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सुख-दुख

सभी मान्यता प्राप्त पत्रकारों को कम से कम 25 हज़ार रुपये महीने की पेंशन दी जाये!

शम्भूनाथ शुक्ला-

लोकतंत्र में चौखंभा राज की बात कही गई है। अर्थात् विधायिका, न्यायपालिका, कार्य पालिका और प्रेस। अब प्रेस को छोड़ कर शेष सभी के ठाठ हैं। रिटायरमेंट के बाद भारी-भरकम पेंशन और अन्य सरकारी सुविधाएँ। लेकिन पत्रकार को रिटायरमेंट के बाद भूखों मरने के लिए छोड़ दिया जाता है।

न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के वे लोग जो पत्रकार के आने पर ससम्मान कुर्सी देते थे, वे पहचानने से मना कर देते हैं। ऐसे में अधिकतर रिटायर पत्रकार या तो चाय बेचते हैं अथवा पोहा या पकौड़े। जबकि ये पत्रकार ऊपर दर्ज हुए माननीयों से बौद्धिकता के मामले में क़तई कमतर नहीं होते। पत्रकारों के लिए ही किसी ने शेर कहा है, “पढ़े फ़ारसी बेचें तेल, ये देखो कुदरत का खेल!”

अब देखिये, मध्यप्रदेश के स्पीकर गिरीश गौतम ने कहा है कि स्पीकर को पद से हटने के बाद वे सारी सुविधाएँ दी जाएँ जो एक पूर्व मुख्यमंत्री के लिए तय हैं। बँगला, गाड़ी, स्टाफ़ और सुरक्षा तथा हवाई व मुफ़्त रेल की सुविधा। उन्होंने पूर्व विधायकों की पेंशन बढ़ाने की माँग भी है। अभी मध्य प्रदेश की सरकार इन पूर्व माननीयों के पेंशन, भत्ते पर 21 करोड़ रुपये खर्च करती है। अब सारे राज्यों और केंद्र सरकार के ऐसे अनुत्पादक ख़र्चों को देखा जाए तो कई हज़ार करोड़ खर्च होते होंगे।

मेरा सरकार से अनुरोध है कि सभी मान्यता प्राप्त पत्रकारों को कम से कम 25 हज़ार रुपये महीने की पेंशन तो दे ही।

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