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ददन ने सबसे नौकरी माँगी लेकिन किसी ने मदद नहीं की… मजबूरी में ठेला लगाया, हारकर लगाया!

रोहिन कुमार-

कुछ नहीं हो सकता दुनिया के इस फ़र्ज़ीवाड़े का। विशुद्ध चोट्टई का फैंसी नमूना। उस पत्रकार ने जॉब स्विच करके या जॉब से ब्रेक लेकर ‘पत्रकार पोहा’ स्टॉल नहीं लगाया। मजबूरी में लगाया। हारकर लगाया। उन्होंने ख़ुद अपने इंटरव्यू में बताया है। कहा कि भाईसाहब, सबसे नौकरी माँगी। सबको मेरी हालात के बारे में पता था। किसी ने मदद नहीं की।

दस साल फ़िल्मसिटी में काम करने के बाद ये हाल। अब इन्हीं संस्थानों के संपादक ‘पत्रकार पोहा’ स्टॉल पर जाकर पोहा चाँप रहे हैं। फ़ोटो आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि उन पत्रकार का पैशन था खाना बनाना-खिलाना। अरे भई, पैशन में ठेला नहीं लगाया उसने। उसको यही लगा कि लिखने-पढ़ने के अलावा यही एक काम है जो मैं कर पाऊँगा। ठेला लगाना उसकी पहली पसंद नहीं थी।

आने वाले दिनों में वरिष्ठ चिरकुट सर लोग इसको एक सफल उदाहरण की तरह पेश कर देंगे। ‘देखिए आदमी में कुछ कर गुजरने की जिजीविषा होती है तो पत्रकार पोहा भी बेच लेता है,’ — इसपर कॉन्शटिट्यूशन क्लब में तालियाँ गड़गड़ाने लगेगी। “सर, एक ठो सेल्फ़ी हो जाए?”

रोटी माँगने वाले को रोटी देने से बड़ा ज्ञान कुछ नहीं होता।


अनिमेष मुखर्जी-

पत्रकार के लगाए पोहे के स्टॉल पर तमाम एडिटर भी पहुंचे। ये सब कथित तौर पर हौसला बढ़ा रहे हैं। हौसला बढ़ाने के कुछ और किस्से सुनिए, किसी एक संस्थान या न्यूज़ रूम के नहीं हैं।

एक लड़के को सबसे अच्छा ट्रेनी होने के बाद भी नौकरी नहीं मिलती है, क्योंकि संपादक जी के परम मित्र को एक दूसरी ट्रेनी पसंद आ जाती है और वे उसके साथ समय बिताना चाहते हैं।

एक पत्रकार को हार्ट अटैक पड़ता है। उसे हॉस्पिटल में भर्ती रहने के दौरान कहा जाता है कि समय मिले तो एक दो स्टोरी फाइल कर दो, तुम्हारे अलावा कोई नहीं कर सकता।

किसी के पिता का आंख का ऑपरेशन है और पूछा जाता है कि आंख के ऑपरेशन में हफ्ते भर की छुट्टी की क्या जरूरत, जबकि उससे कुछ हफ्ते पहले चुनाव के चक्कर में बिना ऑफ लिए काम किया गया था।

संपादक जी की सखी बता देती है कि फलां की कॉपी में बहुत गलतियां थीं। संपादक जी बिना कॉपी चेक करे मान लेते हैं और पीआईपी का नोटिस भी थमा देते हैं।

एक व्यक्ति जो पूरी मेहनत करता है उसकी तनख्वाह बढ़ती है 85 रुपए महीना। दूसरा व्यक्ति जो काम न करके संपादक जी के स्थान विशेष का चुम्बन लेने की हद तक जाता है, उसकी तनख्वाह अपने सीनियर से पर्याप्त ज़्यादा हो जाती है।

एक पत्रकार से तो वरिष्ठ जन इसलिए नाराज हो गए, क्योंकि उस पत्रकार को कुछ प्रसिद्ध लोग जानते थे।

कुछ साल पहले कई लोग न्यूज़ रूम से निकाले गए। इनमें से ज्यादातर को कहा गया कि वे काबिल नहीं हैं। अपने आप को साबित नहीं कर सके।

इन नाकाबिल लोगों में कुछ को तमाम प्रतिष्ठित अवार्ड मिल चुके हैं। कुछ को ख्यातिलब्ध फेलोशिप मिल गईं, किसी ने रिसर्च ग्रांट हासिल कर लिया। कुछ बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में पहुंच गए, कुछ को फिल्मों में सफलता मिल गई। अपना काम शुरू करना अच्छा और सुखद अनुभव है। पत्रकारिता संस्थान मेहनतकश प्रतिभाओं की कब्रगाह हैं। उनसे दूर रहना ही भला।


दीपांकर-

अगर आप बाबा साहब और फुले के विचारों को मानने वाले हैं और आप सवर्ण हैं तो तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया के न्यूजरूम में आपको साइड लगा दिया जायेगा, लेकिन आप अगर दलित शोषित पिछड़ी जातियों से आते हैं और फुले के विचारों को मानने वाले हैं तो आपके लिए साइड में भी जगह नहीं है.

बाहर निकलिए ठेला लगाइए, पैसा भी मिल जायेगा आपको.
पैशन बनाइए या मजबूरी लेकिन वही करिए जो आपके पूर्वज और उनकी पीढ़ियां करती आ रही हैं.

नाश्ते और लंच का इंतजाम करिए.

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