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अमर उजाला की यह पत्रकारिता गुंडई है या चिरकुटई? 

संजय कुमार सिंह

खबर से ही साफ है कि राजनाथ सिंह ने अगर कहा है कि तीन बार बात हुई तो वह पहले की बात है। सहमति बनाने की कोशिश हुई, शर्तें रखी गईं और जब शर्तें मंजूर या नामंजूर होना बताना था तो नहीं बताया गया। मंजूर होतीं तो बताया जाता। नहीं थीं, इसलिये नहीं बताया गया। कोई भी समझता है और इसी हिसाब से निर्णय हुआ। नतीजा यह है कि 48 साल बाद इस पद के लिए चुनाव हो रहे हैं। जिन कारणों से हो रहे हैं उसे जनता की नजर में स्पष्ट होना चाहिये। पर भाजपा वाले इंडिया गठबंधन के सिर ठीकरा फोड़ना चाह रहे हैं और उन्हें बहुमत का भरोसा है। यह सब समझना मुश्किल नहीं है। ऐसे में ऐसे शीर्षक का खेल पत्रकारिता के नाम पर राजनीति है।

निजी तौर पर मैं भाजपा की ओर से ओम बिरला को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में नहीं हूं। मैं तो उनके चुनाव जीत जाने को ही लोकतंत्र की हार मानता हूं पर भाजपा ने उनसे पिछली बार जैसे काम करवाये हैं वैसा वही इस बार शायद नहीं कर पायेंगे। इसलिए और वैसे भी, उन्हें छोड़कर किसी और को उम्मीदवार बनाया जाता तो इंडिया गठबंधन के लिए समर्थन करना संभव होता। एक साथ सैकड़ों सांसदों को निलंबित कर विधेयक पास कराने का विरोध करने वाले ऐसा करने वाले का ही समर्थन क्यों करें? यही नहीं, जो सहमति से सरकार चलाने की बात कर रहा है वह इसपर सहमति क्यों चाहे? मीडिया का काम है इसपर चर्चा करे ताकि आम लोगों का नजरिया स्पष्ट हो, वे सही निर्णय कर पायें। लेकिन इस तरह के शीर्षक से सरकार का समर्थन या राहुल गांधी का विरोध किया जा रहा है। जहां तक चुनाव की बात है, चंडीगढ़ और सूरत के बाद उसका भी बहुत मतलब नहीं है पर वह अलग मुद्दा है। हालांकि चीजों को समग्रता में ही देखा जाना चाहिये खासकर तब जब घोषित इमरजेंसी का विरोध और अघोषित इमरजेंसी के हालात पर सुई पटक सन्नाटा हो।   

मीडिया का काम बहुत अच्छी सरकार का समर्थन करना भी नहीं है। उसे हमेशा सरकार की कमजोरियां सामने लाना चाहिये। जनहित की बात करनी चाहिये पर वह सब अब नहीं होता है। जहां तक लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव की बात है, इंडिया गठबंधन को उम्मीद रही होगी कि सरकार बनाने के लिए नरेन्द्र मोदी का समर्थन करने वाले भी ओम बिरला के खिलाफ उसका साथ दे सकते हैं। जब यह तय हो गया कि ऐसे लोग भाजपा के साथ हैं तो भाजपा या राजनाथ सिंह को जरूरत ही नहीं थी कि वे खरगे जी को फोन करते और उन्होंने नहीं किया। उसका यही मतलब था। राहुल गांधी ने जो कहा वह सहमति की कोशिशों पर कहा। जो कहा वह तथ्य था पर अखबार ने सेवा में ऐसा शीर्षक लगा दिया जो बिना कहे कह रहा है कि राहुल गांधी ने झूठ बोला या राजनाथ सिंह ने राहुल गांधी की बातों का खंडन किया जबकि ऐसा होगा भी नहीं। संभव है, यह इरादतन नहीं किया गया हो पर इससे संदेश यही जा रहा है और अगर इरादतन नहीं है तो बड़ी चूक है।

आज सभी अखबारों में यही खबर है कि लोकसभा अध्यक्ष के लिए चुनाव होंगे, यह 48 साल बाद हो रहा है आदि। इसमें यह महत्वपूर्ण है कि सहमति से सरकार चलाने की सरकार की कोशिश या इच्छा नहीं दिख रही है जबकि प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा था और यह दिखाने की कोशिश की थी कि जो करना है वह विपक्ष को ही करना है। वे तो आदर्श और सर्वश्रेष्ठ हैं ही। इसीलिए तीसरी बार चुन कर आये हैं। ठीक है कि विपक्ष की सीटें कुछ बढ़ गई हैं पर अभी उन्हें बहुत सुधार की जरूरत है। अखबारों में इस मामले को ऐसे ही प्रस्तुत किया गया और इसी से पक्ष विपक्ष की छवि बन रही है। इसके मुकाबले के लिए राहुल गांधी को लंबी यात्राएं करनी पड़ी, पर वह अलग मुद्दा है और हर मुद्दे पर यात्रा नहीं हो सकती है।

आइये पहले आज के शीर्षक देख लें

1. टाइम्स ऑफ इंडिया – एनडीए बिरला को ही अध्यक्ष बनाने पर आमादा, कांग्रेस ने इस पद के चौथे मुकाबले में के सुरेश को चुना। उपाध्यक्ष के पद के लिए (भी) सरकार ने विपक्ष की मांग नामंजूर की। सिंगल कॉलम की एक खबर का लाल स्याही से शीर्षक है, “कांग्रेस में अभी भी इमरजेंसी की मानसिकता जीवित है : प्रधानमंत्री”।

2. हिन्दुस्तान टाइम्स – एनडीए ने फिर से ओम बिरला को चुना तो स्पीकर पद के लिए दुर्लभ शक्ति प्रदर्शन। सिंगल कॉलम की खबर है, कोटा के सांसद जिन्होंने पांच साल सदन चलाई एक और दौर के लिए तैयार।

3. इंडियन एक्सप्रेस – एनडीए और विपक्ष सहमति बनाने में नाकाम रहे तो स्पीकर के पद के लिए बिरला बनाम सुरेश। इंट्रो है, मुकाबला न हो इसके लिए विपक्ष ने सरकार से उप सभापति का पद मांगा।

4. द हिन्दू – अध्यक्ष पद के लिए लोकसभा में दुर्लभ मुकाबला होगा। 

5. द टेलीग्राफ – विपक्ष ने एनडीए के खिलाफ उम्मीदवार उतारा (फ्लैग शीर्षक)  इंडिया की आवाज मजबूती से रखी गई।

6. नवोदय टाइम्स – पांच दशक में पहली बार स्पीकर पर सहमति नहीं (फ्लैग शीर्षक) मुख्य शीर्षक है, बिरला का चुना जाना तय।

7. अमर उजाला – 48 वर्षों में पहली बार नहीं बनी सहमति बिरला के सामने विपक्ष ने सुरेश को उतारा।

हिन्दी अखबारों के शीर्षक से लग रहा है कि भाजपा उम्मीदवार ओम बिरला का चुना जाना तय है। नवोदय टाइम्स ने तो साफ-साफ यही लिखा है। पर अंग्रेजी अखबारों का शीर्षक इस स्पष्ट राय का नहीं है। जो भी हो, खबर यह थी कि सहमति नहीं बनी, भाजपा ओम बिरला को ही अध्यक्ष बनाने पर आमादा है और इसपर कोई समझौता करके उपाध्यक्ष के मामले में आश्वासन देने को भी तैयार नहीं है। खबर यह छपी है कि विरोध के बावजूद ओम बिरला अध्यक्ष बनेंगे, पक्ष सहमति के लिए तैयार नहीं है आदि आ। आज की दूसरी प्रमुख खबर राहुल गांधी को लोकसभा में विपक्ष का नेता चुने जाने को लेकर है। लेकिन इसपर कोई विवाद नहीं था। जहां, विवाद था वहां सहमति नहीं बनी – यह खबर आज नहीं है। उल्टे, हिन्दी के दोनों अखबारों ने मुकाबले का परिणाम दे दिया है। इससे लग रहा है कि चुनाव व्यर्थ है। लेकिन जैसा मैंने ऊपर लिखा है, ओम बिरला की उम्मीदवारी बिना विरोध स्वीकार नहीं की जा सकती थी और विरोध का नतीजा है कि चुनाव हो रहे हैं। यह बड़ा मुद्दा है लेकिन मीडिया ने उसे बनने नहीं दिया या और भाजपा ने अपनी योग्यता क्षमता का पूरा उपयोग किया।

इस लोकसभा में सरकार के सहयोगियों के चुनाव और विपक्ष की राजनीतिक मजबूती का अंदाजा निर्दलीय सांसद पप्पू यादव की इस चुनौती से लगता है, ‘छठी बार का सांसद हूं, आप हमको सिखाइयेगाआप कृपा पर जीते होंगे, मै निर्दलीय जीता हूं’। यही स्थिति अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों की है। चुनाव जीतना और राजनीतिक रूप से मजबूत होना अलग चीजें हैं। यही नहीं, पप्पू यादव कल रीनीट लिखा टीशर्ट पहन कर शपथ लेने आये थे। आज नीट की चर्चा पहले पन्ने पर तो नहीं है। नवोदय टाइम्स में एक खबर है, यूपी में प्रश्नपत्र लीक पर उम्रकैद, एक करोड़ जुर्माना। कहने की जरूरत नहीं है कि तरह-तरह की परीक्षाओं के लिए एनटीए जैसी संस्था बनाना उसमें आरएसएस और अभाविप के लोगों का प्रवेश पा जाना और फिर प्रश्नपत्र लीक होने या दूसरे घपलों के लिए सख्त कानून बनाने से बात नहीं बनेगी।

बच्चों को बड़ी, महंगी गाड़ी नहीं देनी चाहिये। यह सामान्य सी बात है। नियमों में संशोधन और जरूरत के साथ तमाम उपाय किये जाने के बावजूद बच्चे गाड़ी चला ही रहे हैं और दुर्घटनाएं भी हो ही रही है। परीक्षा में चोरी या प्रश्नपत्र लीक होने का मामला भी ऐसा ही है। कानून बनाने से नहीं रुकेगा। जब समाज शॉर्ट कट को गलत नहीं मानता है, कमजोर को लंगड़ी मारने से परहेज नहीं है, पैसे वालों को पता है कि फर्जी डिग्री से भी नौकरी मिल जाएगी और ताकत हो तो अदालतें भी कुछ नहीं करेंगी तो कानून से क्या होने वाला है। खास कर तब जब साफ दिखाई दे रहा है कि केंद्रीय मंत्री के स्तर पर प्रश्नपत्र लीक को स्वीकार नहीं करने की कोशिश चल रही है। पहले इसे स्थानीय मामला बताया गया, फिर जांच सीबीआई को दी गई उसने कई राज्यों में विस्तार महसूस किया, बिहार पुलिस ने कहा कि एनटीए ने सहयोग नहीं किया। एनटीए का कुछ नहीं हुआ – ऐसे में जुर्माने से क्या होना है। वैसे भी, प्रश्नपत्र लीक होना भ्रष्टाचार है, ‘व्यवस्था’ के सहयोग या उम्मीद से संभव होता है। जुर्माना बढ़ाने से गेस पेपर कहकर बिकेगा! यह समस्या कोचिंग वालों के कारण भी है। उसपर भी ध्यान देने की जरूरत है। लेकिन कोचिंग की जरूरत क्यों है वह आप जानते हैं।

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