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एसबीआई और अन्य सरकारी बैंकों का पसंदीदा कर्जखोर अडानी समूह ही क्यों है?

विजय शंकर सिंह-

हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट पर एक संक्षिप्त टिप्पणी… अडानी समूह पर हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट एक दिलचस्प और लंबी रिपोर्ट है, जिसे पढ़ने में लगभग एक घण्टे का समय चाहिए। उसे लेकर लगातार प्रतिक्रियाएं आ रही है। पर ऐसा लगता है कि बहुत कम लोगों ने रिपोर्ट के निहितार्थों को पढ़ा और समझा है। रिपोर्ट का यह संक्षिप्त रूप, Shantanu Basu जी की पोस्ट पर, साभार आधारित है। शांतनु बसु, कोई स्टॉक एक्सचेंज से जुड़े हुए व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन उन्होंने, इस रिपोर्ट से कुछ तथ्यों को तार्किक रूप से अपनी पोस्ट मे रखा है। अंग्रेजी में लिखे उस रिपोर्ट के सारांश पर यह टिप्पणी आधारित है।

भारत के कुछ अन्य बिजनेस समूहों के समान, अडानी बिजनेस समूह भी किसी भी परिवारिक बिजनेस मॉडल से अलग नहीं है। गौतम अडानी इस समूह के प्रमुख हैं। उनका परिवार, समूह के बिजनेस के लिए, आउटसोर्स एजेंटों के रूप में, काम करता है और इस तरह, इस समूह के विकास में अपना योगदान देता है। जिस बिजनेस समूह का आर्थिक आपराधिक इतिहास जितना ही बड़ा होगा, विशेष रूप से, दुनिया भर में, उस समूह के विस्तार की उतनी ही संभावना होगी।

गुजराती पूंजीपतियों का बिजनेस मॉडल लगभग एक ही तरह का है। इनके बिजनेस तरीके को समझना ज्यादा मुश्किल भी नहीं है। एसबीआई (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया) जैसे इच्छुक ऋणदाता से, शुरुआती कर्ज ले और फिर इसे, समूह की अन्य कंपनियों के बीच, एलएलपी और अन्य निजी कंपनियों के नेटवर्क के बीच गोल गोल घुमाते रहे।

फिर कर्ज द्वारा मिले इन पैसों को, इस कंपनी से उस कंपनी में, समय समय पर जरूरत के मुताबिक स्थानांतरित करें, अलग-अलग समय (समान वित्तीय वर्ष के साथ) में प्रत्येक कंपनी के कैश बैलेंस को बढ़ाते हुए, स्टॉक की कीमतों को बढ़ाते रहें, और फिर विशेष रूप से, SBI और अन्य संस्थागत निवेशकों से और अधिक कर्ज की मांग करते रहें। वे तो देने के लिए बैठे ही हैं!

बिजनेस समूह की आय के लिए, इन्हें भी समूह की अन्य कंपनियों के नेटवर्क में शामिल कर लिया जाता है, और फिर इसे सूचीबद्ध समूह की कंपनियों में पुनर्निवेश किया जाता है। फिर कर्ज में डूबे पी एंड एल खातों को किनारे करने के लिए, उपरोक्त के साथ, जोड़ कर, एक साथ पी एंड एल खाते को तैयार करते हैं। और ऐसा करके, निवेशक के मन में यह भ्रम उत्पन्न कर दिया जाता है कि, समूह की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ है। समूह, इसके बदले में, कभी भी ऋण डिफॉल्ट के बारे में सोचे बिना, निवेशकों/बैंकों से, अतिरिक्त धन उगाहने में लग जाता है। एक प्रकार से यह यह एक विशाल पौंजी Ponzi बिजनेस मॉडल की तरह है, जिसमें एक को कुछ देने के लिए दूसरे को लूटने की जरूरत आ पड़ती है।

इस तरह के बिजनेस मॉडल के लिए, कंपनियों के गंभीर ऑडिटर की भूमिका, एक 23-24 वर्ष की आयु के ऑडिट क्लर्कों से अलग नहीं होती हैं। इस तरह की ऑडिट से, लेखा खामियों के बारे में, सच्ची और निष्पक्ष राय प्राप्त करना आसान नहीं होता है। यह एक चिंतित करने वाला विंदु है।

अब देखते हैं, यह पोंजी कैसे काम करता है?

बता दें, अडानी एंटरप्राइजेज ने एसबीआई से 100 मिलियन डॉलर कर्ज लिए हैं। इसके बाद इस राशि को, वह अपनी बैलेंस शीट पर ले जाता है। फिर यह ‘अधिशेष’ को या तो समूह की कंपनियों या संदिग्ध कंपनियों के अपने नेटवर्क में पुनर्वितरित कर देता है। इस तरह से होने वाली आय, अपेक्षाकृत छोटे मूल्यवर्ग (जैसे, $10-15 मिलियन) में समायोजित कर दी जाती है और, जरूरत पड़ने पर अन्य कंपनियों के नकदी अनुपात और स्टॉक की कीमतों को बढ़ाने या स्थिर रखने के लिए, हस्तांतरण हेतु, एक आरक्षित पूल के रूप में भी कार्य करती है।

इस तरह का समायोजन या पूंजी हस्तांतरण, भारत या विदेशों में प्रवर्तन एजेंसियों के मन में, बिना कोई संदेह उपजाए किया जा सकता है। जब भी नकदी संतुलन और स्टॉक मूल्य को बढ़ाने की आवश्यकता होती है, यही पोंजी मॉडल अपनाया जाता है। इस बिजनेस मॉडल में, करचोरी या अन्य आर्थिक अपराध से हुई अर्जित आय को भी वैध बनाना मुश्किल नहीं है। नकली चालान बना देना, निर्यात के लिए अधिक और आयात के लिए कम उत्पाद के फर्जी काग़ज़ तैयार करना, इस बिजनेस मॉडल का एक तरीका बन गया है। इसके लिए, बिक्री योग्य उत्पाद का भौतिक अस्तित्व का होना भी जरूरी नहीं है। बस कागज़ का पेट भरना होता है।

यहां तक ​​कि अगर भारत सरकार की एजेंसियां ​​अडानी समूह की किसी गड़बड़ी को पकड़ भी लेती हैं, तो, सत्ता में बैठे, अडानी के संरक्षक यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि, एजेंसियों की जांच निष्फल हो जाए। आखिर, इन्हीं आर्थिक अपराध के, कीचड़ भरे पैसों से ही तो, सत्ताधारी पार्टी चुनाव प्रचार का खर्च उठाती है!

जहां तक ​​नेटवर्क की अन्य कंपनियों का सवाल है, उनके बारे में, कुछ न कहना ही बेहतर होगा। इनमें से, लगभग अधिकांश के पास कोई वेबसाइट तक नहीं है और जिनके पास है भी, उसमे, कार्यालय, कर्मचारी, आदि न्यून सूचनाओं के ही उल्लेख हैं। फिर भी इन संस्थाओं को अरबों डॉलर का ऋण मिलता रहता है क्योंकि, इनके सरपरस्त, गौतम अडानी है।

आखिर अडानी समूह एसबीआई और अन्य सरकारी बैंकों का पसंदीदा कर्जखोर क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि केवल सरकारी वित्तीय संस्थान ही हैं जो, अनियंत्रित रूप से असुरक्षित शेयरों की गारंटी (?) पर असीमित धनराशि उधार देने के लिए, तैयार बैठे हैं। कोई भी सरकारी बैंक, कर्ज देते समय, कंपनी की बैलेंसशीट और पी एंड एल खातों और उनके सही मूल्यांकन को विस्तार से देखने की हिम्मत नहीं करता है। क्योंकि, कहीं ऐसा न हो कि वे अपनी नौकरी ही न खो दें। या हो सकता है, यहां तक कि झूठे आरोपों में जेल न, भेज दिया जाए।

इसका परिणाम यह है कि इस समूह के लगभग 4 लाख करोड़ रुपये के ऋण का एक बड़ा हिस्सा बहुत कम अथवा बिना किसी संपत्ति के आधार पर दिया गया है। समूह की संपत्ति का मूल्यांकन, मात्र एक कल्पना है।

आज जब अडानी के शेयरों ने ₹46000 करोड़ का नुकसान हुआ, तो कोई भी सरकारी बैंक, ऐसा नहीं है जो, इस समूह को 50% मार्जिन मनी देने के लिए कहे। डर है, कहीं ऐसा न हो कि सच सामने आ जाए और जनता सड़को पर आ जाए और एसबीआई या किसी अन्य सरकारी बैंकों में जहां जनता का खाता है, वे बदनाम न हो जाय।

इससे भी अधिक दिलचस्प बात यह है कि वित्तीय सेवा विभाग, एमओएफ या भारत सरकार जो सभी सरकारी बैंक, (उनके सीए की नियुक्ति, उनके वार्षिक खातों को मंजूरी देने और सभी निदेशकों और सीएमडी/सीईओ की नियुक्ति सहित) का अधीक्षण करता है, अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करता है। खासकर जब, बैंकिंग अधिनियम के अनुसार, बैंको की ऑडिट, CAG (सीएजी) जिसके पास समस्त विभागों के ऑडिट का दायित्व है, द्वारा किसी भी ऑडिट से मुक्त है तब, क्या बैंको के बोर्ड का यह दायित्व नहीं है कि, वह इस तरह के ऋण दान का संज्ञान लेकर विशेष ऑडिट कराए ?

बैंको, आरबीआई और सरकार ने कभी भी किसी सरकारी बैंक के इस ऋण दान के विशेष ऑडिट कराने का निर्देश नहीं दिया है, जो अडानी समूह को दिए गए ऋण के नियमों और शर्तों को जांच के दायरे में लेकर जांच और ऑडिट करता। क्या वित्तमंत्री से, संसद में, इस मसले पर जवाब नहीं मांगा जाना चाहिए?

यह आम बात है कि, स्टॉक दलाल, शेयरों का व्यापार करते हैं और प्रत्येक शेयर की बिक्री पर अच्छा मार्जिन पाते हैं। जितना अधिक शेयर मूल्य, उतना ही अधिक उनका कमीशन। क्या राजनीतिक फंडिंग का एक हिस्सा, इस तरह के असहज किए जा सकने वाले, सवालों पर चुप्पी के लिए तो नहीं रखा जाता है?

14 साल के लिए सेबी द्वारा शेयर ट्रेडिंग से प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद, केतन मेहता जैसा मेगा स्टॉक ऑपरेटर, प्रॉक्सी का उपयोग करके अपने पुराने ग्राहकों (जैसे अडानी) को बनाए रखते हुए अपने भारतीय व्यवसाय को पहले की ही तरह, सुविधाजनक रूप से, लंदन में रहते हुए चलाना जारी रखता है?

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