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सरकार विरोधी रिपोर्टिंग तो छोड़िये, कॉरपोरेट की मदद करने वाली खबरें भी नहीं की गोदी वालों ने

संजय कुमार सिंह-

नरेश गोयल और उनकी पत्नी के खिलाफ मनी लांडरिंगका केस खत्म पर खबर? वह भी तब जब ईडी की कामयाबी की कमी के आधार पर कहा जा सकता है कि वह कइयों को रोजगार दे सकने वालों को बर्बाद कर रहा है। यह सरकारी सह पर हो रहा है। कारण सरकार बताएगी नहीं पर समझना मुश्किल नहीं है।

वैसे तो आज के अखबारों में पवन खेड़ा की गिरफ्तारी और फिर जमानत मिलने की खबर छाई हुई है लेकिन अडानी समूह को सरकारी सरंक्षण और हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट के बाद समूह के 56 ईंची गुब्बारे के हश्र पर महीने भर से चले आ रहे सन्नाटे के मद्देनजर कॉरपोरट खबरों का महत्व बढ़ गया है। और ऐसी एक खबर द टेलीग्राफ के बिजनेस पेज पर मिली। खबर के अनुसार जेट एयरवेज के संस्थापक और उनकी पत्नी के खिलाफ मनी लांडरिंग का केस खारिज हो गया है। आपको याद होगा कि नोटबंदी के बाद कई कारोबारी समूह आर्थिक रूप से तबाह हो गए। कुछ विदेश भाग गए, कुछ का धंदा बंद या मंदा हो गया। हालांकि, किसी कारोबारी समूह ने मजबूती से ऐसा आरोप नहीं लगाया है और किसी ने यह दावा नहीं किया कि नोटबंदी के बाद की परिस्थितियों में कारोबार मुश्किल हुआ जिससे आर्थिक स्थिति खराब हुई और भारत में धंधा करना मुश्किल हुआ। 

जब नोटबंदी हुई थी तो छोटे-बड़े कारोबारियों ने जरूर ऐसा कहा था लेकिन उसपर ध्यान नहीं दिया गया। मीडिया को ऐसे मामले जिस ढंग से कवर करना चाहिए था नहीं हुआ। आश्चर्यजनक रूप से चार्टर्ड अकाउंटेंट और उनका एसोसिएशन भी इस मामले में लगभग चुप रहा। अब जब यह तय हो चुका है कि नोटबंदी कानूनन सही थी या उसमें कोई गलती नहीं थी तो एक अध्ययन होना चाहिए जिससे पता चले कि देश की अर्थव्यवस्था पर उसका क्या असर हुआ। कितने या कौन से कारोबारी बर्बाद हो गए। फायदा तो नहीं ही हुआ है वरना खूब प्रचार किया जाता। नुकसान नहीं हुआ हो तो भी खबर है। पर नुकसान गोदी मीडिया नहीं बताएगा तो सरकार भी नहीं बताएगी। यह काम उद्योग संगठनों को करना चाहिए था पर उन्हें भी इसकी जरूरत नहीं लगी या हिम्मत नहीं हुई।  दूसरी ओर, कारोबारी जब कर्ज की किस्तें चुकाने में अक्षम होने लगे तो यह प्रचारित किया गया कि उन्हें कर्ज पिछली सरकार ने दिया था और कर्ज देने में भ्रष्टाचार हुआ था। 

एक राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस ने इस आरोप का मुकाबला नहीं किया और अभी भी बहुत लोग यही मानते हैं। जबकि तथ्य यह है कि सरकारी बैंकों का जो पैसा डूबा उसका कारण कारोबार नहीं चलना भी हो सकता है और नोटबंदी के बाद की स्थितियां निश्चित रूप से इसका कारण हो सकती हैं। इसलिए, जो कारोबारी (तब की सरकार की सिफारिश पर कर्ज पाने वाले भी) 2014 से पहले लिए गए कर्ज की किश्ते 2016 के नवंबर तक चुकाते रहे और उसके बाद नहीं चुका पाए (या चुकाया) तो कारण नोटबंदी भी हो सकती है। लेकिन यह कहीं मुद्दा ही नहीं रहा और व्हाट्सऐप्प फॉर्वार्ड प्रचारित करते रहे कि कारोबारी कर्ज नहीं चुका पाए तो भाग गए और भले इनमें विजय माल्या जैसे सरकारी पार्टी के करीबी लोग रहे हों दोषी कांग्रेस को बताया गया। वैसे तो वह पूरा प्रचार ही फर्जी था लेकिन भारत में मतदाताओं ने धोखा दिए जाने का बुरा नहीं माना। मीडिया जो गोदी चढ़ गया। 

ऐसी दशा में जेट एयरवेज बंद हो गया और एयरइंडिया टाटा समूह को चला गया है। इसमें किसे फायदा हुआ और किसे नुकसान कौन जाने और कौन बोले। कारोबारी वैसे भी विवादों से दूर रहते हैं और अपना काम करते हैं। पर विषय तो है और मीडिया के लिए जरूरी व दिलचस्प भी। खासकर इसलिए कि टाटा एयरलाइंस के अधिग्रहण के बाद जब देश में निजी विमानसेवा शुरू हुई तो टाटा समूह अपनी विमान सेवा शुरू करना चाहता था और यह इच्छा सार्वजनिक थी। बहुत समय तक ऐसा हो नहीं पाया। और एक समय जब टाटा की सक्रियता बहुत अधिक थी तो अचानक टाटा समूह की ओर से कहा गया कि वह इस प्रयास से अपना हाथ खींच रहा है  क्योंकि सरकार हमसे जो चाहती है वह हम करते नहीं हैं (या ऐसा ही कुछ)। इसके बाद टाटा समूह को एयर इंडिया मिल जाना, टाटा के लोकोपकार संगठनों से संबंधित टैक्स विवाद और फिर रतन टाटा का पीएम केयर्स में शामिल होना बहुत कुछ कहता है। 

इसपर बहुत कुछ जानने की इच्छा रही। पहले ऐसे मामलों पर काफी कुछ लिखा जाता था जो अब नहीं दिखता। रतन टाटा इस उम्र में और इन स्थितियों में पीएम केयर्स में क्यों शामिल हुए यह सवाल उनसे बार-बार हर किसी को पूछना चाहिए या जबाव जानने की इच्छा हर किसी को होनी चाहिए पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और ना वो मन की बात करते हैं। ऐसे में नरेश गोयल जैसे अपेक्षाकृत छोटे कारोबारी की कंपनी के बंद हो जाने पर भी दूसरे बड़े कारोबारियों की प्रतिक्रिया दिलचस्प होगी। उसकी पठनीयता और उसे लेकर जिज्ञासा होगी। उसे सरकारी (या कोई और) सहायता नहीं मिलना भी कॉरपोरेट मीडिया के लिए चर्चा का विषय हो सकता था। लेकिन हुआ क्या? अप्रैल 2019 में आर्थिक कारणों से सेवा बंद होने से सैकड़ों लोग बेरोजगार हो गए और कंपनी को अभी तक चालू नहीं किया जा सका है। जनहित में यह काम सरकार का ही था पर नहीं हुआ। 

उलटे उसपर एक फर्जी मुकदमा ठोंक दिया गया और कंपनी को अछूत बना दिया गया। मामले को फर्जी साबित होने में चार साल लग गए। कमजोर-बीमार कंपनी को मार दिया गया। यह सरकारी नीति नहीं रही हो तो भी जिस सरकार के शासन में यह सब हुआ उसकी कमजोरी या जनहित की उपेक्षा तो है ही। उसपर या उससे सवाल तो है ही। सरकारी पार्टी या अडानी अमीर होते गए पर नरेश गोयल क्यों लुट गए – इसपर कोई चर्चा दिखी? मीडिया चुप है। जो बोल सकते हैं उन्हें डरा दिया गया है और हर ओर सन्नाटा है। इतना कि गूगल से लग रहा है कि यह खबर कहीं छपी ही नहीं है। पीटीआई-भाषा की 23 फरवरी की एक खबर के अनुसार, दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस पृथ्वीराज चह्वाण की खंडपीठ ने 20 फरवरी 2020 को दर्ज ईसीआईआर और गोयल दंपति के खिलाफ सभी कार्रवाई को गैरकानूनी और कानून के विपरीत होने के आधार पर रद्द कर दिया। आम तौर पर ईसीआईआर एक तरह से प्राथमिकी होती है जो पुलिस, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और कोई अन्य एजेंसी आपराधिक मामले के आधार पर दर्ज करती है। 

इससे पहले, गोयल दंपति के वकील रवि कदम और आबाद पोंडा ने दलील दी थी कि ईसीआईआर 2018 में मुंबई पुलिस में दर्ज एक शिकायत के आधार पर दर्ज की गयी। लेकिन मार्च 2020 में पुलिस ने यह कहते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल की कि उन्हें शिकायत में कुछ ठोस नहीं मिला और यह विवाद दीवानी प्रकृति का नजर आता है। पुलिस ने अकबर ट्रैवल्स द्वारा दर्ज करायी एक शिकायत के आधार पर कथित धोखाधड़ी और जालसाजी के लिए गोयल दंपति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी थी। ट्रैवल एजेंसी ने आरोप लगाया था कि उसे अक्टूबर 2018 से एअरलाइन द्वारा विमानों का संचालन बंद करने के बाद 46 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। अब आप समझ सकते हैं कि यह मामला कितना मजबूत या कमजोर था। खासकर तब जब कंपनी का परिचालन बंद हो चुका था और वह नोटबंदी जैसी सरकारी कार्रवाई के मुक्त नहीं हो सकता था। 

दूसरी ओर हिन्डनबर्ग या अडानी समूह का मामला है जिसपर (अभी तक) किसी जांच की जरूरत नहीं समझी गई है (क्योंकि ऐसी कोई घोषणा नहीं है)।क्या आप जानते हैं कि मई 2022 में खबर आई थी, तीन महीने में शुरू होगी जेट एयरवेज की फ्लाइट सर्विस, डीजीसीए ने दी उड़ान की मंजूरी। यह तो सरकारी खबर थी। लेकिन नहीं छपी या कम छपी क्योंकि जेट एयरवेज पर ईडी के मामले के कारण उसे अछूत मान लिया गया था। इसीलिए इसे सुरक्षा मंजूरी मिलने के बाद भी अभी तक सेवा शुरू नहीं हो पाई है पर वह दूसरी खबर है और वह भी नहीं हुई। ऐसा ही हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट के साथ है। चूंकि सरकार को पसंद नहीं है और प्रधानमंत्री के सबसे करीबी के खिलाफ है इसलिए डेढ़ सौ पन्ने की रिपोर्ट की चर्चा मीडिया में नहीं के बराबर है जबकि अडानी के शेयर रोज इसी रिपोर्ट के कारण गिर रहे हैं और अब तो एक महीना हो चला। सेठ जी भी काफी नीचे आ चुके हैं। 

दूसरी ओर, जेटएयरवेज की सेवा सुरक्षा मंजूरी मिलने के बाद भी अभी तक शुरू नहीं हो पाई है पर वह दूसरी खबर है और वह भी नहीं हुई। हिन्दी में तो खबरें वैसे भी नहीं होती हैं अंग्रेजी में द वायर की खबर के अनुसार जेट एयरवेज की यह हालत कई कारणों से है और इसमें राजनीतिक ताकतों की भूमिका भी है। वैसे तो हिन्दी में हवाई सेवा से संबंधित खबरें पहले भी नहीं होती थीं लेकिन हवाई चप्पल वालों को हवाई यात्रा कराने के दावे के मद्देनजर स्थिति बदलनी चाहिए थी। आज हालत यह है कि हिन्दी में पवन खेड़ा गूगल करने पर छह पन्ने में 67 परिणाम आ रहे हैं। पहले पन्ने पर कोई भी खबर 24 घंटे से पुरानी नहीं है। लेकिन नरेश गोयल सर्च करने पर 10 पेज में 81 परिणाम आ रहे हैं और पहले पन्ने में भी ज्यादातर पुरानी खबरें हैं। वैसे तो यह कोई पैमाना नहीं हो सकता है लेकिन मुझे लगता है कि खबर छपी होती तो यहां दिखती जैसे पवन खेड़ा की दिख रही है। 

आज जो पुरानी खबरें पहले पन्ने पर दिख रही हैं उनका शीर्षक है, 1) नरेश गोयल विदेश जाना चाहें तो 18 हजार करोड़ रु. की गारंटी दें। 2) जेट के फाउंडर नरेश गोयल को ईडी ने हिरासत में लिया, उनके मुंबई … 3) फिर भरेगी उड़ान, नरेश गोयल की गलतियों की वजह से बंद हुई थी जेट … तो ऐसी है मीडिया की हालत और आप खबरों के लिए इसी मीडिया पर निर्भर हैं तो ईश्वर आपका भला करे।

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