Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

पत्रकारों पर निष्पक्ष होने का दबाव और साथी पत्रकारों को ऐसा बताने की जरूरत !  

दस साल के नरेन्द्र मोदी के शासन ने देश, समाज, अर्थव्यवस्था के साथ संविधान, लोकतंत्र के बाद अब दिखाई दे रहा है कि पूंजी बाजार का भी नुकसान किया है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब मीडिया के सहयोग से किया गया और इसके लिए मीडिया संस्थानों को तोड़ा, दबाया और कमजोर किया गया है। अगर इन सबको राजनीति और जनादेश की इच्छा भी मान लें तो विरोधी मीडिया को समर्थक लाला से खरीदवा लेना या किसी समर्थक लाला द्वारा सरकार के पक्ष में मीडिया संस्थान खरीद लेना अति है। पर ये सब पुरानी बातें हैं।

अब मीडिया के स्वतंत्र लोगों की सुरक्षा का मामला बचा हुआ है और उससे परेशानी जाहिर है। इसलिए उसे भी खत्म करने की कोशश चल रही हो सकती है। कल एक मित्र के ट्वीट से मुझे लगा कि साथी पत्रकारों को इसके प्रति सतर्क करने की जरूरत है। पत्रकारों से यह कहा जाता रहा है कि आप सरकार की बुराई करते हैं तो अच्छाई भी बताइये, सरकार के विरोधी को कांग्रेस या आम आदमी पार्टी का समर्थक कह दिया जाता रहा है और इस तरह सब की साख खराब की गई है। अब तो पत्रकारों को बाकायदा सरकार समर्थक और विरोधियों के खाने में बांट दिया गया है। ज्यादातर मीडिया संस्थानों को जैसे तैसे खरीद लिया गया है।

ऐसे में राहुल गांधी का एक वीडियो ट्वीट करते हुए कहा गया है कि पत्रकार सही है, (यानी वह संघी या गोदी या ट्रोल पत्रकार नहीं है) और जैसा संबंधित पत्रकार ने कहा, आपको सवाल न पसंद आए तो आप बोल देंगे कि ये बीजेपी की लाइन है? मैंने वीडियो देखा और मानता हूं कि सवाल बीजेपी की ही लाइन है। पहले ऐसे सवाल नहीं होते थे। यह सवाल कभी रहा ही नहीं। संसद में विरोध से संसद का कार्यकाल बेकार चला जाता है, उसपर भारी पैसा खर्च होता है। यह कोई मामला ही नहीं है। विरोध से नेताओं की लाइन, उनका पक्ष, योग्यता क्षमता मालूम होती है और तानाशाही को रोकने के लिए जरूरी है।

पारदर्शिता के लिए  इसका सीधा प्रसारण होता है। पर माइक बंद कर दिये गये, सवाल-जवाब रिकार्ड से निकाल दिये गये – ये सब चिन्ता का विषय नहीं है? संसद के कार्यकाल की चिन्ता तब की गई जब राहुल गांधी ने चुनाव नतीजे से शेयर घोटाले की जांच के लिए जेपीसी की मांग की। संसद से सदस्यों को बाहर करके फैसले करने में पैसे बर्बाद नहीं हुए? विरोध प्रदर्शन से संसद का सत्र वाशआउट हो जाता है यह बीजेपी की ही लाइन है जिसका मतलब यह निकला कि विरोध नहीं होना चाहिये औऱ बहुमत वाली सरकार जो करे करने देना चाहिये। राहुल गांधी इसी को तानाशाही कह रहे हैं और इसी के विरोध में मोर्चे पर हैं।  

इसलिए विरोध मजबूत होगा (सरकार कमजोर होगी) तो संसद सत्र निर्बाध नहीं चलेगा – यह मुददा ही नहीं है। जनादेश तो है ही। इसलिए सवाल निश्चित रूप से गलत था और जवाब बिल्कुल सही। इस तथ्य का कोई मतलब नहीं है कि संबंधित पत्रकार ने चुनाव परिणाम से संबंधित भविष्यवाणी सही की थी। बेशक, यह संभव है कि जिस पत्रकार ने यह सवाल पूछा हो वह निष्पक्ष और स्वतंत्र हो। लेकिन काम तो वह किसी सरकार समर्थक मीडिया संस्थान के लिए ही कर रहा होगा और अगर स्वतंत्र रूप से कर रहा है तो इसी समाज में रह रहा है। संभव है, उसकी कंडीशनिंग हो गई हो और इसीलिए यह सवाल (जरूरी) लग रहा हो और दूसरे सवाल दिमाग में नहीं आ रहे हों।

मुझे लगता है कि पत्रकारिता की यह स्थिति संघ और भाजपा के साथ नरेन्द्र मोदी की राजनीति का परिणाम है। इससे न सिर्फ संवैधानिक संस्थाओं बल्कि सरकार और मीडिया की भी साख खराब हुई है। जमे-जमाये और मंजे हुए पत्रकार भी मुद्दे को समझने में चूक जा रहे हैं। और साख बचाने के संघर्ष में हैं। यह ट्वीट नमूना भर है। ऐसे ट्वीट और वीडियो (अपने बचाव में) कई मित्रों के हैं। मैं इसे ले रहा हूं क्योंकि मैं स्वाति जी से कभी नहीं मिला। जानता नहीं और अभी तक ट्वीटर पर फॉलो भी नहीं करता था। 

मुझे लगता है कि राहुल गांधी ठीक कर रहे हैं। इससे लोग आत्मावलोकन करेंगे तो चीजों को समझेंगे। ऐसे लोगों का आंख मूंद कर समर्थन करने की बजाय उन्हें यथार्थ समझाया जाना चाहिए। राहुल गांधी अगर बुरे लगे रहे हैं तो यह उनकी मजबूरी है। इसे समझा जाना चाहिये। उनका व्यवहार कतई अपरिपक्व नहीं है। असल में वे शालीन तरीके से बहुत कुछ कह रहे हैं। उन्हें समझने की जरूरत है। जहां तक ऐसी पत्रकारिता और उसके प्रभाव का मामला है, कंगना रनौत को थप्पड़ के मुकाबले आरपीएफ के उस जवान को याद कीजिये जिसने ट्रेन में मुस्लिम यात्रियों को चुन-चुन कर मार दिया था। हत्या का मुकदमा चला ही होगा पर हुआ क्या?

कुल मिलाकर, भाजपा राज में मुद्दों पर बात हो ही नहीं रही है, वह चर्चा खबर का मुद्दा नहीं है। यू ट्यूबर तो उस आरपीएफ कर्मी की खबर नहीं ही करेगा। आकाशवाणी, दूरदर्शन और एएनआई, पीटीआई भी नहीं कर रहे हैं, क्योंकि सरकार को पसंद नहीं है। आप राहुल गांधी की पसंद को मुद्दा बना रहे हैं। राहुल गांधी को पत्रकारों से निपटने दीजिये वे अपने व्यवहार से संबंध बनायेंगे या बिगाड़ लेंगे। बचाव करना है तो छोटे शहरों के कमजोर पत्रकारों का कीजिये जिन्हें तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है। हत्या तक करवा दी जा रही है। मुझे नहीं लगता कि इस मामले में वरिष्ठ और स्वतंत्र या निष्पक्ष पत्रकारों को कूदने की जरूरत थी। संबंधित पत्रकार ने अपनी बात वहीं, उसी समय कह दी थी।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन