पालिसी मेच्योर होने के बाद भी निवेशकों का पैसा दाबे बैठे है सहारा समूह, एजेंट ने की आत्महत्या

एजेंट ने सुसाइड नोट में सुब्रत राय, ओपी श्रीवास्तव, अभिजीत सरकार समेत दस लोगों को आत्महत्या के लिए जिम्मेदार बताया… सुब्रत राय समेत दसों के खिलाफ एफआईआर दर्ज… देश भर के लाखों निवेशक परेशान, सहारा के कर्ताधर्ता ऐश कर रहे हैं निवेशकों के धन को हड़प कर, कई राज्यों में निवेशकों ने सहारा के मैनेजरों पर किया हमला…

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सहारा इंडिया अपने एजेंटों, फील्ड वर्करों और मोटीवेटरों को अपना कर्मचारी नहीं मानता!

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सहारा इंडिया के चेयरमैन सुब्रत रॉय

एक बड़ी खबर सहारा इंडिया कंपनी से आ रही है. कंपने कोर्ट में यह लिखकर दे दिया है कि उसका अपने कमीशन एजेंटों, फील्ड वर्करों और मोटीवेटरों से कोई संबंध नहीं है. Continue reading

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सहारा का हाल : अय्याशी के लिए पैसा है पर कर्मचारियों के लिए नहीं!

चरण सिंह राजपूत

सुना है कि पैरोल पर जेल से छूटे सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय ने 18 जनवरी की शाम को दिल्ली के मौर्य होटल में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर अपनी शादी की वर्षगांठ मनाई। इस कार्यक्रम में करोड़ों का खर्च किया गया। जनता के खून-पसीने की कमाई पर मौज-मस्ती करना इस व्यक्ति के लिए कोई नयी बात नहीं है। गत दिनों लखनऊ में अपनी पुस्तक ‘थिंक विद मी’ के विमोचन पर भी करोड़ों रुपए बहा दिए। अखबारों में विज्ञापन छपवाया कि देश को आदर्श बनाओ, भारत को महान बनाओ। दुर्भाग्य देखिए, यह सुब्रत राय अपनी संस्था और अपने आप को तो आदर्श व महान बना नहीं पाए लेकिन देश को आदर्श और महान बनाने चल पड़े हैं। गरीब जनता को ठगेंगे। कर्मचारियों का शोषण और उत्पीड़न करेंगे पर देशभक्ति का ढकोसला करेंगे। यह व्यक्ति कितना बड़ा नौटंकीबाज है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यदि आप सहारा के कार्यालयों में जाएंगे तो आपको वहां पर भारत माता की तस्वीर दिखाई देगी।

कार्यक्रमों की शुरुआत में आप इस व्यक्ति को भारत माता की तस्वीर के सामने दीप प्रज्ज्वलित करते पाएंगे। दिखावे के लिए यह संस्था गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस को भारत पर्व के रूप में मनाती है। तिरंगे का इस्तेमाल ऐसे किया जाता है कि जैसे इनसे बड़ा देशभक्त कोई दूसरा हिन्दुस्तान में नहीं। देशभक्तों को लूटकर देशभक्ति का जो दिखावा ऐसे लोग कर रहे हैं। यह देश के लिए बहुत घातक है। ऐसे लोगों के चेहरे बेनकाब करने बहुत जरूरी है। कारगिल के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए की उगाही करने वाला। जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए ठगने वाला यह व्यक्ति देश और समाज दोनों को बेवकूफ बना रहा है। सुप्रीम कोर्ट को बनाने चला था कि आ गया शिकंजे में। अपनी मां के निधन पर पैरोल पर जेल से छुटकर कर्मचारियों में आतंक का माहौल बना रहा है।

जिन कर्मचारियों के बल पर 2000 रुपए से दो लाख करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित कर पाया यह व्यक्ति, अब उन्हीं कर्मचारियों को बर्बाद करने में लगा है। कर्मचारियों को सच बोलने की शिक्षा देने वाले इस व्यक्ति को सच्चाई पसंद नहीं। जो जितना झूठ बोलता हो, चाटुकारिता करता हो। निर्लज्ज और बेशर्म हो। वह उतना ही इसे पसंद आता है। स्वाभिमानी, खुद्दार और ईमानदार कर्मचारी तो जैसे इसका सबसे बड़ा दुश्मन हो। प्रवचन ऐसे देता है कि बाबा आशाराम और रामपाल भी शर्मा  जाएं। कितना निरंकुश और तानाशाह है यह व्यक्ति। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मीडिया में सहारा में चल रही अराजकता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया तो जैसे इसके सीने पर पैर रख दिया गया हो। इस व्यक्ति ने आंदोलन की अगुआई कर रहे कर्मचारियों को जेल में बुलाकर धमकाना चाहा पर उन कर्मचारियों की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने हर बात का मुंहतोड़ जवाब दिया। देशभक्ति का ढकोसला करने वाली संस्था पर जिस दिन सीबीआई जांच बैठेगी उस दिन लोगों को पता चल जाएगा कि इसमें कितने गड़बड़झाले हुए हैं।

यह वह संस्था है जिसके मालिकान और अधिकारी अय्याशी करते हैं और कर्मचारियों को एक-एक पैसे के लिए तरसाया जाता है। भले ही आज की तारीख में कर्मचारियों को वेतन मिलने लगा हो पर आज भी 10-17 माह का बकाया वेतन संस्था पर है। जिन कर्मचारियों का रिटायरमेंट हुआ है। उन्हें पैसा नहीं दिया गया। जिन लोगों ने एक्जिट प्लॉन के तहत नौकरी छोड़ी है। उन्हें पैसा नहीं मिला है। हमेशा कोर्ट के सम्मान की बात करने वाला यह व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन देने को तैयार नहीं। जिंदगी के महत्पवूर्ण 20-25 साल संस्था को देने वाले कर्मचारी अब इसे बोझ लगने लगे हैं। किसी को तबादले के नाम पर तो किसी को बर्खास्त कर और किसी को तरह-तरह के तरीके अपनाकर परेशान कर नौकरी से निकालने में लगा है। वह भी बिना भुगतान किए बिना। मीडिया से 22 कर्मचारी मई माह में निकाल दिए गए थे कि हाल ही में 25 कर्मचारियों की नौकरी ले ली गई। यह कर्मचारी इस हाड़ कंपकपाती ठंड में राष्ट्रीय सहारा (नोएडा) के मेन गेट पर जमीन पर बैठकर अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं पर इन लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। इन सब बातों की ओर शासन-प्रशासन, उत्तर प्रदेश व केंद्र सरकारों के अलावा सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट करना बहुत जरूरी हो गया है।

चरण सिंह राजपूत

पूर्व सहारा कर्मी

charansraj12@gmail.com

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हाड़ कंपाती ठंड में सहारा के मेन गेट पर बैठे ये बर्खास्त 25 कर्मी किसी को नहीं दिख रहे!

किसी को नहीं दिखाया दे रहा सहारा का यह अन्याय… नोएडा में बड़ी संख्या में राजनीतिक व सामाजिक संगठन हैं। ट्रेड यूनियनें भी हैं। देश व समाज की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाले पत्रकार भी हैं। पर किसी को इस हाड़ कंपाती ठंड में गेट पर बैठे बर्खास्त 25 कर्मचारी नहीं दिखाई दे रहे हैं। 17 महीने का बकाया वेतन दिए बिना सहारा प्रबंधन ने इन असहाय कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया पर इनकी पीड़ा समझने को कोई तैयार नहीं।

नोएडा में श्रम मंत्रालय से लेकर जिला प्रशासन की पूरी व्यवस्था है पर कोई भी व्यक्ति इन कर्मचारियों को इनका हक नहीं दिलवा पा रहा है। किसान-मजदूरों की लड़ाई लड़ने की बात करने वाले दलों को क्या मेन गेट पर बैठे ये कर्मचारी दिखाई नहीं दे रहे हैं ? मजदूरों की लड़ाई लड़ने की बात करने वाली सीटू भी क्या इस अन्याय से अंजान है। बड़ी-बड़ी बातें लिखने वाले लेखकों को ये पीड़ित मीडियाकर्मी नहीं दिखाई दे रहे हैं? कौन बनेगा इन कर्मचारियों की आवाज? कौन समझगेगा इन कर्मचारियों के बीवी-बच्चों की पीड़ा। बच्चों को साक्षर और स्वस्थ बनाने की बात करने वाली सरकारें बताएं कि जिन कर्मचारियों का 17 महीने का बकाया वेतन न दिया गया हो और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया हो। वे अपने बच्चों को कहां से पढ़ाएं? कहां से खिलाएं? कहां से बीमारी का इलाज कराएं?


पूरे मामले को विस्तार से जानने-समझने के लिए इसे भी पढ़ें…


विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करने वाले सहारा प्रबंधन के पास इन कर्मचारियों को पैसा देने के लिए नहीं। सहारा मालिकान और अधिकारियों के किसी खर्चे में कोई कमी नहीं है। जमकर अय्याशी हो रहे ही है पर पीड़ित कर्मचारियों के लिए पैसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि अंदर काम कर रहे कर्मचारी बहुत खुश हों। उनका भी 10-12 महीने का बकाया वेतन संस्था ने नहीं दिया है। स्थानांतरण के नाम पर इन्हें भी डराया हुआ है। देश को आदर्श बनाने और भारत को महान बनाने की बात करने वाला संस्था का चेयरमैन जिंदगी के 20-25 वर्ष संस्था को देने वाले कर्मचारियों की नौकरी ले लेता है पर इनके पक्ष में कोई आवाज नहीं उठती, इससे शर्मनाक बात और नहीं हो सकती है।

इस नपुंसक समाज में हर कोई ताकतवर व्यक्ति के साथ खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। गरीबों को सताकर नायक बन रहे हैं। मुझसे भी काफी लोग कह रहे हैं आप क्यों बिना वजह के इतनी बड़ी संस्था से दुश्मनी मोल ले रहे हो। मेरा कहना है कि मरा तो जन्म ही अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए हुआ है। दूसरों के लिए लड़ने के लिए हुआ है। अपने बच्चों की परवरिश तो मैं मजदूरी करके भी कर लूंगा पर किसी दमन के सामने नहीं झुकूंगा। जब हम अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ सकते तो दूसरों की क्या खाक लड़ेंगे। जानवरों की खाल भी जूते बन जाते हैं पर आदमी की खाल के तो जूते भी नहीं बनते। क्या करेंगे हम इस शरीर का? कहां ले जाएंगे इन पैसों को? जितना हम दूसरों के काम आ जाएंगे वह ही हमारा असली पुरुषार्थ है। अपने लिए तो सब जीते हैं जरा दूसरों के लिए भी जी कर देखो।

मैंने तो सहारा के अन्याय के खिलाफ 2006 में ही मोर्चा खोल दिया था। हम लोग एक-एक पैसा सहारा से लेकर रहेंगे और एक बार ससम्मान अंदर भी जाकर दिखाएंगे। हमारे हौंसलों को कोई गेट कोई ताकत नहीं रोक सकती है। कानूनी रूप से हम सहारा को मुंह तोड़ जवाब देते रहेंगे।

देखें यह वीडियो, कैसे इस ठंढ में सहारा के बर्खास्त कर्मी मेन गेट पर जमे हैं और सहारा प्रबंधन के अन्याय के खिलाफ जमकर अपनी बात रख रहे हैं>>

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा मीडिया में सेलरी संकट से त्रस्त कर्मियों ने शुरू किया मेन गेट पर धरना-प्रदर्शन (देखें वीडियोज)

सहारा मीडिया के नोएडा स्थित मुख्य आफिस के गेट पर सहारा कर्मियों ने सेलरी के लिए धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है. कई महीने की सेलरी दबाए बैठे सहारा प्रबंधन ने अपने कर्मियों को भूखे मरने के लिए छोड़ दिया है. इससे परेशान कई कर्मचारी अब गेट पर धरना प्रदर्शन शुरू कर चुके हैं. दूसरे मीडिया हाउसेज इस आंदोलन को इसलिए कवर नहीं कर रहे क्योंकि चोर चोर मौसेरे भाई के तहत वे एक दूसरे के घर में चलने वाले उठापटक को इग्नोर करते हैं. धरना प्रदर्शन सात जनवरी से चल रहा है. धरने में करीब 25 कर्मचारी खुल कर हिस्सा ले रहे हैं.

देखें वीडियो>>

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स्वामी अग्निवेश ने खोला सहारा के खिलाफ मोर्चा!

राष्ट्रीय सहारा में टर्मिनेट किए गए कर्मचारियों को फोन पर किया संबोधित, डीएम को लिखा पत्र

सहारा मीडिया में हो रहे शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ समाज सुधारक और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश ने मोर्चा खोल दिया है। जहां उन्होंने नोएडा के सेक्टर 11 स्थित राष्ट्रीय सहारा के मेन गेट पर चल रहे बर्खास्त 25 कर्मचारियों के धरने को मोबाइल फोन से संबोधित किया, वहीं इस मामले को लेकर गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी को पत्र भी लिखा है। अपने संबोधन में उन्होंने कर्मचारियों को आश्वस्त किया कि उनके हक की लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक लड़ी जाएगी। 17 माह का बकाया वेतन रहते हुए कर्मचारियों की बर्खास्तगी को उन्होंने अपराध करार दिया।

सहारा के उत्पीड़न पर जिला प्रशासन की चुप्पी पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि नोएडा जैसे शहर में कोई संस्था इस हद तक कर्मचारियों का उत्पीड़न कर रही है और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। यह शर्मनाक है। स्वामी अग्निवेश ने जिलाधिकारी को लिखे पत्र में सहारा प्रबंधन के खिलाफ के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा है। साथ ही कार्रवाई की सूचना दिल्ली स्थित उनके कार्यालय को देने को लिखा है। उचित वेतन दिए बिना काम कराने को स्वामी अग्निवेश बंधुआ मजदूरी मानते हैं। सहारा मीडिया में तो 17 माह का बकाया वेतन दिए बिना कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया है। 22 कर्मचारी पहले निकाल दिए थे। बड़े स्तर पर दूर-दूराज क्षेत्रों में कर्मचारियों का स्थानांतरणर कर दिया जा रहा है वह भी बिना बकाया वेतन दिए बिना।

इस संस्था का गजब खेल है। एक ओर संस्था का चेयरमैन सुब्रत राय थिंक विंद मी पुस्तक लिखता है। देश को आदर्श और भारत को महान बनाने की बातें लिखकर अखबारों में विज्ञापन छपवाए जाते हैं। लखनऊ में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता उस कार्यक्रम में पहुंचते हैं। अपने को बड़ा देशभक्त बताने वाले बाबा रामदेव तो सुब्रत राय से मिलकर अपने को धन्य मानने लगे। जगजाहिर है कि यह संस्था अपने कर्मचारियों का किस हद तक शोषण और उत्पीड़न कर रही है। दबे-कुचले और किसान मजदूरों की लड़ाई लड़ने का दावे करने वाले किसी नेता ने कर्मचारियों के शोषण की बात उठाने की जहमत नहीं समझी।

बताया जाता है कि इस संस्था ने कारगिल के नाम पर 10 साल तक अपने कर्मचारियों के वेतन से 100-500 रुपए काटे। संस्था के चेयरमैन ने अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए ठग लिए। इस संस्था के खिलाफ यदि स्वामी अग्निवेश ने आवाज बुलंद की है तो निश्चित रूप से इस आवाज में और दिग्गजों की आवाज भी जुड़ेंगी और देशभक्ति के नाम पर समाज और देश को गुमराह करने वाले संस्था के चेयरमैन का चेहरा बेनकाब होगा।

ज्ञात हो कि स्वामी अग्निवेश लंबे समय से बंधुआ मजदूरों की लड़ाई लड़ते रहे हैं। किसी समय उन्होंने फरीदाबाद में पत्थर खदानों से 2000 के आसपास परिवारों को छुड़ाकर पुनर्वासित कराया था। पीआईएल भी स्वामी अग्निवेश की देन हैै। बताया जाता है कि इन खदान मजदूरों की समस्याओं से संबंधित एक पत्र स्वामी अग्निवेश ने सुप्रीम कोर्ट को पोस्ट कार्ड पर लिखा था, जिसे कोर्ट ने पीआईएल मानते हुए मजदूरों के पक्ष में अपना फैसला दिया था।

अक्सर देखा जाता है कि जब मीडिया में शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की बात आती है तो राजनीतिक व सामाजिक संगठन दूर भागने लगते हैं। ऐसे में स्वामी अग्निवेश ने राष्ट्रीय सहारा से निकाले गए कर्मचारियों के पक्ष में आवाज उठाकर उन लोगों के मुंह पर तमाचा मारा है जो बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं पर करते कुछ नहीं। खुद मीङिया दूसरों की आवाज तो उठाने की बात करता है पर मीडिया में शोषण और उत्पीड़न का जो खेल खेला जा रहा है उस पर न कुछ बोलने को तैयार है और न ही लिखने को। दैनिक, जागरण, राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों के कितने पत्रकार और कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड  की मांग करने और मीडिया में हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने पर बाहर कर दिए गए पर  मीडिया की ओर से कोई आवाज नहीं उठी। ऐसा नहीं है कि इलोक्ट्रिक मीडिया इससे खेल से वंचित है। यहां पर तो हालात और बुरे हैं।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा प्रमाण, यहां आगे बढ़ने का एकमात्र फार्मूला चरणवंदना और वरिष्ठों को अय्याशी कराना है!

सहारा के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच बैठाएं प्रधानमंत्री : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और स्वराज इंडिया पार्टी के नेता तथा सुप्रीम कोर्ट के प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण के बाद अब कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गुजरात के मुख्यमंत्री रहते सहारा समूह से रिश्वत लेने के आरोप लगाए हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष भले ही इसे राजनीतिक स्तर पर देख रहा हो पर मेरा मानना है कि हम लोग इस मामले को इस तरह से देखें कि एक संस्था की वजह से हमारे देश के प्रधानमंत्री का नाम बदनाम हो रहा है।

इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भले ही साम्प्रदायिक दंगों को लेकर तरह-तरह के आरोप लगते रहे हों पर उनकी ईमानदारी पर अभी तक कोई विरोधी भी आरोप नहीं लगा पाया था। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, हालात और उनकी राजनीतिक कार्यशैली भी उनकी ईमानदार छवि बखान कर रही है। हां, आयकर विभाग के छापे पड़े दो साल से ज्यादा बीत गए हैं। ऐसे में सहारा समूह के खिलाफ कार्रवाई न होना, कहीं न कहीं केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है। ऐसे में सहारा समूह और आयकर विभाग पर जरूर जांच बैठनी चाहिए। आयकर विभाग पर इसलिए क्योंकि दो साल पहले नोएडा कार्यालय में पड़े छापे में वहां से 134 करोड़ रुपए बरामद हुए थे। इस मामले में सहारा ग्रुप पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई। यदि प्रधानमंत्री को रिश्वत देने संबंधी दस्तावेज आयकर विभाग को सहारा समूह से बरामद हुए थे तो इस मामले पर जांच क्यों नहीं बैठाई गई।

सहारा समूह पर कोई कार्रवाई न होने से कहीं-कहीं प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर भी उंगली उठ रही है। इन आरोपों के बाद प्रधानमंत्री पर सहारा समूह के खिलाफ उच्चस्तरीय जांच कराने की और नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है। सहारा ग्रुप के खिलाफ जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसके सुप्रीमो सुब्रत राय देशभक्ति के आड़ में लम्बे समय से देश की भोली-भाली जनता को ठग रहे हैं। भेड़ की खाल में घूम रहे इस भेड़िये ने जनता के खून-पसीने की कमाई पर जमकर अय्याशी की और बड़े स्तर पर नेताओं व नौकरशाह को कराई है। देश में कालेधन के खिलाफ माहौल बन रहा है और जगजाहिर है कि सहारा हमारे देश का स्विस बैंक रहा है।

निवेशकों के हड़पे पैसे के बदले सहारा समूह जो पैसा सुप्रीम कोर्ट में जो पैसा जमा करा रहा उसका स्रोस भी पूछा जाना चाहिए। इस संस्था पर जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जब नोएडा से 134 करोड़ रुपए जब्त किए गए थे, उस समय सहाराकर्मियों को कई महीने से वेतन नहीं मिल रहा था तथा सहारा प्रबंधन संस्था के पास पैसा न होने का रोना रो रहा था। जांच इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि इस संस्था के चेयरमैन सुब्रत राय ने राजनीतिक दलों की पकड़ के चलते बनाए अपने रुतबे के बल पर देश में बड़े स्तर पर अनैतिक काम किए हैं। इस संस्थान में मालिकान और अधिकारी खूब अय्याशी करते हैं पर कर्मचारियों को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया है।

दिखावे को तो सुब्रत राय देशभक्ति का ढोल पीटते फिरते हैं पर जमीनी हकीकत यह है कि यहां पर कर्मचारियों का जमकर शोषण और उत्पीड़न किया जाता रहा है। लंबे समय से कर्मचारियों का प्रमोशन नहीं हुआ है।  12-16 महीने का वेतन बकाया है। जो कर्मचारी अपना हक मांगते हैं उन्हें या तो नौकरी से निकाल दिया जाता है या फिर कहीं दूर स्थानांतरण कर दिया जाता है। अपना बकाया वेतन व मजीठिया वेजबोर्ड मांग रहे 22 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया में मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं दिया जा रहा है। गत सालों में एग्जिट प्लॉन क तहत कितने कर्मचारियों की नौकरी तो ले ली पर हिसाब अभी तक नहीं किया गया। इन कर्मचारियों ने पूरी जवानी इस संस्था को दे दी और अब वे दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। यह संस्था अपने को बड़ा देशभक्त और भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत होना दिखाती है पर कर्मचारियों को नमस्ते, प्रणाम की जगह ‘सहारा प्रमाण’ करवा कर अपनी गुलामी कराती है। आगे बढ़ने का एकमात्र फार्मूला चरणवंदना और वरिष्ठों को अय्याशी कराना है।

देशभक्ति के नाम दिखावा तो बहुत किया जाता है पर सब अपने कर्मचारियों को ठग कर। 1999 में पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध में शहीद हुए हमारे सैनिकों के परिजनों की देखभाल के नाम पर संस्था ने अपने ही कर्मचारियों से 10 साल तक 100-200-500 रुपए तक वेतन से काटे। उस समय चेयरमैन ने यह बोला था कि दस साल पूरे होने पर यह पैसा ब्याज सहित वापस होगा पर किसी को कोई पैसा नहीं मिला। यह रकम अरबों-खरबों में बैठती है। इस मामले की उच्च स्तरीय जांच बैठाई की जाए तो पता चल जाएगा कि इस संस्था ने शहीदों की लाश पर ही अपने ही कर्मचारियों से अरबों-खरबों की उगाही कर ली।

गत साल चेयरमैन सुब्रत राय जब जेल गए तो अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से 10,000-100000 रुपए तक ठग लिए। जब हक की लड़ाई लड़ रहे कर्मचारियों में से एक प्रतिनिधिमंडल जेल में जाकर चेयरमैन से मिला तथा इस रकम के बारे में पूछा तो उन्होंने बड़ी ही बेशर्मी से यह कहा कि संस्था में किसी स्कीम में धन कम पड़ रहा था। इसलिए अपने ही कर्मचारियों से पैसा लेना पड़ा। यह पैसा कर्मचारियों ने ऐसे समय में दिया था जब कई महीने से उन्हें वेतन नहीं मिला था। किसी कर्मचारी ने अपनी पत्नी के जेवर बेच कर ये पैसे दिए तो किसी ने कर्जा लेकर। कर्मचारियों ने हर बार अपने चेयरमैन पर विश्वास किया और इस व्यक्ति ने हर बार उन्हें इमोशनल ब्लैकमेल करते हुए बस ठगा। लंबे समय तक वेतन न देकर  इस संस्था ने कितने कर्मचारियों के परिवार तबाह कर दिए। कितने बच्चों का जीवन बर्बाद कर दिया। कितने कर्मचारियों को मानसिक रूप से बीमार बना दिया।

देश का दुर्भाग्य है कि सब कुछ जानते हुए भी विभिन्न दलों के नेता इस संस्था के कार्यक्रमों में पहुंच जाते हैं। गत दिनों जब नोएडा के मेन गेट पर बड़ी तादाद में कर्मचारी जब अपना हक मांग रहे थे तो किसी दल के नेता का दिल नहीं पसीजा पर 18 दिसम्बर को लखनऊ में सहारा न्यूज नेटवर्क की ओर से थिंक विद मी, देश आदर्श बनाओ, भारत महान बनाओ कार्यक्रम किया गया तो विभिन्न दलों के नेता उस कार्यक्रम में पहुंचे और बड़ी-बड़ी बातें की। इस कार्यक्रम में लगभग सभी मुख्य दलों के नेता मौजूद थे। इनमें कांग्रेस उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष राजबब्बर और प्रभारी गुलाम नबी आजाद भी मुख्य रूप से उपस्थित थे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री पर सहारा समूह से रिश्वत लेने का आरोप लगा रहे हैं तो उन्हें यह भी समझना चाहिए कि यदि सहारा ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते उन्हें रिश्वत दी होगी तो कुछ गलत काम पर पर्दा डालने के लिए ही दी होगी। वैसे भी संस्था के चेयरमैन के जेल जाने के बाद सहारा के काले कारनामे जगजाहिर हो चुके हैं तो वह क्यों नहीं सहारा के कार्यक्रमों में जाने से अपने नेताओं को रोकते और क्यों नहीं सहारा के निवेशकों के पैसे हड़पने के केस को लड़ रहे अपने नेता कपिल सिब्बल को उनकी नैतिक जिम्मेदारी समझाते ?  यदि राजनीतिक दल वास्तव में देश में अब कुछ अच्छा करना चाहते हैं तो अपने दलों की छवि सुधारने के साथ ही उन कारपोरेट घरानों के खिलाफ मोर्चा खोलें उनके वजूद का इस्तेमाल करते हुए अपने काले कारनामों से जनता व देश को ठग रहे हैं।

CHARAN SINGH RAJPUT
charansraj12@gmail.com

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मोदी भी क्या सुब्रत राय के चंगुल में फंसे थे?

सहारा के चंगुल से कौन बड़ा राजनेता बचा है? कैश ही सहारा की सबसे बड़ी ताकत… मोदी भी क्या सुब्रत राय सहारा के चंगुल में फंसे थे? ये सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि देश भर के जब सारे चिटफंडियों जैसे रोजवैली की संपत्ति कुर्क की जा रही है, चिटफंड कंपनी के निदेशकों को जेल की सलाखों के पीछे डाला जा रहा है, निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक किसी भी चिटफंडियों को जमानत तक नहीं दे रहा है तो सहाराश्री आखिर किस तरह रियायत पाते जा रहे हैं.

सरकारी एजेंसियां सुप्रीम कोर्ट के सामने क्यों नहीं खुलासा कर रही हैं कि जेल के भीतर और अब बाहर आकर भी सुब्रत राय सहाराश्री कभी कोऑपरेटिव सोसायटी के नाम पर तो कभी बीमा बेचने के जरिए जनता से उगाही कर रहे हैं. आरोप है कि पैसों को गलत तरीके से एक कंपनी से दूसरे में ट्रांसफर किया जा रहा है. हर महीने करोड़ों रुपये घाटे सहकर भी सहारा मीडिया जिंदा रखा गया है. आखिर कैसे? अब तक किसी और कंपनी की बात होती तो रिसीवर नियुक्ति कर दिये गये होते. बिना राजनीतिक प्रभाव के इस तरह के मामलों की अनदेखी कर पाना किसी भी अधिकारी के लिए संभव नहीं होता. इसीलिए ये सवाल बार-बार उठ रहा है. 

सहारा से पैसे लेने के मामले में मोदी पर सबसे पहले हमला किया स्वराज इंडिया से जुड़े प्रशांत भूषण और इसके अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने. प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट तक में इस मामले की जांच के लिए अपील की है, तो राहुल गांधी और केजरीवाल जनता की अदालत में इस मामले में फैसला कराने पर तुले हैं. लेकिन मोदी ने सहारा कंपनी से मिले पैसे पर चुप्पी साध रखी है. धीरे-धीरे ये मामला गरमाता जा रहा है. प्रधानमंत्री चाहे तो इसका जवाब आम आदमी को दूरदर्शन के जरिए दे सकते हैं क्योंकि लोकतंत्र के मर्म में आम आदमी ही महत्वपूर्ण होता है. लेकिन अभी इसकी भी सुगबुगाहट नहीं है.

सहाराश्री ग्लैमर के साथ दबंगई के लिए भी जाने जाते हैं. सहारा मीडिया में कई पूर्व संपादकों से सहाराश्री की दंबगई के किस्से सुन सकते हैं. कैसे सहाराश्री के एक आदेश पर एक मिनट के अंदर प्रधान संपादक जलील होकर कैंपस से बाहर कर दिये गये, कैसे एक संपादक को गार्डों के जरिए बेइज्जत करके इस्तीफा लिया गया, कैसे सहाराश्री के स्वास्थ्य के बारे में गलत खबर देने के चलते एक संपादक की पिटाई की गई, कैसे एक संपादक के घर सहारा के गार्डों ने छापा मारा और उसकी संपत्ति की सहारियन तरीके (अवैध) से जांच की. दुनियादारी और बदनामी के चलते ये संपादक भी अपनी बेइज्जती कराकर चुप रहना ही बेहतर समझे.

सहाराश्री के दबंगई के साथ दरियादिली के भी किस्से आम हैं. यूपी के तमाम दलों के बड़े नेता खुलेआम स्वीकार करते हैं कि सहाराश्री के चलते ही आज बड़े नेता हैं. इनमें कांग्रेस के राजसभा सांसद प्रमोद तिवारी, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर, समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेता भी शामिल हैं. अटल जी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान तो यूपी के तमाम बीजेपी नेता अपनी सिफारिश सहाराश्री से करने की सिफारिश करते थे. बीएसपी के कई बाहुबली सांसद भी मायावती के नहीं पसंद करने के बावजूद सहाराश्री के यहां अपनी हाजिरी लगाकर चरणामृत ले आते थे.

चुनावों में कैश की खासी किल्लत रहती है. ऐसे में चिटफंडियों के अलावा अंबानी जैसा धन्नासेठ भी देश के कोने-कोने में कैश मुहैया कराने की हालत में नहीं होता है. इसी कारण से नेताओं ने चिटफंडियों को पालना-पोसना जारी रखा. जब हालात बिगड़ते तो नेता चिटफंडियों से पल्ला झाड़ लेते. लेन-देन में कोई लिखा-पढ़ी तो होती नहीं है. ये स्थिति नेताओं के साथ चिटफंडियों को भी खूब रास आती है. कई नेताओं की अवैध कमाई का हिस्सा इन चिटफंडियों के यहां रहता है. जहां देना होता है, चिटफंडिये अपनी शाखाओं के जरिए पहुंचा देते हैं. कई मौके पर जब नेता स्वर्ग पहुंच जाते हैं तो चिटफंडिये नेता का सारा पैसा दबा जाते हैं. इसके उदाहरणों में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह का नाम सबसे ऊपर आता है. इसी कारण से मोदी पर भी सवाल उठना लाजिमी है.

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें :

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सहारा पर मोदी की चुप्पी देशद्रोह! भड़ास के सवालों पर भी मौन है मोदी सरकार

राहुल गांधी ने सहारा पर मोदी से अपने सवालों का सीधा जवाब मांगा. भड़ास ने तो सबसे पहले यह सवाल उठाया था कि आखिर क्यों जब सारे चिटफंडिये जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं तो सहारा और एक-दो चिटफंडियों पर रियायत क्यों? गरीबों के मसीहा बने मोदी सरकार क्यों इस मामले में दरियादिली दिखा रहे हैं. जबकि सहारा मीडिया कर्मचारी भी अपनी सैलरी के लिए सहाराश्री की पोल खोलते हुए सत्ता के तमाम दरवाजों को खटखटा चुके हैं.

अब राहुल गांधी ने फिर पूछा कि प्रधानमंत्री साफ करें कि सहारा से उन्होंने पैसे लिए या नहीं. प्रधानमंत्री को अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए. भड़ास का स्टैंड राहुल गांधी से थोड़ा अलग है. हम प्रधानमंत्री जी से पूछना चाहते हैं कि अदालतों को दोष देने से पहले बतायें कि किन प्रशासनिक विफलताओं की वजह से…

-चिटफंडियों के मसीहा समझे जाने वाले सहाराश्री जेल से बाहर कैसे आये?

-सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जो पैसा सहारा कंपनी सेबी में जमा करा रही है वो पूंजी कहां से आ रहा है. कहीं गरीबों से फिर से वसूली जा रही रकम ही तो नहीं है.

-मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं के जरिए सहारा के ऑफिसों को क्यों पूरे देश में पैसे वसूलने की आजादी मिली है, जिसके कारण सही मायने में संचालित कोऑपरेटिव संस्थायें भी आने वाले समय में बदनाम होंगी.

-सहारा ग्रुप के ऑफिसों से ही मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं को संचालित किया जा रहा है, सूत्र बताते हैं कि इन संस्थाओं से सहाराश्री ने लिखित रुप से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखा है.

-कृषि मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं के जिम्मेदार पदों पर सुब्रत राय सहाराश्री ने अपनी कठपुतलियों को बैठाया है. कार्रवाई किसके दबाव में रूकी है?

-किस कारण सहाराश्री परिवार का अब एक भी सदस्य सहारा इंडिया परिवार का किसी भी अहम पद पर नहीं है, जबकि अच्छे दिनों में बेटा-बहु से लेकर भाई-भतीजा तक सहारा कर्तव्ययोगियों की सलामी (सहारा प्रणाम) लेते रहे हैं और आज भी लेते हैं.

-सहारा जिन मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं और बीमा कंपनी के जरिए पूंजी जुटा रही है, आखिर उस पूंजी के लेन-देन की दैनिक निगरानी क्यों नहीं की जा रही है जबकि सहाराश्री की गतिविधियां संदिग्धता के दायरे में आ चुकी हैं.

क्या मोदी सरकार उस समय जागेगी, जब गरीब जनता अपने पैसों के लिए फांसी पर झूलने के लिए मजबूर होने लगेगी और फांसी के लिए रस्सी कम पड़ना शुरू हो जायेगी. दबाव बनाने और बेजा फायदे के लिए मीडिया कंपनी खोले सुब्रत राय सहाराश्री की मनमानी के चलते ही सहारा मीडिया भारी घाटे में रीढ़हीन और पंगु दिखती है. सहारा मीडिया के कर्मचारी आज भी अपने एक साल से ज्यादा की सैलरी के लिए सहाराश्री की कृपा की बाट जोह रहे हैं. लेकिन सहाराश्री की मुख्य चिंता बकाये सैलरी से ज्यादा ग्लैमरस पार्टी में होती है.

भड़ास4मीडिया केवल इतना चाहता कि मोदी सरकार स्वीकार करे कि सहाराश्री को मिल रही रियायत के लिए अदालतों से ज्यादा उनकी प्रशासनिक नाकामयाबी है. देश की अस्मिता से जुड़ा सवाल है कि क्या ये फायदे सुब्रत राय सहाराश्री को मोदी सरकार ने लोकसभा चुनावों में पूंजी उपलब्ध कराने के एवज में दी है? अगर ऐसा है तो ये देशद्रोह है. अब बारी मोदी जी की है, तो मोदी जी… बोलिए, देश सुन रहा है…

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सहारा समूह ने छह महीने में नौ बार दिए नरेंद्र मोदी को करोड़ों रुपये : राहुल गांधी

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आखिरकार बम फोड़ ही दिया. उन्होंने आज मेहसाणा (गुजरात) में आयोजित एक रैली में कहा कि सहारा समूह पर पड़े छापे के बाद छह महीने में सहारा समूह के लोगों ने नरेंद्र मोदी को नौ बार करोड़ों रुपए दिए. मोदी को सहारा के बाद बिड़ला ग्रुप के लोगों ने भी पैसे दिए. इसकी पूरी जानकारी तारीख-दर-तारीख और विस्तार से मौजूद है.

6 mahine mein 9 baar Sahara ke logon ne apni diary mein likha hai ki humne Narendra Modi ji ko paisa diya hai. The records are with IT Dept for last 2 and half years yet no action has been taken. An independent enquiry must be initiated. IT Department raided Sahara Company on 22 Nov, 2014. As per record with IT, Rs 2.5 cr was given to PM Modi on 30 Oct ’13; Rs 5cr on 12 Nov ’13; Rs 2.5 cr on 27 Nov ’13; Rs 5cr on 29 Nov ’13 : Rahul Gandhi

राहुल के इस सनसनीखेज आरोप से हड़कंप मच गया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आज आखिर उस आरोप का खुलासा कर ही दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है. मेहसाणा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है. राहुल ने कहा कि पीएम मोदी ने गुजरात का सीएम रहने के दौरान सहारा कंपनी से 6 महीने में 9 बार पैसे लिए थे. आईटी के छापे में इसका खुलासा हुआ था. उन्होंने बकायदा रैली के मंच से चिट लहराते हुए ये आरोप लगाया.

राहुल ने कहा कि 2013 में पड़े आईटी के छापे के बाद सामने आया कि सहारा ने नरेंद्र मोदी को पैसा दिया. सहारा के लोगों ने अपनी डायरी में लिखा है कि हमने 6 महीने में 9 बार नरेंद्र मोदी जी को पैसा दिया है. आपने मुझे संसद में बोलने नहीं दिया. आप मेरे सामने खड़े होने को तैयार नहीं थे. पता नहीं क्या कारण था? कोई बिजनेस चलाता है तो वो उसका रिकॉर्ड रखता है. किसको कितने पैसे दिए कितने लिए. 22 नवंबर 2014 को सहारा पर रेड हुई. सहारा के रिकॉर्ड में जो लिखा था वो बताता हूं.

30 अक्टूबर 2013 को ढाई करोड़ मोदी जी को दिया गया. 12 नवंबर 5 करोड़ दिया गया. 29 नवंबर को 5 करोड़ लिखा था. 6 दिसंबर को 5 करोड़ दिया गया. 19 दिसंबर को 5 करोड़ दिया गया. 14 जनवरी 2104 को 5 करोड़. 28 जनवरी को 5 करोड़. 22 फरवरी को 5 करोड़ दिए गए.

राहुल ने कहा कि छह महीने में 9 बार सहारा ने मोदी जी को पैसा दिया है. ये जानकारी ढाई साल से आयकर के पास है. इस पर जांच होनी चाहिए. इस पर जांच क्यों नहीं हुई? ये सच है या झूठ, देश को बताइए मोदी जी. आपने पूरे देश को लाइन में रखा, उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाया. अब मैं देश की ओर से पूछ रहा हूं जो ये इनफार्मेशन इनकम टैक्स के पास है, क्या यह सच है और इसमें जांच कब होगी? ऐसा ही एक रिकॉर्ड बिरला कंपनी का है. मोदीजी आप प्रधानमंत्री हैं, आपके ऊपर सवाल उठाए जा रहे हैं अब आप देश को बताओ कि यह सच है कि नहीं? आप एक निष्पक्ष जांच इस मामले में कराइए. बिरला का भी रिकॉर्ड है. आप पीएम हैं, आप पर सवाल है. आयकर के साइन हैं. आप खुद बताइए कि यह सच है या नहीं?

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सुब्रत राय ये पैसा अपने पास से दे रहे हैं या गरीबों से वसूली गयी रकम से?

चिटफंडिये, मीडिया और मोदी सरकार, जवाबदेही किसकी…. : देश के गरीबों का पैसा मारने वाले चिटफंडियों के मसीहा बन चुके सुब्रत राय सहाराश्री जेल के बाहर हैं. रिहाई के बदले सहाराश्री से सुप्रीम कोर्ट सैकड़ों करोड़ जमा कराते जा रही है. बड़ा सवाल है कि ये पैसा क्या सुब्रत राय सहाराश्री अपने पास से दे रहे हैं या फिर गरीबों से ही नये तरीके से वसूली जा रही रकम में से ही एक हिस्सा जमा कराई जा रही है. बेल पर बाहर सहाराश्री फिर से अपना जाल बिछाने में लग गये हैं. जिसके लिए कई राज्यों की राजधानी में ग्लैमर शो आयोजित किये जा रहे हैं. नेताओं और अधिकारियों को इसमें मेहमान बनाया जा रहा है. खुलेआम ये खेल उस मोदी सरकार के नाक के नीचे चल रहा है, जो दावा करती है कि ना खायेंगे ना खाने देंगे. मोदी सरकार अदालतों को दोषी ठहरा कर पल्ला नहीं झाड़ सकती क्योंकि निचली से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की अदालतें चिटफंडियों को अब जमानत पर रिहा नहीं होने देती हैं.

चिटफंडिये गरीबों का पैसा सीधे अंदर करने के लिए सरकारी पॉलिसी की खामी, सत्ता और प्रशासन के घटिया चरित्र का फायदा उठाते हैं. उदाहरण के लिए अपने कामकाज के पाक-साफ बताने के लिए कुछ सालों से चिटफंडिये कोऑपरेटिव सोसायटी के तहत रजिस्ट्रेशन कराकर, चंद कागजी खानापूर्ति के जरिए देश के दूर-दराज के अंचलों में गरीबों से अरबों-खरबों की वसूली कर रहे हैं. शिकायत होने पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं हो पाती है क्योंकि कोऑपरेटिव सोसायटी का रजिस्ट्रेशन कृषि मंत्रालय में होता है. घपले होने की शिकायत पर कृषि मंत्रालय सीमित कार्रवाई ही कर सकती है, जिसके चलते चिटफंडिये बेखौफ हैं. कृषि मंत्रालय के अधिकारी भी सबकुछ जानते हुए भी सहारा जैसी कंपनियों के दोहन पर कोई सख्त कदम नहीं उठा रहा हैं. जो अलग-अलग नामों से कार्यरत है. जिसके कारण सत्ताधीशों पर भी सवाल खड़े होते हैं.

स्थानीय स्तर पर कार्रवाई और दबावों से बचने के लिए चिटपंडिये लंबे समय से मीडिया में भी पैसा लगा लगा रहे हैं, जिसकी कायदे से शुरुआत सुब्रत राय सहाराश्री ने की. यानि जो पत्रकार ऐसे चिटफंडियों को बेनकाब करता अब ऐसी कंपनियों का कर्मचारी बन गया. सही गलत दलील देकर अपने पेट पालने वाली सैलरी को बचाने की जुगाड़ में लग गया. चिटफंडियों ने पत्रकारों को तनख्वाह की लालच देकर पीत पत्रकारिता को बढ़ावा दिया. सत्ताधारी भी कुंद होती जा रही पत्रकारिता में ऐसे चिटफंडियों को जमकर सपोर्ट किया. इन चिटफंडियों के कार्यक्रमों में हिस्सा बने. गरीब को लूटने वाले केवल सुब्रत राय सहारा ही नहीं, वो राजनेता भी कसूरवार हैं जो इन चिटफंडियों के जरिए चुनावों में अरबों रूपये कैश में पाते हैं और पानी की तरह बहाते हैं.

कानूनी दांवपेंचों और खामियों का सहारा लेकर चिटफंडिये गरीब आदमी के पैसों का दोहन करने के लिए कई रास्तों का सहारा लेते हैं. इनके निशाने पर हमेशा गरीब आदमी ही होता है, जो अपने खून-पसीने की कमाई के चंद हजार रूपयों को वापस पाने के लिए कोर्ट-कचहरी तक नहीं पहुंच पाता. चिटफंडिये देश भर में एजेंटों का जाल बिछाकर लाखों-करोड़ों गरीबों से पैसे एजेंटों के माध्यम से लूटते रहते हैं. एजेंट भी स्थानीय निवासी होते हैं, जो कुछ हजार की सैलरी की लालच में अपने करीबी लोगों को बहकाकर पैसा जमा कराते रहते हैं.

2014 तक चली केंद्र की कांग्रेस सरकार को इस बात का श्रेय देना होगा कि उसने सभी बड़े चिटफंडियों को सलाखों के पीछे भेजकर इस तरह के धंधे पर लगाम कस दी थी. लेकिन चिटफंडियों के सरताज की रिहाई के लिए किसी हद तक मोदी सरकार की अबतक की अनदेखी जिम्मेदार है. चिटफंडियों ने गरीबों के दोहन के लिए नये-नये तरीकों को ईजाद कर लिया है. कानूनी एजेंसियां और सरकार भी चिटफंडियों के वसूली के नये-नये तरीकों को बखूबी जानती है. लेकिन कार्रवाई तब होती है जब पानी नाक के ऊपर जाने लगता है. तो सुनो सरकार जी! पानी अब नाक के ऊपर आ गया है.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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ये सहारा वाले कब से देशभक्त हो गए!

सहाराकर्मी इस ढकोसले का विरोध करें : सहारा का नाम सामने आते ही संस्था के चेयरमैन सुब्रत राय का चेहरा सामने आने लगता है। यह वह शख्स है जिसने जनता, बॉलीवुड, विधायिका, कार्यपालिका, मीडिया सबको छकाया और अब न्यायपालिका का बेवकूफ बनाने चला था कि आ गया गिरफ्त में। लंबे समय तक जेल में रहने के बाद अपनी मां के निधन पर पैरोल पर बाहर आया हुआ है। जनता से ठगे पैसे वसूलने के लिए सुप्रीम कोर्ट थोड़ी बहुत राहत भी दे रहा है। अगले माह फिर से 600 करोड़ रुपए देने हैं नहीं तो फिर से जेल जाना पड़ेगा। इतना सब कुछ होने पर यह शख्स अपनी ऐबदारी से बाज नहीं आया। जिन कर्मचारियों ने इसकी तानाशाही का विरोध कर अपना हक मांगा, उन्हें या तो नौकरी से निकाल दिया या फिर हतोत्साहित करने के लिए कहीं-दूर स्थानांतरण करवा दिया।

आजकल राष्ट्रीय सहारा में एक विज्ञापन आ रहा है कि सहारा न्यूज नेटवर्क की ओर से 18 दिसम्बर को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ‘थिंक विद मी समिट-आदर्श बने देश, महान बने भारत’ कार्यक्रम होने जा रहा है। सुना है कि इसी दिन संस्था के चेयरमैन सुब्रत राय भी नोएडा परिसर में किसी पुस्तक का विमोचन करने जा रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जिस संस्था में अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण और उत्पीड़न किया जा रहा हो। लंबे समय से कर्मचारियों प्रमोशन न हुआ हो। 10-16 महीने का वेतन बकाया है। काफी साथियों को वेतन देना बंद कर दिया हो। हक मांग रहे 22 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया हो। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया में मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं दिया जा रहा हो। उस संस्था को कैसे देशभक्त कह सकते हैं।

यह वह संस्था है जिसमें संस्था का मुखिया अपने कर्मचारियों को खुद बगावत करने के लिए उकसाता है और खुद ही बागियों को कुचलता है। यह वह संस्था है जिसमें मालिकान और अधिकारी अय्याशी करते हैं और कर्मचारियों को भुखमरी के लिए मजबूर कर किया जाता रहा है। यह वह संस्था जिसमें बड़े छोटों से कुर्बानी मांगते हैं।  यह संस्था अपने को बड़ा देशभक्त और भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत होना दिखाती है पर कर्मचारियों को नमस्ते, प्रणाम की जगह सहारा प्रमाण करवा कर अपनी गुलामी कराती है। आगे बढ़ने का एकमात्र फार्मूला चरणवंदना और वरिष्ठों को अय्याशी कराना है। देशभक्ति के नाम दिखावा तो बहुत किया जाता है पर सब कुछ अपने कर्मचारियों को ठग कर।

1999 में पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध में शहीद हुए हमारे सैनिकों के परिजनों की देखभाल के नाम पर संस्था ने अपने ही कर्मचारियों से 10 साल तक 100  – 200  – 500 रुपए प्रति माह तक वेतन से काटे। यह रकम सहारा कर्मचारियों के हिसाब से अरबो-खरबों में बैठती है। सहारा जब किसी को देता है कितना गुना प्रचार-प्रसार करता है। केन्द्र सरकार यह जांच कराये कि सहारा ने कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिजनों को कितना पैसा दिया तो मामला सामने आ जायेगा। इस संस्था ने शहीदों की लाश पर भी अपने ही कर्मचारियों से उगाही कर ली। उस समय चेयरमैन ने यह बोला था कि दस साल पूरे होने पर यह पैसा ब्याज सहित वापस होगा पर किसी को कोई पैसा नहीं मिला।

गत साल जब चेयरमैन जेल गया तो अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से 10,000 रुपए से लेकर 10,0000 रुपए तक ठग लिए। जब हम लोगों ने जेल में जाकर इस रकम के बारे में पूछा तो चैयरमैन ने बड़ी ही बेशर्मी से यह कहा कि संस्था में किसी स्कीम में धन कम पड़ रहा था, इसलिए अपने ही कर्मचारियों से पैसा लेना पड़ा। यह पैसा कर्मचारियों ने तब दिया था जब कई महीने से कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला था। किसी ने अपनी पत्नी के जेवर बेच कर यह पैसे दिए तो किसी ने कर्जा लेकर।

हर बार कर्मचारियों ने इस व्यक्ति पर विश्वास किया और इस व्यक्ति ने हर बार कर्मचारियों को ठगा। हां देश के छल-कपट करने वाले मक्कार लोग संस्था में अधिकारी बना रखे हैं, जो सोचते हैं कि वे अमर हैं। इस संस्था ने कितने परिवार तबाह कर दिए। कितने बच्चों का जीवन बर्बाद कर दिया। कितने कर्मचारियों को मानसिक रूप से बीमार बना दिया। कितने लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया। यह संस्था देश को आदर्श और भारत को महान बनाने चली है।

सोचने की बात तो यह है कि सब कुछ जानते हुए भी विभिन्न दलों के नेता इस संस्था के कार्यक्रमों में पहुंच जाते हैं क्यों? गत दिनों राष्ट्रीय सहारा नोएडा के मेन गेट पर बड़ी तादाद में कर्मचारी अपना हक मांग रहे थे तो किसी भी दल के नेता का दिल नहीं पसीजा। जो संस्था अपने उन कर्मचारियों की न हो पाई, जिनके पर बल 2000 रुपए की पूंजी से दो लाख करोड़ की पूंजी तक पहुंच गई। वह संस्था देश की क्या होगी ? जो संस्था अपने को आदर्श न बना सकी। महान न बना सकी। वह देश को क्या आदर्श बनाएगी ?  क्या भारत को महान बनाएगी? मेरी सहारा पीड़ित कर्मचारियों तथा निवेशकों और देशभक्त जनता से अपील है कि 18 दिसम्बर को देशभक्ति के नाम हो रहे इस ढकोसले का जमकर विरोध करें।

आपका अपना
चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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मां के मरने की खुशी मना रहे हैं सुब्रत रॉय! (देखें तस्वीरें)

Celebrations of parole on Mother’s supposed natural death…

How cruel.

Plz see these pics and guess whether he is in remorse or Happy that mother’s death got him Parole…

Point to ponder

Also got his brother in law out ( Ashok Roy Chowdhury) with him while old employee Ravi Shankar Dubey ( ED-Accounts) us still lurching behind bars without any consideration when and how he wud see the outside sunshine.

Regds
EX-EMPLOYEE
(harassed & still without any full and final/pf/gratuity payment recd even after 7 months)

CORPORATE HR
LUCKNOW

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सहारा के कर्मचारी अपने मालिकों के सब कुछ समेटने, बांधने और भागने की योजनाओं के क़िस्से सुनते-सुनाते दिन काट रहे हैं!

(अनिल यादव, वरिष्ठ पत्रकार)

अपने चढ़ते दिनों में नई योजनाएं शुरू करते वक़्त सहारा इंडिया के संस्थापक चेयरमैन सुब्रत रॉय सहारा की टाइमिंग अचूक हुआ करती थी. लेकिन कामयाबी के नुस्ख़े बताने वाली अपनी ताज़ा किताब “लाइफ़ मंत्रा” के मामले में वक़्त का ख़्याल नहीं रखा गया है. हताशा में इस तथ्य की भी परवाह नहीं की गई है कि उस किताब से कौन प्रेरित होना चाहेगा, जिसका लेखक ग़रीब निवेशकों से धोखाधड़ी के आरोपों में दो साल से जेल में है?. ज़मानत की बड़ी रक़म का इंतज़ाम करने में हलकान कंपनी में कर्मचारियों को वेतन के लाले पड़े हुए हैं. हमेशा विश्वस्त समझे जाने वाले व्यापारिक साझेदार और राजनेता पल्ला झाड़ चुके हैं. ऐसे में किताब की जानकारी रखने वाले साधारण पाठकों के मुंह से “ख़ुद मियां फ़ज़ीहत, औरों को नसीहत” कहावत सुनाई दे रही है.

लखनऊ में हर कोई सुब्रत रॉय को जानता है क्योंकि वे कभी खुली गाड़ी में अपने वक़्त के सबसे बड़े फ़िल्मी सितारों के साथ हज़रतगंज में शॉपिंग किया करते थे. उनके पारिवारिक आयोजनों में प्रधानमंत्री आया करते थे. इसके अलावा 370 एकड़ का सहारा शहर किवदंती था, जहां शपथ लेने के बाद यूपी की सरकार नाश्ता करने जाया करती थी. अब सहारा शहर के उपेक्षित बग़ीचों में लंबी घास उग आई है, जहां जानवर चरते दिखते हैं. व्यवस्था की जगह अनिश्चित भविष्य की आशंकाएं हैं, डेढ़ साल से कर्मचारी कामचलाऊ एडवांस पर काम कर रहे हैं. यह एडवांस भी कई महीने बाद मिलता है.

कर्मचारी कंपनी के मालिकों के सब कुछ समेटने, बांधने और भागने की योजनाओं के क़िस्से सुनते-सुनाते दिन काटते हैं. उनकी सुरक्षा के लिहाज़ से यहां यह सब लिखना ठीक नहीं होगा. सुब्रत रॉय सहारा के क़रीबी लोगों और कर्मचारियों में एक राय है कि उनका पतन सिर्फ़ अहंकार के कारण हुआ है. जब सिक्योरिटीज़ एंज एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (सेबी) और अदालत से निर्देश आते थे, वे अख़बारों में लाखों के विज्ञापन देकर बताया करते थे कि उन्हें क़ानून न सिखाया जाए, यह कि उन्हें बेवजह प्रताड़ित किया जा रहा है जबकि वे कट्टर देशभक्त हैं. मुक़दमा जब निर्णायक दौर में पहुंच गया तब भी वे बहाने कर अदालत में हाज़िर होने से बचते रहे. कई मौक़ों पर उन्होंने ऑन रिकार्ड कहा कि वे ख़ुद जजों को बहस में हरा सकते हैं. इन सब वजहों से अपनी साख बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए मजबूर हो गया.

जिन दिनों मुसीबत की शुरूआत हो रही थी, मुझे सुब्रत रॉय सहारा का एक लंबा इंटरव्यू करने का मौक़ा मिला था. मेरे लिए यह दुर्लभ मौक़ा था. मैं उनकी जीवनी लिखना चाहता था. सुब्रत रॉय ऐसे विलक्षण आदमी थे जिन्होंने लोकतंत्र और क़ानून के सुराख़ों से गुज़रने वाली व्यावहारिक सच्चाइयों के सहारे विशाल आर्थिक साम्राज्य ही नहीं खड़ा किया, वरन राष्ट्रवाद, देशभक्ति और परोपकार की छौंक लगाकर उसके चारों ओर एक नैतिक आभामंडल भी गढ़ने में कामयाब थे. सब कुछ जानने के बावजूद देश का सबसे बड़ा अर्थशास्त्री भी उनकी कामयाबी का राज़ लिखकर नहीं बता सकता.

साल 2005 में बहुत दिनों तक किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं दिखे. अफ़वाह उड़ी कि वे एड्स से मर गए, उनकी डमी से काम चलाया जा रहा है. इसका नतीजा यह हुआ कि निवेशक अपना पैसा वापस मांगने लगे, कुछ कलेक्शन सेंटरों पर पथराव हुआ था. उन्होंने अपनी मौजूदगी और कंपनी पर नियंत्रण का सबूत देने के लिए एक पूरे दिन का फ़ोटो सेशन रखा था. वे इसमें योग करते, गोल्फ़ खेलते और दौड़ते हुए दिखाए गए थे. सुब्रत रॉय ने यह इंटरव्यू प्रायोजित किया था. वह इंटरव्यू कभी नहीं छपा, क्योंकि कंपनी के क़ाबिल अफ़सरों ने उसे कई दिनों तक पढ़ा और आख़िरकार विज्ञापनों की ताज़ा खेप के साथ अख़बार में छापने के लिए एक नया इंटरव्यू थमा दिया.

सहारा शहर के उनके ड्राइंग रूम में 66 लाख के जगमग, डेढ़ टन के विदेशी झूमर के नीचे, फिरकी बनी सुंदर सेक्रेटरियों के बीच मुलाक़ात निराशाजनक थी, क्योंकि वे जीवनी लिखने का बयाना किसी और को दे चुके थे. उन्होंने ठहाका लगाते हुए पहली बात कही, “हिंदुस्तान में तो मेरा रामनाम सत्य ही कर दिया गया था, एचआईवी का भी टेस्ट करा लिया है, कुछ नहीं निकला.”

वे मुक़दमेबाज़ी और कंपनी की माली हालत पर छपी ख़बरों से ख़ासा ख़फ़ा थे. उन्होंने कहा, “आज इतनी मीडिया कंपनियां हो गई हैं कि सिर्फ़ साक्षर लोगों को पकड़ कर काम चलाना पड़ रहा है. इसलिए ऐसी गप्पें छपती हैं.” सुब्रत रॉय ने इसके बाद विस्तार से बताया कि उनकी सेहत रोज़ 20 घंटे काम करने से बिगड़ गई थी, सुबह चार-पांच बजे से पहले नहीं सो पाते थे. समय की इतनी कमी है कि झल्लाकर घड़ी तोड़ देने का जी करता है. लेकिन अब उन्होंने ज़िंदगी में पहली बार पूरी तरह फ़िट होने की ठान ली है. साल 1988 से बेलगाम ब्लड प्रेशर योग से क़ाबू में आ गया है, वज़न 101 किलो से घटाकर 87 कर लिया है जिसे 82 तक लाना है, नब्बे प्रतिशत से अधिक शाकाहारी हो गए हैं, शराब बिल्कुल छोड़ दी है, खाने के शौक़ और समय की कमी के घालमेल के कारण ज़्यादा खा जाते थे. लेकिन अब पेट को पहले से काफ़ी छोटा कर लिया है.

वे कह तो यह रहे थे कि बेटे बड़े हो गए हैं और वे संन्यास लेकर हिमालय जा सकते हैं. लेकिन साथ ही वे 2 लाख करोड़ की अनुमानित लागत वाले 25 नई परियोजनाओं का ब्यौरा देते हुए दूसरी पारी खेलने के मूड में लग रहे थे. वे सुंदरवन को अमीर पर्यटकों का स्वर्ग बनाना चाहते थे और प्रवासी भारतीयों के यहां छूट गए मां-बाप के लिए एक केयर सर्विस लॉन्च करने वाले थे. सहारा एयरलाइन्स की नाकामी पर उन्होंने कहा, हमने सरकार से कहा, “हमको जमाई बोलो, टांग खिंचाई मत करो, भारत को एविएशन में अग्रणी बना देंगे. लेकिन राजनेताओं में जिगरा नहीं है, वे दृढ़ निश्चय से कुछ नहीं कर पाते.”

उनकी कई परियोजनाओं से पर्यावरण को ख़तरा बताया गया था, लिहाज़ा वे पर्यावरणविदों से भी ख़फ़ा थे. उन्होंने कहा, “पर्यावरण के लिए चिल्लाने वालों को बाहर से पैसा मिलता है. वे अपनी दुकान चलाने के लिए कुछ भी लिख सकते हैं, उन्हें तो फांसी पर लटका देना चाहिए.” बीच बीच में उन्हें अपने जगज़ाहिर वफ़ादार दोस्तों की याद आती रही. वे बताते रहे कि कैसे रवीना टंडन ने सहारा ग्रुप में आने के लिए पिछली कंपनी से इस्तीफ़ा दे दिया था. शाहरुख़ ख़ान का पैर टूटने पर उन्हें सारी व्यस्तताओं के बीच इलाज के लिए लंदन से डा. अली को भेजना याद रहा. अफ़सोस कि अमर सिंह के बच्चों के मुंडन में नहीं जा पाये. एक जगह जाता तो हर ऐसे आयोजन में जाना पड़ता, जिसके लिए समय नहीं है.

तीन घंटे के इंटरव्यू और डिनर के बीच मैंने अचानक देखा कि वे एक खंभे से टेक लगाए बांग्ला में कुछ अंसबद्ध सा बड़बड़ा रहे हैं. मैंने क़रीब जाकर कहा, कुछ अपने बारे में बताइए. उन्होंने जो कहा, वह संसार का आठवां आश्चर्य था. पहले तो यक़ीन ही नहीं हुआ. लेकिन वे कह रहे थे- “इतना ग्लैमर हर कोई नहीं झेल सकता. कोई बिज़नेस प्रतिद्वंदी नहीं है. मैंने लड़कों से कहा है कि ऐसा काम करो कि राइवल नहीं, फ़ॉलोअर पैदा हों. हम लोग थोड़ा अक्खड़पन, क्वालिटी और क्लास मेन्टेन करते हैं.”

उन्होंने इसके आगे कहा, “मैं पॉलिटेक्निक कॉलेज के होस्टल में था तो मेरे पास चार कारें थीं. घर में टाटा बिड़ला डिनर पर आते थे. पिताजी को अगर डोंगे में एक क्रैक दिख जाए तो पूरा डिनर सेट तोड़ देते थे.”

मुझे अचानक संतोष हुआ कि अच्छा हुआ उनकी जीवनी कोई और लिखेगा. उन्हें इतनी भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं कि वास्तविकता ही भूल गए हैं, उन्होंने एक नया अतीत भी बना डाला है. सभी जानते हैं कि गोरखपुर में सहारा की शुरूआत एक मेज़, एक लम्ब्रेटा स्कूटर और दो हज़ार की पूंजी से हुई थी. इस किवदंती पर यक़ीन दिलाने के लिए कंपनी ने वह स्कूटर और मेज़ आज तक एक शो केस में सजा रखी है.

लेखक अनिल यादव वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा बीबीसी हिंदी डॉटकॉम में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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सुब्रत राय जेल में प्रसन्न, सहारा मीडिया कर्मी जेल के बाहर भीषण सेलरी संकट से खिन्न

क्या कांट्रास्ट है. जो जेल में है वो प्रसन्न है. जो आजाद है वह खिन्न है. यह तीसरा महीना चल रहा है सहारा मीडिया में बिना सेलरी काम कराए जाने का. सुब्रत राय तिहाड़ जेल में दबा कर किताबें लिख रहे हैं, बाहर अखबारों में करोड़ों अरबों का विज्ञापन अपनी किताब से संबंधित छपवा रहे हैं और कह रहे हैं कि उनके पास अपने कर्मियों को देने के लिए पैसे नहीं हैं. सुब्रत राय खुद को रिहा कराने के लिए होटल जमीन सब बेचने का प्रस्ताव कोर्ट के सामने कर रहे हैं लेकिन अपने कर्मियों को सेलरी देने के नाम पर चुप्पी साधे हैं.

ज्ञात हो कि सेलरी संकट पहले भी सहारा मीडिया में था लेकिन तब सहारा कर्मियों ने मोर्चा बनाकर, एकजुट होकर हड़ताल आदि का सहारा लेकर प्रबंधन पर घनघोर दबाव बनाया जिसके परिणामस्वरूप सहारा मीडिया के वरिष्ठों को हटाकर कमान उपेंद्र राय को दे दी गई. तब लोगों में भरोसा जगा कि अब सब बेहतर होगा. उपेंद्र राय ने शुरुआत में एक महीने की सेलरी देकर और सेल्फ एक्जिट पालिसी बनाकर यह संकेत दे दिया कि वह सहारा मीडिया में अब सेलरी का संकट नहीं आने देंगे. पर वक्त बीतने के साथ उपेंद्र राय अपनी सीमाओं में सिमटते गए. असल में उपेंद्र राय या कोई भी तभी सेलरी दे पाएगा जब सुब्रत राय सेलरी देने के लिए बोलेंगे. उन्हें दिख रहा है कि बिना सेलरी भी लोग काम कर रहे हैं इसलिए वह खुद के जेल में होने के नाम पर अपने कर्मियों पर इमोशनल अत्याचार करते हुए उनके पेट पर लात मार रहे हैं.

सहारा मीडिया के सैकड़ों कर्मियों ने भड़ास को फोन और मेल कर के अंदरखाने की जानकारी दी. नोएडा से लेकर लखनऊ, कानपुर, पटना, मुंबई हर जगह सहारा मीडिया कर्मी बेहद उदास और निराश हैं. किसी के बच्चे की फीस नहीं जमा तो किसी ने मकान का किराया नहीं भरा. रोज उम्मीद के साथ आफिस आते हैं और बेहद निराशा में भरकर वापस लौटते हैं. इन हालात में सहारा मीडिया में फिर से एक बार हड़ताल की संभावनाएं बनती नजर आ रही हैं. तिल तिल कर मरने से अच्छा है कि अपने हक के लिए लड़ कर मरो. पिछले दफे जब सहारा मीडिया में जोरदार हड़ताल हुई तो प्रबंधन हिल गया था और सेलरी रिलीज करने के साथ साथ आगे सब कुछ बेहतर होने का भरोसा मिला था. यहां तक कि सुब्रत राय को भी तिहाड़ से पत्र जारी करना पड़ा था. लेकिन प्रबंधन फिर कर्मियों की चुप्पी और धैर्य का नाजायज फायदा उठाने में जुटा है.

उपेंद्र राय भी सुब्रत राय के पैसे रिलीज करने का इंतजार कर रहे हैं. जो हालात सहारा मीडिया में है उसमें उपेंद्र राय भी खुद को चक्रव्यूह में फंसा पा रहे हैं. हालांकि कहने वाले कहते हैं कि तिहाड़ में मीटिंग एसी कांफ्रेंस के नाम पर करोड़ों का बिल भरने वाले और अपनी किताब के विज्ञापन पर करोड़ों खर्च करने वाले सुब्रत राय सेलरी के अलावा बाकी अन्य सभी कामों आयोजनों के लिए जमकर पैसे रिलीज कर रहे हैं लेकिन जाने क्या है कि सेलरी के लिए पैसे देने नाम पर वह एक सैडिस्ट मुस्कान के साथ चुप्पी साध लेते हैं. ऐसे में अब आखिरी हथियार सहाराकर्मियों की एकजुटता और हड़ताल के साथ हल्लाबोल ही है. जितने दिन सहारा कर्मी अलग थलग और चुप चुप रहेंगे, उतने दिन उनकी पीड़ा दुख मुश्किल गहन होते जाएगी.

एक सहारा कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


सहारा मीडिया के संकट के बारे में अगर आपको कुछ बताना है तो भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं. मेल भेजने वालों का नाम पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

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सुब्रत राय की रिहाई के लिए अपनी संपत्तियों को बेचेगा सहारा

2 साल से जेल में बंद सहारा प्रमुख की रिहाई के लिए धन का बंदोबस्त करने हेतु सहारा समूह ने अपनी संपत्तियों को बेचने के बारे में सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को नया प्रस्ताव पेश किया. इस प्रस्ताव के आधार पर प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर, न्यायमूर्ति ए आर दवे और न्यायमूर्ति ए के सीकरी की पीठ ने सेबी से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है.

सहारा के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बताया कि समूह अपना मुंबई का होटल सहारा स्टार, फार्मूला वन में कंपनी के 42 फीसदी शेयर और चार विमानों को बेचने के लिए बातचीत कर रहा है. समूह ने यह भी कहा कि विदेश में तीन होटलों लंदन में ग्रोवेनर हाउस होटल, न्यूयार्क प्लाजा तथा ड्रीम न्यूयार्क होटल बेचने के लिए भी बातचीत जारी है. वकील ने कहा कि ग्रोसवेनर हाउस होटल के लिए कतर से बातचीत चल रहा है जिससे करीब 2300 करोड़ रुपये मिलेंगे.

यही नहीं, समूह ने अमेरिका में उसके दो होटलों के लिए रशियन बैंक को फिर वित्तीय मदद के लिए राजी किया है. सहारा समूह ने बेंगलुरू में भी अपनी संपत्तियों को बेचने की अनुमति मांगी है. समूह को अपने निवेशकों को धन लौटाने के लिए सेबी-सहारा खाते में भुगतान के लिए 36000 करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी है.

न्यायालय ने 67 वर्षीय सुब्रत राय को अंतरिम जमानत के लिए कुछ शर्तें लगाईं थीं जिनमें पांच हजार करोड़ रुपये नकद और इतनी ही राशि की बैंक गारंटी देना तथा निवेशकों को ब्याज सहित 36000 करोड़ रुपये लौटाना शामिल हैं. सुब्रत राय सहारा की कंपनियों के दो निदेशकों रवि शंकर दुबे और अशोक राय चौधरी के साथ 4 मार्च, 2014 से तिहाड़ जेल में बंद हैं.

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सहारा मीडिया में सांकेतिक हड़ताल आज से, सहाराश्री ने कर्मियों को भेजी चिट्ठी

सहारा मीडिया में नई बनी यूनियन ने कई राउंड वार्ता बेनतीजा रहने और प्रबंधन के उदासीन रवैये से मजबूर होकर सेलरी व बकाया के लिए फिर से आंदोलन की राह पर चलने का फैसला किया है. इसके तहत 21 अक्टूबर यानि आज से अखबार का एक एडिशन छापने और चैनलों पर एक लाइव बुलेटिन चलाने का फैसला किया गया है. सहारा कर्मी अब सांकेतिक रूप से ही काम करेंगे. सहारा मीडिया में पिछले आठ महीनों से सेलरी संकट है.

यूनियन ने संसद के सामने प्रदर्शन करने से लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने तक का फैसला किया है. उधर, कर्मियों के फिर आंदोलित होते देख अबकी उनके सामने सहाराश्री की चिट्ठी का लालीपाप फेंका गया है. ये पत्र भड़ास के पास भी है जिसे आप पढ़ने के लिए नीचे लिखे Next पर क्लिक कर सकते हैं>>

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सेलरी न मिलने के खिलाफ सहाराकर्मियों का गुस्सा फूटा, अखबार के कई यूनिटों में हड़ताल

राष्ट्रीय सहारा अखबार के कर्मियों ने कई महीने से सेलरी न मिलने से नाराज होकर हड़ताल शुरू कर दिया है. खबर है कि नोएडा, देहरादून, वाराणसी संस्करणों के मीडियाकर्मियों ने कामकाज ठप कर दिया है. नोएडा एडिशन के संपादकीय विभाग के लोगों ने बाहर निकल कर नारेबाजी की है. ज्ञात हो कि सुब्रत राय के जेल जाने के बाद से सहारा मीडिया में सेलरी का संकट बना हुआ है.

नोएडा में राष्ट्रीय सहारा कर्मियों ने हड़ातल कर नारेबाजी शुरू कर दी.

कई त्योहार आए और गए लेकिन सहारा कर्मी पैसे के लिए रोते रहे. प्रबंधन दूसरे खर्चों पर कटौती नहीं कर रहा लेकिन स्टाफ की सेलरी पर कुंडली मारे बैठा है. आज की हड़ताल से संभव है कि प्रबंधन की आंख खुले और सबको बकाया सेलरी दे दी जाए. हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि सेलरी न देना प्रबंधन की रणनीति का हिस्सा है ताकि अदालतों पर दबाव बनाया जा सके कि अगर सुब्रत राय को रिहा नहीं किया गया तो लाखों घरों के चूल्हे बुझे रहेंगे. फिलहाल राष्ट्रीय सहारा अखबार में हड़ताल की खबर से मीडिया जगत में हलचल है. इससे पहले मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर दैनिक जागरण, नोएडा के कर्मियों ने हड़ताल कर दिया था.

हड़ताल को लेकर अभी अभी भड़ास के पास आई एक मेल इस प्रकार है…

भड़ास के लिए सूचना
दिनांक 10.07.2015

राष्ट्रीय सहारा नोएडा, देहरादून व वाराणसी मे संपादकीय कामकाज ठप

तीन-तीन, चार-चार माह के बाद आधा अधूरा वेतन पाकर लंबे अर्से से कम कर रहे सहारा के कर्मचारियों का धैर्य अब जवाब दे गया है। वेतन की माँग को लेकर राष्ट्रीय सहारा के नोएडा कार्यालय में आज 4.30 बजे से समपादकीय विभाग के आक्रोशित कर्मचारियों ने जमकर हँगामा किया। जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारों के साथ कर्मचारियों ने सहारा इंडिया मास कमुनिकेशन (प्रिन्ट) के प्रशासनिक प्रमुख सीबी सिंह का घेराव किया। समाचार लिखे जाने तक समपादकीय विभाग का कामकाज पूरी तरह ठप रहा है। नोएडा में किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को देखकर राष्ट्रीय सहारा की देहरादून, वाराणसी यूनिट में भी सम्पादकीय कामकाज नहीं किया जा रहा है। कर्मचारी कार्यालय तो आए हैं लेकिन समाचार लिखे जाने तक कम शुरू नहीं किए हैं। उधर गोरखपुर, लखनऊ व पटना में भी कामकाज ठप करने की योजना बनाई जा रही है।

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सहारा मीडिया से मोटी सेलरी वालों को हटाने का काम शुरू, कई नाम चर्चा में

सुब्रत राय के लगातार तिहाड़ की रोटी खाने से सहारा समूह के मीडिया वेंचर के आगे दानापानी का संकट आ खड़ा हुआ है. इसे देखते हुए प्रबंधन ने पहले तो सेलरी रोके रखकर लोगों को खुद भाग जाने का मौका दिया. पर जो मोटी सेलरी वाले लंबे समय से कुंडली मारे बैठे हैं उनके न भागने पर प्रबंधन ने उन्हें भगाने का फैसला लिया है.

चर्चा है कि गोविंद दीक्षित से लेकर अजय पांडेय, अशोक ओहरी, हरदीप सिंह, संजय बहादुर, सुनील कुमार समेत दर्जनों लोग हटाए गए हैं या हटाए जाने की प्रक्रिया में हैं. इन नामों में कुछ संपादकीय से जुड़े हैं तो कुछ एकाउंट व अन्य विभागों से. इन सभी की सेलरी दो लाख से ज्यादा बताई जाती है. सूत्रों के मुताबिक ऐसे लगभग चौदह लोगों की लिस्ट बनाई गई है जिन्हें नमस्ते किया जाएगा.

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राष्ट्रीय सहारा बनारस यूनिट हेड देवकी का लखनऊ तबादला, सुब्रत राय तिहाड़ में लेंगे मैनेजरों व संपादकों की बैठक

राष्ट्रीय सहारा अखबार से खबर है कि बनारस यूनिट के हेड देवकी नंदन मिश्रा का लखनऊ तबादला कर दिया गया है. उन्हें जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट से संबद्ध किया गया है. इस बीच, एक अन्य सूचना के मुताबिक सहारा के लखनऊ के एचसीबीएल (हिंदुस्तान कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड) बैंक में भगदड़ मचने का बड़ा कारण खुद सहारा के ही कई बड़े पदाधिकारी हैं. जब इन्हें 17 अप्रैल को आरबीआई की टीम के छापे की जानकारी मिली तो सबने फौरन अपना अपना पैसा निकालने के लिए दौड़ लगा दी. साथ ही इन लोगों ने अपने परिचितों को भी पैसे निकाल लेने की सलाह दी. इस तरह देखते ही देखते बात फैल गई और इस बैंक के आफिस के सामने पैसे निकालने वालों की लंबी कतार लग गई. बाद में आरबीआई ने इस बैंक पर रोक लगा दी लेकिन इससे पहले सहारा वाले और इनके परिचितों ने बैंक से अपना पैसा निकाल लेने में सफलता हासिल कर ली थी.

तीसरी खबर ये है कि 22 अप्रैल को सहारा श्री सुब्रत राय तिहाड़ जेल में अपने सहारा मीडिया के मैनेजरों व संपादकों की बैठक लेंगे. सूत्रों के मुताबिक सुब्रत राय को अपनी संपत्ति बेचने के लिए डील की खातिर जो मीटिंग हाल दिया गया है, वहां अब सहारा की आंतरिक मीटिंग होने लगी है. इस तरह सुब्रत राय का जेल में होना या न होना, दोनों स्थिति बराबर हो गई है. भड़ास को सूत्रों ने बताया कि 22 अप्रैल को टीजे (तिहाड जेल) में सुब्रत राय ऑल इंडिया सहारा के स्थानीय संपादकों व मैनेजरों और टीवी चैनलों की मीटिंग लेंगे. इस बैठक को लेकर संपादक व मैनेजर लोग इन दिनों दिन रात होमवर्क करने में लगे हैं.

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वेतन न मिलने से सहारा मीडिया के कर्मचारी भुखमरी के कगार पर

वेतन न मिलने से सहारा मीडिया के कर्मचारी भुखमरी के कगार पर आ गये हैं। लगभग एक सप्ताह पहले एजेडब्लू (इनका अपना कैडर है) से लेकर जूनियर एग्जकिवटिव तक के कर्मचारियों को पे स्लिप दे दी गई लेकिन वेतन आजतक नहीं मिला…. संपादक, मैनेजर, एकाउन्ट और एचआर हेड रोज कर्मचारियों को गोली पर गोली दिये जा रहे है… हर कर्मचारी अपने खर्च में कटौती कर रहा है… हर कर्मचारी कर्ज मे गले तक डूब गया है…

हालत यह है कि अधिकारीयों के चमचे तक के स्वर बगावती हो रहे हैं… एक ही सवाल सबके जेहन में है कि आखिर वेतन क्यों नही दे रहे हैं सहारा वाले… अखबार के लिये कागज खरीदने के लिये पैसा है, स्याही खरीदने के लिये पैसा है… बिजली-पानी का बिल देने के लिये पैसा है…. अधिकारियों को ढोने के लिये गाड़ी लगाने और उसमें पेट्रोल और डीजल डलवाने के लिये पैसा है केवल कर्मचारियों को वेतन देने के लिये पैसा नहीं है…..

चर्चा है कि सहारा ने मीडिया को बेच दिया है… मार्च तक ये वेतन के मामले को टाला जा रहा है…. नया मालिक आयेगा तो वह नये वित्तीय वर्ष से पैसा देगा… इस चर्चा में दम भी है… पिछले माह प्रबंधन ने एक नोटिस लगाई थी जिसमें मार्च तक का समय मांगा था. समय मांगने का राज अब कर्मचारियों की समझ में आया..

महोदय, हर अखबार वाले मजीठीया की लड़ाई लड़ रहे हैं और सहारा वाले वेतन की.. फरवरी में तीन महीने हो जायेगा वेतन मिले हुए… यानी सहारा वालों के सामने दोहरा संकट है… सूत्रों का कहना है कि यह संकट जान-बूझकर खड़ा किया जा रहा है…. अन्य यूनिटों में वेतन दिया जा रहा है… संकट केवल मीडिया के लिये है…. प्रबंधन मीडिया वालों को सबक सिखाना चाहता है क्योकि प्रबंधन का मानना है कि मीडिया ने कोई प्रभावशाली भूमिका नहीं निभाई इसलिये इसे सबक सिखाना है….. मतलब, करें वो, भरे मीडिया…

महोदय, आपने हमारी समस्या कई बार उजागर की है…. इस बार भी करेंगे… बेहतर है की इसमे प्रबंधन का भी पक्ष लें कि वेतन क्यों नही दे रहे हैं ? समूह संपादक की राय ली जा सकती है… आखिर वे चाहते क्या हैं…..

एक सहाराकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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उपेंद्र राय सहारा से मुक्त हुए!

एक बड़ी खबर सहारा मीडिया से आ रही है. सूत्रों का कहना है कि डायरेक्टर न्यूज समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर काबिज उपेंद्र राय अब इस संस्थान के हिस्से नहीं रहे. हालांकि उपेंद्र राय के करीबियों का कहना है कि उपेंद्र राय सहारा के हिस्से बने हुए हैं. बस, उनके काम का प्रोफाइल बदल गया है. उन्हें सहारा की तरफ से जो भी सुख सविधाएं मिल रही हैं, वह यथावत जारी है. उनका पद अब ग्रुप एडवाइजर का हो गया है. उनकी रिपोर्टिंग साल भर से जेबी राय को थी. अब वे सीधे सुब्रत राय को रिपोर्ट करेंगे.

वहीं दूसरी तरफ अंदरुनी सूत्र बताते हैं कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) समेत कई जांच एजेंसियों के शिकंजे में फंसे सुब्रत राय को कुछ लोगों ने समझा दिया है कि उनकी तिहाड़ जेल में बंदी जीवन गुजारने के पीछे बड़ी वजह उपेंद्र राय हैं. उन्हीं के जमाने में प्रवर्तन निदेशालय, सेबी समेत कई एजेंसीज के तेजतर्रार अधिकारियों से सहारा का पंगा हुआ और मामला दिनोंदिन उलझता बिगड़ता चला गया. इसी कारण उन दिनों भी सहारा मीडिया से उपेंद्र राय को किनारे कर पीआर का काम सौंप दिया गया था. अब उन्हें पूरी तरह साइडलाइन कर दिया गया है और कहने भर को ग्रुप एडवाइजर का पद दे दिया गया है.

सूत्रों के मुताबिक उपेंद्र राय को सुब्रत राय ने कह दिया है कि वह चाहें तो अपना खुद का या किसी दूसरी कंपनी का काम देख सकते हैं. इससे साफ पता चलता है कि सहारा से उपेंद्र राय की विदाई हो चुकी है. रिश्तों में खटास न आए और सम्मानपूर्ण एक्जिट हो, इसके लिए ग्रुप एडवाइजर का पद क्रिएट किया गया है. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उपेंद्र राय लॉ की पढ़ाई कर रहे हैं. इसी के लिए उन्होंने अवकाश हेतु प्रार्थनापत्र दिया था जिसे सुब्रत राय ने मंजूर कर उन्हें मुक्त कर दिया. फिलहाल उपेंद्र राय को लेकर सहारा में जितने मुंह उतनी बातें सुनाई पड़ रही हैं.

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सहारा ग्रुप अपने निवेशकों का धन वापस नहीं कर रहा, पढ़ें एक पीड़ित का पत्र

देवरिया : बड़े पैमाने पर जनता के धन को पानी की तरह से अपने सुख और ऐशो आराम में व्यतीत करने वाला सहारा ग्रुप अपने ग्राहकों/ निवेशकों / उपभोक्ताओं का धन परिपक्तवता अवधि पूर्ण हो जाने के बाद भी उसका भुगतान नहीं कर रहा है। जब भी इस सम्बन्ध में सहारा के कर्मचारी/अधिकारियों से बातचीत की जाती है वे कई तरह के बहाने बनाकर टरका दे रहे हैं। दबाव देने पर मारपीट और बलवा करने पर उतारू हो जाते हैं तथा जबरन झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी देते हैं।

इन दिनों शादी व्याह का सीजन चल रहा है। लोगों को अपनी बेटे बेटियों की शादी करनी है। कई जरूरतमंद ऐसे हैं जिनको अपनी बीमारी का ईलाज कराना है। सहारा के अभिभावक कहे जाने वाले सुब्रत राय सहारा और दो अन्य लोग पब्लिक के पैसे के साथ शतरंजी खेल खेलने की वजह से जेल की सलाखों के पीछे हैं तो बाकी बचे इनके कर्मचारियों को क्यों नहीं जेल में डाल दिया जा रहा है जो पब्लिक का पैसा लेने के बाद उनको वापस नहीं कर रहे हैं। क्या यह मामला अपराध की श्रेणी में नहीं आता है।  उदाहरण के लिए देवरिया जिले के एक उपभोक्ता की पीड़ा जान लेना लाजमी होगा…

दिनांक 3 दिसम्बर 2014
सेवा में,                            
क्षेत्रीय प्रबन्धक
सहारा क्रेडिट कोओपरेटिव सोसायटी लिमिटेड
सिविल लाइन्स रोड, देवरिया
    एवं
सहारा क्रेडिट कोओपरेटिव सोसायटी लिमिटेड
रजिस्टर्ड आफिस- सहारा इण्डिया भवन
1, कपूरथला काम्पलेक्स,
अलीगंज, लखनऊ-226024

विषय- परिपक्वता अवधि व्यतीत हो जाने के बाद भी भुगतान का नही किया जाना।
महोदय,
निवेदन है कि प्रार्थी मिनहाज अहमद पुत्र स्व0 मुस्ताक अहमद, निवासी वार्ड नम्बर 16, न्यू कालोनी (सच्चिदानन्द मार्ग), थाना कोतवाली देवरिया का निवासी है। प्रार्थी ने दिनांक 31-7-2009 को सहारा म्यूचयुअल बेनिफिट स्कीम के तहत एक हजार प्रतिमाह मूल्यवर्ग का खाता 60 माह हेतु खुलवाया था। जिसकी सदस्यता संख्या 10081103096 एवं खाता संख्या 10082918078 है।
जिसकी परिपक्वता पूर्ण हुए तीन माह से अधिक हो गए है। उक्त परिवक्ता धनराशि 73140-00 की वापसी के बाबत विदड्राल स्लिप भी दिनांक 22-9-2014 को बन चुका है। जिसमें गवाह के रूप में सहारा के एजेन्ट श्री संजय सिंह पुत्र केदार सिंह ग्राम बगहा मठिया पोस्ट व जिला देवरिया है व उनका कोड संख्या 1008510622 है का हस्ताक्षर भी है। लेकिन अत्यन्त दुःख के साथ अवगत कराना पड़ रहा है कि प्रार्थी को प्रतिदिन कार्यालय बुलाकर भुगतान हेतु बुलाया जाता है लेकिन धन का भुगतान न करके मात्र आश्वासन दिया जा रहा है। जबकि प्रार्थी की पत्नी श्रीमती रूही मिनहाज का स्वास्थ्य अत्यधिक खराब है तथा उनकी ईलाज के उक्त धन की सख्त जरूरत है।
अतः अनुरोध है कि अविलम्ब प्रार्थी के उपरोक्त धन भुगतान कराने की कृपा करें। अन्यथा की दशा में प्रार्थी इस प्रकरण को लेकर इलेक्ट्रानिक एवं प्रिन्ट मीडिया और कानून की शरण में जाएगा तथा इस सम्बन्ध में हुए शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक क्षति और समस्त व्यय के उतरदायी व्यक्तिगतरूप से आप एवं आपकी संस्थान होगी।
प्रार्थी-

मिनहाज अहमद
पुत्र स्व0 मुस्ताक अहमद
निवासी वार्ड नम्बर 16 न्यू कालोनी
(सच्चिदानन्द मार्ग) थाना कोतवाली, देवरिया
मोबाईल नम्बर – 9415387040

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सहारा की लाल डायरी में अमित शाह का नाम!

तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का नाम सहारा की डायरी में पाए जाने पर संसद भवन के गेट पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किया. तृणमूल ने यह मुद्दा राज्यसभा में भी उठाया. तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों ने आरोप लगाया कि सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय से बरामद एक लाल डायरी में अमित शाह का नाम शामिल है. रॉय को 28 फरवरी को गिरफ्तार किया गया था और वह अभी भी जेल में हैं. राज्यसभा की बैठक शुरू होने के साथ ही तृणमूल सदस्य डेरेक ओ ब्रायन ने यह मुद्दा उठाया और सहारा घोटाले में अमित शाह के खिलाफ सीबीआई जांच को लेकर चर्चा कराने की मांग की. सदस्यों ने अमित शाह से संबंधित सहारा की प्रतीकात्मक लाल डायरियां भी लहराई.

राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन ने सदस्यों से कहा कि यह मुद्दा 11.30 बजे के बाद उठाया जाए. उधर अन्य सदस्यों ने धान और कपास फसलों के कम खरीद मूल्य को लेकर विरोध जताया, जिसके कारण घोटाले का यह मुद्दा नहीं उठाया जा सका. दोपहर 12 बजे जब सदन की बैठक प्रश्नकाल के लिए शुरू हुई, तो डेरेक ओ ब्रायन ने दोबारा चर्चा की मांग की और कहा कि उन्होंने प्रश्नकाल स्थगित करने का नोटिस दिया है. उन्होंने कहा, ‘महोदय, हम एक मुद्दा उठाना चाहते हैं, बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा. अमित शाह का नाम सहारा प्रमुख से प्राप्त एक लाल डायरी में शामिल है.’

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सहारा के नोएडा दफ्तर से 137 करोड़ रुपये की नकदी और भारी मात्रा में सोना बरामद

खबर है कि इनकम टैक्स विभाग ने जो छापमारी सहारा के नोएडा और एनसीआर के आफिसों पर की है, उससे भारी मात्रा में रुपये और सोने बरामद हुए हैं. सूत्रों के अनुसार सहारा के नोएडा दफ्तर से 137 करोड़ रुपये नकद मिले हैं और भारी मात्रा में सोना भी मिला है. माना जा रहा है कि इस बरामदगी से निवेशकों को पैसा न लौटाने के चलते दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय सहारा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

इनकम टैक्स विभाग के अधिकारी नोएडा के सेक्टर 11 स्थित सहारा के इस दफ्तर और दि‍ल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित दफ्तरों में पहुंचे थे और जरूरी दस्तावेजों को अपने कब्जे में ले लिया था. यह कार्रवाई प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दर्ज मनी लॉन्डरिंग के मामले में की गई. बताया जा रहा है कि प्रवर्तन निदेशालय इस मामले में तिहाड़ जेल में सुब्रत राय से पूछताछ भी कर सकता है.  ईडी ने जमाकर्ताओं के करोड़ों रुपए का भुगतान न करने के मामले में इसी वर्ष सहारा समूह के खिलाफ यह केस दर्ज किया था. इस मामले की छानबीन कर रहे पूंजी बाजार नियामक सेबी से रिपोर्ट मिलने के बाद ईडी के मुंबई जोनल दफ्तर ने आपराधिक केस दर्ज किया था. गौरतलब है कि निवेशकों के करोड़ों रुपए अदा न करने के मामले में सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय मार्च से ही तिहाड़ जेल में हैं.

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सहारा के दिल्ली-एनसीआर के दफ्तरों पर छापा, संपादकजी लोग आफिस जाने से हिचक रहे

सहारा समूह की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. ताजी सूचना है कि आज सुबह आयकर विभाग की टीमों ने सहारा के नोएडा, दिल्ली समेत पूरे एनसीआर के आफिसों पर छापा मारा. नोएडा स्थित सहारा मीडिया से खबर है कि यहां मौजूद लोगों को बाहर नहीं जाने दिया जा रहा. छापेमारी की सूचना के बाद संपादकजी लोगों को आफिस जाने में पसीने छूट रहे हैं. जब आयकर विभाग के अधिकारी सहारा के दि‍ल्ली के ग्रेटर कैलाश और नोएडा स्थित दफ्तरों में पहुंचे तब यह सूचना पूरे मीडिया जगत में आग की तरह फैल गई. लेकिन ज्यादातर चैनलों ने इस खबर को नहीं दिखाया.

निवेशकों के करोड़ों रुपए हजम करने के आरोप में जेल में बंद सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय के दिल्ली-एनसीआर स्थित दफ्तरों में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने छापा मार कर जरूरी दस्तावेजों को अपने कब्जे में ले लिया है.  ये छापेमारी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की तरफ से दर्ज मनी लॉन्डरिंग के मामले में की गई है. ईडी इस मामले में तिहाड़ जेल में बंद सुब्रत राय से पूछताछ करने की तैयारी में है. ईडी ने जमाकर्ताओं के करोड़ों रुपए का भुगतान न करने के मामले में इसी वर्ष सहारा समूह के खिलाफ यह केस दर्ज किया था. इस मामले की छानबीन कर रहे पूंजी बाजार नियामक सेबी से रिपोर्ट मिलने के बाद ईडी के मुंबई जोनल दफ्तर ने आपराधिक केस दर्ज किया था. निवेशकों के करोड़ों रुपए अदा न करने के सिलसिले में सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय मार्च से ही जेल में हैं.

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सहारा समूह ने 17,000 करोड़ रुपये की मनी लांड्रिंग के लिए फर्जी इनवेस्टर बनाए!

एक बड़ी सूचना प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के सूत्रों के हवाले से आ रही है कि सहारा समूह ने मनी लांड्रिंग के लिए ढेर सारे फर्जी निवेशक बनाए. इस आशंका / आरोप की जांच के लिए सेबी ने कहा था जिसके बाद प्रवर्तन निदेशालय सक्रिय हो गया है. सेबी ने ईडी को फर्जी निवेशकों के बारे में अपने पास मौजूद समस्त जानकारी दे दी है. सेबी ने सहारा मामले में जांच की रिपोर्ट भी ईडी को सौंप दी है. सेबी रिपोर्ट के आधार पर पीएमएलए कानून के उल्लघंन का मामला बनाएगी.  ईडी जानबूझ कर बनाए गए फर्जी निवेशकों की जांच कर रहा है.

सहारा समूह ने अपनी तरफ से सेबी को निवेशकों के बारे में जो जानकारी दी थी, वह गलत निकली है. सेबी को 20,000 करोड़ रुपये में से करीब 17,000 करोड़ रुपये की मनी लांड्रिंग का शक है. इस मामले में उत्तरप्रदेश के एक बड़े राजनेता की भूमिका की भी जांच होगी. पूरे खेल के खुलासे के लिए प्रवर्तन निदेशालय की एक टीम जल्द ही सुब्रत रॉय से तिहाड़ जेल में पूछताछ कर सकती है.  ईडी ने सहारा के खिलाफ ईसीआईआर (एनफोर्समेंट केस इंवेस्टिगेशन रिपोर्ट) दाखिल कर दिया है. उधर, सहारा का कहना है प्रवर्तन निदेशालय इस मामले की जांच नहीं कर सकता क्योंकि सेबी की जांच फिलहाल जारी है.

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दो परम चिटफंडियों सुब्रत राय और कुणाल घोष के दिन और मुश्किल हुए

: कुणाल घोष ने आत्महत्या की कोशिश की तो सुब्रत रॉय के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज हुआ : कोलकाता से खबर है कि तृणमूल कांग्रेस के निलंबित सांसद एवं सारदा घोटाला मामले में आरोपी कुणाल घोष ने शुक्रवार को प्रेसीडेन्सी सुधार गृह (जेल) में नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. घटना के बाद जेल अधीक्षक, डॉक्टर और ड्यूटी पर मौजूद एक कर्मचारी को निलंबित कर दिया गया और पूरे प्रकरण की जांच के लिए गृह सचिव बासुदेव बनर्जी के नेतृत्व में समिति गठित की गयी है. साथ ही घोष के खिलाफ आत्महत्या की कोशिश करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है. पश्चिम बंगाल के सुधारगृह सेवा मंत्री एच ए सफवी ने कहा कि घोष ने दावा किया था कि उन्होंने नींद की गोलियों खा ली है. उन्हें सरकारी एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उन्हें पिछले साल गिरफ्तार किया गया था और उसके बाद से वह जेल में हैं.

एसएसकेएम के निदेशक प्रदीप मित्रा ने संवाददाताओं से कहा कि घोष को जब अस्पताल लाया गया था, उस समय वह अर्धनिद्रा में थे। मित्रा ने कहा, उन्हें सीसीयू में भर्ती कराया गया. उनके पेट की सफाई की गयी और नमूने फारेंसिक जांच के लिए भेज दिए गए हैं. घोष ने दावा किया कि उन्होंने नींद की 40 गोलियां खा ली हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विधानसभा में दिए एक बयान में अधीक्षक, जेल के डॉक्टर और ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारी को निलंबित किए जाने की घोषणा की. उन्होंने कहा कि मामले की जांच के लिए गृह सचिव बासुदेव बनर्जी के नेतृत्व में एक समिति गठित की गयी है. उन्होंने कहा कि जांच पूरी होने तक अधीक्षक, जेल के डॉक्टर और ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी निलंबित रहेंगे.

उधर, नई दिल्ली से खबर है कि पिछले 9 महीने से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद सहारा समूह के मालिक सुब्रत रॉय की मुश्किलें हैं कि कम होने का नाम  ही नहीं ले रही हैं. एनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी) ने रॉय के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है. गौरतलब है कि जमानत हासिल करने के लिए सहारा समूह और खुद सुब्रत राय पिछले कुछ महीनों से 10000 करोड़ रुपए का इंतजाम करने में जुटे हुए हैं. इसके  चलते अपनी कुछ विदेशी प्रॉपर्टी बेचने के लिए अदालत ने उन्हें जेल परिसर में ही कॉन्फ्रेंस रूम की भी सुविधा दी थी. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अब जमाकर्ताओं को करोड़ों रुपये का भुगतान नहीं किए जाने से जुड़े मामले में सहारा समूह के खिलाफ मनी लांड्रिंग का मामला दर्ज किया है.

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि प्रवर्तन निदेशालय को इस संबंध में सेबी से रिपोर्ट मिलने के बाद एजेंसी के मुंबई क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा आपराधिक मामला दर्ज किया गया. उन्होंने कहा, सहारा समूह के खिलाफ मनी लांड्रिंग रोधी कानून के तहत एक मामला दर्ज किया गया है. जांच प्रगति पर है.  इस संबंध में सहारा समूह को भेजे गए ई-मेल का कोई जवाब नहीं आया। सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय मार्च से ही जेल में बंद हैं. निवेशकों को 20,000 करोड़ रुपये से अधिक के पुनर्भुगतान को लेकर सहारा समूह लंबे समय से सेबी के साथ विवाद में है. सहारा समूह कहता रहा है कि उसने 93 प्रतिशत निवेशकों को सीधे भुगतान कर दिया है. प्रवर्तन निदेशालय इस बात की जांच कर रहा है कि कहीं अवैध परिसंपत्तियों का सृजन करने के लिए तो इस धन की मनी लांड्रिंग नहीं की गई. सूत्रों ने कहा कि सेबी को अभी तक मिले तथ्यों के आधार पर ईडी द्वारा शिकायत दर्ज की गई है. ईडी जांच तथ्यों के आधार पर पीएमएलए के तहत समूह की कुछ परिसंपत्तियों को कुर्क करने की कार्रवाई शुरू करेगा.

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सुब्रत रॉय की रिहाई के लिए हेज फंड से कर्ज़ लेगा सहारा समूह

सहारा ग्रुप अपने चीफ सुब्रत रॉय की रिहाई वास्ते धन जुटाने के लिए दो अमरीकी हेज फंज फंडों से बात कर रहा हैं। इस सौदे से सहारा ग्रुप करीब एक अरब डॉलर (6000 करोड़ रुपए) का कर्ज़ जुटाना चाहता है। मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक ये दोनों हेज फंड, विदेशों में सहारा समूह के तीन होटलों पर कुल एक अरब डॉलर से अधिक (6,000 करोड़ रुपये) के ऋण के वित्त पोषण के लिए धन दे सकते हैं।

इन होटल संपत्तियों में समूह का लंदन में ग्रासवेनोर हाउस होटल और न्यूयार्क के दो होटल प्लाजा और ड्रीम डाउनटाउन होटल शामिल हैं।

सहारा ग्रुप के प्रवक्ता ने कहा, ‘इस मामले में हम बस यही कह सकते हैं कि यह समाचार पूरी तरह से गलत है।’ प्रवक्ता ने इ-मेल से भेजे जवाब में कहा, ‘ बात जाहिर न करने की सहमति की वजह से संपत्तियों के सौदे से जुड़े किसी भी मुद्दे पर टिप्पणी न करने की हमारी असमर्थता को आप अच्छी तरह से समझ सकते हैं। आप इस तथ्य से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि बात न करने की सहमति का विदेश में कितनी सख्ती से पालन किया जाता है।’

इससे पहले रॉय दिल्ली में तिहाड़ जेल में अपने कामचलाऊ ऑफिस से होटलों की बिक्री का सौदा करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन तिहाड़ जेल के कान्फ्रेंस रूम को दफ्तर की तरह इस्तेमाल की छूट का समय खत्म होने के कारण वह सौदा नहीं कर सके। गौरतलब है कि निवेशकों का अरबों डॉलर का धन लौटाने के मामले में भारतीय शेयर बाजार नियामक (सेबी) के साथ लंबे समय से चल रहे विवाद में रॉय मार्च से जेल में बंद हैं।

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सुब्रत रॉय की हिरासत पर कानूनविदों ने उठाए सवाल

Subrat Roy

नई दिल्ली। सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय को तिहाड़ जेल में छह महीने से अधिक हो चुके हैं। इन छह महीनों में उनकी रिहाई की संभावनाएं कई बार बनीं और औंधे मुंह गिरीं। अब जैसै-जैसे दिन बीतते जा रहे है ये कहना मुश्किल होता जा रहा है कि वो सुप्रीम कोर्ट की शर्त के अनुसार अपनी रिहाई के लिए सेबी को 10,000 करोंड़ रुपए दे भी पाएंगे या नहीं।

सहारा के सूत्र बताते हैं कि ऐसा नहीं कि कंपनी के पास पौसा नहीं है, मसला रॉय की वर्तमान स्थिति का है। उनको मजबूरी में अपनी मुल्यवान संपत्तियों को बेचना पड़ रहा है, इस कारण उन्हे अच्छे दाम भी नहीं मिल रहे हैं। भला कौन व्यापारी अपनी कीमती संपत्ति को औने-पौने दाम में बेचना चाहेगा।

रॉय और उनके साथ बंद सहारा के दो निदेशकों, अशोक रॉय चौधरी और आरएस दुबे, के मामले में कुछ बातें ऐसी है जिनकी दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है। तकनीकी रूप से 10,000 करोड़ रुपए ज़मानत राशी नहीं है। रॉय को ज़मानत तो पांच महीने पहले ही दे दी गई थी लेकिन इसके लिए कोर्ट द्वारा 10,000 करोड़ रुपए देने की पूर्व-शर्त रख दी गयी। कानूनविद कहते हैं ज़मानत के लिए ये एक असाधारण पूर्व-शर्त है।

रॉय तथा सहारा के दो निदेशकों पर जो आरोप लगाए गए हैं वो बहुत स्पष्ट नहीं हैं। राय ने मां की बीमारी के कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने उपस्थित होने में असमर्थता ज़ाहिर की थी, अगर ये अदालत की अवमानना का मामला है तो रॉय ने उस अपराध के लिए नियत अधिकतम सज़ा, छह महीने, पूरी कर ली है।

सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है बहस इस बात पर होनी चाहिए कि वर्तमान परिश्थितियों में किसी व्यक्ति को जेल में रखने की उचित समय सीमा क्या है या के कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट अधिनियम में दी हुई छह महीने की सज़ा यहां लागू होती है। संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित है। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा ही वंचित किया जा सकता है।

कुछ कानूनविदों के अनुसार राय के मामले में संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हुआ है। एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता के अनुसार रॉय को निरंतर हिरास में रखा जाना संविधान में दिए जीवन के अधिकार का उल्लंघन है और सर्वोच्च अदालत में उपचारात्मक याचिका (क्यूरेटिव पिटीशन) दायर करने का आधार है।

अब प्रशन ये है, क्या रॉय को तब तक हिरासत में रखा जाए जब तक वो 10,000 हज़ार करोड़ रुपए जमा नहीं कर देते। या फिर रॉय को समुचित सुरक्षात्मक उपायों के साथ संपत्तियों के सौदे के लिए रिहा कर देना चाहिए और पैसा जमा करने के लिए एक समय सीमा निश्चित कर देनी चाहिए।

गौरतलब है कि रॉय इस वर्ष 4 मार्च से तिहाड़ जेल में बंद हैं।

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