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मोदी भी क्या सुब्रत राय के चंगुल में फंसे थे?

सहारा के चंगुल से कौन बड़ा राजनेता बचा है? कैश ही सहारा की सबसे बड़ी ताकत… मोदी भी क्या सुब्रत राय सहारा के चंगुल में फंसे थे? ये सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि देश भर के जब सारे चिटफंडियों जैसे रोजवैली की संपत्ति कुर्क की जा रही है, चिटफंड कंपनी के निदेशकों को जेल की सलाखों के पीछे डाला जा रहा है, निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक किसी भी चिटफंडियों को जमानत तक नहीं दे रहा है तो सहाराश्री आखिर किस तरह रियायत पाते जा रहे हैं.

सहारा के चंगुल से कौन बड़ा राजनेता बचा है? कैश ही सहारा की सबसे बड़ी ताकत… मोदी भी क्या सुब्रत राय सहारा के चंगुल में फंसे थे? ये सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि देश भर के जब सारे चिटफंडियों जैसे रोजवैली की संपत्ति कुर्क की जा रही है, चिटफंड कंपनी के निदेशकों को जेल की सलाखों के पीछे डाला जा रहा है, निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक किसी भी चिटफंडियों को जमानत तक नहीं दे रहा है तो सहाराश्री आखिर किस तरह रियायत पाते जा रहे हैं.

सरकारी एजेंसियां सुप्रीम कोर्ट के सामने क्यों नहीं खुलासा कर रही हैं कि जेल के भीतर और अब बाहर आकर भी सुब्रत राय सहाराश्री कभी कोऑपरेटिव सोसायटी के नाम पर तो कभी बीमा बेचने के जरिए जनता से उगाही कर रहे हैं. आरोप है कि पैसों को गलत तरीके से एक कंपनी से दूसरे में ट्रांसफर किया जा रहा है. हर महीने करोड़ों रुपये घाटे सहकर भी सहारा मीडिया जिंदा रखा गया है. आखिर कैसे? अब तक किसी और कंपनी की बात होती तो रिसीवर नियुक्ति कर दिये गये होते. बिना राजनीतिक प्रभाव के इस तरह के मामलों की अनदेखी कर पाना किसी भी अधिकारी के लिए संभव नहीं होता. इसीलिए ये सवाल बार-बार उठ रहा है. 

सहारा से पैसे लेने के मामले में मोदी पर सबसे पहले हमला किया स्वराज इंडिया से जुड़े प्रशांत भूषण और इसके अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने. प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट तक में इस मामले की जांच के लिए अपील की है, तो राहुल गांधी और केजरीवाल जनता की अदालत में इस मामले में फैसला कराने पर तुले हैं. लेकिन मोदी ने सहारा कंपनी से मिले पैसे पर चुप्पी साध रखी है. धीरे-धीरे ये मामला गरमाता जा रहा है. प्रधानमंत्री चाहे तो इसका जवाब आम आदमी को दूरदर्शन के जरिए दे सकते हैं क्योंकि लोकतंत्र के मर्म में आम आदमी ही महत्वपूर्ण होता है. लेकिन अभी इसकी भी सुगबुगाहट नहीं है.

सहाराश्री ग्लैमर के साथ दबंगई के लिए भी जाने जाते हैं. सहारा मीडिया में कई पूर्व संपादकों से सहाराश्री की दंबगई के किस्से सुन सकते हैं. कैसे सहाराश्री के एक आदेश पर एक मिनट के अंदर प्रधान संपादक जलील होकर कैंपस से बाहर कर दिये गये, कैसे एक संपादक को गार्डों के जरिए बेइज्जत करके इस्तीफा लिया गया, कैसे सहाराश्री के स्वास्थ्य के बारे में गलत खबर देने के चलते एक संपादक की पिटाई की गई, कैसे एक संपादक के घर सहारा के गार्डों ने छापा मारा और उसकी संपत्ति की सहारियन तरीके (अवैध) से जांच की. दुनियादारी और बदनामी के चलते ये संपादक भी अपनी बेइज्जती कराकर चुप रहना ही बेहतर समझे.

सहाराश्री के दबंगई के साथ दरियादिली के भी किस्से आम हैं. यूपी के तमाम दलों के बड़े नेता खुलेआम स्वीकार करते हैं कि सहाराश्री के चलते ही आज बड़े नेता हैं. इनमें कांग्रेस के राजसभा सांसद प्रमोद तिवारी, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर, समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेता भी शामिल हैं. अटल जी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान तो यूपी के तमाम बीजेपी नेता अपनी सिफारिश सहाराश्री से करने की सिफारिश करते थे. बीएसपी के कई बाहुबली सांसद भी मायावती के नहीं पसंद करने के बावजूद सहाराश्री के यहां अपनी हाजिरी लगाकर चरणामृत ले आते थे.

चुनावों में कैश की खासी किल्लत रहती है. ऐसे में चिटफंडियों के अलावा अंबानी जैसा धन्नासेठ भी देश के कोने-कोने में कैश मुहैया कराने की हालत में नहीं होता है. इसी कारण से नेताओं ने चिटफंडियों को पालना-पोसना जारी रखा. जब हालात बिगड़ते तो नेता चिटफंडियों से पल्ला झाड़ लेते. लेन-देन में कोई लिखा-पढ़ी तो होती नहीं है. ये स्थिति नेताओं के साथ चिटफंडियों को भी खूब रास आती है. कई नेताओं की अवैध कमाई का हिस्सा इन चिटफंडियों के यहां रहता है. जहां देना होता है, चिटफंडिये अपनी शाखाओं के जरिए पहुंचा देते हैं. कई मौके पर जब नेता स्वर्ग पहुंच जाते हैं तो चिटफंडिये नेता का सारा पैसा दबा जाते हैं. इसके उदाहरणों में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह का नाम सबसे ऊपर आता है. इसी कारण से मोदी पर भी सवाल उठना लाजिमी है.

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2 Comments

2 Comments

  1. इंसाफ

    December 24, 2016 at 4:55 pm

    देखो बेटा, खुन्नस में बुराई करना है तो कर लो, किन्तु जब तुम करीब से सहाराश्री की अच्छाईयों को जान लोगे तो तुम भी मुरीद हो जावोगे. तुम ही बताओ बेटा, इस देश में किसकी आलोचना नहीं हुई. भगवन राम से लेकर कलयुग में गाँधी को भी नहीं छोड़ा. देखो, सहाराश्री की शक्ति उनके ६ लाख कर्मचारी है. ध्यान में रखो.

  2. अरुण श्रीवास्तव

    January 1, 2017 at 3:59 pm

    इंसाफ (कालपनिक नाम ही सही ) जी इसके पहले भी आप इसी तरह के विचार व्यक्त कर चुके हैं। जिनके पास तर्क नहीं होते वे इसी तरह की भावनात्मक बातें करते हैं। रही बात छह लाख कर्मचारी होने की बात तो आप इस संख्या की आड़ में कहना क्या चाहते हैं। सुब्रत राय ने कोई एहसान किया है क्या ? काम लेते हैं तब दाम देते हैं ।

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