयरपर्सन और अन्य) की न्यूनतम उम्र 50 साल तय की थी। कोर्ट ने इसे ख़ारिज किया क्योंकि इससे “युवा और योग्य” वकीलों या विशेषज्ञों की नियुक्ति को रोकता है। साथ ही, एक्ट में चार-साल की अवधि (टेन्योर) रखी गई थी जबकि कोर्ट ने पहले कहा था कि अवधि छोटी होने से सदस्यों की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को नेशनल ट्रिब्यूनल्स कमीशन बनाने का निर्देश दिया है, ताकि ट्रिब्यूनल की नियुक्ति, संचालन, प्रशासन पारदर्शी हो और वह कार्यपालिका से स्वतंत्र बने। बेंच ने यह स्पष्ट किया है कि भारतीय संविधान में संवैधानिक सर्वोच्चता है न कि संसद की सर्वोच्चता। इसका मतलब है कि संसद को वह कानून बनाना चाहिए जो संविधान-मानदंडों और अदालतों की व्याख्या के दायरे में हो, न कि अदालत की पिछली बातों को केवल “पैकेज बदलकर” वापस लाना। न्यायपालिका की भूमिका को सिर्फ फैसले देने तक सीमित नहीं माना गया है। कोर्ट ने कहा है कि वह यह भी देखेगी कि संसद का कानून संविधान की मर्यादा में है या नहीं। यह “न्यायिक समीक्षा” एक बुनियादी संरचनात्मक सिद्धांत है। कोर्ट ने सरकार को चार महीने का समय दिया है कि वह नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन बनाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह “निराशा” जताई कि केंद्र सरकार ने बार-बार उन निर्देशों को मानने से इनकार किया है जो पहले कोर्ट ने न्यायिक स्वतंत्रता और ट्रिब्यूनल स्वायत्तता बनाए रखने के लिए दिए थे। कोर्ट ने कहा कि पारित किए गए नए कानून में वही पुरानी समस्याएं फिर से सामने आई हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


