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सुख-दुख

इस वजह से ढेर सारे पत्रकार वैदिक जी को खलनायक मानते थे!

ऋषिकेश राजोरिया-

वेद प्रताप वैदिक और अभय छजलानी… पहले वेद प्रताप वैदिक और कुछ ही दिनों के बाद अभय छजलानी। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में नाम कमाने वाले दोनों दिग्गज इस दुनिया से विदा हो गए। जन्म लेना और मरना जीवन की अनिवार्य अनवरत प्रक्रिया है, ऐसे में हमारे सामने शोक व्यक्त करने के अलावा और कोई उपाय नहीं रहता।

वेद प्रताप वैदिक पीएचडी के लिए हिंदी में शोधपत्र तैयार करने से प्रसिद्ध हुए और उसके बाद वह शब्दों के तगड़े व्यापारी बने। मैं उनसे कई बार मिला। इंदौर में, दिल्ली में कुछ वर्ष पहले जयपुर में भी। उनके व्याख्यान सुने। भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ देखी। वे प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की हिंदी शाखा भाषा के भी संपादक रहे। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने राजनीति के दिग्गजों के बीच अपना संपर्क क्षेत्र मजबूत करने का काम किया। उन्हें हिंदी पत्रकारिता में योगदान देने के लिए याद किया जाता है, लेकिन उनके हाथों हिंदी पत्रकारिता का नुकसान भी हुआ है। जब टाइम्स ग्रुप को अपने हिंदी प्रकाशनों से पीछा छुड़ाना था और कानूनी मुकदमे चल रहे थे, उस समय चंद्रकला प्रकाशन नामक एक कंपनी ने टाइम्स की सभी हिंदी पत्रिकाओं के टाइटल खरीद लिए और बाद में उनका प्रकाशन कभी नहीं किया। इस सौदे में वैदिकजी की भूमिका सवालों के घेरे में रही थी। उन पत्रिकाओं में धर्मयुग, माधुरी, दिनमान, पराग आदि शामिल थी। इन प्रकाशनों से निकले पत्रकार वैदिकजी को खलनायक मानते थे।

अभय छजलानी इंदौर के प्रसिद्ध अखबार नई दुनिया के मालिक थे। 1987-89 में जब मैं नई दुनिया में काम करता था, उस समय अभय छजलानी नई दुनिया का मालिकाना हक पूरी तरह अपने पास रखने की प्रक्रिया में जुटे थे। मेरे सामने नई दुनिया का एक अलग भोपाल संस्करण शुरू हुआ था और उसका मालिकाना हक दिवंगत नरेन्द्र तिवारी के परिवार को सौंपने की तैयारी हो चुकी थी। अभयजी का बचपन दिग्गज पत्रकारों के बीच बीता था। वह प्रभाष जोशी, राजेन्द्र माथुर, राहुल बारपुते जैसे लेखकों, संपादकों के बीच बड़े हुए थे। लेकिन समय के साथ उनके नियंत्रण में आते-आते नई दुनिया की चाल-ढाल बदल गई। उससे मिलते जुलते दैनिक नई दुनिया, नव दुनिया जैसे अखबार आ गए, जिनको चलाने वाले नई दुनिया से ही निकले थे। एक समय ऐसा भी आया जब अभयजी के बेटे ने पूरा नई दुनिया अखबार जागरण समूह को बेच दिया। इस तरह अभयजी ने अपने जीवनकाल में ही अखबार को शीर्ष मुकाम तक पहुंचते हुए और बाद में पूरी तरह अपने हाथ से निकलते हुए भी देखा। समय का हिसाब अलग तरह का होता है।

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